NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
अंतरराष्ट्रीय
पाकिस्तान
अमेरिका
तालिबान सरकार को मान्यता देने में अनिच्छुक क्यों है पाकिस्तान?
तालिबान के दो अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि सीमा पर हुई एक घटना को लेकर तालिबान और पाक सेना ‘आमने-सामने’ हो गयी थीं और स्थिति ‘तनावपूर्ण’ थी। घटना के बाद 22 दिसंबर को उत्तर में कुनार सूबे की सीमा के पाकिस्तानी इलाक़े से सीमा पार मोर्टार भी फ़ायर किया गया था।
एम.के. भद्रकुमार
05 Jan 2022
Taliban
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को अलग करने वाली डूरंड रेखा के साथ बाड़ेबंदी

हालिया रिपोर्ट तालिबान सैन्य बलों और उसकी सीमा पर तैनात पाकिस्तानी सेना के बीच तनाव का संकेत देती है। 22 दिसंबर को अफ़ग़ान रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता इनायतुल्ला ख़्वारज़्मी ने इस बात का ख़ुलासा किया था कि तालिबान सैन्य बलों ने पाकिस्तानी सेना को पूर्वी नंगरहार सूबे के साथ "ग़ैर-क़ानूनी" सीमा बाड़बंदी करने से रोक दिया था।

सोशल मीडिया में घूम रहे एक वीडियो में दिखाया गया है कि तालिबान सैनिकों ने कंटीले तार की फिरकी को ज़ब्त कर लिया है और तालिबान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सुरक्षा चौकियों पर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों को सीमा पर बाड़ लगाने की कोशिश नहीं करने की चेतावनी दे दी है।

तालिबान के दो अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि सीमा पर हुई इस घटना को लेकर तालिबान और पाक सेना "आमने-सामने" हो गयी थीं और स्थिति "तनावपूर्ण" थी। घटना के बाद 22 दिसंबर को उत्तर में कुनार सूबे की सीमा के पाकिस्तानी इलाक़े से सीमा पार मोर्टार भी फ़ायर किया गया था।

दिलचस्प बात यह है कि ये घटनाक्रम 19 दिसंबर को इस्लामाबाद में अफ़ग़ानिस्तान पर हुई ओआईसी (इस्लामिक देशों के संगठन) की मंत्रिस्तरीय बैठक के तुरंत बाद हुए थे। जहां ओआईसी मंत्रिस्तरीय बैठक पाकिस्तानी कूटनीति के लिहाज़ से एक बड़ी घटना थी, वहीं तालिबान के लिहाज़ से इसके बहुत कम मायने थे। उनकी सरकार की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता के मुद्दे पर भी कोई प्रगति नहीं हुई।

पाकिस्तानी विश्लेषकों के मुताबिक़, जहां इस्लामाबाद में दिखायी देने वाले तालिबान के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्तक़ी को पीछे की पंक्ति में जगह दी गयी थी, वहीं मेजबानों ने अपनी ख़ुद की छवि को चमकाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया था।

उस सम्मेलन से सही मायने में अमेरिका के अलग-थलग पड़ जाने की स्थिति को थोड़ा दुरुस्त करने में मदद मिली थी, क्योंकि जो बाइडेन प्रशासन अब असरदार मुस्लिम देशों के साथ अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति को लेकर एक समन्वित नज़रिये का दावा कर सकता है। इसके लिए विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने पाकिस्तान के प्रति अपना आभार जताया।

राजनीतिक लिहाज़ से तालिबान ने 2,611 किलोमीटर लंबी डूरंड रेखा पर बाड़ लगाने की बात तो दूर रही, इस डूरंड रेखा की वैधता को कभी मंज़ूर ही नहीं किया है, जो कि औपनिवेशिक शासन की विरासत है। लेकिन, यह पाकिस्तानी सेना की एक ऐसी प्रभावशाली परियोजना है, जिसे पाकिस्तानी चौकियों पर सीमा पार से होने वाले हमलों को रोकने को लेकर चार साल के दौरान भारी लागत से शुरू किया गया है। 

इस बाड़ में चेन-लिंक बाड़ के दो सेट होते हैं, जो कि कांटेदार गोल तार के कॉइल्स होते हैं और इनके बीच की दूरी दो मीटर की होती है। यह डबल बाड़ तक़रीबन चार मीटर ऊंची है और सेना ने किसी भी गतिविधि को रोकने की ख़ातिर निगरानी कैमरे लगा रखे हैं। इस परियोजना की लागत 600 मिलियन डॉलर के आस-पास होने का अनुमान है।

इस मामले की सबसे अहम बात यह है कि इस बाड़ ने डूरंड रेखा को न सिर्फ़ एक ठोस रूप दे दिया है, बल्कि आख़िरकार इससे अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगने वाली इस सीमा को वैधता मिलने की भी उम्मीद है।

काबुल की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखने को लेकर पाकिस्तानी सेना के समर्थन पर अपनी ज़रूरी निर्भरता को देखते हुए तालिबान चुप तो ज़रूर रहा, लेकिन शायद डूरंड रेखा पर बाड़ लगाने के पाकिस्तानी इरादे को भांप लिया था। तालिबान ने काबुल की सत्ता में आने के 100 दिनों के भीतर उस बाड़ की अनदेखी करना शुरू कर दिया है।

डूरंड रेखा पर 235 क्रॉसिंग पॉइंट्स अंकित किये गये हैं। तालिबान शायद इस क्षेत्र में रहने वाले पश्तून आदिवासियों के लिए एक खुली सीमा की उम्मीद कर रहा है। लेकिन, रावलपिंडी में स्थित जीएचक्यू (पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय) इसे लेकर कभी राज़ी नहीं होगा।

बुनियादी तौर पर ऐसा लगता है कि तालिबान अपना ज़रबरदस्त असंतोष दिखा रहा है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना की ओर से उसे जो भारी-भड़कम उम्मीदें बंधायी गईं थीं, वह धराशायी हो गयी हैं। सोवियत राजनीति पर चर्चिल के उस मशहूर रूपक को उधार लेते हुए अगर कहा जाय, तो डूरंड रेखा पर लगाये जा रहे बाड़ को लेकर की जाने वाली मुक्केबाज़ी दरअसल "नहीं दिखायी देने वाली आमने-सामने की लड़ाई" की तरह है।

सौ दिन बीत चुके हैं, लेकिन तालिबान को पाकिस्तान से मदद की जो उम्मीदें थीं, वह अब भी अधूरी हैं। ठीक है कि अफ़ग़ान अर्थव्यवस्था को मदद करने में पाकिस्तान की अपनी सीमायें हो सकती हैं। लेकिन, तालिबान सरकार को मान्यता देने को लेकर पाकिस्तान की अनिच्छा बहुत परेशान करने वाली रही है।

ज़ाहिर है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय काबुल की सत्ता व्यवस्था को मान्यता देने को लेकर अभी और इंतज़ार करने जा रहा है, हालांकि मानवीय सहायता का मिलना शुरू हो गया है। क्षेत्रीय देशों ने कमोबेश तालिबान सरकार (इसे मान्यता दिये बिना) के साथ अपनी संलग्नता की शर्तों का हिसाब-किताब लगा रखा है।

30 दिसंबर को काबुल में तालिबान अधिकारियों के साथ बातचीत को औपचारिक रूप देने वाले ईरान के बाद ऐसा करने वाला चीन दूसरा देश बन गया। चीन के विदेश मंत्रालय के एशियाई मामलों के विभाग के महानिदेशक लियू जिनसोंग ने तालिबान सरकार के विदेश मामलों के मंत्रालय के तीसरे राजनीतिक विभाग के महानिदेशक ज़ाकिर जलाली के साथ मानवीय सहायता और आर्थिक पुनर्निर्माण पर दो कार्य-स्तरीय प्रणालियों की पहली बैठक की सह-मेज़बानी की।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि यह अंतर-मंत्रालयी बैठक "दोस्ताना और व्यावहारिक माहौल में" आयोजित हुई। दोनों पक्षों ने मुख्य रूप से मौजूदा मानवीय स्थिति और आर्थिक पुनर्निर्माण पर विचारों का आदान-प्रदान किया... और सरकार के शासन के अनुभव के आदान-प्रदान को मज़बूत करने, सक्षम विभागों के बीच संचार और समन्वय बढ़ाने और बीआरआई सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमत हुए।

चीन ने जहां क्षमता निर्माण और कर्मियों के प्रशिक्षण में मदद की पेशकश की, वहीं तालिबान सरकार ने "अफ़ग़ानिस्तान में चीनी संस्थानों और कर्मियों के लिए सुरक्षा की गारंटी दी, और भविष्य में ज़्यादा से ज़्यादा चीनी निवेश किये जाने की उम्मीद जतायी।"

इसी तरह, रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने पिछले हफ़्ते कहा था कि तालिबान अधिकारियों की आधिकारिक मान्यता देना सही मायने में "फिलहाल समय से पहले" की बात है, मास्को पहले से ही काबुल के साथ कारोबार कर रहा है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि तालिबान सरकार नहीं नकारने जाने वाली एक "हक़ीक़त" है, हालांकि मान्यता दिये जाने का इंतज़ार करना चाहिए। लगभग यही नज़रिया ईरान का भी है।

निश्चित ही रूप से यह रूस, चीन और ईरान के लिए मुनासिब है कि वे अपनी नीतियों को अफ़ग़ानिस्तान की वास्तविकताओं के साथ समायोजित करें, जबकि अमेरिकी बाहरी बना रहे। चीन ने बीआरआई (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) परियोजनाओं और निवेश के मौक़ों पर चर्चा शुरू कर दी है।

इसी में पाकिस्तान की विकट परस्थिति भी निहित है। जहां पाकिस्तान काबुल में नया-नया हाकिम बना है, वहीं  इसका मतलब यह भी है कि तालिबान के प्रति उसकी एक नैतिक ज़िम्मेदारी भी है, और काबुल में सरकार को मान्यता दिया जाना उस दिशा में पहला क़दम होना चाहिए।

तालिबान का कभी उस परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ एक कड़वा अनुभव रहा है, जिन्होंने उसकी क़ीमत पर अमेरिका के साथ एक नया रिश्ता बनाने की कोशिश की थी। लेकिन, वाशिंगटन अब ज़ोर देकर कह रहा है कि जब तक प्रतिबंधित हक़्क़ानी जैसे शीर्ष तालिबान नेता काबुल में पद पर बने हुए हैं, तब तक वह रोके हुए पैसों को जारी नहीं करेगा।

आख़िर तालिबान सरकार को मान्यता न देकर पाकिस्तान क्या यह साबित करना चाहता है कि तालिबान उसकी पैदाइश नहीं है; अगस्त में तालिबान के काबिज होने में इसका कोई लेना-देना नहीं रहा है; वह तालिबान की विचारधारा से घृणा करता है; क्या वह वास्तव में चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में प्रतिनिधि शासन हो? इनमें से कोई भी धारणायें काम नहीं करेंगी।

विश्व जनमत को यह पता है कि किस तरह पाकिस्तान ने अपने इस कमज़ोर, संकटग्रस्त, नाज़ुक पड़ोसी देश में सत्ता को आगे बढ़ाया है और अफ़ग़ानिस्तान में खंडित नेतृत्व और गृह युद्ध की स्थिति का ग़ैर-मुनासिब फ़ायदा उठाते हुए इसे शायद अपूर्णनीय रूप से तोड़कर रख दिया है।

ऐसा नहीं कि यह सब 2001 में अमेरिकी हमले या 1980 में सोवियत हस्तक्षेप के साथ शुरू हुआ हो, बल्कि इसकी जड़ें पाकिस्तान के उस नौवें प्रधान मंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के ज़माने में है, जिन्होंने काबुल विश्वविद्यालय में उग्रवादी मुस्लिम युवा संगठन के कार्यकर्ताओं को 1974 में एक विद्रोह की तैयारी के लिए पाकिस्तान आने के लिए दावत दी थी।

आज मसला यह है कि कथित उदार अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के हिस्से के रूप में स्वीकार किये जाने की अपनी लालसा में पाकिस्तानी अभिजात वर्ग तालिबान के संरक्षक के रूप में ख़ुद के देखे जाने में शर्म महसूस करता है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें: Blowback From Afghanistan

TALIBAN
Taliban Peace Talks
Afghan Taliban
taliban in afghanistan
Pakistan
Pakistan Army

Related Stories

इतवार की कविता : 'टीवी में भी हम जीते हैं, दुश्मन हारा...'

अफ़ग़ानिस्तान की घटनाओं पर विचार

भारत और अफ़ग़ानिस्तान:  सामान्य ज्ञान के रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति

उनके तालिबान तालिबान, हमारे वाले संत?

रसोई गैस के दाम फिर बढ़े, महंगाई की जबरदस्त मार

तालिबान के साथ अमेरिका के बदलते रिश्ते और पैकेज डील!

अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े पर भारत के ‘ग़ैर-बुद्धिजीवी’ मुस्लिम का रुख

दानिश का कैमरा: दानिश से मोहब्बत और नफ़रत के मायने

कार्टून क्लिक: शुक्रिया पाकिस्तान! तुम हमारे चुनाव में हमेशा काम आते हो

फ़ैज़ भाई, जय श्रीराम!


बाकी खबरें

  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू
    19 Dec 2021
    सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र…
  • teni
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : जयपुर में मौका चूके राहुल, टेनी को कब तक बचाएगी भाजपा और अन्य ख़बरें
    19 Dec 2021
    सवाल है कि अजय मिश्र को कैसे बचाया जाएगा? क्या एसआईटी की रिपोर्ट के बाद भी उनका इस्तीफा नहीं होगा और उन पर मुकदमा नहीं चलेगा?
  • amit shah
    अजय कुमार
    अमित शाह का एक और जुमला: पिछले 7 सालों में नहीं हुआ कोई भ्रष्टाचार!
    19 Dec 2021
    यह भ्रष्टाचार ही भारत के नसों में इतनी गहराई से समा चुका है जिसकी वजह से देश का गृह मंत्री मीडिया के सामने खुल्लम-खुल्ला कह सकता है कि पिछले 7 सालों में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ।
  • A Critique of Capitalism’s Obscene Wealth
    रिचर्ड डी. वोल्फ़
    पूंजीवाद की अश्लील-अमीरी : एक आलोचना
    19 Dec 2021
    पूंजीवादी दुनिया में लगभग हर जगह ग़ैर-अमीर ही सबसे ज़्यादा कर चुकाते हैं और अश्लील-अमीरों की कर चोरी के कारण सार्वजनिक सेवाओं में होने वाली कटौतियों की मार बर्दाश्त करते रहते हैं।
  •  Bihar and UP lagging behind in studies
    एम.ओबैद
    बिहार और यूपी पढ़ाई में फिसड्डी: ईएसी-पीएम
    19 Dec 2021
    रिपोर्ट में बड़े राज्यों में 9 राज्यों को शामिल किया गया है जिसमें बिहार 36.81 अंकों के साथ नौवें तथा उत्तर प्रदेश 38.46 अंकों के साथ आठवें स्थान पर है। दोनों राज्य का स्थान राष्ट्रीय औसत 48.38 से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License