NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
स्टडी वीज़ा के लिए माँ-बाप कर्जे उठाने को हुए मजबूर
दोआबा के बाद मालवा में भी स्टडी वीज़ा पर विदेश जाने का रूझान एक दम तेज़ हुआ है। बेरोज़गारी और नशे की आदत से बचाने के लिए मां-बाप बच्चों को विदेश भेजने के मजबूर हो रहे हैं।
शिव इंदर सिंह
13 Oct 2019
study visa
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : The Tribune

पंजाब में अब स्टडी वीज़ा भी कर्जे का कारण बनने लगा है। माँ-बाप अपने बेटे-बेटियों को विदेश भेजने के लिए सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं। माँओं की बांहें सूनी, कान खाली और ट्रैक्टरों बिना घर खाली होने लगे हैं। ज़मीनें बेचने के लिए ग्राहक नहीं मिल रहे। कर्जा दिनों-दिन बढ़ रहा है। जहाज़ की टिकट के लिए पशु और विदेशी फीसों के लिए खेती मशीनरी का बिकना अब छिपी बात नहीं रही है। पूरे एक साल से कॉटन बेल्ट इलाके में स्टडी वीज़ा पर बच्चों को विदेश भेजने का रुझान बढ़ा है।

जिला बंठिडा की भुच्चो मंडी के नीटा ज्वैलर्स के मालिक गुरदविंदर जौड़ा ने बताया कि अब एक ही दिन में चार-चार केस गहने गिरवी रखने व बेचने के आते हैं, जिनमें से पचास फीसदी केस स्टडी वीज़ा वाले होते हैं। प्राइवेट फाइनेंस कम्पनियां से गहनों पर लोन लेने वाले केस बढ़े हैं।

बरनाला के मित्तल ज्वैलर्स के मालिक अमन मित्तल ने बताया कि गांवों में अब गहने बेचने का रुझान बढ़ा है और माँ-बांप बेटे-बेटियों को विदेश भेजने के लिए कानों का सोना तक बेच रहे हैं। इसी तरह बठिंडा जिले के गीदड़बहा की मुख्य ज्वैलरीशॉप के मालिक ने बताया कि हर महीने आठ से दस केस इसी तरह के आते हैं।

मालवा क्षेत्र के तलवंडी साबो, बरनाला, मोगा, ज़ीरा, मलोट और कोटकपुरा में ट्रैक्टर मंडियां लगती हैं। मोगा के ट्रैक्टर व्यापारी मस्तान सिंह बताते हैं कि माँ-बाप बच्चों को विदेश भेजने के लिए ट्रैक्टर बेच रहे हैं। तलवंडी साबो की मंडी के ट्रैक्टर व्यापारी गुरचरण सिंह बताते हैं कि हर सप्ताह छह-सात किसान नए ट्रैक्टर बेचने आते हैं जिन्होंने अपने बच्चे विदेश भेजने होते हैं। देखा गया है कि मंडियों में खेती के उपकरण नहीं बल्कि माँ-बाप के अरमान बिक रहे होते हैं।

दोआबा के बाद मालवा में भी स्टडी वीज़ा पर विदेश जाने का रूझान एक दम तेज़ हुआ है। बेरोज़गारी और नशे की आदत से बचाने के लिए माँ-बाप बच्चों को विदेश भेजने के मजबूर हो रहे हैं।फिरोजपुर के गांव पौने के उतार के एक घर की कहानी नए संकट को दर्शाने के लिए काफी है। इस घर के बुर्जुग मालिक की पहले ही मौत हो गयी थी, पूरी ज़मीन बेच कर लड़का विदेश भेज दिया, बाद में माँ की मौत हो गयी और माँ के संस्कार और भोग पर भी लड़का पहुंच नहीं सका।

बच्चों को विदेश भेजने के लिए माँ-बाप दुधारू पशुओं को भी बेचने लगे हैं। मालवा पशु व्यापारी वैलफेयर सोसाइटी के प्रधान परमजीत सिंह माटा बताते हैं कि पशु मेलों में 60 फीसदी पशु मजबूरी की मार से बिक रहे हैं। इनमें से भी ज्यादातर केस स्टडी वीज़ा वाले होते हैं। बहुत सारे किसान इस आस पर जमीनों को गिरवी रख रहे हैं कि विदेश पहुंचकर बेटा इसे छुड़वा लेगा।

मुक्तसर के एक नौजवान किसान जगमीत सिंह ने बताया कि जमीन गिरवी रखने के बाद ज्यादातर किसान उसी ज़मीन को ठेके पर जोतना शुरु कर देते हैं। इस तरह समाज में पर्दा भी रह जाता है। देखा जाए तो विदेश में अकेला पैसा ही नहीं जाता पीछे से घर भी खाली हो जाते हैं। माँ-बाप के पास सिर्फ उम्मीदें रह जाती हैं। नया रूझान यह भी सामने आया है कि जिन लड़कों के बढ़िया बैंड आए हैं वे भी ऐसी लड़की ढूंढते हैं जो विदेश का खर्चा उठा सके।

पंजाब से बारहवीं कक्षा पास करके, यहां से नाउम्मीद होकर लाखों की तादाद में बच्चे आईलैट्स ( IELTS ) सैन्टर्स की ओर कूच कर रहे हैं। 2018-19 दौरान ही डेढ़ लाख के करीब विद्यार्थी स्टडी वीज़ा पर कनाडा व अन्य देशों में चले गए हैं। इस तरह के रूझान से पंजाब के कॉलेजों में विद्यार्थियों की संख्या घटी है।
जगह-जगह खुले आईलैट्स सैन्टर्स नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। इस बार पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में भी विद्यार्थियों की गिनती में कमी आई है।

एक सीनियर सरकारी अधिकारी अनुसार विद्यार्थियों की संख्या घटने का तर्क देकर कुछ ग्रामीण कॉलेजों को बंद करने के प्रस्ताव पर भी सरकार कई बार चर्चा कर चुकी है।

पंजाब के प्रसिद्ध इतिहासकार और समाजशास्त्री राजपाल सिंह बताते हैं, "बीसवीं सदी के शुरुआत में पंजाबियों का विदेश जाने का रुझान शुरू हुआ, वहां उन्होंने अपने पैर जमाए, विदेशी पैसे ने पंजाब में खुशहाली लाई। इसीलिए पंजाबियों को लगता है कि विदेश जाकर उनका जीवन खुशहाल हो जाएगा। ज्यादातर पंजाबियों के रिश्तेदार भी विदेशों में रहते है।

पंजाबी आसान ज़िन्दगी जीने के आदी हो गए हैं। लेकिन खेती-बाड़ी में आई स्थिरता व पंजाब में अच्छे उद्योगों का नहीं टिक पाना पंजाबियों को आर्थिक संकट की तरफ धकेल रहा है। ऐसे समय में विदेश ही उनके लिए सहारा बनता है।"

राजपाल एक और तथ्य उजागर करते हुए बताते हैं कि कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में केवल किसानी वर्ग और मध्यम वर्ग ही जाता है क्योंकि उनके पास वहां जाने के पैसे हैं। लेकिन पंजाब का दलित और निम्न वर्ग अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण ज्यादा से ज्यादा कुवैत जैसे छोटे देशों में ही जाता है।

पंजाबी मूल के कैनेडियन पत्रकार गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि पंजाब से जो पढ़े लिखे नौजवान विदेशों में जाते हैं उन्हें अपने पैर जमाने में ज्यादा समस्या नहीं आती, मुश्किल उनके लिए ज्यादा होती है जो पंजाब से बारहवीं कक्षा के बाद ही विदेशों की तरफ जाते हैं और आजकल ऐसे नौजवान लड़के-लड़कियों की ही गिनती ज्यादा है।

सामाजिक और सांस्कृतिक कर्मी हरीश मोदगिल बताते हैं, "यह रुझान हमारे बुरे आर्थिक और राजनीति सिस्टम की देन है। नौजवानों को उनकी योग्यता के मुताबिक़ काम नहीं मिल रहा। इस मुद्दे को लेकर बहुत सारे संघर्षशील संगठन मैदान में हैं। दुख की बात तो यह है कि पंजाब सरकार द्वारा अपने राज्य के नौजवानों को रोज़गार के बढ़िया मौके पैदा करके देना तो दूर बल्कि सरकार स्कूलों में ही आईलैट्स (IELTS) की पढ़ाई शुरू करने जा रही है ताकि नौजवान देश छोड़कर विदेश चले जाएं।"

कर्जा उठा कर बच्चों को विदेश भेजने के रूझान के बारे में कनाडा के वैनकूवर सूबे की पंजाबी मूल की एमएलए रचना सिंह का कहना है, “माँ-बाप द्वारा ऐसा अपने बच्चों को विदेशों में पक्का करने के लिए किया जाता है। उन्हें लगता है कि जब बच्चे पक्के हो गए तो अपने आप कर्जा उतार देंगे। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है क्योंकि बच्चे स्टडी दौरान एक सप्ताह में 20 घंटे ही काम कर सकते हैं जिसके लिए उन्हें 14 डॉलर प्रति घंटा मिलते हैं।

इन्हीं पैसों में उन्हें अपने रहन-सहन , खाने-पीने और मकान के किराये का भी जुगाड़ करना पड़ता है। जो विद्यार्थी गैर-कानूनी तौर पर नियमित घंटों से अधिक काम करते हैं वहां उन्हें मेहनताना भी कम मिलता है, शोषण भी होता है और पकड़े जाने का भी डर रहता है। स्टडी पूरी होने के बाद विद्यार्थी अपना वर्क परमिट अप्लाई कर सकता है। इस तरह परमानेंट होने के लिए सात साल तक का समय लग जाता है। यहां पर बढ़िया डिग्री देने वाली यूनिवर्सिटियों में दाखिला कम मिलता है।

पंजाब के विद्यार्थी जिन संस्थानों में दाखिला लेते हैं उनमें पढ़ाई का स्तर तो बढ़िया नहीं होता लेकिन वे विद्यार्थियों की जेबें जरूर खाली करा देते हैं। इस तरह यहां आकर विद्यार्थियों की लड़ाई अपने आप को बनाए रखने की रह जाती है। माँ-बाप के सिरों पर चढ़ा कर्जा उतारना मुश्किल हो जाता है। माँ-बाप के पल्ले रह जाती है-नामोशी और आँसू।”

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

punjab
Study visa
Educated Unemployed
Drug addiction
Study visa reason for loan
economic crises

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

लुधियाना: PRTC के संविदा कर्मियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू

त्रासदी और पाखंड के बीच फंसी पटियाला टकराव और बाद की घटनाएं

मोहाली में पुलिस मुख्यालय पर ग्रेनेड हमला

पटियाला में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं निलंबित रहीं, तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का तबादला

श्रीलंका का संकट सभी दक्षिण एशियाई देशों के लिए चेतावनी

दिल्ली और पंजाब के बाद, क्या हिमाचल विधानसभा चुनाव को त्रिकोणीय बनाएगी AAP?

विभाजनकारी चंडीगढ़ मुद्दे का सच और केंद्र की विनाशकारी मंशा

पंजाब के पूर्व विधायकों की पेंशन में कटौती, जानें हर राज्य के विधायकों की पेंशन

विश्लेषण: आम आदमी पार्टी की पंजाब जीत के मायने और आगे की चुनौतियां


बाकी खबरें

  • Iran
    प्रबीर पुरकायस्थ
    ईरान नाभिकीय सौदे में दोबारा प्राण फूंकना मुमकिन तो है पर यह आसान नहीं होगा
    21 Feb 2022
    वाशिंगटन की मूर्खता सबसे कठोर परमाणु समझौते से बाहर निकलना था, जिस पर कोई देश भी सहमत हो सकता था। ईरान अभी भी उन पुरानी शर्तों में से अधिकांश को स्वीकार कर सकता है, लेकिन जो कुछ उन्नत क्षमताएं इसने…
  • Newsletter
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    इस साल रेड बुक्स डे (21 फ़रवरी) पर आप कौन-सी रेड बुक पढ़ेंगे?
    21 Feb 2022
    गोविंद पानसरे की हत्या के कुछ साल बाद, नयी दिल्ली स्थित लेफ़्टवर्ड बुक्स (एक प्रकाशन संस्थान) ने रेड बुक्स डे पर विचार करना शुरू किया। एक ऐसा दिन जब परिवर्तनवादी किताबों और उन्हें तैयार करने वाले…
  • vp
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्यों थे वी.पी सिंह गठबंधन की सरकार के मज़बूत स्तंभ
    20 Feb 2022
    'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में नीलांजन बात करते हैं वरिष्ठ पत्रकार देबाशीष मुखर्जी से। देबाशीष ने हाल ही में ही वी पी सिंह पर एक किताब लिखी है. उन्होंने सिंह, गठबंधन सरकार और उसके महत्व…
  • punjab
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जनादेश 2022: पंजाब चुनाव में दिखे कई रंग, अगली सरकार ईवीएम में बंद
    20 Feb 2022
    पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए शाम पांच बजे तक 63 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया। अंतिम आंकड़ों का इंतज़ार है।
  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जनादेश 2022:  तीसरे चरण की 59 सीटों के साथ यूपी की 172 सीटों का भविष्य ईवीएम में लॉक
    20 Feb 2022
    निर्वाचन आयोग की ओर से अभी शाम 5 बजे तक के आंकड़े जारी किए हैं। जिसके अनुसार शाम 5 बजे तक कुल औसतन मतदान 57.58% रहा। इनमें ललितपुर में सबसे ज़्यादा 67.38 प्रतिशत वोट पड़े जबकि सबसे कम कानपुर नगर में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License