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ऑनलाइन शिक्षा कोई विकल्प नहीं
दरअसल अभी तो मात्र कुछ व्यवहारिक पहलू या दिक्कतें हैं जो सामने आई हैं। बहस तो इस बात पर होनी चाहिये कि स्थापित शिक्षा व्यवस्था के विकल्प में ऑनलाइन शिक्षा को क्यों थोपने की बात चल रही है? इसके पीछे क्या छिपा मकसद है?
कुमुदिनी पति
08 Jul 2020
ऑनलाइन शिक्षा कोई विकल्प नहीं

भारत में कोविड-19 के केस लगातार बढ़ रहे हैं। अब तक 7 लाख मामले औपचारिक रूप से दर्ज हो चुके हैं। और ऐसे में सरकार को पुनः विचार करना पड़ रहा है कि कौन से कारोबार और गतिविधियां चालू की जा सकती हैं। अनिश्चितता के इस दौर में सबसे ज्यादा आतंकित हैं शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए लोग, चाहे वे अध्यापक हों या छात्र; यहां तक कि कर्मचारियों का जीवन भी प्रभावित होगा क्योंकि शिक्षण संस्थान बंद पड़े हुए हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था, चाहे वह जैसी भी रही हो, 150 वर्षों में विकसित हुई है। अब लॉकडाउन की आड़ में इस पद्धति को समाप्त कर ऑनलाइन शिक्षा से काम चलाने की बात हाने लगी है। ऑनलाइन शिक्षा के विषय में बातें पहले भी होती रही हैं और कई ऑनलाइन कोर्सेस उपलब्ध भी रहे हैं। पर ऑनलाइन शिक्षा को स्थापित शिक्षा व्यवस्था की मदद में लगाया जा रहा था, न कि विकल्प के रूप में देखा जा रहा था।

इस बार भी हम यही समझे कि कोविड का ग्राफ धीरे-धीरे समतल हो जाएगा और हम पुनः सामान्य जीवन की ओर लौटेंगे; तो ऑनलाइन शिक्षा को एक समय अन्तराल के लिए छात्रों को जोड़े रखने के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इस आकलन के मद्देनज़र शिक्षण संस्थानों ने घोषणा की थी कि जुलाई से सामान्य ढंग से अकदमिक सत्र प्रारंभ हो जाएगा। पर अब लगने लगा है कि ऑनलाइन शिक्षा कई महीनों तक जारी रहेगी। इसलिए कई शोध चल रहे हैं कि ऑनलाइन शिक्षा को यदि लम्बे समय तक जारी रखने की मजबूरी हुई तो इसका पूरे समाज पर क्या नकारात्मक असर होगा।

दूसरी ओर कई विश्वविद्यालयों में अध्यापक और छात्र शंका जाहिर कर रहे हैं कि सरकार द्वारा ऑनलाइन शिक्षा को एक स्थायी विकल्प बनाने की कवायद चल रही है। ऑनलाइन शिक्षा और परीक्षा का दिल्ली विश्वविद्यालय सहित कुछ अन्य विश्वविद्यालयों में जमकर विरोध शुरू हुआ है। जून में विरोध प्रदर्शन हुआ और गिरफ्तारियां भी हुईं। डूटा लगातार छात्रों से फीडबैक प्राप्त कर रहा था कि ऑनलाइन परीक्षाओं से उनका भारी नुकसान होगा क्योंकि न ही वे इसके लिए  मानसिक रूप से तैयार हैं न ही सबके पास इसके लिए मूलभूत व्यवस्थाएं हैं। कई छात्रों ने बताया कि कैसी-कैसी दिक्कतें आ रही थीं। जुलाई 8 तक मॉक परीक्षा देने वाले छात्रों ने डूटा पदाधिकारियों के पास हज़ारों में पैनिक कॉल्स किये-सबसे पहले तो छात्र जिस वेबसाइट का पहले भी इस्तेमाल कर चुके थे उसे खोलने पर मैसेज आने लगा कि वह गलत यूआरएल है।

दूसरी और प्रश्नों में गलतियां थीं; छात्र ने जिस पेपर को चुना, वह वेबसाइट पर था ही नहीं। कभी नेटवर्क नहीं मिला तो कभी ओटीपी नहीं आया। छात्र ट्विटर पर हैशटैग डीयूअगेन्स्टऑनलाइनइक्ज़ाम्स चलाने लगे। छात्रों ने बताया कि वीसी और डीन उनके फोनकॉल्स का जवाब नहीं दे रहे थे पर विश्वविद्यालय की साइट शिकायतों के कारण क्रैश कर गई। संघर्ष अभी जारी है।

इसे पढ़ें : महामारी के दौरान ऑनलाइन ओपन बुक इम्तिहान- क्या छात्रों से बदला लेने की कोशिश है?  

उधर, जेएनयू के दो अध्यापक, जो जनूटा के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं-आएशा किद्वई और अतुल सूद ने एक सर्वे किया और पाया कि 70 प्रतिशत अधापकों का मानना है कि ऑनलाइन शिक्षा, कक्षाओं में चलने वाली शिक्षा का विकल्प नहीं हो सकती। मानव संसाधन मंत्रालय को विश्वविद्यालय द्वारा भेजे गए आंकड़ों के अनुसार केवल 35.6 प्रतिशत छात्र और 29.7 प्रतिशत छात्राएं ऑनलाइन क्लास में हिस्सा ले पाए। सर्वे रिपोर्ट के आधार पर इन अध्यपकों ने बताया कि कोविड संक्रमण के मद्देनज़र छात्रों को छात्रावास खाली करने का निर्देश दिया गया था। जो छात्र-छात्राएं घर चले गए, उनमें से कइयों के परिवार की आर्थिक स्थिति लॉकडाउन के चलते दयनीय हो चुकी थी, इसलिए वे न ही ऐसे उपकरण या डिवाइस खरीद सकते थे जिनकी मदद से वे ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण कर सकें, न ही उनके पास इंटरनेट की सुविधा थी। जिनके पास डिवाइस और इंटरनेट दोनों थे, उन्हें सही बैंडविड्थ नहीं मिल पाया या कनेक्टिविटी की समस्या झेलनी पड़ी।

‘‘जब आप ऑनलाइन पद्धति से शिक्षा ही नहीं पहुंचा पाए तो आप परीक्षा कैसे ले सकते हैं?’’ उन्होंने प्रश्न किया।

वर्तमान स्थिति में अध्यापकों के पास ऑनलाइन मीटिंगों के लिए संस्थागत लाइसेंस नहीं हैं, उन्हें कोई स्पष्ट निर्देश भी नहीं मिले हैं कि ‘ऑनलाइन शिक्षा’ कैसे दी जाएगी और परीक्षाओं के लिए क्या तैयारियां की जाएंगी। कई अधापकों ने बताया कि गरीब छात्रों को ये सुविधा उपलब्ध कराने हेतु विशेष फंड की आवश्यकता होगी, जिसपर कोई बात नहीं हो रही। नेत्रहीन छात्रों को ऑनलाइन परीक्षा में बैठना असंभव होगा और पिछड़े इलाकों में रहने वाले छात्र पूरी तरह से इस पद्धति से कटे हुए रहेंगे, तो क्या उन्हें छोड़ दिया जाएगा? ऐसे ढेरों सवाल अनुत्तरित हैं।

इसके अलावा शोध छात्रों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत है कि वे सर्वे और फील्ड वर्क नहीं कर सकते और विज्ञान के छात्र प्रयोगशालाओं में प्रयोग नहीं हो सकते।

जेएनयूएसयू के प्रतिनिधियों का कहना है कि व्यापक छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता क्योंकि ऑनलाइन शिक्षा में भारी ‘‘डिजिटल डिवाइड’’ है, यानी जो छात्र डिजिटल प्रणाली को इस्तेमाल करने के लिए आर्थिक व सामाजिक रूप से समर्थ नहीं हैं, वे इसका लाभ नहीं ले सकेंगे। बहुसंख्यक आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े हुए छात्रों से तो शिक्षा का अधिकार ही छिन जाएगा। इसलिए रिपार्ट में प्रसताव दिया गया है कि जनवरी 2021 तक नए प्रवेश न हों और अकादमिक सत्र को भी लम्बित किया जाए ताकि गंभीरता से इन सवालों पर बात हो सके। फिर, किसी निर्णय लेने से पूर्व छात्रों, अध्यापकों और विश्वविद्यालय प्रशासन की बैठकें हों और समस्त पहलुओं को समझकर उनपर विचार हो।

पर सवाल इतना ही नहीं है। दरअसल यह तो मात्र कुछ व्यवहारिक पहलू हैं जो सामने आए हैं। बहस तो इस बात पर होनी चाहिये कि स्थापित शिक्षा व्यवस्था के विकल्प में ऑनलाइन शिक्षा को क्यों थोपने की बात चल रही है? इसके पीछे क्या छिपा मकसद है?

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर कृष्ण कुमार ने कहा, ‘‘इस मुद्दे को हल्के में न लिया जाए, इसका परिणाम काफी गंभीर होगा। हमारी स्थापित शिक्षा व्यवस्था को विकसित होने में 100-150 सालों का समय लगा है और लोगों ने यहां तक पहुंचने के लिए बहुत संघर्ष किया है। इसमें सबसे बड़ी खूबी यह है कि हर वर्ग के छात्र, हर जाति या समुदाय के विद्यार्थी और लड़कियां एक साथ साझा वातावरण में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। महामारी के बहाने इस साझा शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर ऑनलाइन शिक्षा को यदि विकल्प बना दिया गया तो यह सबसे दुखद प्रकरण होगा।

एक तो यह कि ढेर सारे छात्र शिक्षा से वंचित होंगे, दूसरे, जो ऑनलाइन शिक्षा ले सकेंगे उनको अपने घरों में कैद रहना पड़ेगा। उनका आपस में मिल-जुलकर सीखना-समझना समाप्त हो जाएगा। छात्रों के बीच सहभागिता, बहसें, आन्दोलनों में उनकी सक्रियता, समाज को समझने के रास्ते सब समाप्त हो जाएंगे। इसलिए फिलहाल के संक्रमण के दौर में यह केवल शिक्षा का एक माध्यम हो सकता है- आप कह सकते हैं कि गुज़ारे का माध्यम बन सकता है। पर वह कभी भी स्थापित शिक्षा व्यवस्था का विकल्प नहीं बन सकता। सबसे बड़ा खतरा है यह है कि शिक्षण संस्थान बंद हो जाएंगे, लाखों अध्यापकों की नौकरियां दांव पर लगेंगी, और सबसे अधिक लाभ गूगल, ऐप्पल, माइक्रोसाफ्ट और ज़ूम टेक्नोलॉजी जैसी कम्पनियों को होगा।’’

एक संस्थान में दर्शनशास्त्र पढ़ाने वाली अध्यापिका ने बताया कि उनसे संस्थान ने कहा है कि अपना व्याख्यान रिकॉर्ड करके भेज दें। अब सवाल यह उठता है कि जब संस्थान के पास सारे व्याख्यान रिकार्ड किये हुए होंगे, तो उन्हें अध्यापकों की क्या जरूरत होगी? खर्च बचाने के लिए वे उनका उपयोग करेंगे और छात्रों को स्टडी मटीरियल व सर्टिफिकेट या डिग्री देने के लाखों रुपये वसूलंगे; न जाने कितनी दुकानें खुल जाएंगी जो डिग्री बांटेंगी। पर बिना अध्यापकों के जटिलतम विषयों को समझना कितना मुश्किल होगा यह तो हम अनुभव से जानते हैं।’’

प्रोफेसर कृष्ण कुमार ने आगे बताया, ‘‘करोना काल में शिक्षा प्रदान करने के दूसरे सस्ते और सुलभ तरीके भी हो सकते हैं, जैसे ज्ञानवाणी चैनल, जिसे हर कोई रेडियो पर सुन सकता है। इसे और विकसित करें तो प्रत्येक कक्षा के लिए कार्यक्रम प्रसारित किये जा सकते हैं। दूरदर्शन भी एक सशक्त माध्यम बन सकता है। पर उनका स्तर इतना निम्न है कि देखना ही सज़ा है। इन कार्यक्रमों को उन्नत दर्जे का क्यों नहीं बनाया जाता?’’

यह सच है कि ऐसा करने के लिए और नए शिक्षण संस्थान खोलने के लिए सरकार को शिक्षा पर बजट कई गुना बढ़ाना पड़ेगा। पर इसपर कभी कोई बात नहीं हाती। प्रख्यात शिक्षाशास्त्री डॉ. अनिल सदगोपाल से बात करने पर उन्होंने बहुत गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि ऑनलाइन शिक्षा लाने की बात इत्तेफाक से नहीं हुई है, न ही केवल कोविड संक्रमण इसके लिए जिम्मेदार है। 1 मई 2020 को प्रधानमंत्री ने स्वयं राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की समीक्षा कर रिपोर्ट जारी की। इसमें 3-सूत्री ऐजेंडा पेश किया गया। ‘‘भारत की शिक्षा को वैशविक स्तर पर सबसे उच्च मानकों के बराबर पहुंचाना-इसके लिए शैक्षिक क्षेत्र में आधुनिकतम तकनीक यानी सूचना संप्रेशण तकनीक का इस्तेमाल करना होगा यानी ऑनलाइन शिक्षा के जरिये शिक्षण परिणाम बेहतर हो जाएंगे; सभी के लिए उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करते हुए एक ‘जीवंत ज्ञान समाज’ बनेगा जिसके आधार पर भारत को वैश्विक ज्ञान की महाशक्ति में तब्दील किया जा सकेगा।’’ अनिल जी कहते हैं,‘‘शिक्षा के ये उच्च मानक कौन तय करता है? ये न्यूयॉर्क, बीजिंग, लंदन व टोक्यो स्टाक एक्सचेंज में सक्रिय मार्केटिंग एजेंसियां करती हैं। यानी यह भी मुनाफाखोरी का एक और धंधा है।’’

तो गरीब और शोषित जातियों के छात्रों की शिक्षा तक पहुंच ही नहीं बन पाएगी क्योंकि शिक्षा का खर्च छात्र को ही उठाना पड़ेगा और वह उसके लिए काफी महंगी होगी क्योंकि प्राइवेट प्लेयर्स-यानी कॉरपोरेट्स का ही उसपर कब्ज़ा होगा। ऐसी शिक्षा छात्र को सामाजिक प्राणी न बनाकर रोज़गार के बाज़ार में एक पण्य वस्तु या कमोडिटी बना देगी। सद्गोपाल जी ने फिर कहा, ‘‘ऑनलाइन शिक्षा को पूरी तरह खारिज करना होगा, जैसा कि हैदराबाद विश्वविद्यालय ने किया है। शासन छात्रों में ‘क्रिटिकल थिंकिग’ खत्म करना चाहता है ताकि कोई समाज व्यवस्था पर प्रश्न न कर सके-कोई रोहित वेमुला या कनैहा कुमार न पैदा हो, किसी कक्षा में अंबेडकर और मार्क्स के बारे में पढ़ाई न हो और कोई न जाने कि ज्योतिबा फुले या भगतसिंह कौन थे। कॉरपोरेट्स के हाथों में शिक्षा व्यवस्था रहेगी तो वे शिक्षा को ‘होमोजिनाइज़’ करेंगे ताकि समाज में जो विविध विचार हैं, संस्कृतियां हैं सब पर रंदा मार दिया जाए। शिक्षा में ह्यूमन एजेंसी समाप्त हो जाएगी तो परिवर्तनकामी युवा मशीन बनेंगे, गुलाम बनेंगे!’’

अब तक तो हम उच्च शिक्षा के बारे में चर्चा कर रहे थे। छोटे बच्चों और उनके अभिभावकों पर तो ऑनलाइन कक्षाओं का भयानक मनोवैज्ञानिक दबाव आ रहा है। एक मां ने बताया कि बच्चों का ‘स्क्रीन टाइम’ बहुत बढ़ गया है, क्योंकि वे पढ़ाई और मनोरंजन दोनों के लिए अब मोबाइल फोन का प्रयोग कर रहे हैं। वह बोलीं, ‘‘यह चिन्ता की बात है क्योंकि मस्तिष्क और आंखों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ना ही है। ऑनलाइन दिये गए असाइनमेंट और प्रॉजेक्ट लेकर माता-पिता अपना सर फोड़ रहे हैं और जिसके घर में सहायता करने वाला कोई नहीं है, वे तनावग्रस्त हैं क्योंकि उन्हें कम नंबर मिलेंगे। वे आहिस्ता-आहिस्ता शिक्षा से बाहर हो जाएंगे।

कइयों ने कहा कि अध्यापक के पास कोई तरीका नहीं है जिससे नकल रोकी जा सके। बच्चे गूगल से देखकर या किताब से देखकर उत्तर देते हैं। इंटरनेट से नकल करके कविताएं और निबंध लिखे रहे हैं, तो सोचने की क्षमता कुंद हो रही है। कक्षा 11 की विज्ञान की एक छात्रा ने बताया कि अब प्रयोगशालाओं में जाना संभव नहीं है तो प्रयोगों के परिणाम थ्योरी में लिख दिये जा रहे हैं। कोई मज़ा नहीं आता क्योंकि हम नहीं देखते कि रासायनिक क्रियाएं कैसे होती हैं और तारों में बिजली का प्रवाह कैसे छोटे से बल्ब के जलने में देखा जा सकता है।

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के नीचे पत्तों की संरचना को अपनी आंखों से देखने में जो कौतूहल पैदा होता है, वह चित्र को देखकर नहीं हो सकता। अध्यापकों का कहना है कि बच्चों को अपने सामने बिना देखे समझना मुश्किल होता है कि उन्होंने कितना ग्रहण किया। फिर बच्चे प्रश्न पूछने में डरते भी हैं तो सूचना का ओवरलोड हो जाता है पर ग्रहण कम हो पाता है। कई बार छात्र-छात्राएं ऑनलाइन शिक्षा से ऊबते हुए नज़र आते हैं और क्लास छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें सामाजिक एकाकीपन महसूस होता है। साथ बैठना, एक दूसरे से सीखना, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में रहना, साथ खेलना व खाना तथा पढ़ाई से इतर सांस्कृतिक मेल-जोल की ओर बढ़ना, स्कूल में होने वाले तमाम कार्यक्रमों में भाग लेना आदि, यह सब एक बच्चे की ज़िन्दगी से हटा लें तो कुछ समय बाद वह निश्चित ही मनोरोगी बन जाएगा। क्या इन विषयों पर गंभीरता से बात हो रही है? 

मद्रास हाई कोर्ट में ऑनलाइन शिक्षा के विरोध में कई याचिकाएं दर्ज की जा रही हैं कि ऑनलाइन शिक्षा से हानि हो रही है तो इसे बंद किया जाए। कोर्ट ने सरकार के पास क्वेरी भेजी है पर इस पद्धति पर स्टे नहीं दिया। परंतु यह उत्साहवर्धक बात है कि कई खेमों से सवाल उठने लगे हैं और बहस जोर पकड़ रही है। शिक्षा जगत से जुड़े हर गंभीर व्यक्ति और संगठनों व शिक्षाशास्त्रियों ने सोचना शुरू किया है और इस विषय पर कई लेख भी लिखे जा रहे हैं। आशा है कि आने वाले दिनों में यह एक आंदोलन का रूप लेगा।

 (कुमुदिनी पति एक समाजसेवी और विचारक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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