NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
भारत
राजनीति
क्या सच में हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ है मांसाहार?
इतिहास कहता है कि इंसानों के भोजन की शुरुआत मांसाहार से हुई। किसी भी दौर का कोई भी ऐसा होमो सेपियंस नही है, जिसने बिना मांस के खुद को जीवित रखा हो। जब इंसानों ने अनाज, सब्जी और फलों को अपने खाने में शामिल किया, तब भी मीट यानी मांस की उसके खाने में प्रचुरता थी।
अजय कुमार
13 Apr 2022
non veg

मांसाहार पर क्या कहा जाए? इस सवाल का सबसे सटीक जवाब तो यही है कि इस पर कुछ भी न कहा जाए। यह व्यक्ति के निजी स्वतंत्रता का मामला है। कोई मांसाहारी या शाकाहारी है? इससे हमें और आपको क्या लेना देना? हमारा संविधान भी यही कहता है कि कोई खाता पीता है, यह उसके जीवन जीने के अधिकार में शामिल है। उसकी निजता के अधिकार में शामिल है। इस पर कोई बहस नही होना चाहिए। यह उसकी चयन की स्वतंत्रता का मामला है। अगर किसी खान पान से लोकव्यवस्था और दूसरे के जीवन में कोई अड़चन नहीं आती है तो खान पान पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगनी चाहिए। भारत का संविधान भी इसका पक्षधर है।

मौजूदा समय के इस तथ्यनुमा राय के बाद मांसाहार और शाकाहार के विवाद पर कोई बात नहीं बचती है। इसके बाद इस पर खूब स्वस्थ बहस की जा सकती है मांसाहार अच्छा या शाकाहार। लेकिन मांसाहार और शाकाहार को लेकर नियम नहीं बनाया जा सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि नवरात्रि में कोई मांस नहीं खायेगा। यह नहीं हो सकता कि मांसाहार और शाकाहार को लेकर बवाल इतना हो कि मारपीट से लेकर दंगा फसाद हो जाए।

लेकिन यह सब हो रहा है तो इसका सबसे पहला जवाब यही है कि यह सब केवल समाज के कुछ उपद्रवी लोग नहीं कर सकते। अगर उपद्रवी करते या करने की कोशिश करते तो संविधान के जरिए संचालित होने वाली सरकार ऐसा होने नहीं देती। लेकिन खुलेआम मांसाहार और शाकाहार को लेकर नियम बन रहे है तो इसका मतलब है कि यह सब कुछ सरकार के देख रेख में हो रहा है। इस पर प्रत्यक्ष या परोक्ष सरकार की सहमति है।

अगर सरकार की सहमति से हो रहा है तो इसका मतलब है कि सरकार संविधान से संचालित नहीं हो रही है। जिस जगह से संचालित हो रही है, वहीं मांसाहार और शाकाहार से जुड़े हिंसाचार का जवाब छिपा है। भोली समझ वाले जो दंगाइयों के पीछे निकल पड़ते हैं वह कहेंगे कि हिंदू धर्म के रक्षा के खातिर यह सब किया जा रहा है। बेचारे इसी चाल में फंस जाते है। वह राम से पनपे मूल्यों से ज्यादा भाजपा और आरएसएस के पिछलग्गू बन जाते हैं।

इतिहास कहता है कि इंसानों के भोजन की शुरुआत मांसाहार से हुई। किसी भी दौर का कोई भी ऐसा होमो सेपियंस नही है, जिसने बिना मांस के खुद को जीवित रखा हो। जब इंसानों ने अनाज, सब्जी और फलों को अपने खाने में शामिल किया, तब भी मीट यानी मांस की उसके खाने में प्रचुरता थी। भोजन में मांस की प्रधानता थी। सहायक की भूमिका में शाकाहार था। धर्म बाद में आया और मांस पहले आया और इंसानों के खाने का हिस्सा ऐसे बना कि अगर कोई कहता है कि हिंदू धर्म में मांसाहार का सेवन नहीं होता तो वह गलत कहता है। वर्तमान का हाल देखिए।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 के आंकड़े कहते हैं कि भारत की तकरीबन 90 प्रतिशत आबादी मांस और मछली का सेवन करती है। 25 राज्यों में तकरीबन 50 प्रतिशत से अधिक आबादी मांस खाती है।

सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं कि दलितों में तकरीबन 67 प्रतिशत मांसाहारी हैं। आदिवासियों में तकरीबन 68 प्रतिशत मांसाहारी हैं। ओबीसी में तकरीबन 59 प्रतिशत मांसाहारी हैं।

ये भी पढ़ें: जेएनयू में फिर हिंसा: एबीवीपी पर नॉनवेज के नाम पर छात्रों और मेस कर्मचारियों पर हमले का आरोप

 

यानी आंकड़ें बताते हैं कि हिंदू धर्म के भीतर मांसाहार का खूब सेवन किया जाता है। इसके साथ यह भी तथ्य है कि मांसाहार के बड़े-बड़े बिजनेस हिंदू धर्म के ऊंची जातियों से जुड़े हुए हैं। लेकिन यह सब तो तथ्य हैं। समाज और संस्कृति विश्लेषक  चन्दन श्रीवास्तव कहते हैं कि समाज की हवा तथ्य, संविधान, नैतिकता पर चलती तो बात ही अलग होती। वह मान्यताओं धारणाओं और पूर्वाग्रहों पर चलती है। इस आधार पर पर देखें तो मांसाहार को लेकर विवाद अभी पैदा नहीं हुआ है बल्कि मांसाहार के खिलाफ उपदेश 19वीं सदी के अंत से चल रहा है। भारतीय राष्ट्रीयता के एक हिस्से का निर्माण मदिरा मांस निषेध पर हुआ है। यह धारा प्रबल रही है।

उत्तर भारत की हिंदी की दुनिया में आजादी के बाद के कई विख्यात साहित्यकारों ने इस पर कई लेख लिखे। आजादी के बाद हिंदी की बौद्धिक दुनिया ने यह स्वीकृति दिलाने की भरपूर कोशिश की कि मांसाहार मनुष्य के भीतर तामसिक प्रवृतियां पैदा करता है। अब तक यह सब उपदेश के स्तर पर हो रहा था। मांसाहार के खिलाफ उपदेश दिया जाता था। लेकिन अब जो बदला है वह यह कि यह शासनादेश में बदल चुका है। मेयर को यह बताने का अधिकार नहीं है कि लोग क्या खाएं या ना खाएं? लेकिन उसके आदेश को स्वघोषित रक्षको के जरिए इस तरह से मनवाया गया है जैसे वह शासनादेश है।

अब सवाल उठता है कि बड़े स्तर पर लोग इसे मानने के लिए क्यों तैयार हुए? इसके लिए स्वीकृति क्यों मिल गई? इसके लिए जवाब है समय का चुनाव। बड़े ध्यान से देखिए तो रामनवमी सार्वजनिकता से जुड़ा विषय है। इस मान्यता से जुड़ा विषय है कि लोग कुछ भी अपवित्र नहीं करेंगे। अपवित्र में यह भी शामिल है कि मीट मांस का सेवन नहीं करेंगे।

अब यह धारणाओं की दुनिया में इस कदर फिट हो जाता है कि लोग इस पर ध्यान ही नहीं देते हैं कि यह उपदेश नहीं शासनादेश के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर उनसे पूछा जाता है कि खान पान पर नियम लगाना सही है? तो उनमें से कुछ लोग कह देते हैं कि यह सही नहीं है लेकिन अधिकतर तो यही कहते हैं कि रामनवमी के समय मांस के सेवन को रोक देने को लेकर नियम बन तो इसमें कुछ भी गलत नहीं। इसलिए जो हिंदू धर्म के भीतर अमूमन मांस मदिरा का सेवन करते हैं, उनके भीतर से भी यह आवाज नहीं निकलती कि मांसाहार के सेवन के लिए नियम बना देना गलत है।  जो इस पर असहमति जताते हैं वह दो वजह से चुप रहते है एक तो स्वघोषित रक्षकों की हुड़दंगई की वजह से जिन्हें सरकार का संरक्षण मिला होता है। दूसरा यह कि अगर वह ऐसा नही करेंगे तो समाज उन्हें छांट देगा।

तर्कों के आधार पर हम भले कह दें कि हिंदू धर्म के भीतर मांसाहार का सेवन करने वाले भरे पड़े हैं तो ऐसे नियम का कोई फायदा नहीं। लेकिन दरअसल इस तरह के नियम के मूल में यह होता है कि यह समाज में इस धारणा को मजबूत करने के लिए लाए जाते हैं कि हिंदू धर्म पवित्र है और इसके अलावा दूसरे धर्म अपवित्र। हिंदू धर्म सभ्य है और इसके अलावा दूसरे धर्म असभ्य और हिंसक। यहां पर दूसरे धर्म से मतलब मुस्लिम धर्म से है। वही है जो भारत में हिन्दू धर्म के बाद दूसरे सबसे बड़े धर्म के तौर पर भारत में मौजूद है। वही है जिसके सहारे सांप्रदायिक राजनीति की जाती है।

कुछ लोगों को ऐसे लगता है कि यह चुनाव के लिए फायदा उठाने के लिए यह किया जा रहा है। ऐसे ध्रुवीकरण भी वैसे इलाके में होते हैं जहां चुनाव होने वाले होते हैं। चुनाव खत्म हो जाएगा तो सब ठीक हो जायेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता है। ऐसे ध्रुवीकरण का असर चुनाव के बाद भी रहता है। समाज में असहिष्णुता की दीवार पहले से ज्यादा गहरी हो जाती है। समाज पीछे चला जाता है।

कुल मिला-जुलाकर कहें तो यह सब धारणाओं की दुनिया पर सवारी कर अपने पीछे गोलबंदी करने से जुड़ी हुई रणनीति है। यही हिंदुत्व है। जिसके बारे में कहा जाता है कि हिंदुत्व हिंदू धर्म के बिल्कुल विपरीत विचारधारा है। जिसका काम हिंदी धर्म के मर्म से जुड़ा नहीं है। राम के मूल्यों से जुड़ा हुआ नहीं है। बल्कि राजनीतिक सत्ता पाने के लिए समाज के धारणाओं, आस्थाओं और भावनाओं का इस्तेमाल कर हिंदू धर्म की एकता से जुड़ा है। इस तरह से मांसाहार के खिलाफ नियम बनाकर नफरत का माहौल बनाना भी हिंदुत्व का एक औजार है।

ये भी देखें: JNU में अब नॉन वेज को लेकर विवाद? ऐसे बनोगे विश्वगुरु ?


बाकी खबरें

  • Saharanpur
    शंभूनाथ शुक्ल
    यूपी चुनाव 2022: शांति का प्रहरी बनता रहा है सहारनपुर
    13 Feb 2022
    बीजेपी की असली परीक्षा दूसरे चरण में हैं, जहां सोमवार, 14 फरवरी को वोट पड़ेंगे। दूसरे चरण में वोटिंग सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, संभल, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बदायूँ, शाहजहांपुर ज़िलों की विधानसभा…
  • Uttarakhand
    कृष्ण सिंह
    चुनाव 2022: उत्तराखंड में दलितों के मुद्दे हाशिये पर क्यों रहते हैं?
    13 Feb 2022
    अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी दलित समाज के अस्तित्व से जुड़े सवाल कभी भी मुख्यधारा के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्न नहीं रहे हैं। पहाड़ी जिलों में तो दलितों की स्थिति और भी…
  • Modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: अगर आरएसएस न होता...अगर बीजेपी नहीं होती
    13 Feb 2022
    "...ये तो अंग्रेजों की चापलूसी में लगे थे। कह रहे थे, अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं"
  • election
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: चुनाव आयोग की साख पर इतना गंभीर सवाल!
    13 Feb 2022
    हर हफ़्ते की कुछ खबरें और उनकी बारिकियाँ बड़ी खबरों के पीछे छूट जाती हैं। वरिष्ठ पत्रकार जैन हफ़्ते की इन्हीं कुछ खबरों के बारे में बता रहे हैं। 
  • Hum bharat ke log
    अनिल सिन्हा
    हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है
    13 Feb 2022
    हम उस ओर बढ़ गए हैं जिधर नहीं जाने की कसम हमने ली थी। हमने तय किया था कि हम एक ऐसा मुल्क बनाएंगे जिसमें मजहब, जाति, लिंग, क्षेत्र, भाषा या विचारधारा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। हमने सोचा था कि…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License