NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
अब मिशन यूपी को और धार देंगे किसान नेता, 2 अक्टूबर से चंपारण से वाराणसी की पदयात्रा
किसान-नेता मिशन यूपी को धार देने में लगे हुए हैं। पश्चिम के गढ़ से आगे बढ़ते हुए वे अवध इलाके तथा बुंदेलखंड में बड़ी महापंचायत कर चुके हैं। गांधी जी के जन्मदिन 2 अक्टूबर से किसान आंदोलन की धरती चंपारण से वाराणसी के लिए पदयात्रा शुरू होने जा रही है,जिसमें आंदोलन के तमाम बड़े नेता भाग लेंगे।
लाल बहादुर सिंह
29 Sep 2021
अब मिशन यूपी को और धार देंगे किसान नेता, 2 अक्टूबर से चंपारण से वाराणसी की पदयात्रा

27 सितंबर के अभूतपूर्व भारत-बंद ने साबित किया कि देश आज एक बड़े राष्ट्रीय जनान्दोलन और राजनीतिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है।

किसानों द्वारा आहूत भारत-बंद की अभूतपूर्व सफलता से उत्साहित किसान नेता राकेश टिकैत ने सरकार को चुनौती देते हुए कहा, " 10 महीने नहीं,  जरूरत हुई तो यह आंदोलन 10 साल चलेगा।" किसानों के इस वज्र-संकल्प का  महाबली मोदी के पास कोई जवाब नहीं है। आंदोलन के सम्मानित वरिष्ठ नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा, " भारत-बंद में पूरा देश इकट्ठा हो गया, अब दुनिया की कोई ताकत हमे हरा नहीं सकती। हम यह लड़ाई जीतेंगे। "

27 सितंबर, 2020 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ 3 कृषि कानूनों के अमल में आने के ठीक एक साल बाद आयोजित इस बंद की सफलता ने, जैसा योगेन्द्र यादव ने कहा, उन लोगों की बोलती बंद कर दी जो इसे एक खास इलाके और समुदाय तक सीमित बताते थे और यह साबित करने में लगे रहते थे कि आंदोलन खत्म हो रहा है।

एक साल पहले 25 सितंबर को हुए पहले बंद और 8 दिसम्बर को हुए दूसरे बंद से इस भारत बंद की तुलना से यह साफ है कि आंदोलन के प्रभाव, समर्थन और भागेदारी का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है और अब इसने सही मायने में राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया है। जिस आंदोलन को उत्तर भारत के भी एक पॉकेट-जाट पट्टी- का आंदोलन माना जा रहा था, उसकी दक्षिण भारत में जबरदस्त धमक ने सबको चौंका दिया है। न सिर्फ केरल और तमिलनाडु के विपक्ष शासित राज्यों में बल्कि भाजपा शासित कर्नाटक में बंद के पक्ष में भारी समर्थन देखा गया। ठीक इसी तरह पूर्वी भारत मे आंदोलन ने जोरदार दस्तक दी है।

इस बंद ने यह भी साफ कर दिया कि अब यह किसान-आंदोलन से जन-आन्दोलन बनता जा रहा है। भारत-बंद के समर्थन में पूरे देश मे मजदूर-कर्मचारी-व्यापारी, छात्र-युवा-महिला संगठनों की उत्साहपूर्ण भागेदारी हुई। एक तरह से यह उनका अपना कार्यक्रम बन गया। दरअसल कॄषि संकट से पैदा किसानों की राष्ट्रव्यापी बेचैनी से जुड़ता हुआ यह आंदोलन अब मोदी सरकार की विनाशलीला के विरुद्ध समाज के सभी तबकों क़े राष्ट्रीय विक्षोभ का केंद्र बनता जा रहा है। 

आंदोलन सुस्पष्ट राजनीतिक दिशा के साथ आगे बढ़ रहा है। आन्दोलन से उभरती राजनीतिक सम्भावनाओं के मद्देनजर तमाम विपक्षी दलों का भारत बंद को समर्थन मिला, जिनमें से कई विभिन्न राज्यों में सत्ता में हैं, बंद का समर्थन करने वालों में मायावती जी और जगनमोहन रेड्डी भी शामिल रहे जो आम तौर पर मोदी सरकार विरोधी स्टैंड के लिए नहीं जाने जाते। केरल, आंध्र, पंजाब जैसे राज्यों में पक्ष-विपक्ष दोनों ने समर्थन किया। नवीन पटनायक और तेलंगाना के चंद्रशेखर राव ही अपवाद रहे जिन्होंने सम्भवतः बंद पर कोई स्टैंड नहीं लिया।

ममता बनर्जी ने कहा कि वे किसानों के मुद्दों का समर्थन करती हैं और तीनों कृषि कानूनों को खारिज करने की मांग करती हैं, हालांकि वे बंद जैसे कार्यक्रमों का समर्थन नहीं करतीं! ममता बनर्जी की राजनीति से बहुत उम्मीद लगाए लोगों को निराशा हुई होगी, गौरतलब है कि हाल ही में विधानसभा चुनाव में किसानों के भाजपा हराओ अभियान से उन्हें लाभ भी मिला था।

कम्युनिस्ट पार्टियां, उनके तमाम जनसंगठन, तमाम छोटे वाम, लोकतान्त्रिक संगठन, जनान्दोलन की ताकतें बंद को सफल बनाने के लिए पूरी ताकत से लगीं। किसान आंदोलन की रैडिकल अन्तर्वस्तु और भारत-बंद के तकरीबन सारे visuals में लहराते लाल झंडों ने एलान कर दिया कि राजनीति का एजेंडा दक्षिण से वाम दिशा की ओर मुड़ रहा है। 

बंद का समर्थन करने वाले अधिकांश गैर-वाम विपक्षी दल बयान देने और tokenism तक ही सीमित रहे, जाहिर है किसान आन्दोलन के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे शिद्दत से नोट किया। किसान नेता राकेश टिकैत ने चोट भी की, कि विपक्ष कमजोर है, यह उस तरह आंदोलन नहीं करता जैसे भाजपा विपक्ष में रहते समय अपने फायदे के लिए करती थी, वरना किसानों को इस तरह 10 महीने से न बैठना पड़ता! 

किसान अच्छी तरह समझते हैं कि नवउदारवादी नीतियों के प्रति समर्पित, वैश्विक वित्तीय एवं कारपोरेट पूँजी से अनगिनत धागों से बंधे राजनीतिक दलों को केवल और केवल अपने मजबूत होते आंदोलन और वोट की ताक़त के बल पर ही किसान अपनी मांगों के पक्ष में खड़ा रख पाएंगे। 

यही अहसास किसान आंदोलन के गर्भ से उसकी आगे की राजनीतिक दिशा को जन्म देगा। 

कुछ लोग सोचते हैं कि सरकार किसानों की मांग मान लेगी, कम से कम MSP वाली मांग मान लेगी और किसान मोदी जी की जयजयकार करते हुए घर वापस लौट जाएंगे, इस तरह उनका अखंड राज जारी रहेगा। यह सोचना भोलापन है। सच्चाई यह है कि मोदी के लिए किसानों की मांग को स्वीकार करना पहले दिन जितना कठिन था, आज उससे अधिक कठिन है। MSP की कानूनी गारण्टी की मांग-वह भी सम्पूर्ण कृषि उपज के लिए, Comprehensive Cost ( C-2 ) के आधार पर- जिस दिन सरकार स्वीकार कर लेगी, उस दिन 3 कृषि कानूनों के पीछे का पूरा purpose ही defeat हो जाएगा, कृषि क्षेत्र में नवउदारवादी सुधार का पूरा एजेंडा ही ध्वस्त हो जाएगा। 

दरअसल भारत के कृषि क्षेत्र पर कब्जे की मुहिम वित्तीय पूँजी के धनकुबेरों और कारपोरेट घरानों के लिए एक strategic बुनियादी एजेंडा है, जिसे दिल्ली में चाहे जो सरकार हो, आज या भविष्य में, लागू करने के लिए वे लगातार दबाव बनाए रहेंगे। किसान केवल और केवल अपने अनवरत जारी आंदोलन के बल पर सरकारों पर अपना countervailing pressure बनाकर ही इसे रोके रख सकते हैं, अंततः इसी प्रक्रिया में कारपोरेट-राजनीति के बरक्स किसानों की, जनता की राजनीतिक ताकत का उदय तथा बुनियादी नीतिगत बदलाव ही इस एजेंडा को निर्णायक तौर पर पीछे धकेल सकता है। 

आज यह आंदोलन जिसमें पूरे देश की, समाज के सभी तबकों की जनता भाग ले रही है, यह महज 3 कृषि कानूनों को रद्द करने और MSP की कानूनी गारण्टी की मांग तक सीमित नहीं है। जैसा किसान नेताओं ने कहा यह अब देश बचाने की, लोकतन्त्र बचाने की लड़ाई बन चुका है। 

बेशक चुनावों के मद्देनजर सरकार tactical manoeuvreing करती रहेगी, जिससे किसान-आंदोलन को निपटना होगा। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में अभी किसानों का सरकारी जमावड़ा करके गन्ने की कीमत 25 रुपये बढ़ाने का योगी जी ने गाजे-बाजे के साथ एलान किया, लेकिन किसानों ने इसे क्रूर मजाक बताते हुए खारिज कर दिया। किसान नेता राकेश टिकैत ने बयान दिया कि गन्ने की एडवाइजरी कमेटी ने कहा है कि गन्ने की लागत कीमत 350 रुपये प्रति क्विंटल है, फिर मात्र 25/- बढाकर उसकी कीमत 350 रुपये करने का क्या मतलब, वह भी 4 साल बाद? जबकि चुनाव के पहले भाजपा ने 450/-का वायदा किया था। टिकैत ने कहा कि सवा चार सौ से  कम कीमत किसानों को मंजूर नहीं। 

किसान-नेता मिशन UP को धार देने में लगे हुए हैं। पश्चिम के गढ़ से आगे बढ़ते हुए वे  अवध इलाके तथा बुंदेलखंड में बड़ी महापंचायत कर चुके हैं। गांधी जी के जन्मदिन 2 अक्टूबर से किसान आंदोलन की धरती चंपारण से वाराणसी के लिए पदयात्रा शुरू होने जा रही है,जिसमें आंदोलन के तमाम बड़े नेता भाग लेंगे।  पूर्वांचल की बागी धरती  के तमाम गांवों कस्बों से गुजरती यह यात्रा मोदी-योगी के किसान विरोधी राज के खिलाफ किसानों के बड़े जागरण को अंजाम देगी।

राष्ट्रीय आंदोलन की गौरवशाली विरासत से सीखता और शक्ति अर्जित करता यह महान आंदोलन गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के रास्ते पर बढ़ रहा है, आंदोलनकारी किसान योद्धाओं के दिलों मे भगत सिंह के किसान-मजदूर राज का सपना और अम्बेडकर के लोकतान्त्रिक मूल्य पल रहे हैं। गांधी-भगत सिंह-अम्बेडकर की विरासत को लेकर आगे बढ़ते इस आंदोलन की चुनौती का मुकाबला कर पाना सावरकर-गोलवलकर के वारिस, नए कम्पनी-कारपोरेट राज के मुखौटे मोदी-योगी के वश में नहीं है। 

यह आंदोलन हमारे लोकतंत्र की एक नई तकदीर लिखेगा।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

Mission UP
kisan andolan
UttarPradesh
farmers protest
SKM

Related Stories

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

मनरेगा मज़दूरों के मेहनताने पर आख़िर कौन डाल रहा है डाका?

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

बलिया: पत्रकारों की रिहाई के लिए आंदोलन तेज़, कलेक्ट्रेट घेरने आज़मगढ़-बनारस तक से पहुंचे पत्रकार व समाजसेवी

पत्रकारों के समर्थन में बलिया में ऐतिहासिक बंद, पूरे ज़िले में जुलूस-प्रदर्शन

यूपी: खुलेआम बलात्कार की धमकी देने वाला महंत, आख़िर अब तक गिरफ़्तार क्यों नहीं

पेपर लीक प्रकरणः ख़बर लिखने पर जेल भेजे गए पत्रकारों की रिहाई के लिए बलिया में जुलूस-प्रदर्शन, कलेक्ट्रेट का घेराव

क्यों मिला मजदूरों की हड़ताल को संयुक्त किसान मोर्चा का समर्थन

पूर्वांचल में ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल के बीच सड़कों पर उतरे मज़दूर

देशव्यापी हड़ताल के पहले दिन दिल्ली-एनसीआर में दिखा व्यापक असर


बाकी खबरें

  • student in ukraine
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे पीछे: यूक्रेन में फँसे छात्रों से लेकर, तमिलनाडु में हुए विपक्ष के जमावड़े तक..
    06 Mar 2022
    हर हफ़्ते की कुछ चुनिंदा ख़बरों को जो रोचक भी हैं और ज़रूरी भी, लेकर आए हैं अनिल जैन..
  • George Orwell
    समीना खान
    “1984” 2022 में भी प्रासंगिक
    06 Mar 2022
    हाल ही में राजकमल प्रकाशन के लिए अभिषेक श्रीवास्तव ने बीसवीं सदी के सबसे प्रसिद्ध और प्रासंगिक उपन्यास ‘1984’ का अनुवाद किया, जो अभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में…
  • Jai Prakash Chouksey
    मृगेंद्र सिंह
    स्मृति शेष : चौकसे साहब के निधन से एक धारदार और आकर्षक लेखनी पर पर्दा गिर गया
    06 Mar 2022
    जय प्रकाश चौकसे की याद में एक प्रशंसक पाठक का संस्मरण।
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    पूर्वांचल: मुकाबला किसानों-युवाओं की नाराज़गी और सत्ताधारियों के चुनावी प्रबंधन में
    05 Mar 2022
    सात चरणों में विभाजित यूपी के विधानसभाई चुनाव के आखिरी चरण में 7 मार्च को 54 सीटों पर मतदान होगा. किसान और नौजवान सत्ताधारियो से बेहद नाराज़ है. इसके जवाब में सत्ताधारियो का चुनाव प्रबंधन भी बेजोड़…
  • Padtal Duniya Bhar Ki
    न्यूज़क्लिक टीम
    पड़ताल दुनिया भर कीः यूक्रेन के सबसे बड़े परमाणु संयंत्र जापोरिजया पर रूसी, आख़िर इरादा क्या है
    05 Mar 2022
    'पड़ताल दुनिया भर की' में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने रूस के यूक्रेन पर हमले के 10वें दिन, यूक्रेन के सबसे बड़े परमाणु संयंत्र पर कब्जे किये जाने के पीछे, रूसी इरादों के बारे में न्यूज़क्लिक के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License