NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
भारत
राजनीति
नई MSP घोषणा: गेहूं की बाल में गेहूं का दाना ही नहीं 
आशा किसान स्वराज के अध्यक्ष किरन विस्सा ने सरकार द्वारा जारी एमएसपी का हिसाब-किताब लगाकर बताया है कि पिछले साल के मुकाबले गेहूं की एमएसपी पर केवल 2% की वृद्धि की गई है। जो पिछले 12 सालों में सबसे कम है।
अजय कुमार
09 Sep 2021
नई MSP घोषणा: गेहूं की बाल में गेहूं का दाना ही नहीं 

बिहार के एक किसान ने बताया कि 1 एकड़ खेत में तकरीबन 10 से 12 क्विंटल गेहूं की पैदावार होती है। जमीन की जुताई, बुवाई, निराई, चिखुराई, सिंचाई से लेकर खाद, कीटनाशक और मजदूरों की मेहनत मिलाकर एक एकड़ गेहूं के खेत में 12 से 13 हजार रुपए का खर्च लग जाता है। बिहार में सरकारी मंडियों का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है। इसलिए किसी नजदीकी खरीददार को ही बेचना पड़ता है। वह मुश्किल से 1500 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से गेहूं खरीदता है। इस तरह से 1 एकड़ जमीन पर 12 हजार का खर्चा लगाने के बाद तकरीबन 15 हजार प्रति एकड़ मिलता है। कमाई के हिसाब से देखा जाए तो खेत में रबी के चार महीने के बाद प्रति एकड़ मुश्किल से 3 से 5 हजार की कमाई। नहीं तो घाटा ही घाटा।

गेहूं की पैदावार पर लगने वाली लागत और कमाई के इस उदाहरण को दिमाग के एक कोने में बिठाकर केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए उस पर्चे को पढ़ना चाहिए जिसमें रबी की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस की कीमत को घोषित किया गया है। अगर केवल गेहूं की ही बात करें। जिसकी पैदावार रबी की फसलों में सबसे अधिक होती है। तो न्यूनतम समर्थन मूल्य के तौर पर सरकार ने प्रति क्विंटल 2015 रुपए MSP तय की है। 

यानी अगर बिहार का किसान तकरीबन 12 हजार का खर्चा लगा कर प्रति एकड़ जमीन पर 10 से 12 क्विंटल गेहूं की पैदावार करता है और उसकी गेहूं की सारी बोरियां सरकार खरीदती है तो उसे महज 20 हजार से लेकर 25 हजार मिलेंगे। कमाई के तौर पर देखा जाए तो रबी के 4 महीने की हाड़ तोड़ मेहनत के बाद 8 हजार से लेकर 13 हजार तक की कमाई।

लेकिन यहां सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसा तब होगा जब बिहार के किसान की सारी की सारी बोरियां सरकार द्वारा घोषित किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी जाएंगी। आंकड़ें कहते हैं कि बिहार के 94% किसानों की अनाज की बोरियां एमएससी पर नहीं बिकती हैं।

यह हिसाब किताब इस सवाल का जवाब है कि 2 एकड़ से कम की जमीन पर जीने वाले भारत के 80 फ़ीसदी किसान की जिंदगी बदहाली के दौर से गुजरने के लिए अभिशप्त है लेकिन फिर भी सरकार से लेकर मीडिया तक सब के सब किसानों के संघर्ष को खलनायक के तौर पर पेश करने में लगे रहते हैं। 

जब भी एमएसपी की घोषणा की जाती है तो सरकार इसे ऐतिहासिक बता कर अपनी पीठ थपथपाती है। और मीडिया भी अपना हेडलाइन इसी आधार पर बनाता है। संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल तेलंगाना के एक संगठन आशा किसान स्वराज के अध्यक्ष किरन विस्सा ने सरकार द्वारा जारी एमएसपी का हिसाब किताब लगाकर बताया है कि पिछले साल के मुकाबले गेहूं की एमएसपी पर केवल 2% की वृद्धि की गई है। जो पिछले 12 सालों में सबसे कम है।

किरन विसा के मुताबिक अगर घोषित की गई एमएसपी की दरों को महंगाई के दरों से समायोजित कर वास्तविक कीमत निकालें तब तो किसानों को एमएससी के तौर कुछ भी मिलता हुआ नहीं दिखता है। साल 2021-22 में गेहूं की एमएसपी की कीमत सरकार ने 1975 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की थी। इस बार गेहूं की कीमत 2015 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की गई है। पिछले साल के मुकाबले ₹40 की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन अगर 6% की महंगाई दर के हिसाब किताब को जोड़कर देखें तो असली कीमत महज 1901 रुपए प्रति क्विंटल निकलती है। यानी किसानों को पिछले साल के मुकाबले इस साल प्रति क्विंटल गेहूं बेचने पर वास्तविक कीमत के आधार पर ₹74 कम मिलेगा।

महंगाई दर जोड़कर कीमतों का आकलन करना बहुत जरूरी है। क्योंकि ऐसा तो होता नहीं कि पिछले साल अगर ₹500 में गैस सिलेंडर मिल रहा था तो इस साल भी ₹500 में मिलेगा। इस साल इसकी कीमत 1000 प्रति सिलेंडर तक पहुंच चुकी है। इसलिए यह पता लगाने के लिए कि सरकार द्वारा एमएसपी के तौर पर दिए गए गेहूं के बाली में हकीकत में गेहूं का दाना है भी या नहीं यह जानने के लिए महंगाई दर के हिसाब से एमएससी का आकलन करना जरूरी है। 

जौ के लिए पिछले साल की एमएसपी ₹1600 प्रति क्विंटल थी। सरकार ने इस बार इसे बढ़ाकर ₹1635 प्रति क्विंटल कर दिया है। महंगाई दर के हिसाब से जोड़ें तो यह महज ₹1542 प्रति क्विंटल बनती है। यानी एक क्विंटल जौ पर पिछले साल के मुकाबले इस साल किसानों को तकरीबन ₹58 कम मिलेंगे। यही हाल चने और सूरजमुखी के लिए निर्धारित की गई एमएसपी का है। सरकार ने प्रति क्विंटल चना के लिए 5100 रुपए और सूरजमुखी के लिए 5327 रुपए एमएसपी निर्धारित की है। जिसकी गणना अगर महंगाई दर जोड़कर की जाए तो पिछले साल से चने की कीमत प्रति क्विंटल ₹166 कम है और सूरजमुखी की कीमत प्रति क्विंटल  ₹194 कम है। रियल प्राइस यानी वास्तविक कीमतों के आधार पर केवल मसूर और सरसों की फसल की एमएसपी में बढ़ोतरी की गई है। मसूर पर प्रति क्विंटल ₹89 की बढ़ोतरी हुई है तो सरसों के लिए प्रति क्विंटल ₹114 की बढ़ोतरी हुई है।

कुल मिला जुला कर कहा जाए तो सरकार द्वारा रबी की छह फसल पर घोषित किए गए MSP में चार फसलों पर वास्तविक कीमत के आधार पर कमी की गई है और केवल दो फसलों पर वास्तविक कीमत के आधार पर बढ़ोतरी की गई है। गेहूं जो रबी के सीजन में बोई जाने वाली सबसे बड़ी फसल है उस पर भी पिछले साल के मुकाबले ₹74 रुपए प्रति क्विंटल की दर से कमी की गई है। 

यह हाल तब है जब किसान सड़कों पर मौजूद हैं। सरकार की लाठियां खा रहे हैं। रात दिन सुबह शाम गर्मी बरसात सब कुछ झेलते हुए अपना हक मांग रहे हैं। लेकिन फिर भी सरकार ने उन्हें कुछ भी नहीं दिया। किसान अपने हक का न्यूनतम मेहनताना मांगते हैं। लेकिन हकीकत की दुनिया में छोड़ दीजिए सरकारी कागजों में भी उन्हें जायज कीमत नहीं मिलती। मौजूदा समय में असली सवाल यही है कि अर्थव्यवस्था के जिस सेक्टर में देश की आबादी के कुल कार्यबल का 40 फ़ीसदी हिस्सा लगा हुआ है, उसकी आमदनी इतनी कम क्यों? अगर 40 फ़ीसदी लोगों को ढंग का मेहनताना नहीं मिल पा रहा है तो सरकार होने का मतलब क्या रह जाता है?

MSP
minimum support price
RABI CROPS
MSP Rabi Crops
farmers crises
Modi government
BJP

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

अगर फ़्लाइट, कैब और ट्रेन का किराया डायनामिक हो सकता है, तो फिर खेती की एमएसपी डायनामिक क्यों नहीं हो सकती?

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

आख़िर किसानों की जायज़ मांगों के आगे झुकी शिवराज सरकार

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

ग्राउंड रिपोर्टः डीज़ल-पेट्रोल की महंगी डोज से मुश्किल में पूर्वांचल के किसानों की ज़िंदगी

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

किसान आंदोलन: मुस्तैदी से करनी होगी अपनी 'जीत' की रक्षा

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License