NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
प्रधानमंत्री फसल बीमा के नाम पर किसानों से लूट, उतना पैसा दिया नहीं जितना ले लिया
कृषि पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट कहती है कि निजी बीमा कंपनियों को प्रीमियम के तौर पर जितनी राशि मिली और कंपनियों द्वारा नुकसान के एवज में जो राशि किसानों को दी गई, अगर इसकी तुलना की जाए तो बीमा कंपनियों ने 30 फीसदी से अधिक की बचत की है।
रूबी सरकार
18 Aug 2021
Farmers
अपने खेतों में प्रधानमंत्री मोदी से कृषि बीमा की मांग करती हुईं महिला किसान

भारत को किसानों का देश कहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में 13 जनवरी 2016 से एक नई योजना ''प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई)'' के नाम पर शुरू की थी. इसे उन्होंने सभी किसानों के लिए बाध्यकारी भी बनाया। अगर इस योजना की पृष्ठभूमि पर गौर करें, तो साफ समझ में आता है, कि निजी बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाना ही इस योजना का मुख्य उद्देश्य था। प्रधानमंत्री ने इस योजना से कृषि पर आश्रित गरीब किसानों को फायदा तो नहीं पहुंचाया, बल्कि अपनी आंखों के सामने उन्हें  खूब लूटवाया। गरज यह कि पांच साल पहले शुरू की गई इस योजना से किसानों को तो फायदा नहीं हुआ। किंतु निजी बीमा कंपनियों ने जमकर इससे मुनाफा कमाया।

कृषि पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट भी यही कहती है, कि इन वर्षों में निजी बीमा कंपनियों को प्रीमियम के तौर पर जितनी राशि मिली और कंपनियों द्वारा नुकसान के एवज में जो राशि किसानों को दी गई, इसकी तुलना की जाए, तो कंपनियों ने 30 फीसदी से अधिक की बचत की है।

कृषि  एवं कल्याण मंत्रालय की ओर से समिति को उपलब्ध कराये गये आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल 2016 से लेकर 14 दिसम्बर 2020 के दौरान, निजी बीमा कंपनियों ने किसानों से प्रीमियम के तौर पर 1,26, 521 करोड़ रुपए जमा कराए, जबकि बीमा कंपनियों ने नुकसान के एवज में किसानों को  87,320 करोड़ रुपए का भुगतान किया। यानी कंपनियों ने 69 फीसदी मुआवजे का भुगतान किया है। रिपोर्ट के अनुसार फसल का नुकसान होने पर किसानों ने 92,954 करोड़ रुपए का क्लेम किया था, लेकिन उन्हें 87,320 करोड़ रुपए का ही भुगतान किया गया। आंकड़ों के मुताबिक इन सालों में सवा 9 करोड़ किसानों को ही मुआवजा दिया गया है। दिसम्बर 2020 तक किसानों को क्लेम का 5924 करोड़ रुपए नहीं दिया गया। रिपोर्ट पर गौर करें, तो साफ समझ में आता है, कि इस योजना का लाभ किसानों को कम और निजी बीमा कंपनियों को ज्यादा हुआ है।

निजी बीमा कंपनियों ने कमाया 60 फीसदी से अधिक मुनाफा

स्थायी समिति की रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक निजी बीमा कंपनियों ने वर्ष 2016 से 2020 के दौरान करीब 31फीसदी मुनाफा कमाया है। कई कंपनियों ने 50 से 60 फीसदी तक मुनाफा कमाया है। भारती एक्स 2017-18 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में शामिल हुई और तीन साल के दौरान कंपनी ने करीब 1576 करोड़ रुपए का प्रीमियम वसूला और क्लेम का करीब 439 करोड़ रुपए भुगतान किया’।

इसी तरह रिलायंस जीआईसी लिमिटेड ने प्रीमियम के तौर पर 6150 करोड़ रुपए वसूला और किसानों को 2580 करोड़ रुपए का ही भुगतान किया। जनरल इंडिया इंश्योरेंस को करीब 62 फीसदी, इफको को ने 52 और एचडीएफसी एग्रो ने करीब 32 फीसदी मुनाफा कमाया है।

जबकि इस योजना की आत्मा में यह बताया गया था बीमा दावे के निपटान की प्रक्रिया को तेज और आसान बनाने के लिए यह निर्णय लिया गया है, ताकि किसानों को फसल बीमा योजना के संबंध में किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े ।

मध्यप्रदेश में ऐसे लाखों किसान हैं, जिन्हें तीन साल से प्रधानमंत्री फसल बीमा का लाभ नहीं मिला है। जिसकी वजह से उनके खेत सूने पड़े हैं और कृषि विभाग के अधिकारी इसे बकवास बताते हैं और बैंक जवाब देने को तैयार नहीं है। दरअसल प्रदेश के किसान बैंक और बीमा कंपनियों के बीच फुटबॉल बनकर रह गये हैं। मध्यप्रदेश में ऐसे दो लाख से अधिक किसान हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ पिछले तीन साल से नहीं मिला है। न ही कहीं उनकी सुनवाई हो रही है। 

बीमा न मिलने के कारण सिवनी- मालवा  के किसानों ने खरीफ की बुवाई बंद कर दी

सिवनी-मालवा जिले के हिरण खेड़ा गांव के किसान ओमप्रकाश बताते हैं कि उनकी पुश्तैनी 52 एकड़ कृषि भूमि खरीफ सीजन में खाली पड़ी रहती है। ओमप्रकाश ने बताया, वर्ष 2013 में सोयाबीन की फसल खराब होने पर पहली बार फसल बीमा का लाभ मिला था। तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी। उसके बाद फसल बर्बाद होने पर कभी भी बीमा का लाभ नहीं मिला। लिहाजा परिवार ने निर्णय लिया कि खरीफ की बुवाई ही नहीं करनी क्योंकि इस मौसम में धान नहीं बो सकते, उसके लिए बहुत पानी की जरूरत है, जो सरकार से हमें नहीं मिलती। सरकार हमें तवा बांध से अक्टूबर से फरवरी तक ही पानी देती है। इसलिए इस दौरान हम लोग रबी के लिए पूरी तैयारी करते हैं। ताकि उसका पूरा लाभ लिया जा सके। रबी में हम लोग गेहूं बोते हैं।

ओमप्रकाश का कहना है कि अगर खरीफ में सोयाबीन बोते हैं तो बारिश से पूरा सड़ जाती है। बहुत नुकसान होता है। फिर रबी की फसल के लिए पैसे ही नहीं बचते। इसी तरह होशंगाबाद के भी लाखों किसानों ने खरीफ के सीजन में खेतों को खाली छोड़ देते हैं।

सीहोर जिले के लाखों हेक्टेअर में सोयाबीन फसल की बर्बादी इसी बरसात में हुई है, सीहोर जिले के करीब सवा तीन लाख हेक्टेअर में सोयाबीन की फसल बर्बाद हो चुकी है। अतिवृष्टि, इल्ली और अफलन के कारण दर्जनों गांव में फसल खराब हो चुकी है। अब इन किसानों को कर्ज चुकाने के साथ ही पूरा साल बिताने की चिंता भी सताने लगी है। इस जिले के सेवनिया गांव की महिला किसानों ने खेत की खड़ी फसल को काटकर बाहर फेंक दिया। कुछ गांवों के किसानों ने तो अपनी खड़ी फसल को काटकर गाय-भैंस मवेशी को खिला दिया, तो कहीं -कहीं किसान ट्रैक्टर से  बखर चलाकर फसल को हांक रहे हैं।

farmers
सीहोर किसानों का कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन

किसान एमएस मेवाड़ा ने बताया कि पिछले तीन सालों से सीहोर जिले के किसानों की फसलें खराब होती चली आ रही हैं, जिससे किसान कर्ज के बोझ में डूब गये हैं। उन्होंने कहा कि इस बार 10 हजार रुपए प्रति क्विंटल से सोयाबीन का बीज खरीदकर बोवनी की थी, जिसमें प्रति एकड़ पांच हजार अतिरिक्त खर्च किया। हजारों रुपए की कीड़ा मार दवाइयां भी डालीं। बरसात से सब बर्बाद हो गया। पूरे जिले में सोयाबीन में अफलन की स्थिति है, फोन लगाने के बावजूद यह बर्बादी देखने कोई भी प्रशासनिक अधिकारी नहीं आया।

किसान मेवाड़ा ने बताया कि यहां के किसान अब प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री से बीमा की मांग कर रहे हैं और फौरी राहत के लिए सर्वे कराकर उचित मुआवजा देने की भी मुख्यमंत्री से मांग कर रहे हैं। इस जिले की महिला किसान बांझ हुई सोयाबीन की फसल को लेकर प्रदर्शन भी कर रही हैं। मेवाड़ा का कहना है कि सीहोर जिले के ऐसे कई गांव हैं , जहां विगत दो वर्षों से सोयाबीन की फसलें एवं अन्य फसलें बेमौसम बरसात या अधिक बरसात से नष्ट हो रही हैं। बैंक फसल बीमा की राशि हर 6 माह काट लेती हैं, लेकिन बताते हैं कि बैंक यह राशि बीमा कंपनी को समय पर नहीं भेजतीं, इस बात को लेकर के किसानों ने कई बार भोपाल के आयुक्त और कलेक्टर सीहोर तथा कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन भी सौंपा।  

मुख्यमंत्री का जिला होने के कारण उनसे भी कहा, परंतु आज तक किसानों को फसल बीमा राशि नहीं मिली। जबकि किसानों की बिना सहमति के बीमा का प्रीमियम काट लिया जाता है। सीहोर में ऐसे करीब 42 हजार किसान हैं, जिन्हें पिछले दो सालों से फसल खराब होने पर बीमा कीराशि नहीं मिली। उन्होंने कहा, वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को आश्वासन दिया था कि यह योजना उन किसानों पर प्रीमियम का बोझ कम करने में मदद करेगी, जो अपनी खेती के लिए ऋण लेते हैं और खराब मौसम से उनकी रक्षा भी करेगी।

आंदोलन से इतना फर्क पड़ा, कि फसल बीमा को ऐच्छिक कर दिया गया

 क्रांतिकारी किसान-मजदूर संगठन के अध्यक्ष लीलाधर राजपूत बताते हैं, कि दरअसल बीमा की संरचना ही पूरी तरह सकारात्मक नहीं है। यह किसानों के हित के लिए भी नहीं है। पूरी दुनिया में बीमा व्यक्तिगत होता है- जैसे पशु हो, वाहन हो या व्यक्ति हो, लेकिन फसल बीमा योजना ही ऐसी बीमा है, जो पहले पूरे तहसील के लिए होता था, अब इसे हल्के में बांट दिया गया है।

एक हल्के में तीन या चार गांव होते हैं। जो 8 से 10 किलोमीटर क्षेत्र में फैला होता है, उसे ही एक इकाई माना गया है। यानी बीमा का क्लेम किसानों को तब मिलेगा, जब पूरे हल्के में 50 फीसद फसल का नुकसान होगा। जबकि ज्यादा बरसात या प्राकृतिक आपदा इल्ली जैसे प्रकोपों के लिए जरूरी नहीं कि पूरे हल्के के खेतों में एक जैसा हो। हो सकता है, कि एक गांव में ओला-पाला पड़ा हो, बाकी गांव में न पड़ा हो, तो इस स्थिति में किसानों को बीमा का लाभ नहीं मिलेगा। जबकि प्रीमियम सारे किसानों से अलग-अलग लिया जाता है। उन्होंने कहा, इसलिए खसरा नम्बर का बीमा होना चाहिए, न कि पटवारी हल्के का।

इस तरह तकनीकी रूप से बहुत से किसान लाभ से वंचित रह जाते हैं। दूसरी बात यह कि किसान की मर्जी के बिना बैंक प्रीमियम काट तो लेता है, लेकिन यह रकम निर्धारित तिथि तक बीमा कंपनी को जमा नहीं करता। इससे भी किसानों को बीमा का लाभ नहीं मिलता। इस पर किसान संगठनों की यह मांग थी, कि बीमा आग्रह की वस्तु है। यह अनिवार्य कैसे हो सकता। अब जाकर सरकार ने इसमें संशोधन कर आदेश निकाला कि खरीद की आखिरी तारीख तक यदि किसान लिखकर दे कि उसका प्रीमियम न काटा जाये, तो बैंक प्रीमियम की राशि नहीं काट सकती।

लेकिन अभी भी बहुत सारे किसानों को यह बात नहीं मालूम कि उसे लिखकर देना होगा। जब इस पर किसानों द्वारा आपत्ति उठाई गई तो अब बैंक प्रीमियम राशि काटने से पहले खाता धारक को फोन कर पूछता है।  इस तरह आंदोलन से यह फर्क तो पड़ा कि फसल बीमा ऐच्छिक हो गई।

लीलाधर बताते हैं कि तीसरी बात इसमें यह भी गड़बड़ी है कि किसानों के पास बीमा का कोई कागज नहीं होता। जबकि बीमा कंपनी का सीधा सरोकार व्यक्ति से होता है। फसल बीमा में सीधा सरोकार नहीं है। इसलिए किसान सीधे कार्यवाही भी नहीं कर सकता। इसके अलावा फसल का नुकसान होने के 24 घण्टे के भीतर किसान को बीमा कंपनी को सूचना देना अनिवार्य है। अब एक जिले में लाखों किसान हैं और बीमा कंपनी के पास एक फोन नंबर। फोन लगना ही मुश्किल है, तब तक 72 घण्टा निकल गया, तो भी किसानों को क्षतिपूर्ति नहीं मिलेगी।

अगर फोन लग भी गया, तो सूचना मिलने के बाद सर्वे करने, पटवारी, कृषि विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ बीमा कंपनी के अधिकारी भी आएंगे। मुआयना करेंगे, फिर वे रिपोर्ट देंगे। इस तरह इतना लम्बा समय बीत जाएगा कि उस पैसे का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

किसान अगली फसल की तैयारी कैसे करेंगे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2019 का फसल बीमा अभी तक किसानों को नहीं मिला। इस तरह करोड़ों रुपए प्रीमियम वसूल कर कुछ लाख रुपये किसानों में बांट दिया जाता है। ऊपर से तुर्रा यह कि सरकार बीमा कंपनी करेगी। कभी महेन्द्रा एन्ड महिन्द्रा, तो कभी लोंबार्ड कंपनी इस तरह की दर्जनों बीमा कंपनी है, जिसे सरकार अपनी मर्जी से चुनती है। बहुत सारी ऐसी कंपनी हैं जिनका जिलों में दफ्तर ही नहीं है। किसान कहां बात करने जाये। श्री राजपूत ने कहा कि सबसे पहले तो किसानों को प्रीमियम की रसीद मिलनी चाहिए।

farmers
farmers distress
farmers crises
farmers protest
Fasal Bima Yojana
pradhanmangtri fasal bima yojna
PM Fasal Bima Yojana
Narendra modi
Modi government

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • indian student in ukraine
    मोहम्मद ताहिर
    यूक्रेन संकट : वतन वापसी की जद्दोजहद करते छात्र की आपबीती
    03 Mar 2022
    “हम 1 मार्च को सुबह 8:00 बजे उजहोड़ सिटी से बॉर्डर के लिए निकले थे। हमें लगभग 17 घंटे बॉर्डर क्रॉस करने में लगे। पैदल भी चलना पड़ा। जब हम मदद के लिए इंडियन एंबेसी में गए तो वहां कोई नहीं था और फोन…
  • MNREGA
    अजय कुमार
    बिहार मनरेगा: 393 करोड़ की वित्तीय अनियमितता, 11 करोड़ 79 लाख की चोरी और वसूली केवल 1593 रुपये
    03 Mar 2022
    बिहार सरकार के सामाजिक अंकेक्षण समिति ने बिहार के तकरीबन 30% ग्राम पंचायतों का अध्ययन कर बताया कि मनरेगा की योजना में 393 करोड रुपए की वित्तीय अनियमितता पाई गई और 11 करोड़ 90 लाख की चोरी हुई जबकि…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 6,561 नए मामले, 142 मरीज़ों की मौत
    03 Mar 2022
    देश में कोरोना से अब तक 5 लाख 14 हज़ार 388 लोगों अपनी जान गँवा चुके है।
  • Civil demonstration in Lucknow
    असद रिज़वी
    लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें
    03 Mar 2022
    युद्ध भले ही हज़ारों मील दूर यूक्रेन-रूस में चल रहा हो लेकिन शांति प्रिय लोग हर जगह इसका विरोध कर रहे हैं। लखनऊ के नागरिकों को भी यूक्रेन में फँसे भारतीय छात्रों के साथ युद्ध में मारे जा रहे लोगों के…
  • aaj ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव : पूर्वांचल में 'अपर-कास्ट हिन्दुत्व' की दरार, सिमटी BSP और पिछड़ों की बढ़ी एकता
    03 Mar 2022
    यूपी चुनाव के छठें चरण मे पूर्वांचल की 57 सीटों पर गुरुवार को मतदान होगे. पिछले चुनाव में यहां भाजपा ने प्रचंड बहुमत पाया था. लेकिन इस बार वह ज्यादा आश्वस्त नहीं नज़र आ रही है. भाजपा के साथ कमोबेश…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License