NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ग़रीब को किया सफ़ाई अभियान से बाहर   
ग्रामीण और शहरी बस्तियों की ग्राउंड रिपोर्ट से पता चलता है कि ग़रीब और कमज़ोर वर्गों को शौचालय के इस्तेमाल से वंचित किया जा रहा है।
भरत डोगरा
03 Jun 2020
Translated by महेश कुमार
Open Defactaion
Image Courtesy: DNA

कोविड-19 महामारी ने एक बार फिर समग्र विकास के ढांचे में स्वच्छता के महत्व को उजागर कर दिया है। सरकार का दावा है कि हाल के वर्षों में स्वच्छता में अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल हुई हैं, जिसकी घोषणा अक्टूबर 2019 में की गई थी कि लगभग पूरा देश अब ओडीएफ या खुले में शौच से मुक्त हो गया है। सरकार के दावों और हक़ीक़त में काफी फ़र्क हैं, लेकिन अक्सर इसका दोष स्वच्छता प्रदान करने वाले कार्यक्रमों और योजनाओं को न देकर बल्कि स्वच्छता संबंधी व्यवहार के पहलुओं को दे दिया जाता है। इसका तर्क यह है कि व्यवहार में परिवर्तन लाने और उसे बनाने में "समय लगता है"।

ओडीएफ की घोषणा के बाद, मैंने इन दावों की जाँच के लिए करीब दस बस्तियों का दौरा किया, जहाँ ग़रीब  और बहुत ही ग़रीब रहते हैं - उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सात ग्रामीण बस्तियाँ और दिल्ली की तीन शहरी बस्तियों का दौरा इसमें शामिल है। सरकार जो कहती है, उसके विपरीत, सभी दस बस्तियों में ग़रीब, विशेष रूप से महिलाएं, चालू शौचालय के लिए बहुत उत्सुक हैं, और वे इनकी बार-बार मांग करती हैं, लेकिन उन्हें सभी सरकारी योजनाओं से वंचित कर दिया गया है। परिणामस्वरूप, उत्तर प्रदेश की इन सात ग्रामीण बस्तियों का भारी बहुमत अभी भी खुले में शौच करता है। और, दिल्ली की दौरा की गई तीन बस्तियों में, स्वच्छता की स्थिति बहुत ही खराब है।

इससे भी बड़ी जो बात है, वह यह कि उत्तर प्रदेश की लगभग सभी दस बस्तियों में पानी की किल्लत का भी पता चला है, जो ज्यादातर मामलों में एक गंभीर संकट की चपेट है। नतीजतन, भले ही शौचालयों का निर्माण तुरंत कर भी दिया जाए लेकिन जब तक पानी की सुविधा नहीं है उन शौचालयों के स्थायी उपयोग की संभावना बहुत कम रहेगी।

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में खमोरा पंचायत में कुचबंदिया बस्ती में बहुत ही वंचित समुदाय बसा हुआ है जोकि दलित तबके से संबंधित है। यहां के लोगों ने बार-बार शौचालय की मांग की है क्योंकि स्वच्छता की मौजूदा स्थितियां बहुत ही खराब और सड़ांध भरी है। साल में ज़्यादातर वक़्त गाँव वासियों को शौच के लिए कम से कम दो किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है,  क्योंकि किसान उन लोगों को अपने खेतों में हगने की इजाजत नहीं देते हैं जो लोग भूमिहीन और दलित हैं।

परिणामस्वरूप, बरसात के मौसम में हालात और भी असहनीय हो जाते हैं। जो लोग विकलांग हैं या फिर बीमार हैं उन्हे किसी तरह साइकिल पर ढो कर ले जाना पड़ता है। गाँव के लोगों द्वारा बार कार्यालय के चक्कर लगाने और अनुरोध करने के बाद, सरकार ने एक छोटे सामुदायिक शौचालय की की परियोजना की मंजूरी दी थी, लेकिन एक दबंग सामंत व्यक्ति ने उस भूमि के मालिक होने का दावा पेश कर दिया जहां उस शौचालय का निर्माण किया जाना था। तो इस छोटे से प्रोजेक्ट पर भी असर पड़ा। इसलिए मेरी यात्रा के दौरान पाया गया कि 100 प्रतिशत लोग अभी भी खुले में शौच कर रहे हैं।

उसी कुचबंदिया समुदाय की बस्ती खिरवा मसरी में जोकि कुछ मील की दूरी पर है, सरकार ने कुछ शौचालयों का निर्माण किया है, लेकिन इनका निर्माण इतना खराब है कि इन्हें इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता है। इसलिए इस बस्ती को भी शौचालय से वंचित कर दिया गया है। ये दोनों बस्तियाँ पानी की कमी से भी पीड़ित हैं।

चित्रकूट जिले के कर्वी ब्लॉक का दफाई गाँव कोल आदिवासियों द्वारा बसाया हुआ गाँव है। उनके यहाँ कोई शौचालय नहीं है और पूरा समुदाय खुले में शौच पर निर्भर है। यहां के लोगों ने मुझे बताया कि उन्होंने शौचालय की मांग कई बार उठाई है क्योंकि यहाँ सफाई की स्थिति बहुत खराब है। शौचालय के लिए केवल एक सीमित क्षेत्र का उपयोग किया जाता है और इसे महिलाओं, पुरुषों और बच्चों द्वारा साझा किया जाता है, जो दैनिक आधार पर बहुत शर्मिंदगी का सबब बनता है। यह क्षेत्र पत्थर के क्रेशरों के बहुत करीब भी है, इसलिए खुले में शौचालय जाने और वापसी में लौटने के दौरान ट्रकों की आवाजाही से दुर्घटना होने का बड़ा जोखिम भी मौजूद है। यह जोखिम बच्चों के लिए और भी अधिक है, जो सड़क के किनारे हगते हैं। उन सबके लिए केवल एक ही हैंडपंप है और पानी की बहुत किल्लत है।

उसी कर्वी ब्लॉक के भरतपुर गाँव की दलित बस्ती में, सरकार ने कुछ शौचालयों का निर्माण किया है, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम हैं। यहाँ भी पानी की कमी है और अधिकांश लोग खुले में शौच पर निर्भर हैं।

बांदा जिले के नारायणी ब्लॉक में जारवा चौकी एक शहरी बस्ती के करीब स्थित है और इसलिए यहाँ खुले में शौच करना बहुत मुश्किल हो जाता है, और खासकर, महिलाओं को शौच करने के लिए एक अलग जगह नहीं दी गई है। यहां कुछ शौचालयों का निर्माण किया गया है, लेकिन इस मुस्लिम बस्ती के अधिकांश लोग शौचालय की पहुंच से पूरी तरह से वंचित हैं।

पुन: पुनहुर गाँव (बांदा जिले के बिसंडा ब्लॉक में) की दलित बस्ती में कुछ ही शौचालयों का निर्माण किया गया है जो यहाँ की आबादी के लिए अपर्याप्त हैं। इसके ऊपर, जलभराव की समस्या बढ़ रही है, जिससे गाँव में स्वच्छता या सफाई की स्थिति बिगड़ती जा रही है।

नारायणी ब्लॉक के भरोसपुरवा गाँव में साफ-सफाई की स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि भूमिहीन दलितों पर सम्मानित दबंगों का दबाव बढ़ रहा है कि वे अपने खेतों का उपयोग हगने के लिए  नहीं करने देते हैं। परिणामस्वरूप दलितों को लंबी दूरी तक चलना पड़ता है; कुछ शौचालयों का निर्माण हुआ है लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है और बहुत खराब तरीके से बने हैं। अधिकांश लोग उन्हें इस्तेमाल लायक नहीं मानते है।

दिल्ली की शहरी बस्तियों में आकर देखा तो बवाना की जेजे कॉलोनी के लोगों का कहना है कि शौचालय के लिए छोड़ी गई जगह का सही उपयोग नहीं किया गया है और मौजूदा सामुदायिक शौचालय बहुत गंदे हैं और इनमें अक्सर पानी की कमी रहती है। एक छोटा सामुदायिक शौचालय स्वच्छ है, लेकिन यहाँ हगने के लिए 5 रुपए का भुगतान प्रति व्यक्ति करना पड़ता है, जिसे ग़रीब वहन नहीं कर सकते हैं। इसलिए यहाँ भी खुले में शौच पर निर्भरता बढ़ी हुई है। 

उत्तर पश्चिमी दिल्ली के हैदरपुर निर्माण शिविर में जहां लोग रहते हैं, उससे कुछ दूरी पर, कुछ सामुदायिक शौचालय मौजूद हैं। हताश लोग इन शौचालयों का उपयोग करने के लिए दौड़ लगाते हैं, लेकिन वहाँ पहले से ही लंबी कतार मौजूद होती है और उन्हे लंबा इंतज़ार करना पड़ता है।  इसके अलावा, रात में ये शौचालय बंद हो जाते हैं। खुले में शौच के लिए इस्तेमाल किए जाने वाली पुरानी जगह को बंद कर दिया गया है और अगर रात में लोग वहां जाते हैं तो पहरेदार लाठी लेकर उनके पीछे दौड़ते है।

बाहरी दिल्ली की सबर डेयरी न्यू ए ब्लॉक बस्ती में, बाजार में जो सामुदायिक शौचालय बनाए गए हैं, वे आमतौर पर महिलाओं के लिए सुलभ नहीं हैं। जिस महिला का मैंने साक्षात्कार लिया, उसने बताया कि उन्हें शौच करने के लिए अंधेरे में निकलना पड़ता है, जो उनके लिए बहुत असुरक्षित है और उन्हें इसके लिए निजता की भी कोई गारंटी नहीं है, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह एक शहरी क्षेत्र में है। शौच, दैनिक दिनचर्या का तनाव, भय और शर्म का एक मिलजुला स्रोत बन गया है।

ये सभी लोग, विशेष रूप से कमजोर वर्गों की महिलाएं, दृढ़ता से महसूस करती हैं कि उन्हे उनकी बुनियादी जरूरत से वंचित किया जा रहा है और इसलिए उन्होने सरकार से कई बार मांग की है कि उनके लिए काम करने वाले शौचालय बनाए जाए और पानी की कमी को दूर किया जाए। ये सभी बस्तियां उन क्षेत्रों में आती हैं, जिन्हें ओडीएफ घोषित किया गया है, लेकिन यहाँ दिन पर दिन हालात बिगड़ते जा रहे हैं।

लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं जो कई सामाजिक आंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख पढ़ने के नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Hidden in Plain Sight: Poor Left Out of Sanitation Campaign

Open defecation free
Swachh Bharat Abhiyaan
COVID 19
Coronavirus lockdown

Related Stories

क्या कोविड के पुराने वेरिएंट से बने टीके अब भी कारगर हैं?

बीड़ी कारोबार शरीर को बर्बाद कर देता है, मगर सवाल यह है बीड़ी मजदूर जाएं तो जाएं कहां?

बिहार के बाद बंगाल के तीन अस्पतालों में 100 से अधिक डॉक्टर कोरोना पॉज़िटिव

स्वच्छता अभियान  का मुखौटा उतारना होगा: विमल थोराट

वैक्सीन नीति पर बीजेपी के दावों का तथ्य, बिहार में बाढ़ से हज़ारों बेघर और अन्य ख़बरें

भारत एक मौज : कोरोना देवी मंदिर, रामदेव का वैक्सीन पर यू-टर्न, राम मंदिर ज़मीन घोटाला

निर्माण मज़दूरों का प्रदर्शन, निजी अस्पतालों को टीका आवंटन को लेकर सवाल और अन्य ख़बरें

कोरोना की वैक्सीन BJP की निजी जागीर नहीं

वैक्सीन रणनीति को तबाह करता भारत का 'पश्चिमीवाद'

कोविड-19 से सबक़: आपदाओं से बचने के लिए भारत को कम से कम जोखिम वाली नीति अपनानी चाहिए


बाकी खबरें

  • लाल बहादुर सिंह
    सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 
    26 Mar 2022
    कारपोरेटपरस्त कृषि-सुधार की जारी सरकारी मुहिम का आईना है उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित कमेटी की रिपोर्ट। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने तो सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन इसके सदस्य घनवट ने स्वयं ही रिपोर्ट को…
  • भरत डोगरा
    जब तक भारत समावेशी रास्ता नहीं अपनाएगा तब तक आर्थिक रिकवरी एक मिथक बनी रहेगी
    26 Mar 2022
    यदि सरकार गरीब समर्थक आर्थिक एजेंड़े को लागू करने में विफल रहती है, तो विपक्ष को गरीब समर्थक एजेंडे के प्रस्ताव को तैयार करने में एकजुट हो जाना चाहिए। क्योंकि असमानता भारत की अर्थव्यवस्था की तरक्की…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,660 नए मामले, संशोधित आंकड़ों के अनुसार 4,100 मरीज़ों की मौत
    26 Mar 2022
    बीते दिन कोरोना से 4,100 मरीज़ों की मौत के मामले सामने आए हैं | जिनमें से महाराष्ट्र में 4,005 मरीज़ों की मौत के संशोधित आंकड़ों को जोड़ा गया है, और केरल में 79 मरीज़ों की मौत के संशोधित आंकड़ों को जोड़ा…
  • अफ़ज़ल इमाम
    सामाजिक न्याय का नारा तैयार करेगा नया विकल्प !
    26 Mar 2022
    सामाजिक न्याय के मुद्दे को नए सिरे से और पूरी शिद्दत के साथ राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने के लिए विपक्षी पार्टियों के भीतर चिंतन भी शुरू हो गया है।
  • सबरंग इंडिया
    कश्मीर फाइल्स हेट प्रोजेक्ट: लोगों को कट्टरपंथी बनाने वाला शो?
    26 Mar 2022
    फिल्म द कश्मीर फाइल्स की स्क्रीनिंग से पहले और बाद में मुस्लिम विरोधी नफरत पूरे देश में स्पष्ट रूप से प्रकट हुई है और उनके बहिष्कार, हेट स्पीच, नारे के रूप में सबसे अधिक दिखाई देती है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License