NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
समाज
भारत
राजनीति
मोदी जी की नोटबंदी को ग़लत साबित करती है पीयूष जैन के घर से मिली बक्सा भर रक़म!
मोदी जी ग़लत हैं। पीयूष जैन के घर से मिला बक्से भर पैसा समाजवादी पार्टी के भ्रष्टाचार का इत्र नहीं बल्कि नोटबंदी के फ़ैसले को ग़लत साबित करने वाला एक और उदाहरण है।
अजय कुमार
29 Dec 2021
मोदी जी की नोटबंदी को ग़लत साबित करती है पीयूष जैन के घर से मिली बक्सा भर रक़म!

कन्नौज के परफ्यूम व्यापारी पीयूष जैन के घर पर लगातार पांच दिनों तक जीएसटी टीम की रेड चलती रही। घर के तहखाने और दीवारों के भीतर से नगदी पैसा तो इतना मिला कि इंसान तो इंसान, मशीनें भी पैसा गिनते गिनते थक गई हैं। बताया जा रहा है कि जीएसटी की टीम 46 बसों में भरकर तकरीबन 200 करोड़ रुपए अपने साथ ले गई है। इस पैसे के अलावा अभी बने ₹11 करोड़ का सोना और ₹6 करोड़ रुपए का चंदन भी बरामद हुआ है।

जब यह खबर न्यूज़ चैनलों के जरिए आम लोगों के बीच दिलचस्पी का जरिया बनने लगी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे अपनी चुनावी सभा में भुनाने में कहां पीछे रहने वाले थे? अपने चिर परिचित हाथ दबा कर आंख मटकाने वाले अंदाज का इस्तेमाल करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बक्सा भर भर कर नोट मिला है। 2017 के पहले भ्रष्टाचार का जो इत्र समाजवादी पार्टी ने छिड़क रखा था, वह सबके सामने आ गया है। प्रधानमंत्री ने यह बात कहकर ताली बटोर ली। लेकिन अब खबर निकल कर आ रही है कि जीएसटी टीम की तरफ से कुछ गड़बड़ी हो गई है। छापा समाजवादी पार्टी से संबंधित पुष्पराज जैन के घर पड़ना था, जबकि पड़ गया पीयूष जैन के घर। पुष्पराज जैन और पीयूष जैन दोनों इत्र व्यापारी है। कन्नौज के जैन मोहल्ले में रहते हैं। 

अखिलेश यादव का कहना है कि योगी आदित्यनाथ झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने मीडिया में झूठा विज्ञापन दिलवाया है। पीयूष जैन के साथ सपा का कोई संबंध नहीं है। उनके निशाने पर पुष्पराज जैन थे। पुष्पराज जैन समाजवादी पार्टी के एमएलसी हैं। यह भी परफ्यूम कारोबारी हैं।

भ्रष्टाचार की जड़ें भारत की सभी राजनीतिक पार्टियों में फैली हुई है। इसलिए मुद्दा भ्रष्टाचार को खत्म करने की बजाय केवल आरोप-प्रत्यारोप की भाषा तक सीमित रह जाता है। उन लोगों पर सवाल नहीं उठते जिन लोगों ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सही कदम नहीं उठाए। उनकी कभी छानबीन नहीं होती जो सब कुछ जानते हुए भी चुप रहे। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते रहे और अपने घर को भरते रहे।

परफ्यूम का कारोबार अकेले दम पर केवल एक दिन में खड़ा तो नहीं हुआ होगा?कहीं से माल खरीदा जाता होगा कहीं पर माल बनाया जाता होगा और कहीं को माल बेचा जाता होगा? यह काम सालों साल से चल रहा होगा. 

कई मालिकों का गठजोड़ आपस में मिलकर एक धंधे को मजबूत बनाता है। ये सब धंधे के मुनाफे के सहयोगी होते है। मामला चूंकि ऐसे नगद पैसे का है जिस पर टैक्स नहीं दिया गया है। इसलिए इससे यह बात भी स्वाभाविक तौर पर निकलती है कि कई खातों में पैसे के लेनदेन की खतौनी नहीं की गई होगी।

कई टैक्स अधिकारियों ने कुछ लेनदेन करके मामला सालों साल से दबा दिया होगा। कई ऑडिटर ने गलती पकड़ने के बाद भी गलती पर कार्यवाही नहीं की होगी। कई नेताओं तक भी बात पहुंची होगी। इन सब की आपस में मिल जुलकर काम करने के बाद कोई कारोबारी करोड़ों रुपए का कैश अपने घर में दबा कर रख सकता है। इसलिए यहां पर केवल चंद नेता दोषी नहीं है बल्कि तमाम व्यवस्था दोषी है जो भ्रष्टाचार का जनक बनती है।

अपने घर में बेपनाह नकदी रखने का यह केवल एक उदाहरण नहीं है। हर महीने कहीं ना कहीं से यह खबर आती है कि अमुक जगह पर बेपनाह पैसा मिला। अमुक सरकारी अधिकारी के घर पर छापा पड़ा। ढेर सारा नकदी जब्त किया गया। पिछले दिनों कर्नाटक से खबर आई थी कि एक सरकारी अधिकारी ने अपने घर के पाइप में पैसा डाल रखा था। उसके पाइप से पानी की बजाय पैसे की बौछार हो रही थी। इस तरह के तमाम उदाहरणों का मतलब क्या है? 

काला धन पर नकेल नहीं कसी जा सकी है। साल 2016 में नोट बंदी लागू करते समय नगदी काला धन पर नकेल कसने की जो बात कही गई थी, वह पूरी तरह से फेल हो चुकी है।

प्रधानमंत्री के नोटबंदी के फैसले पर ढेर सारे बैंक और अर्थशास्त्र के विद्वानों ने एतराज जताया था। रिजर्व बैंक के भूतपूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने तो यहां तक कहा था कि इससे कोई फायदा नहीं होगा। घाटा ही घाटा होगा। काला धन की परेशानी खत्म हो ना खत्म हो लेकिन अर्थव्यवस्था अगले कई सालों के लिए चरमरा जाएगी। यही हो रहा है। उस समय के तमाम विद्वान सही साबित हो रहे हैं। प्रधानमंत्री का फैसला गलत साबित हो रहा है।

काला धन से ऐसे लगता है, जैसे धन काला होता है। पैसा काला होता है। ना यह बात नहीं है। काला दरअसल धन नहीं होता बल्कि लेन-देन होता है। वह लेनदेन जिसे खाते में दर्ज न किया गया हो। वह लेनदेन जिसकी जानकारी टैक्स अथॉरिटी को ना हो। जिस पर टैक्स नहीं लग पाता। यही काला धन बनता है। जो वसूली पीयूष जैन के घर से हुई है वह सारा पैसा इस्तेमाल किया जा सकता है। दिक्कत यह है कि इतनी ज्यादा पैसे पर सरकार को टैक्स नही मिला है। सरकार को यह भी नहीं पता कि इसकी कमाई कहां से की गई है? यही काला धन है।

नोट बंदी लागू करते समय मोदी सरकार कहती थी कि जब बाजार में मौजूद नगद पैसा का रूप दूसरे करेंसी से बदल दिया जाएगा तो काला पैसा अपने आप अर्थहीन हो जाएगा। बाजार से बाहर चला जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। आरबीआई ने रिपोर्ट सौंपी कि बाजार में मौजूद 99 फ़ीसदी नगद पैसा 1 साल के लिए बैंकों में वापस लौट आया है। सारे किए धरे पर पानी गिर गया। सरकार काले धन के तौर पर देश में जितना नगदी पैसा गिना रही थी, उतना पैसा भी काला नहीं हो पाया। सारा पैसा सफेद हो गया।

8 नवंबर साल 2016 में भारत की अर्थव्यवस्था में तकरीबन 17 लाख करोड़ रूपया नकदी के तौर पर घूम रहा था। आरबीआई का आंकड़ा है कि अक्टूबर साल 2021 में भारत की अर्थव्यवस्था में तकरीबन 29. 17 लाख करोड़ की नकदी चलन में है। 

नकदी का इतना ज्यादा चलन अर्थव्यवस्था में तब हो रहा है जब नोटबंदी के बाद से डिजिटल पेमेंट का चलन बहुत अधिक बड़ा है। केवल यूपीआई पेमेंट का कारोबार तकरीबन 100 बिलियन डॉलर का हो चुका है।  इसके बाद भी इतने बड़े स्तर पर नकदी का क्या मतलब है? यही असली सवाल है।

इसी सवाल का अगर जवाब ढूंढने निकला जाए तो बहुत सारे सवाल पैदा होते हैं, जिनका इशारा इस तरफ है कि भारत में नगदी के तौर पर मौजूद काला धन खत्म नहीं हो रहा बल्कि बढ़ रहा है।

सवालों की फेहरिस्त देखिए। साल 2012 के बाद भारत की अर्थव्यवस्था गिरी है। रोजगार कम हुए हैं। अर्थव्यवस्था में बहुत लंबे समय से मांग की कमी है। ग्रोथ रेट कम हो रहा है। मध्यवर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे चला गया है। 

लेकिन फिर भी नकदी में इतनी बड़ी बढ़ोतरी का क्या मतलब है? यह नकदी कारोबार लगाने और रोजगार देने में नहीं बदली, अर्थव्यवस्था में मांग पैदा करने में नहीं बदली। तो इसका मतलब क्या है? तब इसका इशारा इसी तरफ जाता है कि भारत में नकदी में हो रहा ढेर सारा लेन-देन सरकारी खातों में जगह नहीं बना पा रहा है। उसकी टैक्स वसूली नहीं हो पा रही है। कुछ लोगों ने ढेर सारा पैसा अपने पास कहीं ना कहीं दबा कर रखा है। अगर यह पैसा बाजार में मौजूद होता तो अर्थव्यवस्था के भीषण हालत में नकद पैसा अर्थव्यवस्था में इतना ज्यादा ना होता। डिजिटल पेमेंट की बढ़ोतरी के बाद भी नोटबंदी के पहले से लेकर अब तक के नगदी पैसे में तकरीबन 64 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। यह छोटा मोटा इजाफा नहीं है। यह बताता है कि पीयूष जैन जैसे लोगों ने अपनी सीधी साधी जिंदगी का दिखावा करके ढेर सारा नकद कहीं ना कहीं छुपा के रखा है।

KANPUR
demonetisation

Related Stories


बाकी खबरें

  • modi
    राजेंद्र शर्मा
    थैंक यू मोदी जी--हम कम से कम एशिया गुरु तो हुए!
    06 Feb 2022
    कटाक्ष: वैसे ऐसा भी नहीं है कि हम हर मामले में एशिया गुरु के कुर्सी पर ही अटके हुए हों। और भी नंबर वन हैं दुनिया में कोविड की मौतों या दौलतवालों के नंबर वन के सिवा।
  • budget
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की
    06 Feb 2022
    इस बजट में गरीबों का, किसानों का, मजदूरों का, बेरोजगारों का, सभी का ध्यान रखा गया है। सब का यह ध्यान रखा गया है कि उन्हें गलती से भी कुछ न मिले और अगर मिले भी तो कम से कम मिले। 
  • hum bharat ke log
    अजय सिंह
    हम भारत के लोग : हम कहां-से-कहां पहुंच गये हैं
    06 Feb 2022
    भारत गणराज्य एक भंवर में फंस गया है। भंवर से उसे कैसे उबारा जाये, यह विकट प्रश्न है।
  • UP Elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुरादाबादः भाजपा को सबक़ सिखाने की तैयारी
    05 Feb 2022
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने मुरादाबाद को साफ रखने वाले सफाईकर्मियों के साथ-साथ मुसलमानों, आम नागरिक से बात की जो बदलाव की तैयारी में दिख रहे हैं।
  • chunav chakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    चुनाव चक्र: 11 ज़िले, 58 सीटें, पहला दौर ही तय कर देगा यूपी का भविष्य
    05 Feb 2022
    चुनाव की घड़ी आ गई है। पांच राज्यों के चुनाव में सबसे पहले उत्तर प्रदेश में 10 फरवरी को पहले दौर का मतदान होगा। मौसम सर्द है लेकिन यहां गर्मी की बातें हो रही हैं। मुख्यमंत्री कहते हैं कि वे सारी '…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License