NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
महामारी और अनदेखी से सफ़ाई कर्मचारियों पर दोहरी मार
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार सफाई कर्मचारियों का सर्वे कर अलग से डेटा इकठ्ठा करे। जो माता-पिता अपने युवा और कमाऊ संतान को खो चुके हैं या जो बच्चे अपने माता-पिता को खो चुके हैं, उनके भरण-पोषण और पढ़ाई आदि के लिए हर महीने आर्थिक सहायता प्रदान करे।
राज वाल्मीकि
18 Jul 2021
अपने बच्चों के साथ पति की तस्वीर लिए बबीता। दिल्ली की वाल्मीकि बस्ती की बबीता ने कोविड की दूसरी लहर में अपने पति को खो दिया।
अपने बच्चों के साथ पति की तस्वीर लिए बबीता। दिल्ली की वाल्मीकि बस्ती की बबीता ने कोविड की दूसरी लहर में अपने पति को खो दिया।

कोरोना महामारी से जहां लाखों लोग परेशान हैं और उनकी व्यथा से देश व्यथित हुआ वहीं सफाई कर्मचारियों की पूरी तरह से अनदेखी की गई। जातिगत भेदभाव कोरोना जैसी महामारी से भी नहीं मिट पाया। अभी जब तीसरी कोरोना लहर की आशंका जताई जा रही है उसमें इस समुदाय के बारे में सोचना, नीति बनाना जरूरी है।

फिलहाल दिल्ली में कोरोना की दूसरी लहर भले ही उतार पर है। पर सफाई कर्मचारी समुदाय में जिन परिवारों ने अपने परिजनों को खोया है उनका सूरते-हाल काबिले-गौर है। दिल्ली में 50 सफाई कर्मचारियों की मौत कोरोना काल में हुई। विडंबना देखिये कि जहां कोरोना के समय बिना सुरक्षा उपकरणों के काम करने वाले सफाई कर्मचारियों को मरने के लिए, बीमार पड़ने के लिए बेसहारा छोड़ दिया गया था, वहीं बाकी फ्रंटलाइन वर्कर्स का ख़ास ध्यान रखा गया। इस महामारी से जो सफाई कर्मचारी अपनी जान गंवा चुके हैं। उनके परिवार का आज हाल-बेहाल है। कई परिवार ऐसे हैं जिनमें कमाने वाला शख्स ही कोरोना का शिकार हो गया। वहां रोजी-रोटी के भी लाले पड़ गए। कहीं बच्चे अनाथ हो गए तो कहीं बूढ़े माता-पिता बेसहारा हो गए।

अठारह वर्षीय अतुल अंबेडकर नगर नई दिल्ली में अपनी छोटी बहन चौदह  वर्षीया विधि के साथ किराये के घर में रहता है। दसवीं तक पढ़ाई की फिर उसके घर के हालात ठीक न होने पर उसकी पढ़ाई छूट गई। अभी विधि नौवीं कक्षा की छात्रा है। वह सरकारी स्कूल में पढ़ती है। इन बच्चों ने कोविड-19 में अपनी मां को खोया है। इनकी माता का देहांत 24 अप्रैल 2021 को हो गया। इनके पिता तो बहुत पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। अपनी मां को खोने के बाद इन बच्चों का ध्यान रखने वाला कोई नहीं है। मां के गुजर जाने के बाद अतुल को मजदूरी करनी पड़ रही है। उसे 8000 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है। इसमे वह किसी प्रकार घर खर्च चलता है।

अतुल का परिवार दिल्ली के अंबेडकर नगर के के-ब्लाक में रहता है। मूलरूप से वे देहरादून के रहने वाले हैं। उनका परिवार करीब 20 साल से दिल्ली में रह रहा था। बीस साल पहले विशाल और उनकी पत्नी निशा देहरादून से दिल्ली आए थे। यहीं उनके दोनों बच्चों अतुल और विधि का जन्म हुआ। विशाल पहले साफ़-सफाई का काम ठेके पर करते थे फिर कार चलाने लगे। सात साल पहले उनकी मृत्यु हाई शुगर की वजह से हुई थी। पति की मृत्यु के बाद निशा परिवार का पालन-पोषण करने के लिए कोठियों में सफाई का काम करने लगीं।

वाल्मीकि समाज की होने की वजह से उन्हें और कोई काम नहीं मिला। मृत्यु के चार महीने पहले से वह मरीजों की देखभाल का काम कर रही थीं। वहीं से वह कोरोना संक्रमित हुईं। 19 अप्रैल को उन्हें काम से हटा दिया गया। निशा ने नजदीकी  डॉक्टर  को दिखाया तो डॉक्टर ने उन्हें कोरोना टेस्ट कराने की सलाह दी। कोरोना टेस्ट कराने पर उनकी रिपोर्ट पोजीटिव आई। 24 अप्रैल को उन्हें सांस लेने में दिक्कत हुई। उनका बेटा अतुल और बेटी विधि उन्हें पास के अस्पताल में ले गए जहां डॉक्टरों ने उनकी मां को मृत घोषित कर दिया।

अतुल और विधि पर क्या बीती होगी, यह समझा जा सकता है। पिता का साया तो पहले ही सिर से उठ गया था अब मां भी नहीं रही। बच्चे अंदर से टूट गए थे। ऐसे में अठारह वर्षीय अतुल ने जीने के लिए काम करना शुरू किया। जिससे वह कमरे का किराया दे सके और अपना तथा अपनी बहन का पालन-पोषण कर सके। बहन को उच्च शिक्षा दिला सके। 

दूसरा उदाहरण बबीता देवी का लिया जा सकता है। बकौल बबीता :

मेरा नाम बबीता है। मैं 38 साल की हूं। मैं वाल्मीकि बस्ती, तिलक नगर, नई दिल्ली में रहती हूं। मेरे दो बच्चे हैं बेटा लव (18) और बेटी खुशी (16)। बेटा बारहवीं पास कर चुका है और खुशी अभी बारहवीं में गई है। मेरे पति हाउस कीपिंग के काम के साथ आर्केस्ट्रा कार्यक्रमों में इंस्ट्रूमेंट बजाने का काम किया करते थे। मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूं। मैं घर-घर जाकर कूड़ा उठाने का काम किया करती थी। इसी तरह जीवन यापन हो रहा था। पर मैं जीवन में आगे बढ़ने की चाह रखती थी।

इसी दौरान सफाई कर्मचारी आंदोलन से डॉ. रेनू छाछर हमारी बस्ती में सर्वे के लिए आईं। उनसे परिचय होने के बाद मैं सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़ गई।

सफाई कर्मचारी आंदोलन के राशन वितरण अभियान में मदद करतीं बबीता

सब कुछ सही चल रहा था कि अचानक कोरोना की दूसरी लहर मुझ से मेरे पति को छीन ले गई। 22 अप्रैल 2021 को मेरे पति का कोरोना से निधन  हो गया। मेरे ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। मैं टूट गई। पर मैंने हिम्मत नहीं हारी है। मेरा संघर्ष जारी है।

दिल्ली नगर निगम सफाई मजदूर संघ से जुड़े दिलीप पारचा ने बताया कि शाहदरा में 12 सफाई कर्मचारियों की मौत कोरोना से हुई। इनमें से किसी के भी परिजनों को न तो आर्थिक मदद मिली और न ही रोजगार। कोरोना से बहुत से सफाई कर्मचारी पीड़ित हुए, उनके परिजन भी बीमार पड़े, लेकिन उन्हें इलाज में कोई मदद नहीं मिल पाई। सबसे बड़ी परेशानी यह रही कि जिस तरह का खौफ़ कोरोना पीड़ित होने का था, उससे कई उन ज्यादा इस बात का कि अगर यह बात लोगों को पता चलेगी तो उनका सामाजिक बहिष्कार होगा। इसके डर से बहुतों ने कोरोना पीड़ित होने की बात छुपाई गई। कोरोना टेस्ट ही नहीं हुए। उत्तर प्रदेश में तो जांच करवाना बेहद मुश्किल काम था। पूरी की पूरी मशीनरी कोरोना पीड़ितों की संख्या को कम करने पर उतारू थी। इसकी मार सफाईकर्मियों पर पड़ी। जो लोग कोरोना से मारे गए वे सरकारी आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हुए।

सफाई कर्मचारी हों या इस समुदाय से जुड़े अन्य लोग और परिवारों को दोहरी मार झेलनी पड़ी। देश की राजधानी दिल्ली में भी समुदाय के परिजनों की समस्याओं पर बहुत कम ध्यान दिया गया।

एक ओर जहां दिल्ली सरकार शहीद हुए डॉक्टर कोरोना योद्धाओं के परिजनों को एक करोड़ की सहायता राशि दे रही है वहीं इन सफाई कर्मचारी कोरोना योद्धाओं के परिजनों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। क्या उनका कसूर ये है कि वे सफाई कर्मचारी समुदाय से हैं। दलित समुदाय से हैं। इसलिए उनकी कोई अहमियत नहीं है। जातिवादी प्रशासन और प्रशासनिक अधिकारियों की नजर में इनकी जान जाने का कोई महत्व नहीं है भले ही वे कोरोना से लोगों की जान बचाते-बचाते खुद शहीद हो गए हों। क्या प्रशासन उन्हें शहीद का दर्जा देगा?

ये सफाई कर्मचारी भी इसी देश के नागरिक हैं। संविधान में उनको बराबरी का अधिकार है। उनके वोट की कीमत भी अन्य नागरिकों के वोट की कीमत के समान है। पर कथित उच्च जाति के अधिकारियों और नेताओं को इनकी याद तब ही आती है जब उन्हें इनका वोट लेना होता है। कहीं साम्प्रदायिक दंगे करवाने होते हैं। इनके श्रम का शोषण तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता आ रहा है। सरकारें भी अक्सर इन्हें अनपढ़ और गरीब बनाए रखने की साजिशें रचती रहती हैं।

कोरोना काल में दिल्ली जैसे महानगर में भी अधिकांश सफाई कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति जर्जर हो गई है। लोग ये भी कहने लगे हैं कि “हम कोरोना से बच भी गए तो भूख से मर जायेंगे।”  क्योंकि वे बेरोजगारी और भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। जो लोग नगर निगम के तहत सफाई का काम कर रहे हैं उनकी स्थिति भी अच्छी नहीं है। उन्हें कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिलता।

भले ही दिल्ली सरकार अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर कहे कि- कोविड से जो दुनिया छोड़ गए, उनके परिवारों के साथ है सरकार। कोविड-19 के कारण मृत्यु हो जाने वाले लोगों के लिए दिल्ली सरकार द्वारा “मुख्यमंत्री कोविड-19 परिवार आर्थिक सहायता शुरू की है। मासिक आर्थिक सहायता के रूप में 2,500 रुपये की सहायता उन दिल्लीवासियों के लिए दी जाएगी जिनके परिवार में कमाने वाले व्यक्ति की कोविड-19 के कारण मृत्यु हुई है। इसके अलावा एकमुश्त राशि के रूप में 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि की सहायता उन समस्त दिल्लीवासियों के लिए है जिनके परिवार में कोविड-19 के कारण किसी की भी मृत्यु हुई है।

सब जानते हैं कि अधिकांश सफाई कर्मचारी और उनके  बच्चे अनपढ़ व गरीब होते हैं। ऐसी स्थिति में वे क्या विज्ञापन और योजना का लाभ ले पायेंगे? 

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार सफाई कर्मचारियों का सर्वे कर अलग से डेटा इकठ्ठा करे। जो माता-पिता अपने युवा और कमाऊ संतान को खो चुके हैं उनके भरण-पोषण के लिए हर महीने आर्थिक सहायता प्रदान करें। स्कूल जाने वाले जिन बच्चों ने अपने माता-पिता और अभिभावकों को खो  दिया है उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च और उनके पालन-पोषण का खर्च सरकार उठाए। सवाल है कि क्या सरकार इन सफाई कर्मचारियों के प्रति इतनी संवेदनशीलता दिखाएगी?

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार निजी हैं।)

safai karmachari
Sanitation Workers
COVID-19
Corona 3rd wave
SC/ST/OBC
lower caste
Valmiki community

Related Stories

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

कोरोना वायरस : टीके की झिझक से पार पाते भारत के स्वदेशी समुदाय

ग्राउंड रिपोर्ट: पंजाब में दलित डेरे व डेरों पर राजनीतिक खेल

पंजाब में मामला सिर्फ आप-कांग्रेस के बीच ही नहीं, सुलगते हैं सवाल

महामारी से कितनी प्रभावित हुई दलित-आदिवासी शिक्षा?

माओवादियों के गढ़ में कुपोषण, मलेरिया से मरते आदिवासी

बिजनौर: क्या राष्ट्रीय स्तर की होनहार खिलाड़ी को चुकानी पड़ी दलित-महिला होने की क़ीमत?

उत्तराखंड में स्वच्छता के सिपाही सड़कों पर, सफाई व्यवस्था चौपट; भाजपा मांगों से छुड़ा रही पीछा

कोरोना लॉकडाउन में घने वनों से घिरे बैगाचक में बांटा गया परंपरागत खाद्य पदार्थ, दिया पोषण-सुरक्षा का मॉडल


बाकी खबरें

  • भाषा
    'आप’ से राज्यसभा सीट के लिए नामांकित राघव चड्ढा ने दिल्ली विधानसभा से दिया इस्तीफा
    24 Mar 2022
    चड्ढा ‘आप’ द्वारा राज्यसभा के लिए नामांकित पांच प्रत्याशियों में से एक हैं । राज्यसभा चुनाव के लिए 31 मार्च को मतदान होगा। अगर चड्ढा निर्वाचित हो जाते हैं तो 33 साल की उम्र में वह संसद के उच्च सदन…
  • सोनिया यादव
    पत्नी नहीं है पति के अधीन, मैरिटल रेप समानता के अधिकार के ख़िलाफ़
    24 Mar 2022
    कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेक्शन 375 के तहत बलात्कार की सज़ा में पतियों को छूट समानता के अधिकार यानी अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। हाईकोर्ट के मुताबिक शादी क्रूरता का लाइसेंस नहीं है।
  • एजाज़ अशरफ़
    2024 में बढ़त हासिल करने के लिए अखिलेश यादव को खड़ा करना होगा ओबीसी आंदोलन
    24 Mar 2022
    बीजेपी की जीत प्रभावित करने वाली है, लेकिन उत्तर प्रदेश में सामाजिक धुरी बदल रही है, जिससे चुनावी लाभ पहुंचाने में सक्षम राजनीतिक ऊर्जा का निर्माण हो रहा है।
  • forest
    संदीपन तालुकदार
    जलवायु शमन : रिसर्च ने बताया कि वृक्षारोपण मोनोकल्चर प्लांटेशन की तुलना में ज़्यादा फ़ायदेमंद
    24 Mar 2022
    शोधकर्ताओं का तर्क है कि वनीकरण परियोजनाओं को शुरू करते समय नीति निर्माताओं को लकड़ी के उत्पादन और पर्यावरणीय लाभों के चुनाव पर भी ध्यान देना चाहिए।
  • रवि कौशल
    नई शिक्षा नीति ‘वर्ण व्यवस्था की बहाली सुनिश्चित करती है' 
    24 Mar 2022
    दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारी शिक्षकों ने कहा कि गरीब छात्र कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट पास करने के लिए कोचिंग का खर्च नहीं उठा पाएंगे। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License