NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
'नीति और राजनीति' : लगातार पड़ताल से सत्ता की अनीति उजागर करने की कोशिश
पुस्तक समीक्षा : इस पुस्तक में भाजपा की अंदरूनी उठापटक का ब्योरा प्रमाणिक रूप से सामने आता है। क्योंकि राम बहादुर राय पिछले करीब 50 सालों से किसी न किसी रूप में भारतीय जनता पार्टी पर करीबी नज़र बनाए हुए हैं।
राकेश सिंह
01 Mar 2020
पुस्तक समीक्षा

'नीति और राजनीति' किताब जनसत्ता में प्रकाशित होने वाले पड़ताल स्तंभ में राम बहादुर राय के 1998 से 2004 के बीच के लेखों का संग्रह है। वह ऐसा समय था, जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में गठबंधन सरकार थी और कांग्रेस की बागडोर को सोनिया गांधी ने संभाल लिया था। मौजूदा दौर में राजनीति, सत्ता, कारपोरेट और मीडिया की जिन विकृतियों की चर्चा सरेआम है, एक पीढ़ी पहले ही उसे भांपकर बेबाकी से उजागर करने का काम कुछ पत्रकारों और संस्थानों ने किया था। इन लेखों में जिस पैने और धारदार ढंग से सरकार, राजनेताओं और नौकरशाही के कामों का विश्लेषण किया गया है, वह मौजूदा मुख्यधारा की माडिया में दुर्लभ है।

उसी दौर में तहलका कांड से लेकर कारगिल घुसपैठ और ताबूत घोटाले जैसे मामले सामने आए थे। केंद्रीय सत्ता में पहली बार आने के बाद भारतीय जनता पार्टी में जिस तरह से बदलाव हो रहे थे, रामबहादुर राय के लेखों में उसका गहरा विश्लेषण देखने को मिलता है। चाल, चरित्र और चेहरे के बल पर सबसे अलग पार्टी होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूब गई थी। उसे इन लेखों में पूरी निर्ममता से उजागर किया गया है।

सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने स्वदेशी के अपने नारे से किनारा कर लिया था। इसका विस्तार से वर्णन एक लेख में किया गया है, जिसका नाम है- "गोविंदाचार्य के सवाल टाले नहीं जा सकते"। भाजपा सरकार ने वैश्वीकरण के सभी पक्षों को गले लगा लिया था। जिसका चौतरफा नुकसान देश को हो रहा था। संघ और भाजपा के बीच स्वदेशी और वैश्वीकरण के मुद्दों पर पैदा हुए मतभेद को अगर सही परिपेक्ष में समझना है, तो इस पुस्तक को पढ़ना जरूरी है। इससे साफ पता चलता है कि क्यों गोविंदाचार्य को भाजपा छोड़नी पड़ी और वे राजनीति से बाहर हो गए। भारतीय जनता पार्टी के सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत से भटकने पर रामबहादुर राय ने इस व्यक्ति केंद्रित राजनीति को आईना दिखाया है।

इस पुस्तक में आपको पता चलेगा कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर वैश्वीकरण और उदारीकरण की लगातार छूट दिए जाने से कितने परेशान रहते थे। इसे रोकने के लिए कुछ बड़ा काम करने की उनकी मंशा मन में ही रह गई। चंद्रशेखर का साफ मानना था कि देश में आर्थिक हस्तक्षेप की इजाजत देने के बाद धीरे-धीरे विदेशी शक्तियां भारत की राजनीतिक व्यवस्था में भी हस्तक्षेप करने का प्रयास करेंगी।

कारगिल लड़ाई के दौरान भारत सरकार अपने पौरुष और आत्म-संयम का प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए अमेरिका की ओर देख रही थी। अमेरिका ने कहा कि नियंत्रण रेखा पार मत करो और उसने मान लिया। जबकि इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश युद्ध के दौरान अमेरिकी धौंस की जरा भी परवाह नहीं की थी और सीधी कार्रवाई की। इसके उलट अटल बिहारी वाजपेई की सरकार कारगिल के समय आत्म-नियंत्रण कर रही थी। इस पुस्तक में पोखरण परमाणु परीक्षण और कारगिल घुसपैठ के समय कांग्रेस की दुविधा का जो वर्णन है उससे साफ है कि पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान पर हुए हवाई हमले के समय कांग्रेस का रूख क्यों स्पष्ट नहीं था। कांग्रेस हमेशा इस तरह की दुविधाओं में घिरी रहती है।

तहलका कांड के बाद प्रकाशित एक लेख में साफ कहा गया कि अटल बिहारी बाजपेई नैतिक जिम्मेदारी लें और इस्तीफा दें। क्योंकि लोगों को उम्मीद थी कि भाजपा, कांग्रेस सरकार के काले कारनामों को नहीं दोहरायेगी। वाजपेई सरकार के इस कदम से लोगों को गहरा धक्का लगा है। लेख में ये जायज भी सवाल उठाया गया है कि अगर खोजी पत्रकारिता की संभावनाएं सिकुड़ने लगे तो क्या प्रायोजित जासूसी ही सच को सामने लाने का एकमात्र उपाय बचा रह गया है।

इस पुस्तक में भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी उठापटक का ब्योरा प्रमाणिक रूप से सामने आता है। क्योंकि राम बहादुर राय पिछले करीब 50 सालों से किसी न किसी रूप में भारतीय जनता पार्टी पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

नेताओं के महिमामंडन के खोखलेपन को पहली नजर में ही भांपकर वे कहते हैं कि देश को नकली और बनावटी विकास पुरुष या लौह पुरुष की जरूरत नहीं है। देश को वास्तविक और प्रामाणिक काम करके दिखाने वाले नेतृत्व की उम्मीद हमेशा रहती है। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच के मनगढ़ंत विवाद से मीडिया को गुमराह करने की सरकार की मंशा को वे बखूबी सामने लाते हैं। सरकार का काम इस तरह के विवाद मीडिया में फैलाते रहना है, जिससे असली मुद्दे कहीं न कहीं की दब जायें और गैर जरूरी मुद्दों पर मीडिया अपना समय और साधन बर्बाद करती रहे। नेता कभी-कभी ऐसे बयान उछालते हैं, जिनका कोई मतलब नहीं होता है। फिर कुछ दिन बाद वे उनका खंडन कर देते हैं। तब तक मीडिया का पूरा ध्यान उसी में भटकता रहता है।

तीसरे मोर्चे से जुड़े घटक दलों के आपसी उठापटक और नेतृत्व हासिल करने की महत्वाकांक्षा के बारे में विस्तार से इस पुस्तक में चर्चा है। संभावनाएं होने के बावजूद ये नेता निजी अहंकार के कारण देश को एक सही नेतृत्व उस समय नहीं दे सके, जब उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी। अगर तीसरे मोर्चे के नेता अपने निजी हित-अहित को परे रखकर एक कठिन दौर में देश की जनता के लिए आगे आने का फैसला लेते तो, जनता उनको समर्थन देने के लिए तैयार थी।

इस पुस्तक में मीडिया द्वारा किए जाने वाले चुनाव सर्वेक्षणों की असलियत और उनकी विश्वसनीयता को भी उजागर किया गया है। ये चुनाव सर्वेक्षण किसी पार्टी विशेष के पक्ष में हवा बनाने का काम करते हैं। सर्वे के बहाने पार्टियों को हराने और जिताने के खेल चलते रहते हैं। एपीजे अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति चुने जाने के बहाने राय ने महत्त्वपूर्ण पदों के लिए अराजनीतिक लोगों को आगे करने की बढ़ती प्रवृत्ति के खतरे की तरफ भी ध्यान दिलाने की कोशिश की है।

जिस तरह से अटल बिहारी वाजपेई की सरकार एक समय कांग्रेस के भीतरी तालमेल से चल रही थी, उस पर भी साफ कटाक्ष किया गया है। जब 2003 में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार के खिलाफ एक अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था तो कई लोगों को उस पर भरोसा नहीं हो रहा था। यह भी स्पष्ट किया गया कि केवल जनता को गुमराह करने के लिए इस तरह की नूरा कुश्ती की जाती है।

"साफ है कि सत्ता और विपक्ष में गहरे छन रही है। किसी भी सवाल पर ईमानदारी और बुनियादी मतभेद नहीं है। जिस मतभेद की बात प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में की वह भी दिखावा ही है। उन्होंने एक-दो बार यह बात कही कि आर्थिक मामलों पर मतभेद बने रहेंगे। ऐसा नहीं है। कम से कम भाजपा और कांग्रेस इसका दावा नहीं कर सकते। उदारीकरण को कांग्रेस ने जहां पहुंचाया उसकी पालकी भाजपा और उसके नेतृत्व में राजग लिए चल रहा है।"

भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस और भाजपा किस तरह से एक दूसरे के हमजोली बनते हैं, इसका गवाह सुखराम प्रकरण है। तब भारतीय जनता पार्टी सुखराम के प्रति नरम रवैया अपनाए हुए थी। देश की चुनावी राजनीति कहां से कहां पहुंच गई है इस बारे में भी कुछ पुराने सांसदों जैसे शशि भूषण, श्यामनंदन मिश्र, चंद्रजीत यादव, मोहम्मद शफी कुरैशी और नंदकिशोर भट्ट आदि के हवाले से बताने का कोशिश की गई है।

ये किताब केवल समस्या और सवाल ही नहीं उठाती बल्कि समाधान भी देती है। दशकों पहले जेपी ने जिन समस्याओं को आज़ादी के बाद पनपते देखा, उनके समाधान के लिए काफी विचार-विमर्श के बाद कुछ उपाय सुझाए थे। जिनको समय के साथ कहीं न कहीं भुला दिया गया। जेपी ने पहले ही लोकतंत्र के धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदलने की बात कही थी। सबसे बड़ी समस्या चुनाव में धनबल के इस्तेमाल की है। जेपी ने बताया था कि पार्टी फंड का इंतजाम करने के नाम पर ही बड़े भ्रष्टाचार किये जाते हैं। साफ कहा गया है कि देश की मौजूदा समस्याओं का हल जेपी के सुझाए गैर-दलीय व्यवस्था से ही निकलेगा। कुल मिलाकर दो शताब्दियों के संधि काल पर भारतीय राजनीति के संक्रमण काल के बारे में नीति और राजनीति में काफी उपयोगी जानकारी है।

पुस्तक- नीति और राजनीति

लेखक- रामबहादुर राय

प्रकाशक-खामा पब्लिशर्स

कीमत-495 रुपये


(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।) 

नीति और राजनीति
Policy and Politics
BJP
BJP politics
राम बहादुर राय
Ram Bahadur Rai
Chandra Shekhar
Globalisation
liberalism
Atal Bihari Vajpayee
Congress

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License