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भारत
राजनीति
राजनीति: कांग्रेस अपने ही नेताओं के वैचारिक संकट और अवसरवाद की शिकार
हालत यह हो गई है कि अब सत्ताधारी भाजपा के साथ-साथ कुछ विपक्ष के नेता भी यह तंज कसने लगे हैं कि जब कांग्रेस खुद अपना घर नहीं ठीक कर पा रही है तो वह राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विपक्षी एकता कैसे बनाएगी?
अफ़ज़ल इमाम
30 Aug 2021
राजनीति: कांग्रेस अपने ही नेताओं के वैचारिक संकट और अवसरवाद की शिकार
फ़ोटो साभार: जनसत्ता

विभिन्न राज्यों में कांग्रेस के बड़े नेताओं की आपसी लड़ाई और भितरघात न सिर्फ पार्टी को कमजोर कर रही है, बल्कि केंद्र की राजनीति में उसके शीर्ष नेतृत्व की अहमियत और हनक को भी कम कर रही है। हालत यह हो गई है कि अब सत्ताधारी भाजपा के साथ-साथ कुछ विपक्ष के नेता भी यह तंज कसने लगे हैं कि जब कांग्रेस खुद अपना घर नहीं ठीक कर पा रही है तो वह राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विपक्षी एकता कैसे बनाएगी?

वर्तमान में पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ही कांग्रेस की सरकारें बची हुई हैं, जबकि महाराष्ट्र व झारखंड में वह सरकार में गठबंधन का हिस्सा है, इसलिए पार्टी के पास अपने नेताओं को देने या ऑफर करने के लिए बहुत कुछ नहीं है। फिर से ‘कुआं खोदने और पानी भरने’ जैसी स्थिति है, लेकिन इसके लिए पार्टी के बहुत सारे नेता तैयार नहीं दिखाई पड़ते हैं। उनकी दिलचस्पी लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरपेक्षता को बचाने और आम जनता से जुड़े महंगाई, बेरोजगारी व गरीबी जैसे सवालों पर संघर्ष करने से ज्यादा अपने लिए पद व रूतबा हासिल करने में है।

हाल के दिनों में ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और सुष्मिता देब समेत कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जिन्होंने अवसर मिलते ही पाला बदल लिया। सिंधिया ने तो मध्य प्रदेश में सरकार ही गिरा दी, जो पार्टी के 15 साल संघर्ष करने के बाद बनी थी। सवाल उठता है कि राहुल गांधी के बेहद करीब रहे इन नेताओं में पार्टी की विचारधारा और नीतियों में जरा भी विश्वास था? चर्चा तो यह भी है कि कुछ और लोग भी पर तौल रहे हैं, जो यूपी चुनाव के ठीक पहले भाजपा का दामन थामेंगे। 

पिछले एक वर्ष के घटनाक्रम पर नजर डाली जाए तो छत्तीसगढ़ और राजस्थान दोनों जगह मुख्यमंत्री पद के लिए खींचतान चल रही है। पिछले साल जुलाई में ही तत्कालीन उपमुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने अपने कुछ करीबी विधायकों के साथ बगावत का बिगुल बजा दिया, जिसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी लोगों के घरों पर ईडी व इनकम टैक्स की छापेमारी का सिलसिला शुरू हो गया। कांग्रेस को अपने विधायकों को टूट से बचने के लिए कई दिनों तक होटल में रखना पड़ा। बाद में पार्टी महासचिव प्रियंका वाड्रा गांधी ने पायलट से बातचीत कर मामले को संभाल लिया। अब एक बार फिर पायलट ने जगह-जगह अपना शक्ति प्रदर्शन शुरू किया है। लोग इंतजार कर रहे हैं कि इस बार क्या होता है?

ध्यान रहे कि कोरोना काल में जब राजस्थान की गहलोत सरकार संकट में थी और सोनिया गांधी की तबीयत भी नहीं ठीक थी तभी पार्टी के 23 नेताओं (जी 23) ने उन्हें चिट्ठी लिख कर पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। यह चिट्ठी बाकायदा मीडिया में लीक भी की गई थी। इतना ही नहीं जब पायलट की बगावत और चिट्ठी कांड हुआ था तो ठीक उसी समय पर छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव के बीच टकराव की खबरें प्रकाश में आई थीं। यहां भी 15 साल बाद कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी थी। लेकिन डेढ़ साल पूरे होते ही टीएस सिंह देव ने 20 जून को ट्वीट कर अपनी ही सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े कर दिए। अब तो दोनों का झगड़ा सड़क पर आ चुका है। स्थिति यह हो गई कि 27 अगस्त को बघेल जब राहुल से मीटिंग करने के लिए दिल्ली आए तो अपना शक्ति प्रदर्शन करने से नहीं चूके। उनके साथ करीब 3 दर्जन विधायक 5 मेयर और प्रदेश के कई पदाधिकारी भी आए थे। हफ्तेभर में हुई दो बैठकों के बाद पार्टी आलाकमान ने मामले को फिलहाल रफा दफा करने का प्रयास किया है, लेकिन टीएस सिंहदेव के तेवरों से लगता नहीं है कि मामला शांत हो गया है। आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ में फिर से संकट गंभीर होने की पूरी संभावना है। कहा जा रहा है कि सरकार बनते समय तय हुआ था कि दोनों नेता ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन औपचारिक रूप से इसकी पुष्टि कोई नहीं कर रहा है। रही बात पंजाब की तो वहां नए प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। पिछले दिनों जब सिद्धू को अध्यक्ष बनाने की बात आई तो कैप्टन खेमे की तरफ से इसका जोरदार विरोध हुआ, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने अपने मजबूत इरादों का संदेश देते हुए अपना फैसला नहीं बदला। साथ ही कैप्टन को भी पूरा सम्मान दिया और स्पष्ट किया कि अगला विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इन सबके बावजूद दोनों के बीच झगड़ा काफी बढ़ चुका है। य़दि यह सिलसिला जारी रहा तो पंजाब चुनाव में कांग्रेस को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। इन सारे घटनाक्रमों को लेकर गोदी मीडिया में चटखारे लेकर खबरें चलाई जा रही हैं, ताकि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बेहद जर्जर और अप्रासंगिक लगे।

इन सब के बावजूद वर्तमान में देश जिस संकट का सामना कर रहा है, उसमें कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व विपक्षी दलों और आम जनता को एकजुट कर भाजपा व आरएसएस के खिलाफ व्यापक मुहिम शुरू करने का प्रयास निरंतर कर रहा है। किसान, बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, जासूसी और राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (देश की संपत्तियों की बिक्री) जैसे मुद्दों पर साझा संघर्ष छेड़ने के लिए विपक्ष में आम सहमति भी है। पिछले दिनों संसद सत्र के दौरान राहुल गांधी काफी सक्रिय रहे। उन्होंने किसानों व पेगासस जासूसी आदि जैसे मुद्दों पर विपक्ष के नेताओं से साथ बैठकें कर न सिर्फ साझा रणनीति बनाई, बल्कि सड़क से संसद तक मार्च आदि भी किया। वे विपक्षी नेताओं के साथ बस में बैठ कर किसानों की संसद देखने के लिए जंतर-मंतर गए और उन्हें अपना समर्थन दिया। फिर सत्र खत्म होने के बाद पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं के साथ आगे की रणनीति पर विचार विमर्श किया। पूरी नेकनीयती से शुरू किए गए इन सारे प्रयासों के बावजूद सवाल उठता है कि जब तक कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता वैचारिक मजबूती के साथ खुद मैदान में नहीं उतरेंगे तब तक बात कैसे बनेगी?

जी-23 वाले कई नेताओं की घर वापसी तो हो गई है, लेकिन सड़क के संघर्ष में उनकी सक्रियता नहीं दिख रही हैं। शीर्ष नेतृत्व जब भी किसी मुद्दे पर पहल करता है तो उसे पार्टी के अन्य बड़े नेताओं का साथ नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए राहुल गांधी ने रफाल घोटाले का मुद्दा जोरशोर से उठाया था, लेकिन पार्टी के अन्य बड़े नेताओं का साथ उन्हें नहीं मिला। इसी तरह ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ और पूंजीपति मित्रों के बारे में तीखी टिप्पणियों को भी कुछ नेता उचित नहीं मानते हैं, हालांकि इस पर वे खुल कर अपनी राय रखने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं। हद तो यह है कि जब राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी और उनकी नीतियों पर सवाल उठाना तेज किया तो शशि थरूर ने उनकी आलोचना न करने की सलाह दे डाली थी। गांधी परिवार के करीबी समझे जाने वाले मिलिंद देवड़ा भी मोदी के प्रशंसक रहे हैं। इसी तरह जयराम रमेश उज्ज्वला योजना तो सलमान खुर्शीद आयुष्मान योजना की तारीफ कर चुके हैं।

इसी साल फरवरी में जब राहुल और कांग्रेस किसानों के मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे थे तो उसी समय राज्यसभा में पीएम मोदी का इमोशनल भाषण सुनकर विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद की आंखे डबडबा रहीं थी। इसी तरह कई और उदाहरण मौजूद हैं, जिनसे कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति का पता चलता है।

हाल के दिनों में बेरोजगारी और महंगाई के सवालों पर भी जब राहुल ने पहल की तो ज्यादातर यूथ कांग्रेस के लोग ही सड़कों पर उतरे। अब उन्होंने देश की संपत्तियों को बेचने के खिलाफ आह्वान किया है तो अभी तक यूथ कांग्रेस ने ही कुछ गिने-चुने प्रदर्शन किए हैं। जाहिर है कि संगठन में जो खामियां हैं, उसकी पूरी जानकारी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को है, लेकिन उसे दुरूस्त करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। राहुल गांधी ने वर्ष 2019 के लोकसभा मिली हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद से सोनिया गांधी इस जिम्मेदारी को निभा रहीं हैं। अभी तक पार्टी को पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं मिल सका है। वैसे पार्टी में सभी बड़े फैसले राहुल ही ले रहे हैं, लेकिन वे खुल कर सामने आने को तैयार नहीं है। पिछले 2 वर्षों के दौरान संगठन में कई महत्वपूर्ण पदों पर नई नियुक्तियां भी की गईं, लेकिन उसका भी कोई फाएदा नजर नहीं आ रहा है।

पार्टी देश के हर ज्वलंत मुद्दे पर पहल कर रही है, जिसमें उसे विपक्ष का समर्थन भी मिल रहा है, लेकिन अपनी भीतरी समस्याओं के चलते वह उसे आंदोलन में तब्दील नहीं कर पा रही है। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी की यह स्थिति उस समय है, जब कुछ माह बाद यूपी समेत 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। फिर वर्ष 2023 में भी कई राज्यों के चुनाव होंगे, जिसके बाद लोकसभा के आम चुनावों के लिए घमासान शुरू हो जाएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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