NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
मूर्तिकारों का मनोभाव
त्योहार का मौसम नज़दीक आ रहा है, लेकिन मूर्ति बनाने वालों को अपने निर्माण के लिए बाज़ार खोजने में दिक़्क़त हो रही है। न्यूज़क्लिक यहाँ एक फ़ोटो निबंध पेश कर रहा है।
निर्मल पोद्दार
25 Aug 2020
मूर्तिकारों

आखिरकार उसने मेरी आंखे बना ही दीं। मैंने धीरे-धीरे उन्हें खोला, लेकिन मै जानता हूं कि कोरोना महामारी के चलते, पिछले साल की तुलना में सब बदल चुका है। एक वर्कशॉप के युवा मूर्तिकार ने अभी-अभी मुझे रंगना शुरू किया था। मुझे यह देखकर अच्छा नहीं लगा कि उसने अपने चेहरे पर मॉस्क नहीं लगाया था। 

इसके बाद मैंने अपने आसपास देखा और असहज माहौल को महसूस किया। मैंने वहां दो किस्म के लोगों को पाया, एक वो जो महामारी को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं, दूसरे वो जो इनसे ठीक उलटा व्यवहार कर रहे हैं।

वर्कशॉप में कुछ ही मूर्तिकार काम कर रहे थे, क्योंकि इस साल बहुत ज़्यादा काम नहीं था। बचे हुए जो लोग काम कर रहे हैं, वह भी एक-दूसरे से दूरी बनाकर चल रहे हैं। हर चीज काफ़ी शांत और उदास लगती है। ना तो रेडियो है, ना ही पुराने गाने चल रहे हैं, ना लोगों में गप्प हो रही है। ना कोई सिगरेट पीने के लिए अब छोटा ब्रेक ले रहा है और ना ही शाम के वक़्त हल्के-फुल्के नाश्ते वाली पार्टियां हो रही हैं। 

मैं मुसीबतों को दूर करने वाला गणेश हूं, यह देखकर मेरा दिल भारी हुआ जाता है कि जो दूसरा व्यक्ति मेरी मूर्ति बनाता है, मुझे लगता है कि अब उसका मुझमें विश्वास नहीं रहा है।

मैं जगदीश पाल को देख रहा हूं, जो 1973 से मूर्ति बना रही इस "विश्वकर्मा शिल्पालय" के मालिक हैं। उनके ज़्यादातर मूर्तिकार कोलकाता से हैं। वह हर साल अपने स्थायी और नए ग्राहकों के लिए मूर्ति बनाते हैं, लेकिन इस साल कहानी कुछ और है।

नए ग्राहकों की छोड़िए, जो स्थायी ग्राहक थे, वे भी इस साल अपनी मूर्तियां नहीं ले रहे हैं। सरकार और नागरिक, कोरोना महामारी के चलते बहुत ज़्यादा सावधानी बरत रहे हैं, हालांकि इस बीमारी के बारे में जागरुकता की अब भी काफी कमी है।

मूर्तिकारों का यह दुख कोई रहस्य नहीं है, लेकिन महामारी से इसमें काफ़ी इज़ाफा हो गया है। यहां-वहां बहुत सारी मूर्तियां पड़ी हुई हैं, जो बाज़ार में जारी संकट की कहानी बयां करती हैं। जगदीश निराश होकर अपने एक साथी कर्मी से अपना दुख बयां कर रहा है, वह कहता है, "अपने बच्चे को इस धंधे में नहीं आने देने का मेरा फ़ैसला बिलकुल सही रहा। अगर वह भी मेरी तरह मूर्तिकार बन जाता, तो उसका हश्र भी मेरे जैसा ही होता। अब जब वह MBA कर रहा है, तो मैं निश्चित होकर यह कह सकता हूं कि वह जीवन में बेहतर करेगा और अपने परिवार को बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष नहीं करने देगा।" फिलहाल मुझे इस भयावह सच्चाई को मानना ही होगा। कुछ दूसरे पेशेवरों की तरह मूर्तिकारों को भी कम पैसा मिलता रहा है और अब इस महामारी ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। 

मूर्तिकार इस बात से अच्छी तरह परिचित हैं कि कोरोना महामारी के प्रसार को रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग और स्वच्छता बेहद जरूरी है। लेकिन मैं उन्हें माचिस की डिब्बी की तरह के रूम में रहते देखता हूं, जिसमें किसी को भी घुटन महसूस होने लगे। एक सुबह मैंने उन सभी को एक ही सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करते देखा, वे सभी एक ही जगह पर दाढ़ी बना रहे थे और नहा रहे थे।

एक दूसरे दिन मैंने देखा कि वह अपना काम खत्म कर, अपने अस्थायी बंकरों में आराम कर रहे थे। ज़्यादातर वक़्त यह लोग अपने चेहरों में पर मास्क नहीं पहनते। उनके मास्क या तो नीचे होते हैं या फिर उनके कान से लटके होते हैं। 

मुझे ऐसा लगता है कि मास्क में काम करते वक़्त इन लोगों को असहज महसूस होता है। इसलिए वे उसे नीचे रखते हैं। यह देखना बेहद दुखदायी है कि जो थोड़ा सा पैसा यह मूर्तिकार कमाते हैं, उसमें वे ना तो खुद के लिए बेहतर जीवन का वहन कर पाते हैं और ना ही अपने काम करने के लिए बेहतर स्थितियां बना पाते हैं। यह लोग अपने घर भी पैसा नहीं भेज पाते हैं।

यह तो बस मेरी मूर्ति बनाने वालों की कहानी है। यह तो बस शुरुआत है, गणेश पूजा के बाद दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा और काली पूजा होती है। मुझे डर है कि इन लोगों का हश्र भी मेरे जैसा ही होगा। लेकिन मूर्तिकारों की आकांक्षा भरी नज़रों से अपनी मूर्तियां बनाते देखने से हमें भी आशा महसूस होती है। मैं उम्मीद करता हूं कि लोग हममें अपना विश्वास नहीं टूटने देंगें, भले ही इस महामारी के साल में हमारी मूर्तियां ना बिक रही हों।

1_27.jpg

2_15.jpg

3_8.jpg

4_9.jpg

5_7.jpg

6_4.jpg

7_2.jpg

 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें। 
 

The Pathos of the Makers

COVID 19
Pandemic
Festivals
Durga puja
Ganesh Chathurthi
shilpkar

Related Stories

दुनिया बीमारी से ख़त्म नहीं होगी

बंगाल : क्या है उस महिला की कहानी, जिसे दुर्गापूजा की थीम बनाया गया है?


बाकी खबरें

  • लव पुरी
    क्या यही समय है असली कश्मीर फाइल को सबके सामने लाने का?
    04 Apr 2022
    कश्मीर के संदर्भ से जुडी हुई कई बारीकियों को समझना पिछले तीस वर्षों की उथल-पुथल को समझने का सही तरीका है।
  • लाल बहादुर सिंह
    मुद्दा: क्या विपक्ष सत्तारूढ़ दल का वैचारिक-राजनीतिक पर्दाफ़ाश करते हुए काउंटर नैरेटिव खड़ा कर पाएगा
    04 Apr 2022
    आज यक्ष-प्रश्न यही है कि विधानसभा चुनाव में उभरी अपनी कमजोरियों से उबरते हुए क्या विपक्ष जनता की बेहतरी और बदलाव की आकांक्षा को स्वर दे पाएगा और अगले राउंड में बाजी पलट पायेगा?
  • अनिल अंशुमन
    बिहार: विधानसभा स्पीकर और नीतीश सरकार की मनमानी के ख़िलाफ़ भाकपा माले का राज्यव्यापी विरोध
    04 Apr 2022
    भाकपा माले विधायकों को सदन से मार्शल आउट कराये जाने तथा राज्य में गिरती कानून व्यवस्था और बढ़ते अपराधों के विरोध में 3 अप्रैल को माले ने राज्यव्यापी प्रतिवाद अभियान चलाया
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक हज़ार से भी कम नए मामले, 13 मरीज़ों की मौत
    04 Apr 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 12 हज़ार 597 हो गयी है।
  • भाषा
    श्रीलंका के कैबिनेट मंत्रियों ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया
    04 Apr 2022
    राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के कारण पैदा हुए आर्थिक संकट से सरकार द्वारा कथित रूप से ‘‘गलत तरीके से निपटे जाने’’ को लेकर मंत्रियों पर जनता का भारी दबाव था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License