NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
बीच बहस: विपक्ष के विरोध को हंगामा मत कहिए
यह सत्तापक्ष की शब्दावली है जिसे सारे अख़बार, सारे चैनल, सारी समाचार एजेंसी प्रकाशित-प्रसारित करते हैं।
मुकुल सरल
24 Jul 2021
बीच बहस: विपक्ष के विरोध को हंगामा मत कहिए

जब जब संसद चलती है टीवी स्क्रीन पर सुबह से शाम तक यही सुर्खियां तैरती रहती हैं- सदन में विपक्ष का हंगामा। विपक्ष के हंगामे की वजह से लोकसभा स्थगित, राज्यसभा स्थगित। सुबह के अख़बारों में भी यही हैडलाइन यानी लीड ख़बर बनती है, जबकि वास्तव में इसे हंगामा नहीं विपक्ष का विरोध कहना चाहिए।

अब बताइए कि विपक्ष संसद के भीतर विरोध कैसे करेगा, जब उसकी सुनवाई न हो। जब विपक्ष की आपत्तियों को ख़ारिज कर दिया जाए। उसके सवालों के जवाब न दिए जाएं तो विरोध हंगामे की ही शक्ल लेगा। और न भी ले तब भी सत्ता पक्ष हर विरोध को बवाल का नाम ही देना चाहेगा। सत्ता पक्ष कहेगा कि विपक्ष हंगामा करता है, संसद चलने नहीं देता। और हम और आप भी यही कहेंगे-समझेंगे कि हां, विपक्ष बड़ा गैरज़िम्मेदार हो गया है।

सरकार या सत्ता पक्ष का क्या काम है- जनहित में नीतियां बनाना और उनका सही से क्रियान्वयन करना।

और विपक्ष का क्या काम है- सत्ता पक्ष पर लगाम लगाना, अंकुश कसना यानी अगर नीतिया जनहित में न हों तो उसका विरोध करना, आपत्ति जताना। सवाल पूछना। इसमें संसद का कामकाज रोकना भी शामिल है और नारेबाज़ी भी।

अब चाहे वो तीन कृषि क़ानून हों, चार श्रम सहिंताएं हों, रफ़ाल घोटाला हो या पेगासस जासूसी कांड या फिर कुछ मीडिया संस्थानों पर उनकी पत्रकारिता की वजह से छापेमारी, कोई भी जनहित का मुद्दा तो है नहीं। यह जनविरोधी, दमनकारी और बदले की कार्रवाई हैं। इसलिए इन्हें सदन में उठाना विपक्ष का पहला और पवित्र काम है। अब वह इसे कैसे उठाएगा। स्थगन प्रस्ताव देगा। बहस की मांग करेगा। जांच की मांग करेगा। और जब उसकी इन मांगों पर कान न धरा जाए... तब हंगामा भी होगा, नारेबाज़ी भी। यह सब लोकतंत्र और संसदीय कार्यवाही का हिस्सा है। इसमें कुछ भी अनपेक्षित या अनूठा नहीं है।  

आप खुद सोचिए, जब कोरोना काल में हुई मौतों पर सदन में झूठ बोल दिया जाए तो विपक्ष क्या करेगा। चुपचाप बैठकर सरकार के झूठ सुनेगा या तत्काल विरोध करेगा। और जब सदन में विरोध होगा तो उसे शोर और हंगामे का नाम दे दिया जाएगा।

अब पूरे मानसून सत्र यही चलेगा। विपक्ष सवाल पूछेगा और सरकार उसे हंगामे का नाम देकर ख़ारिज कर देगी। टीवी पर बहस कराएगी कि विपक्ष रचनात्मक भूमिका नहीं निभा रहा। सुबह के अख़बारों में भी आप यही हैडलाइन पढ़ेंगे और इस तरह विपक्ष की नकारात्मक छवि आपके दिमाग़ में बनेगी।

आज विपक्ष के विरोध को हंगामा कहने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) कांग्रेस के शासनकाल में इसी तरह विरोध करती थी। तब उसे अपनी भूमिका सही नज़र आती है, लेकिन आज जब कांग्रेस और अन्य दल उसकी नीतियों, कार्रवाइयों का विरोध करते हैं तो उसे सदन का वक़्त बर्बाद करना कहा जाता है।

आपको याद होगा कि मनमोहन सरकार वन और टू ख़ासकर टू यानी दूसरे कार्यकाल में बीजेपी के विरोध के चलते संसद के कई पूरे के पूरे सत्र काम नहीं हो सका। और उस समय बीजेपी क्या कहती थी? कहती थी कि सदन चलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है।

बीजेपी विपक्ष थी तो संसद चलाने की ज़िम्मेदारी सरकार की भी बताती थी। जनता की आवाज़ के तौर पर विपक्ष की भूमिका निभाने की बात करती थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद से ही सुर बदल गए हैं!

ये #पुरानी_बाइट 2011 की है। #PuraneeBite pic.twitter.com/bD8uQDbrbE

— Umashankar Singh उमाशंकर सिंह (@umashankarsingh) July 23, 2021

आप कहेंगे कि उस समय मनमोहन सरकार भी तो बीजेपी की नहीं सुनती थी। उसके सवालों का जवाब नहीं देती थी। उसकी आपत्तियों पर कान नहीं धरती थी।

लेकिन ऐसा नहीं है। मनमोहन सरकार में विपक्ष के विरोध के चलते इस्तीफ़े भी हुए हैं और जांच भी बैठाई गई।

और एक और बड़ा फ़र्क़ है बीजेपी और कांग्रेस के विरोध में। बीजेपी के सामने कभी छवि का संकट नहीं रहा है। मतलब यह कि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद बीजेपी को मीडिया ने कभी उस तरह नेगेटिव प्रचारित नहीं किया, जैसे कांग्रेस या वाम या अन्य दलों को किया जाता है। इसके पीछे है बीजेपी की धार्मिक और जातीय राजनीति। बीजेपी जिस सवर्ण और वर्चस्वशाली वर्ग की नुमाइंदगी करती है। देश के तमाम संसाधनों, संस्थानों के साथ मीडिया पर भी उसका कब्ज़ा रहा है। इसलिए उसके प्रति मीडिया के एक बड़े वर्ग में हमेशा अपनेपन का भाव रहा है। साफ्ट कॉर्नर रहा है। इसलिए बीजेपी चाहे राममंदिर के मुद्दे पर संसद ठप करे या महंगाई के। मीडिया ज़ोर-शोर से सरकार को ही घेरती थी, लेकिन आज अगर सदन में महंगाई का मुद्दा भी उठाया जाए तो उसे शोर-शराबे की संज्ञा दी जाएगी।

उस समय के टीवी चैनल आपने देखे होंगे तो पेट्रोल-डीजल के हर दिन के भाव का हिसाब रखा जाता था। बीजेपी नेता साइकिल चलाने लगते थे। गैस सिलेंडर लेकर सड़कों पर आ जाते थे। और वह हैडलाइन बनता था। यही नहीं न्यूज़ चैनल आपकी थाली कितनी महंगी हुई, उससे क्या-क्या चीज़ ग़ायब हुईं इसका बाकायदा ग्राफिक्स के जरिये बयान करता था। अब यह आपने कब से नहीं देखा। ज़रा सोचिएगा।

यही नहीं आप अन्ना आंदोलन और किसान आंदोलन की कवरेज़ को ही ध्यान से देख लीजिएगा। आपको फ़र्क़ समझ आ जाएगा। उस समय सिर्फ़ मीडिया की वजह से ही अन्ना आंदोलन का माहौल बना था और माना जाता है कि इस आंदोलन के पीछे बीजेपी और आरएसएस की भी ताक़त थी लेकिन आज जब किसान अपने दम पर आठ महीने से दिल्ली की सीमाओं पर डटे हैं तो उसे कितना और कैसा कवरेज़ दिया जा रहा है। कैसे कैसे जुमलों या विशेषणों से नवाज़ा जा रहा है। आतंकवादी से लेकर नक्सलवादी और अब मवाली तक। एक-दो अख़बारों या चैनलों को छोड़कर बाक़ी सब किसान आंदोलन के विरोध और सरकार के पक्ष में ही बैटिंग कर रहे हैं।

आप कहेंगे कि सत्ता पक्ष का काम है कि वो विपक्ष को बदनाम करे, ख़ारिज करे (हालांकि यह सैद्धांतिक तौर पर सही नहीं है) लेकिन मीडिया का तो काम है कि वह सरकार की इस चालाकी को पकड़कर उजागर करे। हम कॉरपोरेट मीडिया से इसकी अपेक्षा नहीं करते। क्योंकि वह तो खुद सरकार की गोदी में बैठा है, लेकिन जो खुद को जनवादी मीडिया कहते या समझते हैं कम से कम उन्हें तो सत्ता की इस शब्दावली से बचना चाहिए।

Parliament Monsoon Session
monsoon session
opposition parties
Opposition Parties Protest
BJP
Narendra modi
Modi government
Pegasus
Congress
Mainstream Media

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

भारत को मध्ययुग में ले जाने का राष्ट्रीय अभियान चल रहा है!

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!


बाकी खबरें

  • कोविड टीकाकरण: क्या यह देश का पहला Vaccine Drive है?
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोविड टीकाकरण: क्या यह देश का पहला Vaccine Drive है?
    13 Jun 2021
    देश में कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए टीकाकरण जारी है। पर क्या यह देश का पहला वैक्सीन ड्राइव है ? भारत में पहले महामारियों से लड़ने के लिए किस तरह के टीकाकरण अभियान चलाए गए थे? इतिहास के पैन के इस…
  • coronavirus
    प्रभात पटनायक
    संपत्ति अधिकार और महामारी से मौतें
    13 Jun 2021
    टीके की कमी के चलते– एक बनावटी कमी जो निजी संपत्ति अधिकारों को बचाने के कारण से पैदा हुई है– एक वर्ग के लोगों की जिंदगी को दूसरे वर्ग के लोगों की ज़िंदगी के खिलाफ खड़ी कर दी गयी हैं।
  • book
    अजय कुमार
    नौकरी छोड़ चुके सरकारी अधिकारी का कुछ लिखने से पहले सरकार की मंज़ूरी लेना कितना जायज़?
    13 Jun 2021
    यह अंदेशा ग़लत नहीं कहा जा सकता कि सरकार खुलकर कह रही है कि ख़बरदार! अगर नौकरी छोड़ने के बाद भी कुछ ऐसा बोला या लिखा जिससे सरकार पर आंच पड़े तो अंजाम बुरा हो सकता है।
  • तिरछी नज़र: टीका न हुआ, रायता हो गया, सब फैलाए जाते हैं
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: टीका न हुआ, रायता हो गया, सब फैलाए जाते हैं
    13 Jun 2021
    मोदी जी के कहने से कोरोना को भगाने के लिए ताली-थाली बजाने वाले हम भला मोदी जी की बात क्यों टालते। तो मोदी जी की बात मान कर हमने टीका लगवाने की ठान ही ली, लेकिन...
  • मुकुल रॉय
    सोनिया यादव
    मुकुल रॉय की वापसी टीएमसी और बीजेपी की आइडियोलॉजी पर भी सवाल खड़े करती है
    13 Jun 2021
    मुकुल की ये मजबूरियां ही हैं कि वो न बीजेपी से वफ़ा कर पाए और न ही टीएमसी से। वैसे ये बीजेपी और टीएमसी की भी मजबूरियां ही हैं जो एक ने दाग़ी नेता को तुरंत भर्ती कर लिया तो दूसरे ने मौका मिलते ही झट…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License