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बीच बहस: शिक्षा का भविष्य नहीं हो सकती ऑनलाइन शिक्षा
जब हम डिजिटल शिक्षा को शिक्षा के एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करें तो हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि असमानता पर आधारित समाजों में वैज्ञानिक तकनीकी का लाभ सभी वर्ग नहीं उठा सकते, इनका लाभ हमेशा समाज के प्रभावशाली वर्गों तक सीमित रहेगा।
शुभेन्द्र
06 Jul 2021
ऑनलाइन शिक्षा
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : economic times

लगभग डेढ़ वर्ष से भारत के उच्च शिक्षण संस्थान बंद हैं। शिक्षा जिसे आधुनिक युग की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि माना जाता है और जिसके माध्यम से किसी देश की प्रगति को मापा जाता है, उसका इतने दिनों तक बंद रहना चिंताजनक बात है। कुछ विश्वविद्यालयों ने इस दौरान डिजिटल माध्यमों का उपयोग करके शैक्षणिक गतिविधियों को जारी रखा, यह जानते हुए भी कि बहुत से विद्यार्थियों की पहुंच इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों तक नहीं है, डिजिटल माध्यमों से ही कक्षाएं आयोजित की गई और परीक्षाएं भी ली गई। अनेक लोगों को यह संतुष्टि भी है कि ऐसे दौर में जिसमें सीधे तौर पर कक्षाओं में उपस्थित हो पाना संभव नहीं था; उस समय इंटरनेट आदि माध्यमों के उपयोग से एक हद तक शैक्षणिक गतिविधियों को जारी रखा जा सका।

भारत ने अभी कोविड 19 की दूसरी घातक लहर का सामना किया है और वैज्ञानिकों ने तीसरी लहर की भी आशंका जताई है ऐसे में कुछ लोग ऑनलाइन शिक्षा को ही शिक्षा का भविष्य मान रहे हैं, सिर्फ विकल्प मानते तब तो कोई बात ही न थी। इस दौरान समाचार पत्रों में भी ऑनलाइन शिक्षा के समर्थन में लेख लिखे गए। ऑनलाइन शिक्षण के समर्थकों का कहना है कि इसके द्वारा उच्च शिक्षा की पहुंच उन लोगों तक सुनिश्चित की जा सकती है जो तमाम आर्थिक और सामाजिक कारणों से भारत के दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, पुणे आदि में स्थित उत्कृष्ट  शिक्षण संस्थानों में दाखिला नहीं ले सकते। इसके द्वारा पूरे देश के विद्यार्थियों के लिए किसी भी विषय के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक उपलब्ध हो सकते हैं जिससे शिक्षा की गुणवत्ता भी सुधरेगी। गौरतलब है कि सैम पित्रोदा ने भी एक बार कहा था कि यदि ऑनलाइन शिक्षण को विकल्प बना दिया जाए तो पूरे देश के लिए किसी विषय के मात्र 5 शिक्षक ही पर्याप्त होंगे। ऑनलाइन शिक्षण के समर्थकों का तर्क यह भी है वैज्ञानिक प्रगति और आविष्कारों को नकारना मूर्खतापूर्ण है। यदि इंटरनेट के माध्यम से गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पूरे देश के लिए आसानी से सुलभ हो सकती है तो फिर इसे उच्च शिक्षा का भविष्य क्यों ना माना जाए।

अब हम इन तर्कों पर क्रम से विचार करें

भारत में डिजिटल असमानता कोई छुपी हुई बात नहीं है। हम आए दिनों अखबारों में इसके बारे में पढ़ते हैं। हमारी आबादी के बहुत बड़े हिस्से की पहुंच कंप्यूटर तथा स्मार्टफोन तक नहीं है; उनके लिए यह आज भी एक स्वप्न है इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्रा ऐश्वर्या रेड्डी की आत्महत्या है। लॉकडाउन के दौरान अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए ऐश्वर्या को लैपटॉप की आवश्यकता थी, जिसे उनका परिवार अपनी आर्थिक स्थिति के कारण नहीं खरीद सका। ऑनलाइन अपनी पढ़ाई जारी न रख सकने के कारण ऐश्वर्या ने यह कदम उठाया।

जब हम डिजिटल शिक्षा को शिक्षा के एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करें तो हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि असमानता पर आधारित समाजों में वैज्ञानिक तकनीकी का लाभ सभी वर्ग नहीं उठा सकते, इनका लाभ हमेशा समाज के प्रभावशाली वर्गों तक सीमित रहेगा। समाज और तकनीकी के अंतर संबंधों पर विचार करने वाले विद्वानों ने हमें बताया है कि जब भी कोई नवीन वैज्ञानिक तकनीकी का आविष्कार होता है तो समाज का विशेषाधिकार संपन्न तबका उसका उपयोग अपनी सामाजिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए करता है।

बीसवीं सदी के प्रमुख जीव वैज्ञानिक जे.वी.एस. हेल्डेन ने इस बात को रेखांकित किया था कि वैज्ञानिक खोजें तभी पूरे समाज के लिए उपयोगी हो सकती हैं, जब हमारी सामाजिक संरचना समानता पर आधारित हो और शोषण मुक्त हो; अन्यथा वैज्ञानिक तकनीकी समाज के प्रभुत्व साली वर्ग के हाथ में ऐसे नए-नए औजार दे देती है, जिससे वह शोषण के  नवीन और सूक्ष्म उपायों को गढ़ लेता है, इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण भारत की वर्तमान सरकार द्वारा सोशल मीडिया के दुरुपयोग का है।

इस नई वैज्ञानिक तकनीक के उपयोग से उसने झूठी और विकृत सूचनाओं का प्रसार कर अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति को सुदृढ़ किया है। भारत की बहुसंख्यक आबादी के मन में अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा का विकास कर उसने भारत के मुसलमानों को सामाजिक रूप से असुरक्षित कर दिया है। वैज्ञानिक तकनीकों का दुरुपयोग प्रभावशाली कैसे अपने वर्ग हितों के लिए करता है यह इस उदाहरण से स्पष्ट है। शिक्षा के डिजिटलीकरण से हमारी कक्षाओं में क्या पढ़ाया जा रहा है इस बात की निगरानी सरकार करेगी इस बात की पूरी संभावना है। अंततः यह तकनीक कक्षाओं में राज्य के हस्तक्षेप को बढ़ावा देगी और शिक्षक की स्वतंत्रता लगभग समाप्त हो जाएगी।

आज पूरी दुनिया में राज्य द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी के नागरिकों के विरुद्ध दुरुपयोग के उदाहरण हमारे सामने हैं। इसका उपयोग राज्यों ने नागरिकों की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए किया है। अतः यह स्पष्ट है कि वैज्ञानिक खोजें तभी सबके लिए लाभदाई होंगी जबकि सामाजिक ढांचा न्याय और समानता पर आधारित होगा अन्यथा वह पहले से असमानता पर आधारित सामाजिक संरचना को और सुदृढ़ करेंगी।

शिक्षा के डिजिटलीकरण का प्रभाव विश्वविद्यालयों के स्वरूप पर भी पड़ेगा। ऑनलाइन शिक्षा के समर्थकों का कहना है कि फिर शायद विश्वविद्यालय परिसरों की आवश्यकता ही न रहेगी। विश्वविद्यालयों के अस्तित्व पर यह संकट मानव सभ्यता के लिए कितना घातक होगा यह समझने के लिए आधुनिक ज्ञान के विकास के साथ विश्वविद्यालयों का क्या संबंध रहा है यह देखना चाहिए।

विश्वविद्यालयों की स्थापना आधुनिक काल के शुरुआती दौर में होती है। आधुनिक युग के आरंभ के साथ इस दुनिया और ब्रह्मांड के प्रति हमारी पुरानी धारणाएं खंडित हुईं, और प्रमाण तथा प्रयोगों पर आधारित नए ज्ञान ने पुरानी कल्पनाओं का स्थान लिया। जैसे ही हमें इस तथ्य का ज्ञान हुआ कि यह दुनिया कुछ नियमों से संचालित है इसमें होने वाली घटनाएं यादृच्छिक नहीं है, उनके पीछे कुछ कारण हैं जिन्हें जाना जा सकता है और जिन्हें जानकर उन घटनाओं की ठीक-ठीक व्याख्या की जा सकती है। यहीं मनुष्य ने ज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति आरंभ की। वैज्ञानिक ढंग से प्राप्त इस ज्ञान को व्यवस्थित कर जनसामान्य तक पहुंचाने के लिए विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। कुछ विश्वविद्यालयों का अस्तित्व आधुनिक युग से पहले भी था; लेकिन 16वीं 17वीं सदी जहाँ से Age of Reason की शुरुआत मानी जाती है; के बाद उनका स्वरूप भी बदल गया और बड़े पैमाने पर नए विश्वविद्यालयों की स्थापना भी हुई।

ऐसा नहीं है कि विश्वविद्यालयों का काम सिर्फ ज्ञान को जनसाधारण तक पहुंचाना रहा है। धीरे-धीरे विश्वविद्यालय ज्ञान के उत्पादन के केंद्र भी बने। शोध को उन्होंने अपनी आधारशिला बनाया। शोध किसी विषय में नए ज्ञान की खोज के लिए एक व्यवस्थित और सायास प्रयास है। कई तथ्यों का ज्ञान मनुष्य को अनायास हो सकता है, लेकिन प्रयत्न करने पर नए तथ्यों के ज्ञान की संभावना अधिक होती है इसमें कोई शक नहीं। ज्ञान निर्माण के लिए व्यवस्थित अवलोकन, अध्ययन ,प्रयोग और विश्लेषण की आवश्यकता होती है, जब ज्ञान प्राप्ति की इस नई पद्धति को अपनाया गया तो देखते ही देखते जीवन और जगत के अनेक क्षेत्र रहस्यमयता के परदे से निकलकर ज्ञान के दायरे में आने लगे। आधुनिक ज्ञान में बहुत बड़ी हिस्सेदारी विश्वविद्यालयी शोध की है।

ज्ञान निर्माण में विश्वविद्यालयों की सफलता का एक कारण और है। मनुष्य अपने सामाजिक जीवन में एक दूसरे पर निर्भर रहा है। इतिहास के आरंभिक दौर में कृषि उसके सामूहिक विकास से संभव हुई, सामूहिक श्रम से ही उसने सभ्यता के भौतिक उपादानों का निर्माण किया, कुछ खंडहर हो चुकी और कुछ बची हुई ऐतिहासिक इमारतें उसके सामूहिक श्रम की सार्थकता की साक्षी हैं। उसकी यह परस्पर निर्भरता और सहयोग भावना ज्ञान के निर्माण के लिए भी आवश्यक है।

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा है कि जब हम खुद को दूसरों के माध्यम से जानते हैं कभी खुद को ठीक से समझ सकते हैं। विश्वविद्यालयों में ज्ञान निर्माण इसी परस्परता और सामूहिकता से संभव होता है। विश्वविद्यालय ही वह स्थान है जहां ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों  के बीच परस्पर विचार विनिमय से अनुशासनों के बीच की दूरी को पाटा जाता है, उनके बीच नए संबंधों की खोज की जाती है, एक विषय की अवधारणाओं का उपयोग दूसरे विषय को ठीक से समझने के लिए किया जाता है और इसी प्रक्रिया में ज्ञान के नए अनुशासनों का जन्म होता है।

अतः विश्वविद्यालय के अस्तित्व पर संकट ज्ञान की संस्कृति पर संकट होगा। वर्तमान समय में तकनीकी के बढ़ते प्रयोग लेकिन ज्ञान और समझ के ह्रास की ओर विद्वानों का ध्यान गया है। हमारी दुनिया वैज्ञानिक उपकरणों से युक्त लेकिन वैज्ञानिक चिंतन से रिक्त होती जा रही है। स्मार्टफोन तथा सोशल मीडिया के व्यापक प्रसार ने मनुष्य से उसका वह एकांत और अब पास छीन लिया है जो किसी घटना या विषय को इत्मीनान से गहराई में समझने के लिए आवश्यक होता है। झूठी खबरों और अफवाहों के इस दौर में विश्वविद्यालय ज्ञान और सत्य के मशाल वाहक हो सकते हैं।

भारत जैसे देश में विश्वविद्यालयों की एक सामाजिक भूमिका भी है। शिक्षा सामाजिक परिवर्तन की वाहक हो सकती है, ऐसी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने भी की थी। भारत की बहुत बड़ी आबादी के लिए गरीबी और सामाजिक शोषण के चंगुल से निकलने का एक मात्र उपाय  शिक्षा ही है। हमारे विश्वविद्यालयों में पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है यह संख्या आगे भी बढ़ती जाएगी। यहां आकर लड़के और लड़कियां खुद को उस जकड़न से मुक्त महसूस करते हैं, जिसमें उनके परिवार और समाज ने उन्हें जकड़ रखा था। कुछ हद तक जातिगत भेदभावों के दंश से भी मुक्ति मिलती है। भारत के गांवों में आज भी लड़कियों का परिवार के बाहर बिना डरे किसी लड़के से बात करना एक अनहोनी घटना है यहां आकर ही उनकी मैत्री का दायरा लड़कों तक भी विस्तृत होता है। आजादी के बाद उच्च शिक्षा से संबंधित जो समितियां शिक्षा से इतर विश्वविद्यालयों के इस व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखा है और उसके सामाजिक सांस्कृतिक महत्व पर जोर दिया है। 2009 में विश्व विद्यालय की शिक्षा के सुधार के लिए बनी यशपाल समिति ने विश्वविद्यालयों की सामाजिक भूमिका को रेखांकित किया था। हमारे विश्वविद्यालय उस परिवर्तन के वाहक हो सकते हैं,जो हम अपने समाज में देखना चाहते हैं।

विश्वविद्यालयों के सामाजिक महत्व का उल्लेख प्रोफेसर अपूर्वानंद ने भी अपनी संपादित पुस्तक The Idea of a University की भूमिका में किया है, इसमें उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख किया है जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में एक ब्राह्मण लड़की अनुसूचित जनजाति के लड़के से विवाह करने का फैसला करती है,"भारत के विश्वविद्यालय ऐसे संबंधों के जन्म और विकास के साक्षी रहे हैं यदि मेरे विद्यार्थी बिहार और राजस्थान से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए ना आते तो जीवन में आज उन्होंने जो फैसला किया है क्या उसके बारे में भी सोच भी सकते थे? उनकी यह कहानी नई नागरिकता और नई सामुदायिकता के उदय की कहानी है। ...विश्वविद्यालय सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से बहिष्कृत व्यक्तियों के लिए शरण स्थली और घर की तरह हैं; वह नए सम्बन्धों  को जन्म देकर उन्हें पल्लवित करते हैं। भले ही शैक्षणिक उत्कृष्टता को मापने वाली रिपोर्टों में इन घटनाओं का जिक्र ना होता हो लेकिन यदि यह राष्ट्र निर्माण नहीं तो राष्ट्र निर्माण कहते किसे हैं"?

अब हमें खुद से पूछना चाहिए, क्या हम डिजिटल शिक्षा के बारे में बात करते समय शिक्षा और शिक्षण संस्थानों के इस उद्देश्य को याद रखते हैं? क्या ऑनलाइन शिक्षा विश्वविद्यालयों का विकल्प बन सकती है?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के एमए हिन्दी के छात्र हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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