NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
कर्नाटक : 6000 से ज़्यादा जेनु कुरुबा आदिवासियों ने टाइगर रिज़र्व के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू किया
आदिवासी समुदाय का कहना है कि वे राज्य के वन विभाग द्वारा ज़बरदस्ती ज़मीन ख़ाली करवाए जाने और प्रताड़ना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं।
सुमेधा पाल
25 Mar 2021
कर्नाटक : 6000 से ज़्यादा जेनु कुरुबा आदिवासियों ने टाइगर रिज़र्व के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू किया

कर्नाटक में नागरहोल टाइगर रिज़र्व के खिलाफ़ 6000 से ज़्यादा जेनु कुरुबा आदिवासी कठोर प्रदर्शन कर रहे हैं। फॉरेस्ट रेंजर के ऑफ़िस के सामने अनिश्चितकाल तक चलने वाला यह विरोध प्रदर्शन 17 मार्च को शुरू हुआ है।

समुदाय का आरोप है कि राज्य सरकार, वन विभाग और WCS (वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी) द्वारा जबरदस्ती उन्हें उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है, ताकि ईको-टूरिज़्म से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सके, जबकि इस दौरान आदिवासियों के वन्य और भू अधिकारों का दमन किया जा रहा है।

बाघ संरक्षण के नाम पर विस्थापन को अंजाम दिया जा रहा है

पारंपरिक तौर पर शहद इकट्ठा करने वाले इस समुदाय का भूमि अधिकार संघर्ष 1970 के दशक से शुरू हो चुका था। हाल में जब नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान में ईको-टूरिज़्म से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना शुरू हुआ तो समुदाय को बाहर करने की कोशिशें नए सिरे से शुरू हो गईं।

जेुनु कुरुबा जनजाति के पुरोहित जे के थिम्मा कहते हैं, "अलग-अलग रेंजों में प्रदर्शन किए जा रहे हैं। राज्य सरकार, केंद्र सरकार और उनकी एजेंसी NTCA (नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी) आदिवासियों को उनकी ज़मीन से हटा रही है, ताकि ईको-टूरिज़्म का विस्तार किया जा सके, जिसका मुख्य उद्देश्य पैसा बनाना और मुनाफ़ा कमाना है।" थिम्मा आगे आदिवासियों समुदायों को वन्य अधिकार ना दिए जाने की बात बताते हुए कहते हैं, "हमारे समुदाय ने वैयक्तिक भूमि अधिकारों, सामुदायिक अधिकारों और रहवास अधिकारों के लिए संघर्ष किया है। लेकिन हमारे दावों को खारिज कर दिया गया। भूमि अधिकार के लिए 4000 से ज़्यादा दावे प्रस्तुत किए गए, लेकिन किसी को भी उनकी ज़मीन का अधिकार नहीं मिला। जिन लोगों को वैयक्तिक भूमि अधिकार हासिल भी हो गए, उन्हें भी आगे अपने घरों के विस्तार करने या ज़मीन जोतने के अधिकार नहीं हैं।"

जेनु कुरुबा समुदाय पारंपरिक तौर पर शहद को इकट्ठा करता रहा है, लेकिन आजीविका चलाने के लिए उनकी कृषि और वन से इकट्ठा की गई चीजों पर बहुत ज़्यादा निर्भरता है।

समुदाय का आरोप है कि कर्नाटक वन विभाग ने इन गतिविधियों में बाधा डाल दी है और आदिवासियों के खिलाफ़ मामले भी दर्ज किए हैं। कुरुबा आगे कहती हैं कि बाघ संरक्षण की आड़ में आदिवासियों की पहचान और उनकी आजीविका को दांव पर लगाकर उन्हें जंगल से बाहर निकाला जा रहा है।

थिम्मा के मुताबिक़, "राज्य वन विभाग और केंद्र सरकार इस विमर्श को बढ़ाने के लिए एक-दूसरे का साथ दे रही हैं; इसके ज़रिए समुदाय को ज़मीन से खदेड़ने की मंशा है। हमें हमारी ज़मीनों तक पहुंच से भी रोका जा रहा है।"

राज्य वन्यजीव बोर्ड, राज्य वन विभाग और NTCA पर समुदाय के अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए थिम्मा कहती हैं, "वन अधिकार कानून की धारा 5(b) ग्राम सभाओं को अपनी ज़मीन से जुड़े फ़ैसले लेने का अधिकार देती है। लेकिन एक तरफ यहां से समुदाय को निकाला जा रहा है, दूसरी तरफ यहां वन विभाग के बंगले, कैंप ऑफ़िस और सड़कें बनाई जा रही हैं। यहां ईको-टूरिज़्म और सफारियों को प्रोत्साहन देने वाला वन विभाग खुद अतिक्रमणकारी है।"

निकासी और 'स्वैच्छिक विस्थापन'

भ-अधिकारों के लिए आदिवासियों का संघर्ष कोई नई बात नहीं है। 1970 के दशक से शुरू हुआ यह संघर्ष आज तक जारी है। नीलगिरी क्षेत्र में जेनु कुरुबा समुदाय के कई लोगों को नागरहोल और बांदीपुर जैसे टाइगर रिज़र्व से अतीत में ही बाहर किया जा चुका है। अब यह लोग भी इन प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हैं।

800 से ज़्यादा लोगों ने जंगल में वापस जाने के लिए दावे लगाए हुए हैं। समुदाय के सदस्य JA शिवु ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा, "जिन लोगों को जंगल से बाहर किया गया, उन्हें दैनिक मज़ूदर और बंधुआ मज़दूर के तौर पर उद्यानों में काम करना पड़ा है, उनका अपनी ज़मीन, संस्कृति और भाषा के साथ संबंध ख़त्म हो गया। जिन लोगों को बाहर किया गया था, अब वे लोग अपनी जगह पर वापस आने की कोशिश कर रहे हैं। वे लोग भी इस आंदोलन का बड़ा हिस्सा हैं। वन अधिकार कानून के तहत अपनी ज़मीन पर वापस लौटने के अधिकार 800 से ज़्यादा लोग संघर्ष कर रहे हैं।"

भारत में दूसरे आदिवासी समुदाय भी बाघ संरक्षण बनाम् आदिवासी की धारणा से जूझ रहे हैं, ताकि वे आगे भी जंगल में रह सकें। न्यूज़क्लिक से बात करते हुए इस निकासी के खिलाफ़ काम कर रही "सर्वाइवल इंटरनेशनल" की शोधार्थी सोफि ग्रिग ने बताया, "वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसायटी (WCS) जैसे संगठन सरकार की विस्थापन योजनाओं को अपनी पहली संरक्षण गतिविधि बताते हैं, जिसकी जानकारी उनकी वेबसाइट पर भी मौजूद है, यह लोग वन अधिकारियों के लिए "स्वैच्छिक विस्थापन" के विषय में एक वार्षिक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाते हैं। हालांकि इन विस्थापनों को स्वैच्छिक बताया जाता है, लेकिन सर्वाइवल इंटरनेशनल ने जितने भी मामलों की जांच की है, उसमें आदिवासियों ने बताया है कि वन विभाग ने उनके खिलाफ़ प्रताड़ना और धमकियों का पूरा एक अभियान छेड़ा हुआ था, ताकि वे लोग थक-हारकर अपनी ज़मीन छोड़ दें, मतलब यह हुआ कि विस्थापन जबरदस्ती करवाया गया और यह गैरकानूनी था। हाल में अपनी ज़मीन से हटाए गए जेनु कुरुबा ने भी इस प्रक्रिया को एक तरह की प्रताड़ना बताया है।" शिवु ने आगे कहा, "आदवासियों को उनकी पैतृक ज़मीन से अलग करना सिर्फ़ उनके लिए बुरा नहीं है, यह संरक्षण की प्रक्रिया के भी विपरीत काम करता है और इसे भारतीय व अंतरराष्ट्रीय कानून में गैरकानूनी माना गया है।"

न्यूज़क्लिक ने WCS से उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए संपर्क किया है, लेकिन अब तक उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है। जैसे ही उनकी प्रतिक्रिया आती है, उसे इसे लेख में शामिल कर लिया जाएगा। 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Over 6,000 Jenu Kuruba Adivasis in Karnataka Begin Indefinite Protests against Tiger reserve

Jenu Kuruba
Tribals India
Adivasis India
indegenous people’s rights
Survival International
Wildlife Conservation Society

Related Stories


बाकी खबरें

  • यूपीः किसान आंदोलन और गठबंधन के गढ़ में भी भाजपा को महज़ 16 सीटों का हुआ नुक़सान
    एम.ओबैद
    यूपीः किसान आंदोलन और गठबंधन के गढ़ में भी भाजपा को महज़ 18 सीटों का हुआ नुक़सान
    11 Mar 2022
    वर्ष 2017 के चुनाव नतीजों की तुलना में इस बार भाजपा को पहले दो चरणों में 18 सीटों का नुकसान हुआ है। पिछली बार उसने 91 सीट हासिल की थीं जबकि इस बार उसे 73 सीटें ही मिल पाई हैं।
  • election results
    न्यूज़क्लिक टीम
    BJP से हार के बाद बढ़ी Akhilesh और Priyanka की चुनौती !
    11 Mar 2022
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे के इस एपिसोड में आज Abhisar Sharma चर्चा कर रहे हैं Uttar Pradesh में फिर से BJP की सरकार बनने और साथ ही बात कर रहे हैं अखिलेश यादव और प्रियंका गाँधी वाड्रा की। 2024 के चुनाव…
  • mayawati
    कृष्ण सिंह
    यूपी के नए राजनीतिक परिदृश्य में बसपा की बहुजन राजनीति का हाशिये पर चले जाना
    11 Mar 2022
    किसी भी राजनीतिक दल के पराजित होने या फिर उसके वोट प्रतिशत में बड़ी गिरावट आने का अर्थ यह नहीं होता है कि हम तुरंत उसकी राजनीतिक मृत्यु की घोषणा कर दें। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी उतनी ही मज़बूती के…
  • pakistan
    जस्टिन पॉडुर  
    पाकिस्तान किस प्रकार से बलूचिस्तान में शांति के लिए पहले-विकास की राह को तलाश सकता है
    11 Mar 2022
    राष्ट्र को एकजुट रखने के लिए पाकिस्तान की कोशिश के संघर्ष के केंद्र में अपनाई जा रही आतंकवाद विरोधी मॉडल की विफलता है।
  • zelsenky
    एम के भद्रकुमार
    ज़ेलेंस्की ने बाइडेन के रूस पर युद्ध को बकवास बताया
    11 Mar 2022
    वाशिंगटन को जो रणनीतिक हार का सामना करना पड़ा है, वह दुनिया भर में अमेरिकी प्रतिष्ठा को कम करेगा, उसके ट्रान्साटलांटिक-नेतृत्व को कमजोर करेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License