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इतिहास के आइने से देखिए : कैसा होगा अमेरिका के बाद का अफ़ग़ानिस्तान
आपसी सम्मान, आपसी विश्वास और आपसी हितों के आधार पर तालिबान के साथ व्यवहार का दरवाज़ा खुल रहा है। कूटनीति को एक मौक़ा दीजिए।
एम. के. भद्रकुमार
01 May 2021
इतिहास के आइने से देखिए : कैसा होगा अमेरिका के बाद का अफ़ग़ानिस्तान

वाशिंगटन में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन से जुड़े ब्रूस रीडेल की अफ़ग़ानिस्तान की समझ पर कभी किसी को शक नहीं रहा। रीडेल सीआईए में अधिकारी रह चुके हैं। अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद भविष्य में क्या स्थितियां बनेंगी, रीडेल ने इन स्थितियों को बताने की कोशिश की है।

रीडेल को लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान में वही पुरानी स्थितियां दोबारा बन रही हैं, जब उत्तरी गठबंधन (नदर्न अलायंस) के नागरिक सेनाओं वाले सरदार बेहद प्रभावी हुआ करते थे। रीडेल आगे सोवियत संघ के अफ़ग़ानिस्तान से हटने के बाद, डॉ नजीबुल्लाह की अफ़ग़ान सरकार के अंजाम की बात करते हैं।

क्या अब दोबारा ऐसी स्थितियां बन सकती हैं? रीडेल का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका के जाने के बाद वहां गृहयुद्ध तेज होगा। "लेकिन वहां तालिबान की जीत अपरिहार्य नहीं है।" रीडेल की सलाह है कि अमेरिका को लगातार अफ़ग़ान सेना को मदद देनी चाहिए और उत्तरी गठबंधन के पुराने नेताओं के साथ अच्छे संबंध बनाने चाहिए, ताकि तालिबान को सैनिक तरीके से हराने का नया एजेंडा बनाया जा सके।  

स्पष्ट है कि अमेरिकी सेना और गुप्तचर तंत्र का प्रभावी विचार मानता है कि तालिबान को मुख्यधारा में लाना सही नहीं होगा, क्योंकि वह इस्लामी अमीरात की अतिवादी विचारधारा में यकीन करता है। लेकिन रीडेल के अंतिम मत का आधार मजबूत नहीं है। इसके बावजूद यह एक अहम आवाज़ है। इसकी अलग-अलग वजह नीचे दी गई हैं;

जो भी नजीब को जानता था, उसे मालूम है कि वे एक अद्भुत शख़्सियत थे। उनका जन्म अफ़ग़ान पश्तून कबीले वाली संस्कृति में हुआ, दूसरी तरफ उनमें KGB से मिले गुप्तचर प्रशिक्षण का पेशेवर रवैया भी मौजूद था। 1992 में जब मुजाहिदीनों ने अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया, तब मैं पहली बार नजीब से मिलने काबुल गया। उस वक़्त भी वे अच्छी जानकारी रखने वाले शख़्स थे।

मशहूर अफ़ग़ानी नेता अहमद शाह मसूद के प्रमुख वार्ताकार अब्दुल रहमान ने एक बार मुझसे कहा था कि वे नज़ीब से लगातार सलाह-मशविरा करते रहते हैं। अब्दुल रहमान की 2002 में काबुल में रहस्यमयी परिस्थितियों में हत्या कर दी गई थी। मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि मसूद और पाकिस्तानी की ISI इस बात को लेकर दृढनिश्चयी थे कि नजीब के भारत के साथ रिश्ते मजबूत ना हों।

अशरफ़ घनी दूर-दूर तक नजीब नहीं हो सकते। नजीब एक विप्लव से लड़ रहे थे, लेकिन उनका मज़बूत शक्ति आधार था। उनके पास पूरी तरह से सुचारू राज्य प्रशासन था और उनकी पार्टी भी कैडर आधारित थी। लेकिन घनी या उनके सहयोगियों के साथ ऐसा नहीं है। यह पहली वजह है। 

जब 1985 में मिखाइल गोर्बाचेव कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ सोवियत यूनियन या CPSU के नेता बने, तो नजीब ने अनुमान लगा लिया था कि आगे रूस की नीतियों में बड़ा बदलाव आएगा। 1988 में जब जेनेवा वार्ता चल रही थी, तब नजीब ने अपने देश के अलग-अलग धड़ों में शांति बनाने की नीति तेज कर दी, इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान के साथ संपर्क का रास्ता भी खुला रखा। जलालाबाद की मशहूर लड़ाई में पाकिस्तान की ISI ने उनकी हिम्मत परखने की कोशिश की। लेकिन वहां नजीब जीत गए, क्योंकि सोवियत संघ द्वारा प्रशिक्षित और हथियारों से सुसज्जित अफ़ग़ान आर्मी उच्च क्षमता वाली थी, जिसका आधार करीब 200 साल पुरानी सांस्थानिक परंपराओं और ढांचे में मौजूद था। इसलिए यह सेना एक स्वस्थ्य समाज, सक्रिय संस्थानों वाली सरकार और राष्ट्र की विचारधारा के ज़रिये अपना अस्तित्व बनाए हुए थी।

इसके उलट अफ़ग़ान सेना की ईकाईयों में आज ज़्यादातर सैनिक आर्थिक वज़हों से भर्ती हुए हैं, जो ऑफ़िसर कॉर्प्स के नीचे सेवाएं देते हैं। इन कॉर्प्स में पूर्व नागरिक सेनाओं के अनपढ़ लोग हैं, जो ना तो किसी साझा विश्वास के लिए लड़ रहे हैं और ना ही उनमें देशप्रेम है। ना ही उनका बहुजातीय, लोकतांत्रिक और एकीकृत अफ़ग़ानिस्तान के विचार में बहुत दृढ़ विश्वास है। 

मुजाहिदीनों को एकीकृत कमांड के अभाव में जलालाबाद की लड़ाई में बुरे तरीके से हरा दिया गया था। वह मुजाहिदीन बड़े स्तर के चढ़ाई करने वाले अभियानों का अनुभव नहीं रखते थे, ऊपर से उनकी ISI पर हद से ज़्यादा निर्भरता भी थी। लेकिन तालिबान बिल्कुल अलग स्थितियों में काम करता है। घनी सरकार जब तक तालिबान के साथ शांति स्थापित नहीं कर लेती, तब तक उसकी कोई भी मदद सिर्फ़ तात्कालिक उपाय ही साबित होगी। यह दूसरी वजह है।

सोवियत संघ जब अफ़ग़ानिस्तान से हट गया, उसके बाद नजीब़ तीन साल तक अपनी सत्ता बनाए रखने में कामयाब रहे थे। लेकिन उस दौरान उन्हें बहुत कठिन वक़्त देखना पड़ा। आपकी याददाश्त ताजा करने के लिए बता दें कि फरवरी 1989 में अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत संघ की आखिरी फौजी टुकड़ी रवाना हुई थी। अगले एक साल के भीतर ही ISI ने एक बड़े तख़्तापलट और नजीब की हत्या के ज़रिए काबुल में सत्ता पाने की योजना बना ली। ISI ने इसके लिए नजीब के ही दोस्त, अफ़ग़ानिस्तान के रक्षामंत्री और पूर्व जनरल शाहनवाज तनाई की मदद ली। 

तख़्तापलट की यह कोशिश कामयाब नहीं हुई और शाहनवाज को मार्च, 1990 में पाकिस्तान भागना पड़ा। जब मैं कुछ हफ़्ते बाद मिशन का प्रभार लेने काबुल पहुंचा, तो मैंने देखा कि वहां सत्ता अपनी धार खो रही है। काबुल शहर घिर चुका था और मुजाहिदीन पूरी घाटी को आसपास के पहाड़ों से रॉकेट चलाकर रौंद रहे थे। रोजाना शाम 6 बजे के बाद एक कर्फ्यू लग जाता, ऐसा इस डर से किया जाता ताकि रात के अंधेरे में मुजाहिदीन कैडर और ISI एजेंट काबुल में ना घुस जाएं। (रेडिफ पर "द बुचर एंड काबुल एंड आई" शीर्षक से मेरा लेख पढ़ें।)

एक दिन मुझे एक अहम संदेश देन के लिए नजीब के कार्यालय में बुलाया गया। यह एक आपात गुहार थी, जिसमें कहा गया कि नजीब सरकार के पास राशिद दोस्तुम के लड़ाकों को देने के लिए पैसे ख़त्म हो चुके हैं और दोस्तुम विद्रोह करने की धमकी दे रहे हैं। (नजीब ने कभी इस हिंसक उज्बेकी लड़ाकों के समूह को शहर में नहीं घुसने दिया।)

साधारण शब्दों में कहें तो यह चीज भी दिमाग में रखनी चाहिए कि आज अमेरिका और उसके साथियों से अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था और राज्य को वित्तपूर्ति की मांग भी की जाएगी। जबकि यह देश अभी महामारी के बाद अपनी हालत सुधारने में लगे हुए हैं। पिछले साल मार्च में मैंने ट्रिब्यून में अपने लेख में बहुत सावधानी बरतने को लेकर जो लेख लिखा था, वह अब भी प्रासंगिक है। यह तीसरी वजह है।

1990 तक सोवियत फौज़ें अफ़ग़ानिस्तान छोड़ चुकी थीं, तब दोस्तुम ने मुजाहिदीनों के साथ समझौता करने की कोशिशें शुरू कर दीं। बल्कि जिस दोस्तुम को रीडेल बहुत अच्छे ढंग से याद कर रहे हैं, दरअसल वो बहुत मौकापरस्त शख़्स थे। दोस्तुम ने ISI के साथ मिलकर 1995 में हेरात विजय में तालिबान की मदद की थी। 

मुझे कम से कम एक मौका याद है, जब दोस्तुम ISI और भारत दोनों के साथ बात कर रहे थे। शिबिरघान में एक बार बातचीत में दोस्तुम ने खुद बताया कि तत्कालीन पाकिस्तानी गृहमंत्री मेजर जनरल नसीलुल्लाह बाबर एक हफ़्ते पहले ही उससे मिलने आए थे। बाबर के साथ तत्कालीन तालिबान प्रमुख मुल्ला मोहम्मद रब्बानी भी मौजूद थे। (दोस्तुम हंसते हुए बताते हैं कि कैसे बाबर ने अपने हाथ में मौजूद छड़ी को मुल्ला के ऊपर छुआते हुए उनका अपमान किया था।)

हाल में ISI के पूर्व डॉयरेक्टर जनरल, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) असद दुर्रानी ने लिखा, "मेंढकों के बारे में एक कहानी है। वह लोग एक बर्तन से बाहर नहीं निकल सकते। क्योंकि जो भी बाहर निकलने की कोशिश करता है, दूसरे लोग उसे खींचने लगते हैं। पता नहीं कैसे यह सब ख़त्म हो गया; बर्तन टूट गया या फिर मेंढक थककर मर गए! अफ़ग़ानिस्तान बिखर नहीं रहा है, लेकिन अमेरिका भाग्यशाली है। उसका कोई भी विरोधी नहीं चाहता कि अमेरिका, सल्तनतों की कब्रगाह अफ़ग़ानिस्तान में समा जाए। बस अमेरिका के दोस्त ही उसे अफ़ग़ानिस्तान में उसे बनाए रखने के लिए उसका पैर खींचते रहते हैं।"

वाकई, यह बहुत खीझ भरा हो सकता है। अफ़ग़ान खुद को फायदा पहुंचाने वालों को कभी जाने नहीं देते। उत्तरी गठबंधन को समर्थन देने के लिए लाखों डॉलर पानी में बह गए। फिर भी क्या विदेशी ताकतों को कुछ हासिल हुआ? वह लोग मसूद को तक नहीं बचा पाए।

लेकिन अगर 9/11 का हमला नहीं हुआ होता, तो अफ़ग़ानिस्तान में आज भी इस्लामी अमीरात की सत्ता जारी रहती। 2001 के खात्मे तक उत्तरी गठबंधन अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। पता ही नहीं चला कि पहले दिया गया इतना सारा पैसा कहां चला गया। बहुत सारी अफ़वाहें कहती हैं कि वह पैसा मध्य एशिया के बाज़ारों तक पहुंच गया। उत्तरी गठबंधन के सरदार आज करोड़पति हैं, जिनकी विदेशों में संपत्तियां और बैंक खाते हैं। यह कैसे हुआ, कोई भी बताना नहीं चाहता।

हम जनरल दुर्रानी की कहावत को और आगे सोचने की कोशिश करते हैं। एक बर्तन की कल्पना कीजिए, जिसमें दोस्तुम, मोहम्मद अत्ता, इस्माइल खान, करीम खलीली, मोहम्मद मोहाकिक, घनी, अमरुल्लाह सालेह, हमदुल्लाह मोहिब, अब्दुल्ला-अब्दुल्ला, हामिद करजई, गुलबुद्दीन हेकमतयार, रासुल सय्याफ़ और राष्ट्रपति जो बाइडेन हैं। यह बर्तन कब तक इन लोगों को थामकर साबुत रह पाएगा?

रीडेल के विश्लेषण में सबसे अहम बात उनका यही मानना रहा कि "पाकिस्तान तालिबान का नियंत्रण नहीं करता और तालिबान की अच्छी स्थिति से पाकिस्तान पर नकारात्मक और सकारात्मक, दोनों ही प्रभाव पड़ेंगे.... अफ़ग़ान तालिबान ज़्यादा स्वतंत्र हो जाएगा।" अगर ऐसा हो जाता है, तो इसमें सशंकित होने की क्या जरूरत है? आपसी सम्मान, आपसी विश्वास और आपसी हितों के आधार पर तालिबान के साथ व्यवहार का दरवाजा खुल रहा है। कूटनीति को एक मौका दीजिए।

साभार: इंडियन पंचलाइन

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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