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लेबर कोड में प्रवासी मज़दूरों के लिए निराशा के सिवाय कुछ नहीं
छठी आर्थिक जनगणना (वर्ष 2013 - 2014) के अनुसार भारत में 70% प्रतिष्ठान 6 से कम श्रमिकों को रोज़गार देते हैं। जबकि मज़दूरों के सामाजिक सुरक्षा से जुड़े नियम नए संहिता के अनुसार उन्हीं प्रतिष्ठानों पर लागू होंगे, जहां श्रमिकों की संख्या 10 से अधिक होगी। 
विक्रम सिंह
18 Apr 2021
लेबर कोड में प्रवासी मज़दूरों के लिए निराशा के सिवाय कुछ नहीं
Image courtesy : The Logical Indian

प्रवासी मज़दूरों का जीवन घोर अनियमितताओं से घिरा होता है। अपने स्थानीय गांव में काम न मिलने के कारण मजबूरीवश यह लोग मन मे कई  आशाएं लिए घर की तरफ निकल जाते हैं। घर से निकलने के साथ ही शुरू होती है - अनिश्चिता और असुरक्षा की लम्बी श्रृंखला।

कहां काम मिलेगा, रहने के लिए बसेरा होगा कि नहीं, काम कैसा होगा, मज़दूरी क्या होगी और कार्यस्थल का माहौल कैसा होगा- यह आधारभूत प्रश्न है, जिनका उत्तर प्रवासी मज़दूरों को कभी नहीं मिलता क्योंकि ज्यादातर प्रवासी मज़दूर असंगठित क्षेत्र में अस्थाई तौर पर काम करते है और उनके जीवन में उपरोक्त प्रश्न लगातार बने रहते हैं। 

इस अनिश्चिता और घोर बेरोजगारी के कारण प्रवासी मज़दूर अपने मालिक के साथ मज़दूरी के बारे में किसी भी तरह का मोलभाव करने की स्थिति में नहीं होते ।  इनके श्रम का उचित दाम इनको नहीं मिलता और संगठित होने के अवसर भी न के बराबर होते हैं। इस स्थिति में बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि कामगारों के इस बड़े हिस्से के हकों की कानूनी रक्षा करना। सरकार की जिम्मेदारी है कि निश्चित व ठोस कानून बनाकर और इसे सख्ती से लागू करवाकर प्रवासी मज़दूरों में हकों की रक्षा करे। 

इन दिनों पूरे देश में मज़दूरों के कानूनों पर चर्चा चल रही है, मुख्य कारण है केन्द्र सरकार द्वारा 29 श्रम कानूनों को श्रम संहिताओं (लेबर कोडस) में बदलना। इसके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है और अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि यह पूरी प्रक्रिया श्रम कानूनों को कम़जोर करते हुए मज़दूरों के जीवन को बाजार के हवाले करने की ही कवायद है, जिससे कॉर्पोरेट्स को मजदूरों के श्रम का शोषण कर  मुनाफा कमाने की खुली छूट मिल जाएगी। 

श्रम कानूनों में इन बदलावों और लेबर कोड्स के खिलाफ देश के सभी मज़दूर संगठन (जाहिर है आरएसएस के मज़दूर संगठन को छोड़कर) एकजुट संघर्षरत है।  पिछले कुछ महीनो में देश ने मज़दूरों के सतत और उग्र आन्दोलन देखे है। एक तरफ किसान, किसान कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन में है तो दूसरी तरफ मज़दूर आंदोलन तीखा हो रहा है। फिलहाल केन्द्र सरकार को लेबर कोड्स को लागू करने की प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए मज़बूर होना पड़ा, परन्तु खतरा टला नहीं। 

यह एक अस्थाई राहत है और इन कोड्स को वापिस करवाने तक संघर्ष जारी रखना होगा । लेकिन प्रवासी मज़दूर और उनके लिए श्रम कानूनों, पूरी चर्चा से ही लगभग गायब रहे। हाँ यदा-कदा उनका संदर्भ जरूर आता है, जिसका मुख्य कारण देश की जनता के पिछले वर्ष लॉकडाउन के समय के अनुभव हैं जब करोड़ों प्रवासी मज़दूर सड़कों पर जीवित रहने और अपने घरों तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते दिखे। 

प्रवासी मज़दूरों के संघर्ष की असंख्य कहानियों ने देश में बचीखुची मानवता को झकझोर कर रख दिया व पहली बार प्रवासी मजदूरों के प्रति जनता की सहनभूति दिखी अन्यथा तो हमारा मध्यमवर्ग इन्हें एक समस्या ही समझता आया है। 

खैर यहां हम बात कर रहे हैं प्रवासी मजदूरों के लिए पहले से उपलब्ध कानूनों के बारे में और वर्तमान श्रम संहितायों में उनके लिए सुरक्षा के प्रश्न पर। प्रवासी मज़दूरों के लिए 1979 में अंतर-राज्य प्रवासी कर्मकार (नियोजन का विनियमन और सेवा शर्त) अधिनियम (The Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Service) Act, 1979) बनाया गया था। तमाम कमियों के बावजूद यह एक अच्छा कानून था जिसमें प्रवासी मज़दूरों के लिए कई तरह से प्रावधान थे।

हालांकि इन कानून को सही से कभी लागू नहीं किया गया। अधिकतर मज़दूरों को तो इसके बारे में पता ही नहीं है। प्रवासी मज़दूरों को काम पर रखने वाले ठेकेदारों और प्रधान नियोजकों से तो आशा की नहीं जा सकती, इनको लागू करने की मुख्य जिम्मेदारी थी सरकारों पर और एक के बाद एक बनी सरकारों ने भी इसको लागू करने की जहमत नहीं उठाई ।

तालाबंदी के कटु और अमानवीय अनुभव के बाद सभी उम्मीद कर रहे थे कि सरकार प्रवासी मज़दूरों के लिए ठोस कानून बनाएगी जिससे उनके हालात में कुछ सुधार हो सके परन्तु भाजपा की केंद्र सरकार ने तो इसके विपरीत जाते हुए पहले से मौजूद कानून को भी लगभग ख़त्म कर दिया है। 

कहने को अंतर-राज्य प्रवासी कर्मकार (नियोजन का विनियमन और सेवा शर्त) अधिनियम, 1979 को लेबर कोड्स में मिला दिया गया है परन्तु असल में इसे कमज़ोर ही किया गया है। वर्तमान में प्रवासी मज़दूर, व्‍यावसायिक सुरक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और कार्यस्‍थल स्थिति 2019 संहिता कोड और सोशल सिक्योरिटी कोड में आते है। प्रवासी मज़दूरों के बारे में प्रावधान व्यासवसायिक सुरक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और कार्यस्थल स्थिति कोड के अध्याय 2 का भाग II में है।

सबसे पहले तो समझने की जरूरत है कि उपरोक्त दोनों कोड्स राज्यान्तरिक (राज्य के भीतर ही एक जगह से दूसरी जगह) प्रवासी मज़दूरों पर लागू नहीं है। हालाँकि पिछले कानून अंतर-राज्य प्रवासी कर्मकार अधिनियम में भी प्रदेश की सीमायों के भीतर प्रवास करने वाले मज़दूर शामिल नहीं थे परन्तु यह एक मौका था हमारी सरकार के पास जब प्रवासी मज़दूरों के इस बड़े हिस्से को कानून के दायरे में लाया जाता, जो उसने बड़ी ही सुगमता से गंवा दिया। 

या यूँ कहें कि अंतरराज्यीय प्रवासी मज़दूरों से मौका छीन लिया। राज्यान्तरिक प्रवासी मज़दूरों की समस्याएं अंतर राज्यायिक प्रवासी मज़दूरों से कतई कम नहीं है।  वर्ष 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार प्रवास करने वाले कुल मज़दूरों का 88 प्रतिशत हिस्सा एक राज्य की सीमाओं में ही अपने पैतृक गांव से दूसरी जगह पर काम करने वाले मज़दूरों का है। 

मतलब अधिकतर मज़दूरों को आपने क़ानून से वंचित कर दिया।

वर्तमान कोड्स में प्रवासी मज़दूरों की परिभाषा में बदलाव किया गया है जिससे इसका दायरा कुछ बढ़ने की आशा है।  पहले केवल ठेकेदारों के साथ या सीधे प्रधान नियोजक के पास काम करने वाले मज़दूर ही प्रवासी मज़दूरों के कानून के दायरे में आते थे, परन्तु अब स्वतंत्र तौर पर काम करने के लिए दूसरे प्रदेशो में जाने वाले मज़दूर भी इस दायरे में आते है।

परन्तु यह दायरा अगले प्रावधान से बिलकुल सिकुड़ जाता है। व्यासवसायिक सुरक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और कार्यस्थ्ल स्थिति कोड के अनुसार यह उन प्रतिष्ठानों पर ही लागू होगा जहाँ मज़दूरों की न्यूनतम संख्या 10 होगी। दरअसल यह न्यूनतम सीमा दोगुनी कर दी गई है क्योंकि इससे पहले के कानून में मज़दूरों की यह संख्या 5 थी। छठी आर्थिक जनगणना (वर्ष 2013 - 2014) के अनुसार भारत में 70% प्रतिष्ठान 6 से कम श्रमिकों को रोजगार देते हैं। 

यह इकलौता प्रावधान छोटे (यहाँ दस से कम संख्या में मज़दूर है) प्रतिष्ठानों में काम करने वाले लाखों प्रवासी मज़दूरों को अनिवार्य रूप से श्रम कानूनों के लाभ से वंचित कर देगा। प्रवासी मज़दूरों को लाभ के मामले में ये दोनों प्रावधान लगभग एक दूसरे को नकारते हैं।

पहले के कानून में ठेकदारों और प्रधान नियोक्ता पर प्रवासी मजदूरों के पंजीकरण और उनसे जुड़ी जानकारी विभाग को देने की जिम्मेवारी दी गई थी। प्रवासी मजदूरों को फोटो लगी हुई पासबुक देना भी उनकी अनिवार्य जिम्मेवारी थी। लेकिन वर्तमान कोड्स में ऐसा कुछ भी नहीं है। किसी की भी जिम्मेवारी सुनिश्चित नहीं की। 

ऐसा लगता है कि यह राज्य सरकारों के हिस्से आएगा और मज़दूर खुद भी ऑनलाइन पंजीकरण कर सकते है। यह अजीब स्तिथि है जब हमने ठेकेदार और मालिक को तो जिम्मेवारी से मुक्त ही कर दिया है लेकिन गरीब प्रवासी मज़दूर जिन्हें ढंग से अंग्रेजी और हिंदी पढ़ना नहीं आता, जिनके पास स्मार्ट फ़ोन और इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है उनसे सरकार आशा कर रही है कि वह मज़दूर खुद अपना पंजीकरण करेंगे। 

परिणाम स्वरुप अधिकतर मज़दूर पंजीकरण करवाते ही नहीं है। यह स्तिथि उनके प्रतिष्ठान के मालिकों और ठेकेदारों के लिए ज्यादा सुखद है।  

प्रवासी मज़दूरों का रिकॉर्ड न होने के पैदा हुई भयानक स्तिथि हम हाल ही में देख चुके है, जब तालाबंदी और उसके बाद के समय में प्रवासी मज़दूरों के बारे में ठोस आंकड़े न होने के चलते राज्य और केंद्र सरकारे कैसे मूक दर्शक बनी रह गई और प्रवासी मजदूरों को जीवन की जंग लड़ते हुए देखतीं रही। 

यहाँ तक कि देश के संसद में मंत्री जी ने बड़ी बेशर्मी से स्वीकार किया की सरकार के पास तालाबंदी के दौरान मरने वाले प्रवासी मजदूरों का रिकॉर्ड नहीं है। जब ठोस रिकॉर्ड ही नहीं तो काहे कि योजना और मज़दूरों की भलाई के कार्यक्रम। 

इसलिए पंजीकरण और प्रवासी मजदूरों का हिसाब रखने की व्यवस्था सुनश्चित करने में विफलता इन कोड्स की एक बेहद महतवपूर्ण कड़ी है।प्रवासी मज़दूरों के लिए यह श्रम कानून ग्रामीण भारत में कृषि में काम करने वाले करोड़ों खेत मज़दूरों के लिए लागू नहीं होते है।

यह बताने की तो आवश्यकता नहीं है कि हमारे देश में खेत मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा देश के दूसरे राज्यों में जाकर काम करता है जो आर्थिक और सामाजिक शोषण का शिकार होता है। असल में ज्यादातर प्रवासी खेत मज़दूर तो आधुनिक बंधुआ मज़दूरों की तरह काम करते है, जो बोलने के लिए आज़ाद है परन्तु एक बार खेत पर पहुँचने के बाद उनको अपने मालिक के अनुसार ही काम करना पड़ता है। 

अन्यथा पैसे न होने की वजह से न तो वह अपने घर वापिस जा सकते है और न ही दूसरे मालिक उनको काम देते है। ज्यादातर मामलो में पूरा परिवार ही एक मालिक के लिए काम करता है। उनको दिहाड़ी केवल खेती के काम की मिलती है इसके अतिरिक्त मालिक के घर और पशुओं का काम बिना मज़दूरी के बेगार की तरह ही करना पड़ता।  वैसे भी देश में कुल 14 करोड़ से ज्यादा खेत मज़दूर बिना किसी कानूनी संरक्षण के काम कर रहें हैं।

उनको न तो किसान समझा जाता है और न ही मज़दूर के तौर पर कोई क़ानूनी पहचान है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे देश के राजनेता और निति निर्धारकों को देश का ज्ञान ही नहीं है, इसी का परिचायक है प्रवासी मज़दूरों के लिए लेबर कोड्स में प्रावधान जिससे जो प्रवासी मज़दूरों के कार्य स्थल की विविधता, उनके काम की विविधता, उनके सामने पेश आने वाली विराट चुनौतियों का संज्ञान लेने में असफल रहीं है। 

दरअसल प्रवासी मज़दूरों के लिए एक अलग से कानून की आवश्यकता है। लेकिन हम तो मोदी युग में जी रहें है यहाँ उनको केवल दिखावे के लिए नीति बनानी है। मकसद है मज़दूरों को भ्रमित कर यह दिखाने का कि जनाब और उनकी सरकार मज़दूर हितैषी है।

प्रवासी मज़दूरों के बारे में तो यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि तालाबंदी के दौरान हुई दुर्दशा के बाद प्रवासी मज़दूरों का सामना भाजपा के नेता नहीं कर पा रहें  है। इसलिए प्रचार के लिए तो कानून बनाये गए है लेकिन यह है केवल नाम के लिए।

 इससे न तो देश के अन्य मज़दूर गफलत में रहेंगे और न ही प्रवासी मज़दूर। किसानो और मजदूरों के संगठित और ऐतिहासिक आंदोलन ने जनता के मन बड़ी आशा बंधाई है, प्रवासी मज़दूरों की आँखों में आशा झलक रही है कि अब उनकी मेहनत को भी उचित दाम और पहचान मिलेगी। मालिक मनमर्जी के अनुसार मशीन की तरह उनको काम से नहीं निकालेंगे। लेबर कोड्स तो इन उम्मीदों को पहचानने में भी असफल है इसलिए इनको वापिस जाना होगा और प्रवासी मज़दूरों के लिए अलग से कानून लाना होगा।  

(लेखक अखिल भारतीय खेत मज़दूर यूनियन के संयुक्त सचिव हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

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