NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पालघर लिंचिंग और विभाजनकारी प्रचार
नफ़रत के प्रचार-प्रसार को उसके स्रोत में ही रोक देना चाहिए।
राम पुनियानी
24 Apr 2020
Translated by महेश कुमार
palghar

पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत ने लिंचिंग को एक प्रमुख लेकिन दुखद घटना के रूप में उभरते देखा है। यह लिंचिंग खासकर पवित्र गाय के मुद्दे और गोमांस खाने के आरोपों के चलते अधिक बढ़ी है और खासकर दो समुदायों जिनमें मुस्लिम और दलित समुदाय शामिल हैं को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। इंडियास्पेंड के आंकड़ों पर गोर करें तो 2014 के बाद से गाय से संबंधित लिंचिंग की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है, और पाया गया कि लिंचिंग हुए पीड़ितों में से 84 प्रतिशत मुस्लिम थे। इनमें से कुछ 52 प्रतिशत हमले अफवाहों पर आधारित थे। लिंचिंग के कुछ कुख्यात मामले भी सामने आए जिसमें उत्तर प्रदेश के दादरी में अखलाक, हरियाणा के बल्लभगढ़ की एक ट्रेन में एक मुस्लिम पर हमला, झारखंड के हजारीबाग में अलीमुद्दीन अंसारी और गुजरात के ऊना शहर में दलितों की बेरहम पिटाई शामिल है।

दूसरे स्तर पर पर देखें तो यह इस अवधि के दौरान काफी बढ़ा है, यानि 2014 के बाद से, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का भी ऐसा ही मानना है, जिन्हे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया था और उन पर हमला किया गया था। अब तक भारत में सांप्रदायिकता का जहर इस कदर बढ़ गया है कि कई घटनाओं को, उनके बारे में विस्तृत जानकारी लेने से पहले ही सांप्रदायिक रंग दे दिया जाता है और तथ्यों को जाने बिना ही शोर के साथ झूठा सामाजिक प्रचार होने लगता हैं।

महाराष्ट्र के मुंबई से लगभग 110 किलोमीटर दूर पालघर शहर के पास गडचिनल गांव में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की दुखद विलाप करते हुए लिंचिंग हुई है इससे ज्यादा उसमें कुछ नहीं समझा जा सकता है। जैसे ही इस इस घटना/त्रासदी की खबर फैली, भाजपा के कुछ नेताओं ने तुरंत मुस्लिम अल्पसंख्यक को इस घटना के लिए दोषी ठहराना शुरू कर दिया। बीजेपी नेता नलिन कोहली ने एक जर्मन न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कुछ ऐसा ही कहा। बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा भी कहाँ पीछे रह सकते थे, उन्हौने इस मुद्दे पर "उदार-धर्मनिरपेक्ष" लोगों की चुप्पी पर तीखा हमला किया।

जैसे-जैसे घटना की परत खुलती गई, सच्चाई सामने आ गई कि दुर्भाग्यपूर्ण साधु कांदिवली, मुंबई से सूरत, गुजरात की यात्रा के लिए रवाना हुए थे। सरकारी आदेशों के तहत सख्त राष्ट्रीय तालाबंदी की वजह से इन साधुओं को यात्रा करने की अनुमति नहीं थी। इसलिए, राजमार्ग की यात्रा से बचने के लिए, जहां पुलिस ने जांच के लिए चेक-पॉइंट बनाए हुए हैं, और इसलिए उन्हौने आंतरिक मार्गों से जाना तय किया। इस मार्ग पर एक आदिवासी बहुल गाँव गडचिनाले पड़ता है जहाँ यह त्रासदी हुई थी।

कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन के समय के दौरान गरीबों का आर्थिक और सामाजिक नुकसान चरम पर पहुँच गया है। बुनियादी जरूरतों की बढ़ती कमी के परिणामस्वरूप देश भर में कई अफवाहें फ़ेल रही हैं। मिसाल के तौर पर, इस गाँव में, जो अफवाहें घूम रही थीं, वह कि बाल-बच्चों को उठाने वाला एक गिरोह इलाके में घूम रहा है, और ये लोग अलग-अलग वेश में घूमते हैं, ताकि उन्हे अपना शिकार मिल सके। इसलिए इन साधुओं को बच्चा उठाने वाला गिरोह मान लिया गया था। 

चूंकि पीड़ित हिंदू थे, इसलिए यह आसानी से मान लिया गया की अपराधी दूसरे समुदाय से ही होंगे। यहाँ यह याद आ रहा है कि 1992-93 में मुंबई हिंसा को भड़काने के लिए दो हिंदू कार्यकर्ताओं की हत्या और बैन परिवार (वे भी हिंदू थे) को जलाने की अफ़वाह को जोगेश्वरी इलाके में उड़ा दिया गया था। ये दोनों दावे झूठे थे, लेकिन फिर भी ये झूठे दावे अल्पसंख्यक पर घातक हमलों का बहाना बन गए थे।

इस मामले में भाजपा के नेता ही नहीं, बल्कि आरएसएस साधु समाज समेत मैदान में कूद पड़े। शातिराना माहौल बनने लगा। पालघर का मामला सामान्य मीडिया चैनलों और सोशल मीडिया के बड़े तबकों पर हावी था। महाराष्ट्र की सरकार (राज्य में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन का शासन है)  सत्यता की बिना पर और सबूतों के ठोस आधार पर खड़ी रही और लगभग 100 दोषियों को गिरफ्तार किया, उनमें से कोई भी मुस्लिम नहीं निकला। दिलचस्प बात यह है कि गाँव का स्थानीय निकाय यानि पंचायत भाजपा द्वारा नियंत्रित है और इस निकाय की प्रमुख, चित्रा चौधरी एक भाजपा नेता है। चूंकि महाराष्ट्र सरकार केस के तथ्यों के ठोस आधार पर खड़ी है, इसलिए उसने चेतावनी भी दी है कि झूठ फैलाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

कानून को हाथ में लेने वालों की क्रूरता सबके लिए चौंकाने वाली है। पिछले कुछ सालों के दौरान, इस तरह की भीड़ लगातार कानून तोड़ रही हैं और लोगों को बिना किसी डर के मार रही हैं; हालात ये हैं कि लिंचिंग अब देश भर में एक सामान्य घटना बनती जा रही है। इसके असली कारण कई हैं। लेकिन उनमें से एक यह है कि इस तरह का आपराध करने वालों को उचित दंड देने में भारी कमी है जो इस तरह के घृणित कार्य करते हैं। इतना ही नहीं, हिंसा में लिप्त इस तरह के कई लोग सत्ताधारी पार्टियों की अच्छी पुस्तकों में हैं, यहाँ तक कि कुछ को तो ऐसी घटनाओं में घृणित भूमिका अदा के बाद सम्मानित भी किया गया है। अखलाक की मौत के मामले में देखें तो एक अभियुक्त की मृत्यु एक आकस्मिक बीमारी के कारण पुलिस हिरासत में हो गई थी। तब तत्कालीन केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा आए और उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा, और एक ऐसा सम्मान दिया जो केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए आरक्षित है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में, राष्ट्रीय ध्वज संहिता के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है।

ऐसे ही एक अन्य मामले में, जब अलीमुद्दीन अंसारी हत्या के आरोपियों में से आठ को जमानत दी गई थी, तो केंद्र राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने उन्हें माला पहना कर स्वागत किया। नीचे तक यह क्या संदेश देता है, कि डरने की कोई जरूरत नहीं है?

हिंसा की तीव्रता को बढ़ाने में योगदान देने वाले अन्य तत्व आम जीवन में बढ़ती सामाजिक हताशा है जो जीवन को आमतौर पर अधिक कठिन बना रही है। भाजपा शासन ने असहिष्णुता को बढ़ावा दिया है, जहां जुदा राय रखने वाले लोगों को नीचा दिखाया जाता है और उन्हें हिंदू विरोधी, राष्ट्र-विरोधी और अन्य कहा जाता है। स्वामी अग्निवेश, जिन्होंने अंध विश्वास की आलोचना की- जिसमें "प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी" या अमरनाथ में बरफ़ानी बाबा की "दिव्य" प्रकृति जैसे मामले पर बयान दिए, को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया था।

मूल मुद्दा सांप्रदायिक मानसिकता के वर्चस्व का है जिसे सत्तारूढ़ दल और उसके मूल संगठन, आरएसएस द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है। वे हमेशा किसी भी तरह की घटना में कूदने की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जिसे भी सांप्रदायिक रंग दिया जा सकता है या जहां भी अल्पसंख्यकों को नीचा दिखाया जा सकता है। कुछ समाचार चैनल, जो विभाजनकारी राजनीति के लाउड-स्पीकर बने हुए हैं, इन घावों पर  नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं। समाज में फैल रही बढ़ती नफरत और समाज के हर वर्ग के बीच झूठ फैलाने के लिए असंख्य सोशल मीडिया नेटवर्क का सहारा लिया है।

लिंचिंग के खिलाफ एक केंद्रीय कानून बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। हिंसा के ऐसे नृशंस मामलों में भाग लेने वाले सभी लोगों को दंडित किया जाना चाहिए। लेकिन उससे पहले, नफरत-भड़काने और ऐसा महसूस करने वालों कि वे जो भी आपराधिक कृत्यों करें लेकिन कानून उन्हे छु नहीं सकता, इससे दृढ़ता से मुकाबला करने की आवश्यकता है। हालांकि पुलिस की जल्द कार्रवाई समय की दरकार है, और जिन्होंने नफरत फैलाने को अपना व्यापार बना लिया है को यह महसूस करने की जरूरत है कि कोई भी देश भाईचारे की भावना के बिना प्रगति नहीं कर सकता है। कमजोर वर्गों को नीचा दिखाकर उन्हें ऊंची टीआरपी मिल सकती है, लेकिन यह शांति और प्रगति के मार्ग को भी रोक देती है।

भारत के संविधान और कानून के शासन को सम्मान देने की आवश्यकता है। तथ्य-जाँच तंत्र जैसे कि #AltNews को बहुत अधिक सक्रिय करने की जरूरत है। और अंत में, सबको इस बात की प्रशंसा करनी चाहिए कि महाराष्ट्र सरकार ने तुरंत उठाकर न्याय किया और कैसे नफरत के प्रसार को उसके स्रोत में ही जाकर रोक दिया। 

लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता और टिप्पणीकार हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

Palghar Lynching and Divisive Propaganda

Palghar
Palghar Lynching
BJP
Shiv sena
RSS
CPI(M)

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Barauni Refinery Blast
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बरौनी रिफायनरी ब्लास्ट: माले और ऐक्टू की जांच टीम का दौरा, प्रबंधन पर उठाए गंभीर सवाल
    20 Sep 2021
    भाकपा (माले) और मज़दूर संगठन ऐक्टू की जांच टीम ने घटनास्थल का दौरा किया और अपनी एक जाँच रिपोर्ट दी, जिसमें उन्होंने कहा कि 16 सितंबर को बरौनी रिफाइनरी में हुआ ब्लास्ट प्रबन्धन की आपराधिक लापरवाही का…
  • New Homes, School Buildings, Roads and Football Academies Built Under Kerala Govt’s 100-Day Programme
    अज़हर मोईदीन
    केरल सरकार के 100-दिवसीय कार्यक्रम के तहत नए घर, विद्यालय भवन, सड़कें एवं फुटबॉल अकादमियां की गईं निर्मित  
    20 Sep 2021
    100-दिवसीय कार्यक्रम में शामिल परियोजनाओं के कार्यान्वयन पर नजर रखने के लिए बनाये गए राजकीय नियंत्रण-मंडल की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के विभिन्न विभागों के तहत…
  • Afghanistan
    एम. के. भद्रकुमार
    शांघाई सहयोग संगठन अमेरिका की अगुवाई वाले क्वाड के अधीन काम नहीं करेगा
    20 Sep 2021
    एससीओ यानी शांघाई सहयोग संगठन, अमेरिका की अगुवाई वाले चार देशों के गठबंधन क्वाड के अधीन काम नहीं करेगा।
  • Indigenous People of Brazil Fight for Their Future
    निक एस्टेस
    अपने भविष्य के लिए लड़ते ब्राज़ील के मूल निवासी
    20 Sep 2021
    हाल ही में इतिहास की सबसे बड़ी मूल निवासियों की लामबंदी ने सत्ता प्रतिष्ठानों के आस-पास की उस शुचिता की धारणा को को तोड़कर रख दिया है जिसने सदियों से इन मूल निवासियों को सत्ता से बाहर रखा है या उनके…
  • Government employees in Jammu and Kashmir
    सबरंग इंडिया
    जम्मू-कश्मीर में सरकारी कर्मचारियों से पूर्ण निष्ठा अनिवार्य, आवधिक चरित्र और पूर्ववृत्त सत्यापन भी जरूरी
    20 Sep 2021
    16 सितंबर को जारी सरकारी आदेश में कहा गया है कि अगर किसी कर्मचारी के खिलाफ किसी भी तरह की प्रतिकूल रिपोर्ट की पुष्टि होती है तो उसे बर्खास्त किया जा सकता है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License