NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
NRC का राजनीतिक अर्थशास्त्र
नया नागरिकता कानून लागू हुआ और उसके अंतर्गत पूरे देश में नागरिकता पंजीकरण किया गया तो नागरिकता से वंचित होने के भय से भारत में भी शोषण के दो रूप भविष्य में नज़र आ सकते हैं...क्या हैं ये दो रूप? क्या है NRC का राजनीतिक अर्थशास्त्र? पढ़िए मुकेश असीम का यह विशेष आलेख
मुकेश असीम
17 Dec 2019
Protest against NRC CAA
Image courtesy: Moneycontrol

पूरे देश में नागरिकता पंजीकरण (NRC) के साथ ही नागरिकता कानून  में हालिया परिवर्तन ने भारतीय सामाजिक जीवन में एक गंभीर संकट की स्थिति पैदा कर दी है क्योंकि यह धर्म के आधार पर नागरिकों में भेदभाव के सिद्धांत को स्थापित करता है। यह सिद्धांत एक बार स्वीकृत हो जाये तो नाजी जर्मनी में यहूदियों और जिप्सीयों, जायनवादी इजरायल में फिलिस्तीनीयों, बौद्ध अंधतावादी श्रीलंका व म्यांमार में तमिलों व रोहिंग्या या सऊदी अरब में गैर इस्लामी धर्मावलंबियों को निचले दर्जे के नागरिक मानने की तरह भारत में मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना देगा। अतः इसमें कतई शक नहीं कि यह भारतीय राष्ट्र के सेकुलर संगठन की बुनियाद पर गंभीर हमला है। यही वजह है कि इसके इस राजनीतिक पक्ष पर देश में गंभीर चर्चा जारी है। मगर इसके राजनीतिक अर्थशास्त्र के पहलू को भी समझने की आवश्यकता है।असम में कई साल तक चले नागरिकता पंजीकरण के परिणाम पहले ही हमारे सामने हैं।

असम में 1951 में भी नागरिकता पंजी बनी थी। उसके बाद 1979 से असम छात्र आंदोलन में यह मुद्दा सर्वोपरि था तथा 1985 के असम समझौते में नागरिकता पंजीकरण की बात तय हुई थी। इसलिए असम के आम लोगों को इस बारे में पहले से जानकारी थी और उन्होंने कुछ हद तक अपने नागरिक होने के प्रमाण सुरक्षित रखने का प्रयास भी किया था। उसके बावजूद भी नतीजा यह निकला कि भूतपूर्व राष्ट्रपति से लेकर सेना/पुलिस में जीवन भर नौकरी करने वाले कई व्यक्ति/परिवार भी अपनी नागरिकता प्रमाणित करने में असफल रहे और नागरिकता पंजी की अंतिम सूची से 19 लाख व्यक्ति बाहर कर दिये गये जिससे खुद इस प्रक्रिया की सख्त समर्थक बीजेपी सरकार भी भौंचक्की रह गई क्योंकि उनकी उम्मीद के विरुद्ध इनमें दो तिहाई से अधिक गैर मुस्लिम थे। इस पूरी प्रक्रिया पर सार्वजनिक जानकारी के मुताबिक सरकार ने 1300 करोड़ रुपये खर्च किये जिसमें इसमें लगे कर्मचारियों का वेतन शामिल नहीं है।

किंतु इससे भी महत्वपूर्ण है कुछ संस्थाओं द्वारा लगाया गया यह अनुमान कि असम की जनता ने खुद की नागरिकता स्थापित करने के लिए लगभग 8000 करोड़ रुपये खर्च किये अर्थात प्रति व्यक्ति औसत 2 हजार रुपये या 5 सदस्यीय परिवार के लिये औसत 10 हजार रुपये। इसमें भी हम यह मान सकते हैं कि दस्तावेज़ जुटाने, आदि में दिक्कत और रिश्वत चुकाने की जरूरत गरीब लोगों को ही अधिक पड़ी होगी तब यह समझा जा सकता है कि बहुत से गरीब मेहनतकश जनता के लिये नागरिकता पंजीकरण बहुत बड़ी आर्थिक समस्या बनकर आया है जिसमें उनकी पूरी बचत खप गई या उन्हें अपनी संपत्ति तक बेचनी पड़ी होगी।

देश की गरीब मेहनतकश जनता में से अधिकांश के पास दस्तावेजों का सख्त अभाव है या उनमें बहुत सारी गलतियाँ हैं। अगर ऐसा ही नागरिक पंजीकरण पूरे देश में लागू किया गया तो अपनी नागरिकता प्रमाणित कर पाना उनके लिये भारी संकट का सबब होगा। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार और रिश्वतख़ोरी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। अगर असम के 3.40 करोड़ लोगों को 8000 करोड़ रुपये इस काम में खर्च करने पड़े तो पूरे देश में ऐसा ही होने पर यह खर्च 3 लाख करोड़ तक जा सकता है। इसके अतिरिक्त सरकारी खर्च भी एक लाख करोड़ रुपये तक जा सकता है। वह भी करों के जरिये जनता से ही वसूल होगा। समझा जा सकता है कि नागरिक पंजीकरण पर यह खर्च देश की आम जनता से बहुत बड़ी और विकराल लूट सिद्ध होगा।

इसका एक और पक्ष है कि नागरिकता छिनने का डर भारत के पहले ही श्रम क़ानूनों की सुरक्षा से वंचित गरीब असंगठित श्रमिकों को कम मजदूरी पर बिना संगठित हुए, बिना अपना कोई अधिकार माँगे काम करने पर मजबूर करने का भी बड़ा जरिया बनने की आशंका है। जब भी कोई वाजिब मजदूरी माँगे, यूनियन बनाने का प्रयास करे या कुछ और अधिकार माँगे, मालिक उनमें जो मुखर हों, उन्हें पुलिस से साँठगाँठ कर अवैध आप्रवासी घोषित करा सकते हैं। सस्ते मजदूरों को शोषण के फंदे में फँसाये रखने के लिए अमेरिका यूरोप में यह तरीका पहले ही आजमाया जाता रहा है।

जब तक मजदूर ऐसी कोई माँग न करें तब तक पूँजीपति, प्रशासन, मीडिया सब जानते-बूझते चुप रहते हैं। पर न्याय माँगते ही श्रमिकों के शोषण के सवाल को अवैध आप्रवास के अंधभावनात्मक मुद्दे में तब्दील कर दिया जाता है। सऊदी व अन्य खाडी देश तो इसी कारण 50-60 साल से दो तीन पीढ़ियों से वहीं काम कर रहे दूसरे धर्म वाले श्रमिकों को तो छोड़िये मुसलमानों को भी अपनी नागरिकता नहीं देते क्योंकि यह उन्हें शोषण के खिलाफ संगठित होने, संघर्ष करने से रोकने का बड़ा तरीका है। श्रमिकों के साथ ही जो अन्य लोग वहाँ छोटा-मोटा कारोबार करना चाहते हैं उन्हें भी अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा किसी सऊदी नागरिक को लगान के तौर पर चुकाना पड़ता है। अतः नागरिकता से वंचित रखना श्रमिकों व छोटे कारोबारियों के गहन शोषण का एक बड़ा औज़ार है।

अमेरिका में अवैध आप्रवासी घोषित करने की धमकी के साथ एक अन्य तरीका भी प्रयोग में है। वहाँ गरीब मेहनतकश विशेष तौर पर अफ्रीकी व हिस्पैनिक मूल वालों को छोटे से छोटे अपराधों में लंबे वक्त के लिए जेल भेजा जा रहा है या जमानत की शर्त इतनी कठिन रखी जाती है कि वे उन्हें पूरा न कर सकें और वे जेल में ही रहें। आबादी के अनुपात में अमेरिका में कैदियों की तादाद दुनिया में संभवतः सर्वाधिक है। उसमें भी ये दो समुदाय ही आबादी के अनुपात में अधिक हैं। ऊपर से बहुत सी जेल निजी क्षेत्र को सौंप दी गईं हैं। निजी क्षेत्र को जेल चलाने पर दो तरह से मुनाफा होता है - एक, सरकार से प्रति कैदी मिलने वाला पैसा; दूसरे, इन कैदियों से नाममात्र की मजदूरी पर कराया गया बेहद कठिन श्रम, जिसमें सुरक्षा के भी कोई उपाय नहीं होते क्योंकि कैदियों की जान बहुत सस्ती होती है।

भारत में भी जैसे आर्थिक संकट गहरा रहा है, श्रम सुधारों के नाम पहले से कमजोर श्रम अधिकारों को और भी कमजोर किया जा रहा है। भारत में पहले ही अधिकांश मजदूर बहुत असुरक्षित स्थितियों में लंबे घंटे काम करने के लिये मजबूर होते हैं व साल में 48 हजार श्रमिक कार्य स्थल पर हुई दुर्घटनाओं में अपनी जान गँवा देते हैं। ऐसी स्थिति में मजदूरों के शोषण को और भी तीक्ष्ण करने के लिए नागरिकता कानून एक भयानक औज़ार बन जायेगा। पूँजीवादी कॉर्पोरेट मीडिया में इसके पक्ष में प्रचार की यह भी एक बड़ी वजह है। इसीलिये भारत सरकार बांग्लादेश को बार बार आश्वासन भी दे रही है कि किसी को देश से निकाला नहीं जायेगा, यह तो पूर्णतया आंतरिक मामला है।

उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूरों के खिलाफ विभिन्न राज्यों में समय समय पर जो नफ़रत फैलाई जाती है, हमले किये जाते हैं, उसे भी इस संदर्भ में देखना चाहिए। कुछ श्रमिकों व छोटे काम धंधे वालों को पीटने, मारने, सामान तोड़ने, जलाने का मुख्य मकसद भी इन मजदूरों को भयभीत रखना होता है। जैसे ही यह भय बढ़कर वास्तविक पलायन में बदलता है, तब तक नफरत फैलाता मीडिया तुरंत जनवादी बनकर राष्ट्रीय एकता, पलायन रोकने की बातें करने लगता है क्योंकि मजदूर वास्तव में ही पलायन कर चले जायें तो सस्ते श्रमिक कैसे मिलेंगे। तब तो उल्टा नुकसान ही हो जायेगा।

स्पष्ट है कि अगर नया नागरिकता कानून लागू हुआ और उसके अंतर्गत पूरे देश में नागरिकता पंजीकरण किया गया तो नागरिकता से वंचित होने के भय से भारत में भी शोषण के दोनों उपरोक्त रूप भविष्य में नजर आ सकते हैं अर्थात श्रमिकों को अवैध करार कराने की धमकी के जरिये किया जाने वाला दोहन और डिटेंशन केंद्रों में बिना किसी श्रम कानून की सुरक्षा वाला भयंकर खास तौर पर स्वास्थ्य के लिए सबसे खतरनाक किस्म का श्रम।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

NRC
CAA
CAB
Citizenship Amendment Act
National Register of Citizens
Religion Politics
Religion Discrimination
Protest against NRC
Protest against CAA
minorities
MINORITIES RIGHTS

Related Stories

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

देश बड़े छात्र-युवा उभार और राष्ट्रीय आंदोलन की ओर बढ़ रहा है

अल्पसंख्यकों पर हमलों के ख़िलाफ़ 1 दिसंबर को माकपा का देशव्यापी प्रदर्शन

त्रिपुरा हिंसा: फ़ैक्ट फाइंडिंग टीम के वकीलों पर भी UAPA, छात्रों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं का त्रिपुरा भवन पर प्रदर्शन

दिल्ली पुलिस की 2020 दंगों की जांच: बद से बदतर होती भ्रांतियां

सीएए : एक और केंद्रीय अधिसूचना द्वारा संविधान का फिर से उल्लंघन

समान नागरिकता की मांग पर देवांगना कलिता, नताशा नरवाल को गिरफ्तार किया गया: पिंजरा तोड़

ग़ैर मुस्लिम शरणार्थियों को पांच राज्यों में नागरिकता

नताशा और महावीर नरवाल: इंसाफ़ एक दूर की कौड़ी

नताशा नरवाल को अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए मिली ज़मानत


बाकी खबरें

  • झारखंड
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: विधान सभा सत्र में विपक्ष ने जन मुद्दों को छोड़ हनुमान चालिसा का किया पाठ
    08 Sep 2021
    हर दिन सत्र के शुरू होते ही भाजपा विधायक सदन की गेट से लेकर सदन के अंदर वेल में पहुंचकर हनुमान चालीसा का पाठ कर हंगामे की स्थिति बनाये हुए हैं। 7 अगस्त को सदन शुरू होते ही एक भाजपा विधायक ने शिव का…
  • muzaffarnagar mahapanchayat
    तारिक़ अनवर
    मुज़फ्फ़रनगर की किसान महापंचायत उत्तर प्रदेश चुनाव में बन सकती है भाजपा के लिए मुसीबत
    08 Sep 2021
    जाट-मुस्लिम एकता एवं आक्रामक तेवर अपनाए विपक्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की संभावनाओं को धूमिल कर सकते हैं।
  • आज का कार्टून
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: माफ़ कीजिए आप अफ़ग़ानिस्तान में हैं!
    08 Sep 2021
    अफ़ग़ानिस्तान का घटनाक्रम निश्चित ही महत्वपूर्ण है, लेकिन जिस तरह से हमारे न्यूज़ चैनल दिन-दिन भर उसकी ख़बरें दिखा रहे हैं, डिबेट कर रहे हैं, उसे देखकर भ्रम होता है कि हम भारत में हैं या…
  • report
    दित्सा भट्टाचार्य
    ग्रामीण इलाकों में सिर्फ़ 8 फ़ीसदी बच्चे ही नियमित ढंग से ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं: अध्ययन
    08 Sep 2021
    अध्ययन से पता चलता है कि दूसरे सामाजिक वर्गों की तुलना में, यहां तक कि वंचित तबकों में भी दलित और आदिवासी परिवारों की स्थिति ज़्यादा खराब है।
  • तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में नई सरकार के गठन की घोषणा की, मुल्ला अखुंद प्रधानमंत्री नियुक्त
    पीपल्स डिस्पैच
    तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में नई सरकार के गठन की घोषणा की, मुल्ला अखुंद प्रधानमंत्री नियुक्त
    08 Sep 2021
    तालिबान ने मंगलवार 7 सितंबर को नई सरकार के गठन की घोषणा की। इस सरकार में प्रधानमंत्री के रूप में मुल्ला हसन अखुंद और उपप्रधानमंत्री के रुप में मुल्ला गनी बरादर और मावलवी हन्नाफी की नियुक्ति की गई।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License