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आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसान आंदोलनः ब्राह्मण बनिया राष्ट्रवाद बनाम असली भारत
आज इस देश के राजनीतिक दलों और किसानों दोनों के सामने यह चुनौती है कि वे ब्राह्मण बनिया (कारपोरेट) राष्ट्रवाद के मुकाबले असली भारत का राष्ट्रवाद कैसे विकसित करें?
अरुण कुमार त्रिपाठी
05 Dec 2020
किसान आंदोलन

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार जब पहली बार बनी तो वे संसद में अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे थे। उस बहस में हिस्सा लेते हुए पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने एक मजेदार बात कही। उन्होंने कहा कि वे जाड़ों दिन में एक शादी में गए तो वहां तरबूज खिलाया जा रहा था। किसी ने पूछा कि अरे यह बेमौसम तरबूज कहां से आ गया। उसी तरह संसद में यह बेमौसम अविश्वास प्रस्ताव कैसे आ गया? उनका यह चुटकुला संसदीय गलियारे और पत्रकारीय लेखन में काफी दिनों तक चला। आज कुछ वैसी ही स्थिति नरेंद्र मोदी सरकार के साथ हो रही है। मोदी जी का दिग्विजयी राष्ट्रवाद कश्मीर से लेकर हैदराबाद तक, पटना से लेकर बनारस तक पूरे भारत में जब जोर शोर से चल रहा था तब अचानक दिल्ली को घेरने पंजाब के किसान कहां से आ पहुंचे? यह हुई न बेमौसम तरबूज की बात।

दरअसल संघ और भाजपा के ब्राह्मण बनिया राष्ट्रवाद और किसानों और मजदूरों के असली भारत के राष्ट्रवाद का विरोधाभास देव दीवाली और गुरु नानक जयंती यानी प्रकाश पर्व के दिन दो चित्रों के माध्यम से स्पष्ट दिखा। एक ओर पंजाब के किसान पुलिस द्वारा सड़क पर लगाई जाने वाली मुंडेर को उखाड़ कर बनाई गई बाड़ पर मोमबत्तियां लगा रहे थे और कुछ किसान अपने ट्रैक्टरों के पुआल पर बैठक कर पैर लटकाए चाय पी रहे थे तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस में अंधेरे में सो रही गंगा पर चारों ओर तेज रोशनी फेंकते और शोर मचाने वाले एक भव्य क्रूज पर सवार होकर देव दीवाली का आनंद ले रहे थे। साफ साफ लग रहा था कि भारत में दो प्रकार के आख्यान चल रहे हैं और उसे समझे बिना न तो आज की समस्याओं को समझा जा सकता है न ही नए भारत का निर्माण किया जा सकता है।

एक ओर संघ और भाजपा का ब्राह्मण बनिया राष्ट्रवाद है जिसमें एक राष्ट्र एक बाजार, एक राष्ट्र एक टैक्स, एक राष्ट्र एक विधान एक निशान, एक राष्ट्र एक एक चुनाव और एक राष्ट्र एक संस्कृति का आक्रामक आख्यान चल रहा है। जिस प्रकार भारतीय जनता पार्टी और उससे गठजोड़ करने वाली पार्टियां तमाम राज्यों और स्थानीय निकायों के चुनावों में कामयाबी पा रही हैं उससे लगता भी है कि उनका आख्यान चल निकला है और देश के पूंजीपतियों, मध्यवर्ग और बहुसंख्यक समाज ने उसे स्वीकार करने की ठान ली है।

शायद यही वजह है कि कोराना के संकट ग्रस्त काल में एनडीए की सरकार कथित कृषि कानून, श्रम सुधार और उदारीकरण के दूसरे उपायों पर तेजी से काम कर रही है। वह बहुत सारे सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश करने का सिलसिला भी तेज किए हुए है। उनके शब्दों में `राष्ट्र के साथ धोखा’ करने वाली कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार भी उदारीकरण कर रही थी लेकिन हकीकत यह है कि वह उतनी तेजी से नहीं कर पा रही थी जितनी तेजी से मोदी सरकार कर रही है। भारत में उदारीकरण के प्रणेता समझे जाने वाले डॉ. मनमोहन सिंह भी आर्थिक सुधार कर रहे थे लेकिन वे न तो अपने को गंगाजल की तरह पवित्र बता रहे थे और न ही उनकी नीतियों का विरोध उनका विरोध माना जाता था। डॉ. मनमोहन सिंह एक अर्थशास्त्री के तौर पर उदारीकऱण की नीतियों के समर्थक थे लेकिन वे उसका कट्टरता से प्रचार नहीं करते थे और उसे सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू से जोड़ते नहीं थे।

आज उल्टा हो गया है। एनडीए सरकार की सारी आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक नीतियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का हिस्सा हो गई हैं। मोदी के समर्थक उन नीतियों का आंख मूंद कर समर्थन करते हैं और उन नीतियों का विरोध करने वाले को मोदी का दुश्मन और विरोधी मानते हैं। इतना ही नहीं वे लोग विरोधियों को राष्ट्रद्रोही और अलगाववादी कहने से भी नहीं चूकते। प्रधानमंत्री भी सभी नीतियों को अपने व्यक्तित्व और साख से जोड़कर ही प्रस्तुत करते हैं। जैसे वे यह नहीं मानते कि वे कभी गलत हो सकते हैं वैसे ही उनके समर्थक भी नहीं मानते कि उनकी नीतियां कभी गलत हो सकती हैं। विडंबना यह है कि वित्तीय पूंजीवाद के वैश्वीकरण के गर्भ से निकली उदारीकरण की सभी नीतियों को हिंदुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और नरेंद्र मोदी के करिश्मा का हिस्सा बना दिया गया है।

लेकिन उन नीतियों के भीतर जाकर देखें तो वे वास्तव में इस देश में अस्सी के दशक में पछाड़ खाते ब्राह्मण बनिया राष्ट्रवाद का हिस्सा हैं। यहां बनिया के लिए कारपोरेट शब्द का प्रयोग भी किया जा सकता है। उस राष्ट्रवाद को सारी दिक्कत तब खड़ी हुई जब मंडल आयोग और आंबेडकरवादी आंदोलन के बहाने एक नया भारत उभरने लगा। ध्यान देने की बात है कि राजीव गांधी के शासन के आखिरी वर्षों में यानी 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसान आंदोलन भी दिल्ली में बेकरार दस्तक देने लगा था। उस किसान आंदोलन की जड़ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सरकारी बैंकों के कर्ज से तेज हुई हरित क्रांति के अव्यवहारिक होने के कारण पैदा किसानों का आक्रोश था। किसान ट्रैक्टर का कर्ज नहीं दे पा रहे थे, बिजली का बिल नहीं चुका पा रहे थे, इसलिए वे पंपिंग सेट का इंजन लगाकर जुगाड़ चलाने लगे थे और बिजली का बिल माफ करने की मांग कर रहे थे। उस जुगाड़ पर रजिस्ट्रेशन नंबर की जगह जय बाबा टिकैत और बम बम भोले लिखा रहता था।

उस समय उपभोक्तावाद से निकला दिल्ली का मध्यवर्ग भी किसानों के बोट क्लब पर दिए जाने वाले धरने को कोस रहा था और उसे संतोष देने के लिए दिल्ली पुलिस रात भर किसानों के धरना स्थल के चारों ओर तेज संगीत बजाती थी ताकि वे सो न सकें। लेकिन किसानों और खेती के सामने असली चुनौती उदारीकरण ने और कृषक संस्कृति के समक्ष असली चुनौती हिंदुत्व ने प्रस्तुत की। वैसे तो हिंदुत्व का प्रयास लंबे समय से चल रहा था लेकिन हिंदी इलाके में उसकी तीव्र प्रतिक्रिया तभी प्रासंगिक हुई जब मंडल आयोग की रपट आई और आंबेडकरवादी आंदोलन का उभार हुआ। मंडल और आंबेडकरवादी आंदोलन के पीछे शूद्र जातियों की सत्ता और नौकरियों में भागीदारी की आकांक्षा थी और उसे ब्राह्मण बनिया वर्ग सह नहीं सका। ध्यान देने की बात है कि एक ओर आरक्षण के आंदोलन चल रहे थे, टिकैत का बिजली का बिल माफ कराने का आंदोलन चल रहा था और दूसरी ओर अगर आडवाणी की रथयात्रा थी तो जगह जगह अयोध्या में राममंदिर के लिए शिला पूजन का कार्यक्रम। इस विश्लेषण में ज्यादा अतिरेक नहीं है कि सरकारी नौकरियों में बढ़ते आरक्षण से नाराज सत्ताधारी सवर्ण वर्ग ने निजीकरण की प्रक्रिया तीव्र की। ताकि उन्हें हाई पैकेज की नौकरियां मिलें और पिछड़ा दलित वर्ग नौकरियों में सिर्फ प्रतीकात्मक भागीदारी पाकर रह जाए।

आज जब संघ परिवार यह आख्यान तेजी से चला रहा है कि यह देश गाय, गंगा और गीता से चलेगा तो उसे बहुसंख्यकवाद से जोड़ने के लिए कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाया गया, केवल असम के लिए बनाए गए सीएए एनआरसी को पूरे देश में लागू कर दिया गया और अब लव जेहाद का कानून लाने के साथ और शहरों के पुराने नाम बदलने का सिलसिला चल निकला है। ऐसे में जाति उन्मूलन की बजाय जाति की राजनीति तक सिमट गए समाजवादी और वर्ग की मार्क्सवादी अवधारणा को भारत के संदर्भ में लागू करने में दिक्कत महसूस कर रहे कम्युनिस्ट अप्रासंगिक होने लगे। कम्युनिस्टों ने किसानों और मजदूरों की राजनीति में अपना आधार बनाया था और केरल, बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में भूमि सुधार और ट्रेड यूनियन की राजनीति के माध्यम से लंबे समय तक शासन भी किया। जबकि पिछड़ी जातियों को आरक्षण के आधार पर सत्ता में आने वाले समाजवादी भी समय समय पर सत्ता में आते जाते रहे पर उन्होंने भूमि सुधार नहीं किया और फिर अपने को परिवारवाद में पतित कर लिया। लेकिन आंदोलन और क्रांति की लंबी वैचारिक विरासत से जुड़े होने का दावा करने वाले कम्युनिस्ट और समाजवादी, एक ओर वैश्वीकरण तो दूसरी ओर बहुसंख्यकवाद की राजनीतिक आंधी में, अपने को संभाल नहीं सके। इन दोनों प्रक्रियाओं ने मिलकर मध्यवर्ग में उसकी सहानुभूति मिटा दी तो सत्ता में हिस्सेदारी के लिए उभरी मध्य और दलित जातियां बहुसंख्यकवाद के आख्यान में बह गईं।

हिंदुत्व ने धर्म, राष्ट्र और कारपोरेट का ऐसा काकटेल बनाया कि उसके नशे में समाज का बड़ा हिस्सा झूमने लगा और समता और सद्भाव की राजनीति करने वाले अप्रासंगिक हो गए। लेकिन आज किसानों और मजदूरों के आंदोलन ने देश के सामने एक नया आख्यान पैदा किया है। वह आख्यान साफ कहता है कि राष्ट्र अयोध्या के मंदिरों, बनारस के घाटों और मथुरा की गलियों में नहीं रहता। वह खेतों, खलिहानों और फैक्टरियों में रहता है और जब उसे सताया जाएगा तो वह हाईवे पर गद्दा रजाई डालकर बैठ जाएगा और लंगर लगा लेगा। इस बात को अब समाजवादी और साम्यवादी भी समझने लगे हैं कि किसान आंदोलन को बड़े किसान और छोटे किसान के आंदोलन और किसान मजदूर के आंदोलन में बांट कर देखना आंदोलन पर आधारित एक राष्ट्रीय राजनीति के लिए कितना घातक है। इसीलिए 26 नवंबर यानी संविधान दिवस के दिन देश भर के किसान मजदूर आर्थिक संकट और उसे बढ़ाने वाले आर्थिक सुधार के विरुद्ध एकजुट होकर सामने आए हैं।

निश्चित तौर पर पंजाब के किसान जैसे हैं, वैसे उत्तर प्रदेश में नहीं हैं। अगर वैसे होते तो वे यूपी में नौकरी करने आते न कि यूपी बिहार के लोग वहां मजदूरी करने जाते। उत्तर प्रदेश में जैसे किसान हैं वैसे बिहार में नहीं हैं, जैसे किसान पश्चिम बंगाल में हैं, वैसे मध्य प्रदेश में नहीं हैं और महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के किसानों के सामने पानी और बाजार का संकट अन्य राज्यों के मुकाबले अलग है। लेकिन जोत के अलग अलग रकबे, अलग अलग जलवायु और भिन्न भिन्न फसलों और बाजार और मवेशियों के कारण किसानों की चिंताएं भी अलग हैं। वह बंटा हुआ है। लेकिन धन्यवाद देना चाहिए एनडीए सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों का कि उन्होंने एक देश एक बाजार का नारा देते हुए कारपोरेट के लिए पारित किए गए तीन कानूनों को किसानों के सबलीकरण और कृषि उत्पादों के विपणन का नाम देकर उन्हें एकजुट होने के लिए मजबूर कर दिया। जो किसान नब्बे के दशक में पैदा हुए जबरदस्त कृषि संकट और लाखों आत्महत्याओं के कारण हरकत में आए थे लेकिन एक नहीं हो पाए थे वे अब हिंदुत्व और कारपोरेट के हमले के कारण एक हो रहे हैं। किसान समझ गया है कि ब्राह्मण बनिया राष्ट्रवाद अहंकारी है और उससे पार पाना है तो लड़ना ही होगा।

पंजाब के किसानों ने अपने प्रतिरोध से यह जता दिया है कि किसान न तो मोदी, योगी और अमित शाह का डंडा खाने के लिए बने हैं और न ही धर्म के नाम पर अपनी खेती और विवेक गिरवी रखकर वोट देने के लिए हैं। इस देश के किसानों ने राष्ट्रवाद का आख्यान विकसित करने में अपना संघर्षपूर्ण योगदान दिया है और इन्हीं आंदोलनों के कारण देश में समतामूलक लोकतंत्र कायम हुआ है। पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन, चंपारण आंदोलन, बारडोली आंदोलन, अवध का किसान आंदोलन अगर न होते तो भारत का राष्ट्रीय आख्यान खड़ा न हो पाता। आजादी के बाद भूमि सुधार के लिए तेभागा और जैसे तेलंगाना और बोधगया जैसे आंदोलन न होते तो जमींदारी न टूटती।

कृषक संस्कृति स्वाभिमानी है और वह सही मायने में आत्मनिर्भर है। इस सरकार ने किसानों के खाते में सीधे कैश ट्रांसफर की योजना शुरू की और उससे बहुत सारे किसान खुश भी हैं। लेकिन ऐसी योजनाओं के बारे में किसानों और आदिवासियों के लिए शास्त्र विकसित करने में लगे डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा कहते थे कि यह सब उन्हें लाचार और भिखमंगा बनाने के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रम हैं। दरअसल किसान को उनका हक मिलना चाहिए और वह हक एक यूनिवर्सल बेसिक इनकम दिए बिना नहीं दिया जा सकता। वे कहते थे कि किसानी का मोल कुशल कारीगरी से कम नहीं होना चाहिए। वे यह भी कहते थे कि भारत में छह लाख गांव हैं। शहरी अर्थव्यवस्था ने हर गांव से कम से कम एक करोड़ रुपए का शोषण किया है। अगर उन गांवों को छह लाख करोड़ रुपए वापस दे दिए जाएं तो उनकी स्थिति सुधर जाएगी।

आज इस देश के राजनीतिक दलों और किसानों दोनों के सामने यह चुनौती है कि वे ब्राह्मण बनिया राष्ट्रवाद के मुकाबले असली भारत का राष्ट्रवाद कैसे विकसित करें? चाहे एमवाई समीकरण में उलझी हुई पार्टियां हों या कम्मा रेड्डी या वोकलिंग लिंगायत के समीकरणों में फंसी पार्टियां हों। चाहे जाटव नीत पार्टी हो या फिर अल्पसंख्यकों को एकजुट करने में लगी पार्टियां हों। उन सभी को सोचना होगा कि अपने संकीर्ण और अप्रासंगिक हो रहे दायरे से बाहर निकल कर किसानों मजदूरों की राजनीति पर ध्यान दें। किसान इस देश की सबसे बड़ी आबादी है और शायद वह हिंदुओं से कम नहीं है। इस बात को जातियों के वोट बैंक पर टिके अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव को भी समझना होगा। किसान तबके की एक राष्ट्रीय उपस्थिति भी है और तीव्र शहरीकरण के बावजूद उसका बड़ा मतदाता मंडल लंबे समय तक रहेगा। इसी को संगठित करके ही ब्राह्मण बनिया (कारपोरेट) राष्ट्रवाद का जवाब दिया जा सकता है। इसी तरह किसानों को भी सोचना होगा कि मंडी परिषद और कारपोरेट के अधिपत्य का खतरा सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं है। वह कहीं बाजार के रूप में, कहीं जमींदार के रूप में तो कहीं पर्यावरण के रूप में पूरे देश में मौजूद है। जहां कम है वहां बढ़ेगा और किसानों को खत्म करने पर जोर देगा। उन सभी के साथ इस देश की एक कृषक संस्कृति भी है जो सांप्रदायिक नहीं है। उसमें जातिवाद जरूर है लेकिन उसके पास उससे निपटने के तरीके भी हैं।

अभी खेती में बदलाव के लिए नए नए कानून पास होंगे। अगर किसान आज सो गए तो वे उनकी गठरी उठा ले जाएंगे। इसलिए असली भारत के इस राष्ट्रवादी आख्यान को समझा जाना चाहिए और उसे विमर्श में लाया जाना चाहिए। दिल्ली के चारों ओर डेरा डालकर किसानों ने उसका संकेत दे दिया है। जो लोग किसानों पर रास्ता रोकने का आरोप लगा रहे हैं उन्हें याद करना चाहिए कि अयोध्या आंदोलन के बहाने उन्होंने दो दशकों में क्या क्या नहीं किया है। इस किसान आंदोलन में भगत सिंह का जोश है तो महात्मा गांधी का होश भी है। महात्मा गांधी के राष्ट्रवाद पर ब्राह्मण बनिया प्रभाव था लेकिन वे उसके घेरे को निरंतर तोड़ना चाहते थे और उसे तोड़ते हुए ही उनकी हत्या हुई। इस आंदोलन एक स्थानीयता भी है तो एक वैश्विक रूप भी है। वह शालीन भी है साहसी भी। वह उस मीडिया को भी पहचानता है जिसने वर्षों पहले खेती को कवर करना छोड़ दिया है और सरकार की गोद में बैठकर हिंदू मुसलमान कर रहा है। किसानों के आक्रोश से उभरता यही नया भारत है और इसी से उसका लोकतंत्र और धार्मिक सद्भाव बचेगा, नागरिक अधिकार बचेंगे और समता व समृद्धि आएगी।  

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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