NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसान आंदोलन: कानून व्यवस्था के नाम पर संघीय गणराज्य के टुकड़े टुकड़े हो रहे हैं
किसान और मजदूर का सड़क पर आना उस संविधान और लोकतन्त्र की नींव का अपनी जगह से हिलना है जिसकी बुनियाद पर इस राष्ट्र राज्य का गठन हुआ था।
सत्यम श्रीवास्तव
27 Nov 2020
किसान आंदोलन
Image courtesy: New Indian Express

गुरुवार से ही देशव्यापी किसान आंदोलन की विभिन्न तस्वीरें यत्र तत्र और सर्वत्र दिखलाई दे रही हैं। संचार के लगभग सभी ‘सरकारी’ और जन माध्यमों में तस्वीरें भले एक जैसी हों पर उनके पीछे विश्लेषणों में भारी अंतर है और यह अंतर असल में बीते 6 सालों में देश की मनोवैज्ञानिक या राजनैतिक अखंडता को खंड -खंड कर दिये जाने के ठोस प्रमाण हैं।

तमाम मामलों में मत भिन्नताओं के बावजूद किसान और मजदूरों के हितों को लेकर देश में हर तबके में एक न्यूनतम सहमति रही हैं और प्राय: यह सहमति सहानुभूति में भी प्रकट होती रही है क्योंकि यह मान्यता कई पीढ़ियों में में गहरे बनी रही कि ये दोनों ही वर्ग देश की नींव हैं।

मामला चाहे लोकतन्त्र में संख्या को लेकर हो या इन पेशों से जुड़ाव को लेकर हो या अर्थव्यवस्था की पक्की नींव को लेकर हो सरकारें इनके हितों को अनदेखा करने का जोखिम नहीं उठा पाती थीं। तत्कालीन विपक्ष भी स्वत: इनके साथ इसलिए आ जाता था कि क्योंकि यह भी एक लोकतान्त्रिक रस्म जैसी रही है। विपक्ष उन सभी के साथ दिखलाई देता था जो सड़कों पर है। माना जाता रहा है कि विपक्ष का एक पाँव संसद में और एक पाँव सड़क पर होता है या होना चाहिए।  

किसान और मजदूर का सड़क पर आना उस संविधान और लोकतन्त्र की नींव का अपनी जगह से हिलना है जिसकी बुनियाद पर इस राष्ट्र राज्य का गठन हुआ था। ऐसे मौकों पर तमाम राजनैतिक दल जन प्रतिनिधि होने के नाते संविधान पर आधारित देश की प्रतिनिधि संसदीय लोकतन्त्र को दरकने से बचाने को अपनी प्राथमिक ज़िम्मेदारी मानते थे।

जब भी कोई आंदोलन सत्ता के किसी निर्णय के खिलाफ होता है उसमें विपक्ष की जगह आंदोलनकारियों के साथ अनिवार्यता होती है। उस सूरत में भी जब विपक्ष के रहते हुए सरकार द्वारा अपने स्तर पर (अध्यादेश लाकर) या संसद में ऐसे कानून या सरकार के निर्णय को रोक पाने में वह कामयाब नहीं रहता। यहाँ तक कि संसद में अपनी जनता के हितों से समझौता कर लेने के बाद भी एक पोलिटिकल जेसचर  के लिए भी विपक्ष इन आंदोलनों में दिखलाई देता रहा है।

इस बार छह साल पहले शुरू हुई उसी परिपाटी को सरकारी मीडिया ने बार-बार स्थापित करने की कोशिश की है। भले ही विपक्ष इन किसान मजदूरों के साथ सड़क पर नहीं दिखलाई दिया लेकिन इस पूरे आंदोलन को मीडिया ने विपक्ष के उकसावे और उसी के साजिश के तौर पर स्थापित किया। ऐसे में शायद एक व्यावहारिक सोच विपक्ष के तन्ने ये भी रही हो कि क्यों ख्वामखाँ एक स्वत:स्फूर्त आंदोलन को बदनाम होने दिया जाए और इससे दूरी बनाए रखने से ही आंदोलन की पवित्रता और उसकी गंभीरता बचाई जा सकती है।

मीडिया ने बार बार इस आंदोलन को विपक्ष की ‘खालिस्तानी साजिश’ से जोड़कर दिखलाया। क्या वाकई ऐसा है? अगर देश में विपक्ष इतना ही मजबूत है कि वो सीधा प्रभावित आबादी को सर पर कफन बांधकर सड़कों पर उतार सकता है, बिना खुद उतरे, तो ऐसा क्या है कि वो सत्ता से बार बार दूर रह जाता है? किसी आन्दोलन को प्रायोजित या उकसावा बताने के लिए मीडिया का बिकाऊ होने से ज़्यादा जरूरी है उसकी सत्ता में सीधे भागीदारी। आज का मीडिया बिकाऊ या सत्तापरस्त नहीं है बल्कि पूरे होशोहवाश में सत्ता में भागीदार है।
 
यह मीडिया भूल रही है कि हाल ही में इन्हीं किसानों ने दशहरे के अवसर पर परंपरागत ढंग से रावण के पुतले जलाने के बजाय मोहन भागवत, मुकेश अंबानी, गौतम अडानी,नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं के पुतले जलाए। मौजूदा सत्ता के तमाम भागीदारों की इतनी गहरी समझ रखने वाले किसानों को किसी के बहकावे में या किसी से प्रायोजित होने की ज़रूरत अब नहीं रह गयी है। इन्हीं किसानों ने अडानी के पेट्रोल पंप भी घेरे हैं। देश में पंजाब के किसानों ने कॉरपोरेट और सांप्रदायिक शक्तियों के गठजोड़ से बनी सत्ता के चरित्र का जिस आसान भाषा में तर्जुमा किया है वह विरले ही देखने को मिलता है। ये किसान बखूबी जानते हैं कि खुद ये भाजपा सरकार कहाँ से प्रायोजित रही है।

खलिस्तान आंदोलन से जोड़कर किसानों की जायज़ मांगों को राजद्रोह की श्रेणी में झोंकने की साज़िशन रिपोर्टिंग का एक सफल प्रयोग दोहराया गया है जो भीमा कोरेगाँव और दिल्ली दंगों के दौरान रिपोर्टिंग की गयी। देश में पैदा हो रही कानून-हीनता वा न्याय-हीनता की परिस्थितियों में मुखर नागरिकों की आवाज़ दबाने के लिए यह प्रयोग यहाँ भी दोहराया गया।
 
अगर ये आंदोलन वाकई खालिस्तान आंदोलन से प्रभावित है, या नक्सल आंदोलन से प्रभावित व उनसे प्रायोजित हैं तो मीडिया को यह भी समझ रखना ज़रूरी है कि वो इस तरह वाटर कैनन के प्रकोप न झेल रहे होते और दिल्ली उनके लिए इस कदर दूर न होती।

सवाल है कि उकसाने की राजनीति या साजिश क्या खुद मीडिया नहीं कर रहा है? जिन सवालों का सामना मीडिया के मार्फत सरकार को करना चाहिए वो सवाल किसी और ही रंग में ढलकर वापिस आंदोलनकारियों पर थोप दिये जा रहे हैं। हालांकि 2014 के बाद से ही मीडिया में यह चलन शुरू हो गया था। जो अब अपने शबाब पर है।

आंदोलन की रिपोर्टिंग और विभिन्न राज्यों द्वारा अपनी अपनी सीमाओं पर की गईं कार्यवाहियों से एक संदेश यह भी दिया है कि जैसे भारत एक गणराज्य के रूप में खुद को स्वरूप नहीं दे पाया है। राज्यों ने जिस तरह से अपनी अपनी भौगोलिक सीमाओं पर चाक- चौबन्द व्यवस्था की और जिस तरह से पड़ोस के राज्य से आने वाले नागरिकों के साथ बर्ताव किया वह एक गणतन्त्र के तौर पर हाल की तमाम ऐसी घटनाओं में सबसे ज़्यादा चिंताजनक है। सीमाओं का यह बंटवारा भौगोलिक होने के साथ -साथ विशुद्ध रूप से दल गत हो चुका है। चूंकि हरियाणा या उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं और किसानों का आंदोलन में केंद्र में बैठी भाजपा के खिलाफ है इसलिए वो इन्हें दिल्ली तक पहुँचने नहीं देंगीं।

राजनैतिक दलों के आधार पर देश की जनता का ऐसा विभाजन लोकतन्त्र के लिए कितना घातक है इसकी कल्पना अभी नहीं की जा रही है या इसे उतना तवज्जो नहीं दिया जा रहा है। आने वाले समय में यह दल गत और प्रशासनिक विभाजन देश की अखंडता के लिए कितना बड़ा खतरा हो सकता है इसे लेकर भी कोई दृष्टि अभी बनती नहीं दिखलाई नहीं देती है।

क्या हरियाणा या उत्तर प्रदेश की सरकारों ने अपनी पुलिस लगाकर राजस्थान या पंजाब जैसे राज्यों के किसानों को अपने राज्य की सरहदों को पार करने से इसलिए भी रोका क्योंकि वो किसान ऐसे राज्यों से आ रहे थे जहां विपक्षी दल की सरकारें हैं? अगर ऐसा है और जो साफ दिखलाई पड़ रहा है तो ऐसे में उस संघीय गणराज्य की नींव में मट्ठा डालने का काम इन सरकारों ने पूरे होश में किया है। जब विभाजनकारी ताकतों की सूची बनाई जाये तो इन राज्य सरकारों को सबसे पहले रखा जाना चाहिए।

कल के आंदोलन में बड़े पैमाने पर बड़ी संख्या में महिला किसानों ने शिरकत की जो मजबूत होते लोकतन्त्र की खूबसूरत तस्वीर रही। झुकी कमर से चलती एक वृद्ध महिला किसान की तस्वीर ने इस बात को फिर पुख्ता किया कि जब तानाशाही के सामने सब झुक रहे हों तो तब अपनी वय और बोझ से दबी एक महिला उसका सामना करने निकल पड़ती है। यही तस्वीर हमें शाहीन बाग के आंदोलन में दिखलाई दी और ऐसी ही तस्वीर कल शाया हुई।

पुलिस की वाटर कैनन को बंद करके अपनी ट्राली पर कूदते एक बाँके जवान की तस्वीर और वीडियो भी कल सोशल मीडिया की सनसनी बना रहा। पत्रकार साथी मंदीप पुनिया ने उनसे साक्षात्कार भी किया। इस हीरो का नाम नवदीप है और जिसे पंजाब के हौसलेवान नौजवान का प्रतीक कहा जा रहा है और जिसके भरोसे यह कहा जा रहा है कि पंजाब के हौसलेवान नौजवान अपनी मिट्टी का सौदा नहीं करेंगे। कई जगहों पर इसी तरह के युवा किसानों ने अपनी ट्रैक्टर के ज़ोर पर बैरिकेट पीछे धकेल दिये तो कहीं उन्हें उठाकर नदी में फेंक दिया गया।

कुछ जगहों पर जहां मिट्टी, रेट और पत्थरों से भरे ट्रक सड़क पर बेतरतीब ढंग से पुलिस ने लगा दिये थे उसे किसानों ने अपने सामूहिक ताकत से पीछे धकेल दिया। ये दृश्य, ताकत और अपनी बात पर भरोसे और अपने साथ हो रहे अन्यायों के प्रतिकार के वो मौके थे जिन्हें इतिहास में बहुत ऊंचे पायदान पर जगह मिलने जा रही है।

Dili Chalo Farmers Protest Delhi
Farmers Attacked Haryana
Police Farmers Clash
Water Canon Farmers
general strike
November 27 Protest
Farmers Protest Haryana
BJP
Punjab Farmers

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

पंजाब: आप सरकार के ख़िलाफ़ किसानों ने खोला बड़ा मोर्चा, चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर डाला डेरा

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?

NEP भारत में सार्वजनिक शिक्षा को नष्ट करने के लिए भाजपा का बुलडोजर: वृंदा करात


बाकी खबरें

  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    'राम का नाम बदनाम ना करो'
    17 Apr 2022
    यह आराधना करने का नया तरीका है जो भक्तों ने, राम भक्तों ने नहीं, सरकार जी के भक्तों ने, योगी जी के भक्तों ने, बीजेपी के भक्तों ने ईजाद किया है।
  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License