NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
सोनभद्र की खान से सोना नहीं, निकाली जा रही हैं लाशें
बिली मारकुंडी के खनन क्षेत्र में 28 फ़रवरी को तब एक बड़ी त्रासदी देखी गई जब सुरेश केशरी की पत्थर की खदान में लगभग 10 मज़दूर दूसरी खदान के मलबे के ढेर के नीचे दब गए थे।
सौरभ शर्मा
06 Mar 2020
Translated by महेश कुमार
सोनभद्र
पत्थर की खदान में एनडीआरएफ़ द्वारा किए जा रहे बचाव अभियान को देखते परिजन। फ़ोटो - सौरभ शर्मा

ओबरा (सोनभद्र): सर्द हवाओं के साथ-साथ दिन धूप से खिला था, उस वक़्त लगभग 110 मीटर गहरी पत्थर की खदान में सैकड़ों लोगों अपनी निगाहें गड़ाए बैठे थे। वे ज़िला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर सोनभद्र ज़िले की बिल्ली मारकुंडी की खदान में झांक रहे थे तो वे खदान से निकलता सोना नहीं, बल्कि लाशें देख रहे थे।

बिल्ली मारकुंडी खनन क्षेत्र, जिसमें बहुत सारी खदानें हैं, वहाँ 28 फरवरी को उस वक़्त एक बड़ी त्रासदी देखी गई, जब सुरेश केशरी की पत्थर की खदान में काम करने वाले लगभग 10 मज़दूर एक अन्य खदान के मलबे के ढेर के नीचे फंस गए थे। ज़िला प्रशासन के अनुसार आधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या पांच है, लेकिन तीन परिवारों को अभी तक अपने प्रियजनों के शव नहीं मिले हैं।

image 1.png

बिल्ली मारकुंडी खदान जहां हादसा हुआ। फ़ोटो - सौरभ शर्मा

24 घंटे के बाद से, पड़ोसी गांव की निवासी फूलमती अपने बेटे शिव चरण की सलामती की दुआ कर रही है और उसके ऊपर आने के इंतज़ार में बैठी है, माना जा रहा है कि उनका बेटा चट्टान के एक बड़े टुकड़े के नीचे दबा हुआ है।

फूलमती, जो तेज़ी से उम्मीद खो रही हैं, कहती हैं, “मुझे पता है कि मेरे बेटे के ज़िंदा निकलने की संभावना बहुत कम है। और मुझे यह भी पता है कि मैंने जिन दो शवों को देखा है उनमें  मेरा बेटा नहीं था।"

शोकग्रस्त माँ न्यूज़क्लिक से बात कराते हुए बताती हैं, "जब तक वे (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल के लोग) मेरे बेटे या उसके शव को नहीं ढूंढेंगे, मैं यहां से नहीं जाऊंगी। मैंने यह सुनने के लिए ख़ुद को तैयार कर लिया है कि मेरा बेटा अब नहीं रहा। मैं केवल उसके साथ ही यहाँ से जाऊँगी।"

फूलमती कहती हैं कि उनका बेटा पिछले दो महीनों से इस खदान में काम कर रहा था और खदान के ठेकेदार से दिहाड़ी में मात्र 10 रुपये बढ़ाने की मांग कर रहा था। वो बताती हैं, “मेरा बेटा जल्द ही इस खदान में खुदाई का काम छोड़ने वाला था। वह अक्सर अपनी पत्नी के साथ शहर जाकर कुछ मज़दूरी ढूँढने या गन्ने का रस बेचने के बारे में बात करता था। उसकी पत्नी ने मुझे बताया कि उसने रस निकालने वाली मशीन ख़रीदने के लिए कुछ 300 रुपये बचाए हैं। वह यहां 50 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से काम करता था और दिन में 10 घंटे से ज़्यादा काम करता था, लेकिन वह इस काम में शामिल जोखिम से भी डरता था।”

1 मार्च की देर रात में, एनडीआरएफ़ के कर्मियों ने दो बुरी तरह से क्षत-विक्षत शवों को बाहर निकाला था, जिनकी पहचान करना भी मुश्किल था। फूलमती ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि उनमें उनका बेटा भी है। हालाँकि, शिव चरण की लाश की पहचान उनके कपड़ों के से उनके सहकर्मियों ने खदान में की थी।

image 2.png

हादसे में मारे गए शिव चरण की मां फूलमती। फ़ोटो - सौरभ शर्मा

राज्य सरकार ने शिवचरण के परिजनों और पांच अन्य लोगों को 5 लाख रुपये देने की घोषणा की है। यह पता लगाया जाना अभी बाक़ी है कि इन खननकर्ताओं ने मालिक (पट्टा धारक) ने उनका बीमा कराया था या नहीं।

शिव शंकर, उम्र 38 वर्ष, एक खनिक जो त्रासदी के मामले में भाग्यशाली निकाला, का कहना है कि यहाँ हर क़दम पर श्रम क़ानून का उल्लंघन होता है, यह कहते हुए कि खदान के मालिक (पट्टा धारक) ने सुरक्षा के प्रति कोई सावधानी नहीं बरती है।

वो कहते हैं, “सुरक्षा के नाम पर, हम श्रमिकों को केवल हेलमेट दिए जाते हैं, सुरक्षा जूते नहीं मिलते हैं। सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार चट्टानों की कटाई का कदम-दर-कदम काम अब अतीत की बात हो गई है। अब, हम मज़दूरों से कहा जाता है कि जब तक पानी न आ जाए, तब तक हमें धरती को ड्रिल करना है। इस त्रासदी को आसानी से रोका जा सकता था, अगर वह खदान जहां से चट्टानें गिरती थीं, उसके चारों ओर बाड़ लगा दी जाती।"

इस बाबत खदान के मालिक (लीज धारक) द्वारा उठाए गए क़दमों के बारे में पूछे जाने पर, शंकर ने आरोप लगाया कि खनन विभाग खदान के मालिकों के साथ मिला हुआ है, क्योंकि स्थानीय श्रम विभाग ने अब तक कोई निरीक्षण नहीं किया है।

के के राय, एक पूर्व खनन अधिकारी, जिन्होंने ज़िले में सोने के भंडार होने का दावा किया था और समाचार की सुर्खियां बटौरी थी, जब उनसे इसके बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उनके ज़िलाधिकारी ने मीडिया से बात करने के लिए माना किया है, लेकिन बाद में कुछ सवालों के जवाब देने के लिए सहमत हो गए।

राय ने कहा, "ऐसे 40 (पट्टे धारक) हैं जो ज़िले में विभिन्न खदानों से पत्थर निकाल रहे हैं। ज़िले में मेरी नियुक्ति से पहले उन्हें पट्टे दिए गए थे। मेरे विभाग ने उल्लंघनों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की है। घटना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इसके लिए खनन विभाग किसी भी प्रकार की कोताही के लिए ज़िम्मेदार नहीं है, क्योंकि यह भगवान की इच्छा से हुआ है।"

image 3.png

अपने पुरुष सदस्यों की मृत्यु पर शोक मनाते परिवार। फ़ोटो - सौरभ शर्मा

पिछले डेढ़ दशक से सोनभद्र में खनिकों के कल्याण के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता दिनकर कपूर कहते हैं कि हर साल दो से तीन ऐसी घटनाएं होती हैं, लेकिन खनन विभाग ने इनसे कोई सबक हासिल नहीं किया है।

उन्होंने कहा, “भारत की इस ऊर्जा राजधानी में सबसे बड़ा उल्लंघन जो हो रहा है वह 500 मीटर के आवासीय क्षेत्रों में खदानें संचालित करना हैं। जब भी किसी खदान में ब्लास्टिंग की जाती है तो रिहायशी इलाक़ों में झटके महसूस होते हैं। स्थिति इतनी ख़राब है कि स्थानीय आईटीआई कॉलेज की छत तक भी नहीं बची है और कई बच्चों को सुनने में दिक़्क़त महसूस होती है।"

सामाजिक कार्यकर्ता कपूर ने आरोप लगाते हुए कहा, "दूसरा मुद्दा यह है कि कोई भी प्रशिक्षित ब्लास्टर्स नहीं हैं और रॉक ब्लास्टिंग का काम साधारण मज़दूरों द्वारा किया जाता है, जिससे चट्टान में ब्रीचिंग के दौरान जोखिम बढ़ जाता है। खनन में शामिल हर संबंधित विभाग के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया जा रहा है। यह खदान के लीज धारकों का रिवाज बन गया है, क्योंकि वे अधिकारियों को एक बड़ा हिस्सा रिश्वत के रूप में देते हैं।"

संसद में पूछे गए एक प्रश्न के अनुसार, सोनभद्र में इस खदान त्रासदी की पृष्ठभूमि में, यह बात भी उजागर होती है कि 2013 से 2016 के बीच देश में कोयला खदान दुर्घटनाओं में 240 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि विभिन्न ग़ैर-कोयला खानों में समान अवधि के दौरान क़रीब 202 मौतें हो चुकी हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Not Gold But Dead Bodies Being Extracted From Mines of Sonbhadra

Sonbhadra Quarries
Stone Quarry
Sonbhadra Mines
Labour Laws
Sonbhadra Miners Dead

Related Stories

तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है

मुश्किलों से जूझ रहे किसानों का भारत बंद आज

भारत में अभी भी क्यों जारी है बंधुआ मज़दूरी?

आईआर नियमावलि: कोविड-19 लहर के बीच केंद्र का उद्योगों में सामूहिक मोल-भाव की गुंजाइश को सीमित करने का प्रस्ताव

भारत में कामकाजी लोगों के जन्म-मरण की दास्तान

2020 : एक ऐसा साल जिसमें लोग एक दुश्मन सरकार से लड़ते रहे

मोदी सरकार के नए श्रम कानून कामगारों के इतने ख़िलाफ़ क्यों हैं?

बन रहा है सपनों का मंदिर मगर ज़िंदगी का असली संघर्ष जारी

एक नागरिक के तौर पर प्रवासी

मोदी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ आज देशव्यापी विरोध दिवस


बाकी खबरें

  • nitish
    शशि शेखर
    क्या बिहार उपचुनाव के बाद फिर जाग सकती है नीतीश कुमार की 'अंतरात्मा'!
    20 Oct 2021
    बिहार विधानसभा की दो सीटों के लिए 30 अक्टूबर को उपचुनाव हो रहे हैं। ये दो सीटें हैं- कुशेश्वरस्थान और तारापुर। दोनों ही सीटें जद(यू) के खाते में थीं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जद(यू) अपनी दोनों…
  • J&K
    जसविंदर सिद्धू
    'कश्मीर में नागरिकों की हत्याओं का मक़सद भारत की सामान्य स्थिति की धारणा को धूमिल करना है'—मिलिट्री थिंक-टैंक के निदेशक
    20 Oct 2021
    मौजूदा हालात सीपीओ (केंद्रीय पुलिस संगठन) बलों के लिए और ज़्यादा समस्यायें पैदा करने वाले इसलिए हैं क्योंकि अब सेना को उन इलाक़ों में तैनात नहीं किया जाता है, जिन इलाक़ों में इमारतें हैं या घनी आबादी…
  • पार्थ एस घोष
    कैसे कश्मीर, पाकिस्तान और धर्मनिर्पेक्षता आपस में जुड़े हुए हैं
    20 Oct 2021
    हिंदुत्व को बढ़ावा देना पाकिस्तान की सैन्य-नौकरशाही एजेंसी द्वारा बिछाए गए जाल में फंसने जैसा है। धर्मनिर्पेक्षता को नकारना दक्षिण एशिया के सामाजिक ताने-बाने की बर्बादी का कारण बन सकता है।
  • Bhutan
    एम. के. भद्रकुमार
    भारत के निर्णयों को प्रभावित करने वाले नैरेटिव और ज़मीनी हक़ीक़त में इतना अंतर क्यों है? 
    20 Oct 2021
    भूटान और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को सुलझाने के लिए गुरुवार को थिम्पू में हस्ताक्षरित 'रोडमैप' ने तो भारत के डोकलाम-नैरेटिव में एक बड़ा सुराख कर दिया है, इतना बड़ा कि उस से होकर अब…
  • valmiki
    राज वाल्मीकि
    महर्षि वाल्मीकि जयंती के बहाने स्वच्छकार समाज को धर्मांध बनाए रखने की साज़िश!
    20 Oct 2021
    ये समाज कभी नहीं सोचेगा कि ये आमंत्रित अतिथिगण जिन महर्षि वाल्मीकि जी की इतनी प्रशंसा कर रहे हैं, जिनके पदचिह्नों पर चलने का उपदेश दे रहे हैं, उनकी तस्वीर तक अपने घर में नहीं लगाते हैं। जिस स्वच्छकार…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License