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MSP की कानूनी गारंटी ही यूपी के किसानों के लिए ठोस उपलब्धि हो सकती है
पंजाब-हरियाणा के बाहर के, विशेषकर UP के किसानों और उनके नेताओं की स्थिति वस्तुगत रूप से भिन्न है। MSP की कानूनी गारंटी ही उनके लिए इस आंदोलन की एक ठोस उपलब्धि हो सकती है, जो अभी अधर में है। इसलिए वे MSP की कानूनी गारण्टी की लड़ाई को जारी रखना चाहते हैं।
लाल बहादुर सिंह
04 Dec 2021
kisan andolan
Image courtesy : NewsTrack

कृषि के कारपोरेटीकरण को रोककर तथा योगी-मोदी की विदाई की पटकथा लिखकर किसान-आंदोलन अपनी ऐतिहासिक भूमिका पहले ही निभा चुका है। 

आज होने जा रही किसान-नेताओं की अहम बैठक और उसके फैसलों की ओर पूरा देश उम्मीद-भरी, उत्सुक निगाहों से देख रहा है।  यह देखना रोचक होगा कि बदली परिस्थितियों में नयी रणनीति के साथ नए फॉरमेट में आंदोलन जारी रहता है या इतिहास गढ़ चुका यह महान आंदोलन फिलहाल रंगमंच से विदा लेता है, भविष्य में और भी ऊर्जा और आवेग के साथ, नए तेवर और कलेवर में प्रकट होने के लिए।

जो भी हो, यह देश किसान आंदोलन और उसके महान नेताओं का ऋणी रहेगा, इतिहास के एक निर्णायक समय में उन्होंने फासीवादी हमले का वार अपने सीने पर झेलकर इस देश को मुकम्मल फासीवादी निज़ाम के शिकंजे में जाने से बचा लिया।

कारपोरेट-हित में लाये गए कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए अहंकारी मोदी सरकार को बाध्य कर किसान-आंदोलन ने बड़ी जीत दर्ज कर ली है। उम्मीद है कि MSP को छोड़कर अन्य मांगों पर देर-सबेर कोई न कोई understanding बन जाएगी।

हालाँकि, सरकार जिस तरह पूरे मामले को deal कर रही है, उससे सरकार की किसानों के बीच रही सही साख भी खत्म होती जा रही है। 

दरअसल सरकार कारपोरेट लॉबी को नवउदारवादी सुधारों के प्रति अपनी असंदिग्ध निष्ठा के बारे में बारम्बार आश्वस्त करना चाहती है, साथ ही वह किसान-आंदोलन के प्रति अपनी नफरत और नाराजगी को छिपा नहीं पा रही जिसके कारण उसे कानूनों को वापस लेना पड़ा।

 लोग इस बात पर चकित हैं कि सरकार अगर चुनावी लाभ के लिए कानूनों से पीछे हटी है तो फिर किसानों को गले क्यों नहीं लगा रही ? इसके पीछे मोदी जी के आहत अहंकार से अधिक जो मुख्य कारण है, वह यह है कि सरकार कारपोरेट लॉबी, कृषि- सुधारों के समर्थकों को ऐसा कोई message नहीं देना चाहती कि वह अपने सुधार के एजेंडे से रंच मात्र भी पीछे हटी है। इसीलिए वह शहीद किसानों के मुआवजे जैसे अतिसंवेदनशील मुद्दे पर भी यहां तक चली गयी कि हमारे पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है और मुआवजे का सवाल ही नहीं है ! 

दरअसल आंदोलन के शहीदों के लिए मुआवजे और स्मारक का सवाल आर्थिक मामला या जमीन देने से अधिक आंदोलन को वैधता देने का सवाल है, जिससे सरकार हर हाल में बचना चाहती है। यही बात आंदोलन के दौरान कायम किये गए मुकदमों को लेकर है। इसीलिये वह इन दोनों मामलों को राज्यों का विषय बताकर खुद बच निकलना चाहती है। तकनीकी-कानूनी पहलू जो भी हो, किसानों ने भी यह तर्क देकर मोदी सरकार को घेर दिया है कि यह आंदोलन केंद्र सरकार की नीतियों और कदमों के खिलाफ था, इसलिए वह इन मौतों और मुकदमों के लिए केंद्रीय तौर पर जिम्मेदार है और अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकती। 

दरअसल किसान-आंदोलन के प्रति शुरू से ही मोदी सरकार का दुश्मनाना रुख बना रहा है। एक साल के आंदोलन के दौर की सब बातें छोड़ भी दी जाएं तो मोदी ने कानूनों को वापस लेने की जिस तरह ट्वीट और टीवी के माध्यम से, किसान-नेताओं को बिना involve किये, एकतरफा घोषणा की और उस दौरान भी वह कानूनों को justify करते रहे, आंदोलनकारी किसानों के ऊपर उन्हें समझ न पाने की तोहमत मढ़ते रहे, यहां तक कि कानून वापसी के बिल की प्रस्तावना में भी कानूनों को सही ठहराते हुए तर्क दिए गए, उससे किसानों ने अपने को बेहद अपमानित महसूस किया है।

सर्वोपरि, मोदी ने जिस तरह आंदोलन को बारम्बार " कुछ " किसानों की जिद के रूप में पेश किया जिनकी वजह से वे व्यापक किसानों का हित नहीं कर पाए, अपने को छोटे किसानों का खैरख्वाह और आंदोलन को बड़े किसानों का बताकर बदनाम करते रहे और अब सरकार व्यक्तिगत स्तर पर किसानों से तार जोड़कर उन्हें आंदोलन से अलग करने, वापस लौटाने की कोशिश कर रही है, उससे नाराज किसान नेताओं ने सरकार पर आन्दोलन को बांटने की साजिश का आरोप लगाया है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने बयान जारी कर कहा है, " नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा, औपचारिक संवाद शुरू न करके, और लंबित मांगों के बारे में मोर्चा द्वारा सरकार को भेजे गए पत्र का औपचारिक रूप से जवाब नहीं देकर, किसानों को बांटने के निरंतर जारी प्रयासों की संयक्त मोर्चा निंदा करता है। "

जाहिर है इस सबसे किसानों के मन में सरकार की नीति और नीयत को लेकर जो शक हमेशा से रहा है उसकी ही पुष्टि हो रही है और वे सरकार की बातों पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं।

जहां तक MSP की बात है, साफ है कि सरकार कुछ भी commit करने को तैयार नहीं है। वह MSP पर गोलमटोल भाषा में बात करते हुए कमेटी बना कर किसानों का आन्दोलन किसी तरह खत्म करवाने में interested है। किसान नेता इस चालाकी को अच्छी तरह समझ रहे हैं। इसीलिये संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने वक्तव्य में कहा है कि "  MSP को लेकर पंजाब के एक किसान नेता को फोन करके सरकार ने कमेटी के लिए 5 नाम मांगे हैं, हमें लिखित कोई जानकारी नहीं दी गयी है। इस कमेटी के details के बारे में हमें कुछ नहीं मालूम, मसलन यह कमेटी किस लिए है , इसका mandate या terms of reference क्या हैं। हम 4 दिसम्बर की बैठक में इस पर विचार करेंगे। "

दरअसल, आंदोलन एक वास्तविक अंतर्विरोध का सामना कर रहा है। ठीक वैसे ही जैसे 3 कानूनों से पंजाब-हरियाणा के किसानों को छोड़कर अन्य किसानों को कोई  समस्या नहीं लग रही थी क्योंकि सरकारी मंडी खरीद के फायदों  का उन्हें स्वाद ही नहीं मिला है, वैसे ही MSP गारण्टी पंजाब-हरियाणा के किसानों को बड़ा मुद्दा नहीं लग रहा क्योंकि वह उन्हें पहले से उपलब्ध है ही। ऐसा लगता है कि  पंजाब के  किसान नेताओं का एक हिस्सा कानूनों की वापसी को पूरी जीत मानकर वापस लौटने की मनःस्थिति में पहुँच गया है।

हरियाणा जो शत्रुवत बर्ताव करने वाली भाजपाई सरकार के कारण किसानों के जमीनी प्रतिरोध और टकराव का सबसे बड़ा मैदान बना, स्वाभाविक रूप से वहां के किसान नेताओं की सबसे बड़ी चिंता किसानों पर लदे 45 हजार के आसपास मुकदमों की वापसी है।

पंजाब-हरियाणा के बाहर के, विशेषकर UP के किसानों और उनके नेताओं की स्थिति वस्तुगत रूप से भिन्न है। MSP की कानूनी गारंटी ही उनके लिए इस आंदोलन की एक ठोस उपलब्धि हो सकती है, जो अभी अधर में है। इसलिए वे MSP की कानूनी गारण्टी की लड़ाई को जारी रखना चाहते हैं।

पंजाब से आने वाले शीर्ष किसान नेताओं के लिये यह कठिन परीक्षा की घड़ी है। वे अब केवल पंजाब नहीं पूरे देश के किसानों के नेता बन चुके हैं, उनके आह्वान पर उनकी लड़ाई के साथ पूरे देश के किसान खड़े हुए और अब वे सबकी उम्मीदों के केंद्र और नायक बन चुके हैं।

उनके सामने एक ओर पंजाब के किसानों के सम्भवतः बड़े हिस्से का अब आंदोलन को खत्म करने का तर्क और मनःस्थिति है। दूसरी ओर अभी अनसुलझी मांगों, विशेषकर MSP की कानूनी गारण्टी की पूरे भारत के किसानों की दीर्घ-प्रतीक्षित मांग को पूरा करवाने की चुनौती उनके सामने है। स्वयं पंजाब के लिए भी crop-diversification, घटते जलस्तर और पर्यावरण की दृष्टि से वे सभी 23 जिंसों के लिए गारंटीशुदा MSP के महत्व को अच्छी तरह समझते हैं।

सर्वोपरि, किसानों की जो ऐतिहासिक एकता इस आंदोलन के माध्यम से कायम हुई है, उसे हर हाल में कायम रखने और आगे बढ़ाने की चुनौती है। इसी पर आने वाले दिनों में कृषि-सुधारों को चोर-दरवाजों से किसानों पर थोपने की  साजिशों के खिलाफ भविष्य की लड़ाइयों की तकदीर निर्भर है।

सरकार और गोदी मीडिया के इस प्रचार में दम नहीं है कि किसान-नेता विधानसभा चुनावों में भाजपा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से किसान आंदोलन को ख़त्म नहीं होने देना चाहते। सच्चाई यह है कि UP समेत सभी राज्यों में सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण advance stage में है और किसान-आंदोलन का इन चुनावों पर जो impact होना था,वह पहले ही हो चुका है।

मोदी एंड कम्पनी द्वारा आंदोलन के साथ किया गया संवेदनहीन बर्ताव, क्रूर दमन- लांछन, 1 साल की अकथनीय यातना, 700 से ऊपर शहीदों की यादें, आंदोलन के सम्मानित बुजुर्ग नेता बलबीर सिंह राजेवाल के शब्दों में, " किसानों के मन में कभी भी भाजपा के प्रति रहम नहीं पैदा होने देंगी। "

यह आंदोलन 2022 में योगी और 2024 में मोदी की विदाई की पटकथा लिख चुका है।

कृषि को कारपोरेट के अधीन करने की नवउदारवादी मुहिम को इसने पीछे धकेल दिया है, सर्वोपरि प्रो. प्रभात पटनायक के शब्दों में " साम्राज्यवाद के लिए यह setback है। अनायास नहीं है कि पश्चिमी मीडिया कानूनों की वापसी की भारी आलोचना कर रहा है। साम्राज्यवाद पूरी दुनिया में land-use के pattern को कंट्रोल करना चाहता है। अतिराष्ट्रवाद की लफ्फाजी की आड़ में साम्राज्यवादी हितों की सेवा करने वाली मोदी सरकार द्वारा कृषि कानून इसी उद्देश्य से लाये गए थे। कृषि का कारपोरेटीकरण land-use पर Metropolitan control स्थापित कर देता। साम्राज्यवाद ने Academia और मीडिया में अपनी समर्थक लॉबी के माध्यम से इन कानूनों को लागू कराने के लिए पूरी ताकत लगा दी, लेकिन किसानों के दृढ़प्रतिज्ञ प्रतिरोध के आगे उनकी सारी कोशिश नाकाम ही गयी। "

यह महान आन्दोलन भविष्य के और बड़े युगान्तकारी जनान्दोलनों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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