NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
अंतरराष्ट्रीय
मुबारक: नए दिन की शुरुआत है नौरोज़
भारत की इस बहुरंगी सभ्यता संस्कृति को कुचल कर आगे निकल जाने की होड़ में हम तमाम ऐसे खूबसूरत रस्म रिवाजों से महरूम होते जा रहे हैं जिनके मिलने से हिंदुस्तान एक खूबसूरत हिंदुस्तान बनता है।
नाइश हसन
21 Mar 2022
Nowruz
फ़ोटो गूगल से साभार

पारसियों के इस त्योहार की जड़े ईरान से जुड़ी है। नौरोज़ हर साल 20-21 मार्च को बड़े धूम-धाम से मनाया जाने वाला त्योहार है। यह नौ या नव और रोज दो शब्द से मिल कर बना है। जिसका माने होता है नया दिन। फसल के कटने से भी इसकी शुरुआत मानी जाती है। ईरानी कैलेंडर की शुरुआत भी नौरोज़ से है। देखा जाए तो इस त्येहार को मजहबी नहीं बल्कि संस्कृतिक तौर पर ज्यादा देखा गया। चूंकि बुनियाद में इसके सांस्कृतिक बुनावट थी लिहाजा इसका असर ये हुआ कि यह सिर्फ पारसियों तक ही महदूद न रहा। एशिया के बडे़ हिस्से के लोग इसे अपने-अपने ढंग से बड़े जोश-ओ-खरोश के साथ मनाते रहे हैं। यह भी कहा जा सकता है कि जमीन के जिस हिस्से पर ईरानी सभ्यता का प्रभाव ज्यादा रहा है वहां इस त्योहार को मनाने का चलन भी ज्यादा रहा है।

आज खुशी और जोश का दिन है। पारसी आज के दिन नए कपडे़ पहनते हैं, और इबादत के लिए अगियारी ( इबादतगाह) जाते हैं, होली और ईद की तरह एक दूसरे से गले मिल मुबारकबाद देते हैं। एक दूसरे को तोहफे दिए जाते हैं। घरों में एक खास किस्म के दस्तरखान सजाए जाते हैं। सात ऐसी चीजें आज के दिन दस्तरखान पर सजाई जाती हैं जो सफेद रंग के मेजपोश पर ही सजाई जाती हैं। जिनकी शुरुआत फारसी के सीन हरफ़ से होती है। इनमें खास तौर पर सामनू (हलवा) संदेज (जैतून का फल) सिरकह, सुमाक़, सीर (लहसुन) ज्यादा चलन में हैं। इसके अलावा भी कई और चीजें सजाई जाती हैं। गुलाब जल, शमा, पेंटेड अंडे, ईरानी मिठाइयां, मौसमी फल आदि भी सजाने का रिवाज है। इस पूरे दस्तरखान को हफ़्त-सीन कहते हैं। पारसी इस मौके पर अपनी मजहबी पुस्तक जेंद अवेस्ता को भी दस्तरखान पर रखते हैं।

अगर देखा जाए तो भारत में मुगल शासन पूर्ण रूप से इंडो-ईरानियन तहज़ीब की एक अनूठी मिसाल है। इसी लिए इसमें नौरोज़ का खासा असर भी नजर आता है। मुगले आज़म फिल्म का मशहूर गीत जब प्यार किया तो डरना क्या, जश्न-ए-नौरोज़ की पृष्ठभूमि पर ही फिल्माया गया गीत है। भारत में शिया मुसलमान भी अपने तरीके से इस त्योहार को मनाते रहे हैं, रंग खेलना, पकवान बनाना, अपनी मजहबी किताबें दस्तरखान पर रखना। ऐसा ही कुछ सुन्नी मुसलमानों के साथ भी रहा है। जब फसल कट कर घर आती तो बाकायदा नया होता, आस-पड़ोस बुलाया जाता बारी-बारी लोगो की दावतें होती, माहौल बड़ा खुशगवार रहता, लेकिन वक्त के साथ जो बदलाव आए उनमें कई नकारात्मक बदलाव भी सामने आए। 1920 के आस-पास का वो दौर जब आर्य समाज के शुद्वि आंदोलन की प्रतिक्रिया के रूप में अहले हदीस वजूद में आया जिनकी तंजीम है तबलीगी जमात। 1926 आते- आते मौलाना मोहम्मद इलियास ने इसका पूरा खाका भारत के मुसलमानों के सामने रखा, और तमाम ऐसी सांस्कृतिक परंपराएं जिनका हिंदू, मुस्लिम, शिया सुन्नी सब पर असर था उन्हें सख्ती से रोका जाने लगा। उसी में नौरोज़ की परंपरा भी लगभग बाकी समुदायों से समाप्त कर दी गई। इससे बंटवारे के बीज बोए गए। इन्हें इस्लाम के नुक्ते-नजर से गलत करार दिया जाने लगा। ईमान माथे पर लगे धब्बे ने नापा जाने लगा। एक तरफ ऐसी बातें हुई तो दूसरी तरफ अब तमाम शिया समुदाय भी ऐसे निकल आए जो इसकी मुखालफत करते हैं, और जिन घरों में पहले नौरोज़ बाकायदा खुशी के साथ मनाया जाता था अब वहां ये खत्म हो चुका है। ऐसे लोगों के उभरने से संस्कृति के मिलान का बड़ा नुकसान हुआ। जो लोग अब तक इस त्योहार को आपसी सौहार्द से मनाते थे अब वो इसके संदर्भ अपनी-अपनी किताबों में ढूंढने लगे।  

भारत की इस बहुरंगी सभ्यता संस्कृति को कुचल कर आगे निकल जाने की होड़ में हम तमाम ऐसे खूबसूरत रस्म रिवाजों से महरूम होते जा रहे हैं जिनके मिलने से हिंदुस्तान एक खूबसूरत हिंदुस्तान बनता है।

जरूरत इस बात की है कि होली हो, नौरोज हो, ईद हो, बड़ा दिन हो ढेरो संस्कृतियों को बिना सवाल किए एक साथ पनपने, फलने फूलने का मौका मिलता रहे, एक दूसरे के त्योहारेां में बिना किताबों से हवाले तलाशे हमारी शिरकत बढती रहे, धर्म से ज्यादा संस्कृति समाज को मजबूत करती है, तो इस मौके पर चलिए चलते है आज अपने पारसी दोस्तों के घर और हफ़्त-सीन के दस्तरखान का लुत्फ उठाते हैं, गुझिया की मिठास अभी मुंह में घुली हुई है, आज नौरोज़ का दस्तरखान भी सज चुका है, इसी के साथ सब को नौरोज़ की ढेर सारी मुबारकबाद। 

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

इसे भी पढ़ें : इतवार की कविता: जश्न-ए-नौरोज़ भी है…जश्न-ए-बहाराँ भी है

Happy Iranian New Year
Nowruz
Parsi New Year Nowruz

Related Stories


बाकी खबरें

  • bitcoin
    सोनिया यादव
    कर्नाटक: बिटकॉइन घोटाला ने सियासत में हलचल क्यों मचा दी है?
    20 Nov 2021
    इस स्कैम ने राज्य की राजननीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। एक ओर सीएम बोम्मई पार्टी के भीतर की चुनौती से परेशान हैं तो वहीं दूसरी ओर सुस्त जांच को लेकर विपक्ष सरकार पर जमकर निशाना साध रहा है।
  • Modi
    राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष : भक्तों के बीच “थैंक्यू मोदी जी!” का नया शिड्यूल घोषित
    20 Nov 2021
    देख लीजिए, कोविड-19 की तरह, किसान आंदोलन की आपदा में से भी मोदी जी ने अवसर निकाल ही लिया। राजधानी में थैंक्यू मोदी जी सभाओं का शिड्यूल आ गया है। बाकी राज्यों में भी आज-कल में यह सिलसिला शुरू हो जाएगा…
  • Punjab
    तृप्ता नारंग
    पंजाब: अपने लिए राजनीतिक ज़मीन का दावा करतीं महिला किसान
    20 Nov 2021
    पुरुषों और महिलाओं द्वारा पारंपरिक तौर पर जो भूमिका निभाई जाती रही है, उसमें आमूलचूल बदलाव देखने को मिला है, क्योंकि किसान आंदोलन में महिलाओं ने जमकर भागीदारी की है। हालांकि नेतृत्वकारी भूमिका में…
  • The stakes of talks between the President of America and China and the period of peace on the pretext of Afghanistan
    न्यूज़क्लिक टीम
    अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति के बीच वार्ता का दांव और अफ़ग़ानिस्तान के बहाने शांति का दौर
    20 Nov 2021
    “पड़ताल दुनिया भर की’ में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने बातचीत की न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से। मुद्दा रहा अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई…
  • nonaligned movement
    एन.डी.जयप्रकाश
    गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को कैसे बदला? : भाग 1
    20 Nov 2021
    उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का संगठित विरोध 1920 के दशक के अंत में शुरू हुआ था। जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के ज़रिए महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License