NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
महामारी ने एक निस्वार्थ शिक्षक और उसके गाँव के सपनों को चूर-चूर कर दिया
प्यारेलाल राइकवार उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में अपने गाँव के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देते थे, मगर स्कूल की नौकरी जाने के बाद बढ़ते क़र्ज़ की वजह से उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली।
सौरभ शर्मा
13 Dec 2021
Rakhi Raikwar
राखी राइकवार अपने भाई प्यारेलाल की तस्वीर दिखाती हुईं। तस्वीर : मोहित कुमार

नारायनी तहसील, बांदा : एक राज्य में जहाँ नेता चुनाव जीतने के लिए अपनी जाति/धर्म का इस्तेमाल करते हैं, प्यारेलाल ने हर धर्म/जाति के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा दे कर अपने गाँव को एक बड़े परिवार के रूप में एकजुट कर लिया था। मगर महामारी की वजह से उनकी नौकरी चली गई, वह भयंकर अवसाद में आ गए और आख़िर में अपनी जान देने पर मजबूर हो गए।

प्यारेलाल राइकवार को सिर्फ़ उनके पहले नाम से ही याद किया जाता है। उनकी मौत एक साल से भी ज़्यादा समय पहले हुई थी मगर आज ताक गोरे का पुरवा गाँव के बच्चे स्कूल नहीं जाते। बांदा-पन्ना हाईवे पर बसा यह गाँव बुंदेलखंड के सूखे इलाक़े बांदा ज़िले में पड़ता है। प्यारेलाल ने सिर्फ़ 32 साल की उम्र में 17 अक्टूबर को आत्महत्या की थी। इस गाँव के 60 परिवार आज भी उनकी मौत का मातम मना रहे हैं।

ग्रामीणों के अनुसार प्यारेलाल स्कूल बंद होने के बाद अपनी नौकरी जाने, बढ़ते क़र्ज़ और अपनी बहन की शादी के लिए पैसे की ज़रूरत की वजह से वह काफ़ी उदास थे।

अपने शराबी पिता के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में संविदा कर्मचारी होने के बावजूद स्कूल शिक्षक अपने परिवार में एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। अब, उनकी दो बहनें और भाई, जो पिछले दो वर्षों में स्कूल नहीं गए हैं, अपनी एक बीघा कृषि भूमि से होने वाली आय पर निर्भर हैं।

आरती राइकवार और राखी राइकवार, स्वर्गीय प्यारेलाल की बहनें। तस्वीर : मोहित कुमार

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर ग्रामीण प्यारेलाल की मौत का शोक मनाता है, जिसकी विनम्रता और अच्छे कामों ने गांव में सांप्रदायिक सद्भाव सुनिश्चित किया था, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित केवल तीन हिंदू परिवार हैं।

प्यारेलाल के पड़ोसियों में से एक 52 वर्षीय खुशबू खातून को अभी भी उसकी मौत पर विश्वास नहीं हो रहा है। वह कहती हैं "कल की ही बात लगती है। उन्होंने गुजारा करने के लिए संघर्ष करने के बावजूद बच्चों को पढ़ाया। वह गांव का अकेला स्नातक था। स्कूल बंद होने के कारण उनकी अनुपस्थिति में वे अकेले हो गए हैं।"

ख़ातून कहती हैं, “प्यारेलाल ने एक निजी स्कूल में 1,800 रुपये की नौकरी गंवाने के बावजूद हमारे बच्चों को पढ़ाना जारी रखा। उन्होंने अंडे और समोसे बेचना शुरू किया लेकिन हर शाम बच्चों को पढ़ाना सुनिश्चित किया। हमें इस बात का अंदाजा नहीं था कि नौकरी छूटने, बढ़ती देनदारियों और तालाबंदी के बाद होने वाली अन्य समस्याओं के कारण तनाव उसे खा रहा था।"

तालाबंदी के बाद से बच्चे स्कूल नहीं गए हैं। कई माता-पिता के विपरीत, जिन्होंने अपने बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला दिलाया, शिक्षा के लिए राज्य पर निर्भर हाशिए के समुदाय असहाय हैं।

प्यारेलाल के एक अन्य पड़ोसी शफीक अहमद कहते हैं, “प्यारेलाल मेरे बेटे जैसे थे। हमें उम्मीद थी कि उनके साथ हमारे बच्चे जीवन में कुछ सार्थक करेंगे न कि दिहाड़ी मजदूरों के रूप में काम करेंगे। अब, कोई भी युवा हमारे बच्चों को नहीं पढ़ा सकता।"

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महामारी के कारण 15 लाख स्कूलों को बंद करने और उसके परिणामस्वरूप 2020 में लॉकडाउन ने प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में नामांकित 247 मिलियन बच्चों को प्रभावित किया।

प्यारेलाल की बहन राखी का ग्रेजुएशन का सपना चकनाचूर हो गया है। उसकी मृत्यु के कारण वह अपना इंटर कॉलेज भी पूरा नहीं कर सकी। उस बदकिस्मत दिन को याद करते हुए, वह कहती है, “उस दिन हमारे पास मेहमान थे; यह मेरी शादी के संबंध में था। मेरा भाई खुश दिख रहा था और उसने उनका स्वागत करने की पूरी कोशिश की। मेहमानों के जाने के बाद, मेरे भाई को छोड़कर हम सब अपने पड़ोसी के घर चले गए। एक घंटे बाद जब हम लौटे तो देखा कि वह पंखे से लटका हुआ था। अस्पताल पहुंचने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया।"

हालाँकि राखी को अपने भाई के इस कदम का सही कारण नहीं पता है, मगर वह कहती हैं, “वह अत्यधिक तनाव में था और मेरी शादी उसकी शादी की चिंता थी। मेरा भाई अपनी देनदारियों के कारण चिंतित रहता था क्योंकि हमारे पिता घर चलाने के लिए कुछ भी योगदान नहीं देते थे।"

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 2020 के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल आत्महत्या करने वालों की संख्या में तेज वृद्धि हुई थी। कुल मिलाकर, 153,052 आत्महत्याओं की सूचना मिली, जो 1967 के बाद से सबसे अधिक है, सबसे प्रारंभिक अवधि जिसके लिए डेटा उपलब्ध है। यह संख्या 2019 से 10% की वृद्धि के साथ 1967 के बाद से साल-दर-साल चौथी सबसे बड़ी छलांग है।

विक्रेताओं और व्यापारियों की आत्महत्याओं में क्रमश: 26.1% और 49.9% की वृद्धि हुई। प्यारेलाल विक्रेताओं की श्रेणी में आते क्योंकि वह अपने परिवार के लिए जीविकोपार्जन के लिए समोसा और अंडे बेच रहे थे। आत्महत्या के कारणों में गरीबी (69%) और बेरोजगारी (24%) में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई।

अहमद उदास होकर कहते हैं, ''अगर प्यारेलाल ने हमें समस्या बताई होती तो हम इसे सुलझा लेते और वह जिंदा होते।''

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।

Pandemic Shattered Selfless Teacher and Dreams of his Village

Uttar pradesh
Pandemic
COVID
unemployment
Jobs
Joblessness
suicide
Banda
Bundelkhand

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

आजमगढ़ उप-चुनाव: भाजपा के निरहुआ के सामने होंगे धर्मेंद्र यादव

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही मस्जिद ईदगाह प्रकरण में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

ग्राउंड रिपोर्ट: चंदौली पुलिस की बर्बरता की शिकार निशा यादव की मौत का हिसाब मांग रहे जनवादी संगठन

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस


बाकी खबरें

  • bollywood
    न्यूज़क्लिक टीम
    बॉलीवुड के 3 खान: मोदी के भारत में हीरो से विलन?
    28 Nov 2021
    किसी ज़माने में कहा जाता था कि बॉलीवुड और क्रिकेट भारत के दो मज़हब हैं, ये दोनों लोगों को जोड़ने का काम करते हैंI लेकिन हाल के सालों में इन दोनों पर ही सांप्रदायिकता का साया पड़ गया हैI चाहे वो…
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : "वह मुसलमानों से डरता था..."
    28 Nov 2021
    गुरुग्राम में पिछले 3 महीनों से अलग-अलग हिंदुत्ववादी संगठनों ने जुमे की नमाज़ में ख़लल डालने का काम किया है। उनके इस शर्मनाक हंगामे को ध्यान में रखिये और पढ़िये निखिल सचान की यह कविता...
  • jewar airport
    प्रशांत सिंह
    जेवर एयरपोर्ट; जश्न और हक़ीक़त: कोई विस्थापित ग्रामीणों का भी दुख पूछे
    28 Nov 2021
    जेवर एयरपोर्ट के शिलान्यास के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किए गए दावों के उलट है विस्थापित ग्रामीणों की कहानी। न पूरा मुआवजा मिला, न घर का सहारा। न ही पीने के पानी की व्यवस्था है और न पूरी बिजली…
  • cartoon
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    सरकार-जी की तपस्या में भला क्या कमी!
    28 Nov 2021
    सरकार जी भी तपस्या कर रहे थे, यह हमें तभी पता चला जब सरकार जी ने खुद हमें बताया कि शायद तपस्या में कमी रह गई है। अन्यथा हमें तो यह ही पता था कि सरकार जी तो अपने राजमहल में मशरूम खा रहे हैं और आराम…
  • govt employee
    अनिल जैन
    निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन
    28 Nov 2021
    किसानों की यह जीत रेलवे, दूरसंचार, बैंक, बीमा आदि तमाम सार्वजनिक और संगठित क्षेत्र के उन कामगार संगठनों के लिए एक शानदार नज़ीर और सबक़ है, जो प्रतिरोध की भाषा तो खूब बोलते हैं लेकिन कॉरपोरेट से लड़ने…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License