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आंदोलन
भारत
राजनीति
अब मिशन यूपी को और धार देंगे किसान नेता, 2 अक्टूबर से चंपारण से वाराणसी की पदयात्रा
किसान-नेता मिशन यूपी को धार देने में लगे हुए हैं। पश्चिम के गढ़ से आगे बढ़ते हुए वे अवध इलाके तथा बुंदेलखंड में बड़ी महापंचायत कर चुके हैं। गांधी जी के जन्मदिन 2 अक्टूबर से किसान आंदोलन की धरती चंपारण से वाराणसी के लिए पदयात्रा शुरू होने जा रही है,जिसमें आंदोलन के तमाम बड़े नेता भाग लेंगे।
लाल बहादुर सिंह
29 Sep 2021
अब मिशन यूपी को और धार देंगे किसान नेता, 2 अक्टूबर से चंपारण से वाराणसी की पदयात्रा

27 सितंबर के अभूतपूर्व भारत-बंद ने साबित किया कि देश आज एक बड़े राष्ट्रीय जनान्दोलन और राजनीतिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है।

किसानों द्वारा आहूत भारत-बंद की अभूतपूर्व सफलता से उत्साहित किसान नेता राकेश टिकैत ने सरकार को चुनौती देते हुए कहा, " 10 महीने नहीं,  जरूरत हुई तो यह आंदोलन 10 साल चलेगा।" किसानों के इस वज्र-संकल्प का  महाबली मोदी के पास कोई जवाब नहीं है। आंदोलन के सम्मानित वरिष्ठ नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा, " भारत-बंद में पूरा देश इकट्ठा हो गया, अब दुनिया की कोई ताकत हमे हरा नहीं सकती। हम यह लड़ाई जीतेंगे। "

27 सितंबर, 2020 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ 3 कृषि कानूनों के अमल में आने के ठीक एक साल बाद आयोजित इस बंद की सफलता ने, जैसा योगेन्द्र यादव ने कहा, उन लोगों की बोलती बंद कर दी जो इसे एक खास इलाके और समुदाय तक सीमित बताते थे और यह साबित करने में लगे रहते थे कि आंदोलन खत्म हो रहा है।

एक साल पहले 25 सितंबर को हुए पहले बंद और 8 दिसम्बर को हुए दूसरे बंद से इस भारत बंद की तुलना से यह साफ है कि आंदोलन के प्रभाव, समर्थन और भागेदारी का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है और अब इसने सही मायने में राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया है। जिस आंदोलन को उत्तर भारत के भी एक पॉकेट-जाट पट्टी- का आंदोलन माना जा रहा था, उसकी दक्षिण भारत में जबरदस्त धमक ने सबको चौंका दिया है। न सिर्फ केरल और तमिलनाडु के विपक्ष शासित राज्यों में बल्कि भाजपा शासित कर्नाटक में बंद के पक्ष में भारी समर्थन देखा गया। ठीक इसी तरह पूर्वी भारत मे आंदोलन ने जोरदार दस्तक दी है।

इस बंद ने यह भी साफ कर दिया कि अब यह किसान-आंदोलन से जन-आन्दोलन बनता जा रहा है। भारत-बंद के समर्थन में पूरे देश मे मजदूर-कर्मचारी-व्यापारी, छात्र-युवा-महिला संगठनों की उत्साहपूर्ण भागेदारी हुई। एक तरह से यह उनका अपना कार्यक्रम बन गया। दरअसल कॄषि संकट से पैदा किसानों की राष्ट्रव्यापी बेचैनी से जुड़ता हुआ यह आंदोलन अब मोदी सरकार की विनाशलीला के विरुद्ध समाज के सभी तबकों क़े राष्ट्रीय विक्षोभ का केंद्र बनता जा रहा है। 

आंदोलन सुस्पष्ट राजनीतिक दिशा के साथ आगे बढ़ रहा है। आन्दोलन से उभरती राजनीतिक सम्भावनाओं के मद्देनजर तमाम विपक्षी दलों का भारत बंद को समर्थन मिला, जिनमें से कई विभिन्न राज्यों में सत्ता में हैं, बंद का समर्थन करने वालों में मायावती जी और जगनमोहन रेड्डी भी शामिल रहे जो आम तौर पर मोदी सरकार विरोधी स्टैंड के लिए नहीं जाने जाते। केरल, आंध्र, पंजाब जैसे राज्यों में पक्ष-विपक्ष दोनों ने समर्थन किया। नवीन पटनायक और तेलंगाना के चंद्रशेखर राव ही अपवाद रहे जिन्होंने सम्भवतः बंद पर कोई स्टैंड नहीं लिया।

ममता बनर्जी ने कहा कि वे किसानों के मुद्दों का समर्थन करती हैं और तीनों कृषि कानूनों को खारिज करने की मांग करती हैं, हालांकि वे बंद जैसे कार्यक्रमों का समर्थन नहीं करतीं! ममता बनर्जी की राजनीति से बहुत उम्मीद लगाए लोगों को निराशा हुई होगी, गौरतलब है कि हाल ही में विधानसभा चुनाव में किसानों के भाजपा हराओ अभियान से उन्हें लाभ भी मिला था।

कम्युनिस्ट पार्टियां, उनके तमाम जनसंगठन, तमाम छोटे वाम, लोकतान्त्रिक संगठन, जनान्दोलन की ताकतें बंद को सफल बनाने के लिए पूरी ताकत से लगीं। किसान आंदोलन की रैडिकल अन्तर्वस्तु और भारत-बंद के तकरीबन सारे visuals में लहराते लाल झंडों ने एलान कर दिया कि राजनीति का एजेंडा दक्षिण से वाम दिशा की ओर मुड़ रहा है। 

बंद का समर्थन करने वाले अधिकांश गैर-वाम विपक्षी दल बयान देने और tokenism तक ही सीमित रहे, जाहिर है किसान आन्दोलन के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे शिद्दत से नोट किया। किसान नेता राकेश टिकैत ने चोट भी की, कि विपक्ष कमजोर है, यह उस तरह आंदोलन नहीं करता जैसे भाजपा विपक्ष में रहते समय अपने फायदे के लिए करती थी, वरना किसानों को इस तरह 10 महीने से न बैठना पड़ता! 

किसान अच्छी तरह समझते हैं कि नवउदारवादी नीतियों के प्रति समर्पित, वैश्विक वित्तीय एवं कारपोरेट पूँजी से अनगिनत धागों से बंधे राजनीतिक दलों को केवल और केवल अपने मजबूत होते आंदोलन और वोट की ताक़त के बल पर ही किसान अपनी मांगों के पक्ष में खड़ा रख पाएंगे। 

यही अहसास किसान आंदोलन के गर्भ से उसकी आगे की राजनीतिक दिशा को जन्म देगा। 

कुछ लोग सोचते हैं कि सरकार किसानों की मांग मान लेगी, कम से कम MSP वाली मांग मान लेगी और किसान मोदी जी की जयजयकार करते हुए घर वापस लौट जाएंगे, इस तरह उनका अखंड राज जारी रहेगा। यह सोचना भोलापन है। सच्चाई यह है कि मोदी के लिए किसानों की मांग को स्वीकार करना पहले दिन जितना कठिन था, आज उससे अधिक कठिन है। MSP की कानूनी गारण्टी की मांग-वह भी सम्पूर्ण कृषि उपज के लिए, Comprehensive Cost ( C-2 ) के आधार पर- जिस दिन सरकार स्वीकार कर लेगी, उस दिन 3 कृषि कानूनों के पीछे का पूरा purpose ही defeat हो जाएगा, कृषि क्षेत्र में नवउदारवादी सुधार का पूरा एजेंडा ही ध्वस्त हो जाएगा। 

दरअसल भारत के कृषि क्षेत्र पर कब्जे की मुहिम वित्तीय पूँजी के धनकुबेरों और कारपोरेट घरानों के लिए एक strategic बुनियादी एजेंडा है, जिसे दिल्ली में चाहे जो सरकार हो, आज या भविष्य में, लागू करने के लिए वे लगातार दबाव बनाए रहेंगे। किसान केवल और केवल अपने अनवरत जारी आंदोलन के बल पर सरकारों पर अपना countervailing pressure बनाकर ही इसे रोके रख सकते हैं, अंततः इसी प्रक्रिया में कारपोरेट-राजनीति के बरक्स किसानों की, जनता की राजनीतिक ताकत का उदय तथा बुनियादी नीतिगत बदलाव ही इस एजेंडा को निर्णायक तौर पर पीछे धकेल सकता है। 

आज यह आंदोलन जिसमें पूरे देश की, समाज के सभी तबकों की जनता भाग ले रही है, यह महज 3 कृषि कानूनों को रद्द करने और MSP की कानूनी गारण्टी की मांग तक सीमित नहीं है। जैसा किसान नेताओं ने कहा यह अब देश बचाने की, लोकतन्त्र बचाने की लड़ाई बन चुका है। 

बेशक चुनावों के मद्देनजर सरकार tactical manoeuvreing करती रहेगी, जिससे किसान-आंदोलन को निपटना होगा। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में अभी किसानों का सरकारी जमावड़ा करके गन्ने की कीमत 25 रुपये बढ़ाने का योगी जी ने गाजे-बाजे के साथ एलान किया, लेकिन किसानों ने इसे क्रूर मजाक बताते हुए खारिज कर दिया। किसान नेता राकेश टिकैत ने बयान दिया कि गन्ने की एडवाइजरी कमेटी ने कहा है कि गन्ने की लागत कीमत 350 रुपये प्रति क्विंटल है, फिर मात्र 25/- बढाकर उसकी कीमत 350 रुपये करने का क्या मतलब, वह भी 4 साल बाद? जबकि चुनाव के पहले भाजपा ने 450/-का वायदा किया था। टिकैत ने कहा कि सवा चार सौ से  कम कीमत किसानों को मंजूर नहीं। 

किसान-नेता मिशन UP को धार देने में लगे हुए हैं। पश्चिम के गढ़ से आगे बढ़ते हुए वे  अवध इलाके तथा बुंदेलखंड में बड़ी महापंचायत कर चुके हैं। गांधी जी के जन्मदिन 2 अक्टूबर से किसान आंदोलन की धरती चंपारण से वाराणसी के लिए पदयात्रा शुरू होने जा रही है,जिसमें आंदोलन के तमाम बड़े नेता भाग लेंगे।  पूर्वांचल की बागी धरती  के तमाम गांवों कस्बों से गुजरती यह यात्रा मोदी-योगी के किसान विरोधी राज के खिलाफ किसानों के बड़े जागरण को अंजाम देगी।

राष्ट्रीय आंदोलन की गौरवशाली विरासत से सीखता और शक्ति अर्जित करता यह महान आंदोलन गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के रास्ते पर बढ़ रहा है, आंदोलनकारी किसान योद्धाओं के दिलों मे भगत सिंह के किसान-मजदूर राज का सपना और अम्बेडकर के लोकतान्त्रिक मूल्य पल रहे हैं। गांधी-भगत सिंह-अम्बेडकर की विरासत को लेकर आगे बढ़ते इस आंदोलन की चुनौती का मुकाबला कर पाना सावरकर-गोलवलकर के वारिस, नए कम्पनी-कारपोरेट राज के मुखौटे मोदी-योगी के वश में नहीं है। 

यह आंदोलन हमारे लोकतंत्र की एक नई तकदीर लिखेगा।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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