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नई शिक्षा नीति “भारतीय शिक्षा को बर्बाद” करने का ‘‘एकतरफ़ा अभियान’:सीपीआईएम
सीपीआईएम ने सरकार द्वारा लाई गई नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विरोध किया और इसे “भारतीय शिक्षा को बर्बाद” करने का ‘‘एकतरफ़ा अभियान’’ बताया। पार्टी ने आरोप लगाया कि इस नीति को तैयार करने के लिए संसद की पूरी तरह अवहेलना की गई है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
30 Jul 2020
नई शिक्षा नीति

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नई शिक्षा नीति(new education policy ) को मंजूरी दे दी। इसमें स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किये गए हैं। सरकार इसे भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक मील का पत्थर बता रही है। जबकि शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हितधारक चाहे वो छात्र ,शिक्षक या फिर शिक्षा से जुड़े शिक्षाविद सभी इसकी आलोचना कर रहे है। वो इसे एक तरह से शिक्षा की गुणवत्ता में कमी और निजीकरण करने की साज़िश बता रहे है। उनका कहना है कि नई शिक्षा नीति देश में शिक्षा व्यवस्था को और कमजोर करेगी और गरीब जनता जिसका बड़ा तबका पहले से ही शिक्षा से बाहर है ,उसे शिक्षा में समाहित करने के बजाए ये उन्हें शिक्षा से और दूर करेगी।

हालंकि इस नई शिक्षा नीति को ऐतिहासिक बताते हुए ,सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संवाददाताओं को बताया कि प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में नयी शिक्षा नीति को मंजूरी दी गई। उन्होंने बताया कि 34 साल से शिक्षा नीति में परिवर्तन नहीं हुआ था, इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण है।  बैठक के बाद उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे और स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता सचिव अनिता करवल ने प्रेस वार्ता के दौरान एक प्रस्तुति दी जिसमें नई शिक्षा नीति के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

पूरी प्रेस वार्ता निचे देख सकते है ;-

नई शिक्षा नीति में क्या है?

स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किए गए हैं। इसमें (लॉ और मेडिकल शिक्षा को छोड़कर) उच्च शिक्षा के लिये सिंगल रेगुलेटर (एकल नियामक) रहेगा । इसके अलावा उच्च शिक्षा में 2035 तक 50 फीसदी सकल नामांकन दर पहुंचने का लक्ष्य है। नई नीति में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट (बहु स्तरीय प्रवेश एवं निकासी) व्यवस्था लागू किया गया है ।

खरे ने बताया कि आज की व्यवस्था में अगर चार साल इंजीनियरंग पढ़ने या 6 सेमेस्टर पढ़ने के बाद किसी कारणवश आगे नहीं पढ़ पाते हैं तो कोई उपाय नहीं होता, लेकिन मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम में 1 साल के बाद सर्टिफिकेट, 2 साल के बाद डिप्लोमा और 3 साल के बाद डिग्री 4 साल के बाद डिग्री मिल जाएगी। यह छात्रों के हित में एक बड़ा फैसला है। वहीं, जो छात्र रिसर्च में जाना चाहते हैं उनके लिए 4 साल का डिग्री प्रोग्राम होगा, जबकि जो लोग नौकरी में जाना चाहते हैं, वो तीन साल का ही डिग्री प्रोग्राम करेंगे । नयी व्यवस्था में एमए और डिग्री प्रोग्राम के बाद एफफिल करने से छूट की भी एक व्यवस्था की गई है। उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे ने कहा, शिक्षा में कुल जीडीपी का अभी करीब 4.43 फीसदी खर्च हो रहा है, लेकिन उसे 6 फीसदी करने का लक्ष्य है और केंद्र एवं राज्य मिलकर इस लक्ष्य को हासिल करेंगे।

उन्होंने कहा कि हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं के अलावा आठ क्षेत्रीय भाषाओं में भी ई-कोर्स होगा। वर्चुअल लैब के कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जायेगा। इसके साथ ही नेशनल एजुकेशन टेक्नॉलोजी फोरम बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एनआरएफ) की स्थापना होगी जिससे अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा मिलेगा। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम अब शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। शिक्षा (टीचिंग, लर्निंग और एसेसमेंट) में तकनीकी को बढ़वा दिया जाएगा। तकनीकी के माध्यम से दिव्यांगजनों में शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा।

वहीं, स्कूली शिक्षा सचिव अनिता करवल(anita karwal) ने बताया कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के 15 वर्ष हो गए हैं और अब नया पाठ्यचर्या आयेगा । इसी प्रकार से शिक्षक शिक्षा के पाठ्यक्रम के भी 11 साल हो गए हैं, इसमें भी सुधार होगा। उन्होंने कहा कि बोर्ड परीक्षा के भार को कम करने की नयी नीति में पहल की गई है। बोर्ड परीक्षा को दो भागों में बांटा जा सकता है जो वस्तुनिष्ठ और विषय आधारित हो सकता है। उन्होंने बताया कि शिक्षा का माध्यम पांचवी कक्षा तक मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा या घर की भाषा में हो। बालिकाओं के लिये लैंगिक शिक्षा कोष की बात कही गई है।

करवल ने कहा कि बच्चों के रिपोर्ट कार्ड के स्वरूप मे बदलाव करते हुए समग्र मूल्यांकन पर आधारित रिपोर्ट कार्ड की बात कही गई है। हर कक्षा में जीवन कौशल परखने पर जोर होगा ताकि जब बच्चा 12वीं कक्षा में निकलेगा तो उसके पास पूरा पोर्टफोलियो होगा। इसके अलावा पारदर्शी एवं आनलाइन शिक्षा को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

इस अवसर पर मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि नए भारत के निर्माण में नई शिक्षा नीति 2020 मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा किसी भी परिवार, राष्ट्र की आधारशिला होती है। नयी शिक्षा नीति को लेकर समाज के सभी वर्गो के 2.25 लाख सुझाव आए और जो सुझाव आए हमने उनका व्यापक विश्लेषण किया ।

इस इस शिक्षा निति के प्रमुख बिंदु निचे देख सकते है ,जिसे सरकार ने कल जारी किया था।

Education Policy by Gautam Kumar on Scribd

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति ने पिछले वर्ष मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को नयी शिक्षा नीति का मसौदा तब सौंपा था, जब निशंक ने मंत्रालय का कार्यभार संभाला था । इस समिति में नौ लोग थे। अधिकारियों ने बताया कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति को मंजूरी दी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर शिक्षा मंत्रालय कर दिया

गौरतलब है कि वर्तमान शिक्षा नीति 1986 में तैयार किया गया था और इसमें 1992 संशोधन किया गया था । नयी शिक्षा नीति का विषय 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल था । मसौदा तैयार करने वाले विशेषज्ञों ने पूर्व कैबिनेट सचिव टी एस आर सुब्रमण्यम के नेतृत्व वाली समिति द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर भी विचार किया । इस समिति का गठन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने तब किया था जब मंत्री स्मृति ईरानी थी ।

नई शिक्षा नीति को “भारतीय शिक्षा को बर्बाद” करने का ‘‘एकतरफा अभियान’:सीपीआईएम

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (सीपीआईएम) सरकार द्वारा लाई गई नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विरोध किया और इसे “भारतीय शिक्षा को बर्बाद” करने का ‘‘एकतरफा अभियान’’ बताया। पार्टी ने आरोप लगाया कि इस नीति को तैयार करने के लिए संसद की पूरी तरह अवहेलना की गई है।

सीपीआईएम की ओर से जारी एक वक्तव्य में कहा गया, “माकपा पोलित ब्यूरो, नई शिक्षा नीति लागू करने के एकतरफा फैसले और मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलने के केंद्रीय मंत्रिमंडल के निर्णय की कड़े शब्दों में भर्त्सना करता है।”

बयान में कहा गया, “हमारे संविधान में शिक्षा समवर्ती सूची में है। केंद्र सरकार द्वारा, विभिन्न राज्य सरकारों के विरोध और आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा तरीके से नई शिक्षा नीति लागू करना संविधान का पूरी तरह उल्लंघन है।”

पार्टी ने कहा कि इस प्रकार की नीति पर संसद में चर्चा की जानी चाहिए थी और सरकार ने इसका आश्वासन भी दिया था।

पार्टी ने कहा, “यह एकतरफा फैसला भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करने के लिए लिया गया है। इस नीति से भारतीय शिक्षा का केंद्रीकरण, सांप्रदायिकता और व्यवसायीकरण बढ़ेगा।”

सीपीआईएम ने कहा, “सीपीआईएम पोलित ब्यूरो भाजपा सरकार के इस निर्णय का कड़ा विरोध करता है। पोलित ब्यूरो की मांग है कि इसे लागू करने से पहले संसद में चर्चा की जाए।”

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगो इसका कर रहे है विरोध

देशभर में स्कूली शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले और आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष वकील अशोक अग्रवाल ने भी इस नई शिक्षा नीति का विरोध किया। उन्होंने इसको एक भेदभाव बढ़ने वाला कहा।

जानी-मानी शिक्षाविद और दिल्ली यूनिवर्सिटी की फैकल्टी ऑफ एजुकेशन की पूर्व शिक्षिका अनीता रामपाल भी इसको लेकर अपना विरोध जाता चुकी है। उन्हें लगता है कि नए तंत्र के जरिए राज्यों के क्षेत्राधिकार पर अतिक्रमण किया जा रहा है।

छात्र संगठन एसएफआई के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव विक्रम सिंह जोकि लगतार शिक्षा व्यवस्था पर लिखते है। उन्होंने इस नई शिक्षा निति को लकेर सरकार की मंशा पर सवाल उठाया और इसे मोदी मंत्रिमंडल का छात्रों के लिए फ़तवा क़रार दिया। उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि"... सवाल उठना लाजमी है कि इस समय जब पूरे देश का ध्यान कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने, बदहाल अर्थव्यवस्था को बचाने और बेरोजगारी की विकराल समस्या से पार पाने की आशा अपनी सरकार से कर रहा है, तब ऐसी क्या आफत आ गई कि इतने महत्वपूर्ण निर्णय के लिए सरकार संसद के सत्र की प्रतीक्षा तक नहीं कर पाई।"

उनकी पूरी टिप्पणी यहां देख सकते है ;-

 

NEP के रूप में मोदी मंत्रिमंडल का छात्रों के लिए फ़तवा जारी मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज दुनिया के सबसे बड़े...

Posted by Vikram Singh on Wednesday, 29 July 2020

शिक्षक भी इसका कर रहे है विरोध

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ(डूटा) ने बयान जारी कर नई शिक्षा नीति का विरोध किया। उन्होंने अपने बयान में सरकार द्वार इस माहमारी के दौर में इस नीति को  लकेर निंदा की और इसे शिक्षा पर हमला बताया। दूटा ने विश्वविद्यालयों को अलग करने और हर उच्च शैक्षिक संस्थान को एक बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को सौंपने के प्रस्ताव का विरोध किया , इस बोर्ड के पास कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के संचालन से जुड़े सभी अधिकार होंगे। इसके साथ ही यूजीसी और अन्य विनियमन निकायों को खत्म कर दिया जाएगा। इसके साथ ही डूटा ने स्वस्य्ता को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए और इसे उच्च शिक्षा के निजीकरण को बढ़ाने वाला कदम और सरकारी शिक्षा को कमज़ोर करने वाला कदम बतया हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय दयाल सिंह कॉलेज में शिक्षक और शिक्षक अंदोलन के सक्रिय नेता राजीव कुंवर ने मल्टीपल एग्जिट और ऑटोनोमी जिसे सरकार छात्रों के हित में बता रही है। उसको छात्र शिक्षक दोनों के खिलाफ बताया है और वो इस नई शिक्षा नीति को निजीकरण का प्रयास और बड़े पूंजीपतियों के लिए मदद बता रहे रहे हैं। उनकी पूरी टिप्पणी निचे पढ़ सकते है;-

छात्रों का भारी विरोध

शिक्षा नीति का सबसे अधिक प्रभाव अगर किसी पर होगा तो वो है छात्र ,क्योंकि वो शिक्षा के सबसे बड़े हितधारक है। सरकार बड़े बड़े दावे कर रही है कि ये क्रन्तिकारी कदम है परन्तु छात्र संगठनों ने इसकी भर्त्सना की और इसे छात्र विरोधी बतया है। आज यानि 30 जून को पूरे देश भर के छात्रों ने #RejectNEP2020 के साथ ट्विटर पर विरोध करने का विरोध करने का एलान किया है। 30 से अधिक छात्र संगठन और छात्र संघो के सँयुक्त मंच ऑल इण्डिया फोरम टू सेव पब्लिक एजुकेशन ने भी इसका विरोध किया हैं।

छात्र संगठन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया(एसएफआई) दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष सुमित कटारिया ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए इस नई शिक्षा निति को शिक्षा के लिए विनाशकारी कहा। उन्होंने कहा कि सरकर अब खुलेतौर पर निजीकरण का एलान किया है लेकिन वो इसे स्वयत्तता के पर्दे से ढक रही है। इसके साथ ही सरकार कह रही है कि  वो अब शिक्षा के क्षेत्र मेंजीडीपी का 6% खर्च करेगी और वर्तमान में 4% कर रही है। लेकिन ये खुद बहुत कम है जबकि छात्र अंदोलन की लंबे समय से मांग रही है कि शिक्षा पर जीडीपी का 10% खर्च होना चाहिए।

सुमित ने कहा "मंत्री जी कह रहे है उन्होंने इसे लाखो लोगो के साथ चर्चा करके उनके परामर्शो को मानकर तैयार किया है लेकिन सच्च्चाई यह है कि उन्होंने किसी भी छात्र संगठन ,शिक्षक संगठन या फिर अन्य शिक्षाविदों के सुझावों पर कोई ध्यान नहीं दिया है। इसे अपने एजेंडे के तहत देश पर थोपा जा रहा है।"

आगे उन्होंने कहा "कुछ चीजें कूड़ेदान में डालने योग्य होती है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी उनमें से एक है। ऐसी शिक्षा नीति का शिक्षा से कोई लेना देना नहीं है।"

छात्र संगठन केवाईएस ने केंद्र सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पारित करने के कदम की कड़ी भर्त्सना करते हुए कहा कि ये स्कूल और उच्च शिक्षा में अनौपचारिकरण को बढ़ावा देकर करोड़ों छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से बाहर करने वाला कदम है।

अपने बयान में केवाईएस ने कहा कि नई शिक्षा नीति बहुसंख्यक छात्रों को औपचारिक शिक्षा से दूर करने का प्रबंध करती है। भाजपा के एजेंडे के तौर पर लायी गयी इस नीति के तहत स्कूली शिक्षा के अनौपचारिकरण का रास्ता साफ होगा।इस कारण दलित, आदिवासी, महिलाएं, अल्पसंख्यक समुदायों के बहुसंख्यक लोग और मजदूर-वर्ग से आने वाले औपचारिक शिक्षा से बाहर होंगे ।

एसएफआई ने कहा कि ये नई शिक्षा निति छात्र विरोधी है और ये उन्हें मंज़ूर नहीं है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के मसौदे पर देश भर से भारी विरोध और आलोचना हो रही थी । इसकी ड्राफ्ट में लोकतांत्रिक विरोधी , केंद्रीयकृत प्रकृति थी। इसके साथ ही इसके सिफारिशों में निजीकरण को बढ़ावा दिया गया था। इसलिए हर वर्ग के लोगो ने इस  न करने और परार्मश करने को कहा था। परन्तु सरकार इन सभी बातो को दरकिनार करते हुए इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक असाधारण स्थिति का लाभ उठाया और नई शिक्षा नीति पारित कर दिया ।

एसएफआई ने इसके ख़िलाफ़ देशव्यापी अभियान चलने की भी बात कही।  उन्होंने कहा कि  यह न समझो कि मंत्रालय का नाम बदलकर नई शिक्षा नीति के खतरनाक तत्वों को कवर कर लोगे। एसएफआई ने कहा कि वो शारीरिक दूरी बनाए रखते हुए देशभर में धरना प्रदर्शन सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का इस्तेमाल करके भी एक्टिव अभियान चलाएंगे।

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ)

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