NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भारत में बेतहाशा फैलती जा रही है ग़रीबी!
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कुपोषण, मातृत्व मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर के आंकड़े बढ़े हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आंकड़ों में भारत सीरियस हंगर वाली कैटेगरी में चला गया है।
अजय कुमार
06 Aug 2021
भारत में बेतहाशा फैलती जा रही है ग़रीबी!
'प्रतीकात्मक फ़ोटो' फोटो साभार: Qrius

मीडिया के प्रचार के दम पर चल रही मोदी सरकार ने बड़े लंबे समय से गरीबी के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। इस पर मीडिया वाले कभी सवाल भी खड़ा नहीं करते हैं। अगर सवाल खड़ा करते तो जिस तरह से चौक चौराहों पर 135 करोड़ वाले देश में ओलंपिक में गिरकर 5 मेडल न मिल पाने पर चर्चा हो रही है ठीक उसी तरह गरीबी पर भी चर्चा होती। अगर ऐसी चर्चाएं होती तो इसका भी हल साफ-साफ दिखाई देता कि कैसे भारत में ओलंपिक में ज्यादा से ज्यादा मेडल मिले।

कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे यानी लोगों के खर्च करने की प्रवृत्ति के आधार पर गणना करके गरीबी के आंकड़े जारी किए जाते हैं। नेशनल स्टैटिसटिकल ऑर्गेनाइजेशन हर पांच साल के बाद कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे के आंकड़े जारी करता है, जिसके तहत मिले आंकड़ों का अध्ययन कर गरीबी के आंकड़े भी जारी किए जाते हैं।

साल 2017-18 अखबारों में कंजूमर एक्सपेंडिचर सर्वे के कुछ आंकड़े लीक हुए। लीक हुए आंकड़े सरकार के सामने चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि सरकार लोक कल्याण नहीं कर रही है। इसलिए सरकार ने इसे जारी करने से मना कर दिया। यानी सरकार ने उस सोर्स को ही दबा दिया जिनसे गरीबी के आंकड़ों का आकलन किया जाता है।

लेकिन, अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा और  जजाती केसरी परिदा ने ठोस अनुमान लगाया है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि किसी समय अंतराल में गरीबी घटने के बजाय बढ़ी है, गरीब लोगों की संख्या भारत की कुल आबादी में घटने की बजाय बढ़ी है। यह अनुमान किसी अटकल पच्चीसी के आधार पर नहीं है, बल्कि भारत सरकार के सर्वे से मिले ठोस आंकड़ों का अध्ययन करके जारी किए गए हैं।

अब तक कंजूमर एक्सपेंडिचर सर्वे का इस्तेमाल कर गरीबी की गणना की जाती रही है। अभी साल 2019-20 का पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे जारी हुआ है। यानी कोरोना से पहले भारत के कामगारों की स्थिति पर भारत सरकार की वार्षिक रिपोर्ट। इस रिपोर्ट के पेज 6 पर कंजूमर एक्सपेंडिचर सर्वे की शैली में ही कुछ आंकड़े जारी हुए हैं। यह इतनी विस्तृत तो नहीं जितनी कंजूमर एक्सपेंडिचर सर्वे के आंकड़े होते हैं फिर भी भारत में गरीबी का ठोस अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त है। इस सर्वे में लोगों से यह सवाल पूछा गया है कि वह स्वास्थ्य, शिक्षा, कपड़ा, जूता, चप्पल, भोजन जैसे जीवन की जरूरी चीजों पर कितना खर्च करते हैं। इन्हीं आंकड़ों को आधार बनाकर कंजूमर एक्सपेंडिचर सर्वे को आधार बनाकर गरीबी के आंकड़े जारी करने वाली पुरानी शैली के तहत ही अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा और जनजाति केसरी परीदा ने भारत में गरीबी पर रिपोर्ट प्रकाशित की है।

साल 201-12 में तेंदुलकर कमेटी ने ग्रामीण इलाकों में ₹816 प्रति महीने और शहरी इलाके में ₹1000 प्रति महीने से नीचे की कमाई करने वाले लोगों को गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की श्रेणी में रखा था। यह निर्धारण विश्व बैंक के जरिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के फार्मूले के आधार पर हुआ था। इस समय अगर इस फार्मूले में महंगाई की दर भी समायोजित कर दी जाए तो ग्रामीण इलाकों में ₹1217 प्रति महीना से कम की कमाई करने वाले और शहरी इलाके में ₹1467 रुपए प्रति महीने से कम की कमाई करने वाले गरीबी रेखा से नीचे घोषित किए जाएंगे।

गरीबी रेखा के इस पैमाने के आधार पर अर्थशास्त्रियों की रिपोर्ट यह बताती है कि भारत के ग्रामीण इलाके में तकरीबन 25.7 फ़ीसदी आबादी साल 2012 में गरीबी रेखा से नीचे थी। यह साल 2020 में बढ़कर 30 फ़ीसदी हो चुकी है। शहरी इलाके में तकरीबन 13 फ़ीसदी आबादी साल 2012 में गरीबी रेखा से नीचे थी अब यह बढ़कर 15 फ़ीसदी तक पहुंच चुकी है। भारत की कुल आबादी में साल 2012 में तकरीबन 21 फ़ीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी अब यह बढ़कर तकरीबन 26 फ़ीसदी के आसपास पहुंच चुकी है।

साल 2012 में अगर ग्रामीण इलाकों में गरीबों की संख्या तकरीबन 21.5 करोड़ थी तो साल 2019-20 में यह संख्या 27 करोड़ के पास पहुंच गई है। यही हाल शहरी इलाकों का भी है। अगर साल 2012 में शहरी इलाके में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या तकरीबन 5.3 करोड़ थी तो अब यह पहुंचकर 7.3 करोड़ हो गई है।

इस तरह से जब से भारत में गरीबी रेखा का आकलन किया जा रहा है तब से लेकर अब तक पहली बार ऐसा हो रहा है कि 2012 से लेकर 2020 तक गरीबी रेखा से नीचे खिसके लोगों में तकरीबन 7 करोड़ का इजाफा हुआ है। साल 2012 में तकरीबन 26 करोड़ आबादी अगर गरीबी रेखा से नीचे थी तो साल 2020 से पहले 34 करोड़ आबादी गरीबी रेखा से नीचे पहुंच गई। कहने का मतलब यह है कि आंकड़े साफ साफ इशारा कर रहे हैं कि भारत में तकरीबन 34 करोड़ आबादी ऐसी है जो महीने में तकरीबन ₹1500 से कम की कमाई पर अपना जीवन गुजर बसर करती है। अगर हर दिन के हिसाब से जुड़े तो तकरीबन 34 करोड़ लोग हर दिन अपनी जिंदगी जीने के लिए मात्र ₹50 की कमाई कर पाते हैं। (यह इससे भी कम हो सकता है क्योंकि शहरी इलाके में गरीबी का निर्धारण 1467 रुपए प्रति महीने से कम की कमाई पर होता है) इतनी कम आमदनी पर जीने के लिए मजबूर लोग कितनी तरह की परेशानियां रोज सहते होंगे और कितनी तरह की परेशानियां रोज पैदा करते होंगे। इसके बारे में अगर आप सोच कर देखेंगे तो शायद जिंदगी का पूरा नजरिया बदल जाए।

यह सारे आंकड़े कोरोना से पहले के हैं। यानी इसमें कोरोना महामारी की वजह से पैदा हुई परेशानियों का कोई योगदान नहीं है। योगदान है साल 2014 के बाद से मोदी सरकार के कामकाज का।

याद कीजिए काला धन रोकने के नाम पर रातो रात लागू किया गया नोटबंदी। जिसका परिणाम कुछ भी नहीं निकला। लेकिन गरीबों की कमर टूट गई। आनन-फानन में लागू की गई GST। जिस पर आए दिन चर्चा होती रहती है कि इसमें बहुत अधिक सुधार की जरूरत है। यह भी आनन-फानन में लागू किया गया। जिसकी वजह से सबसे अधिक प्रभाव असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले सूक्ष्म और लघु उद्योग पर पड़ा। सरकार द्वारा जनकल्याण के बजाय राजकोषीय नीतियों पर ध्यान दिया जाना। मतलब भले लोग भूख से मरते रहे लेकिन लोक कल्याण पर खर्चा नहीं करना है। इस बात पर ज्यादा ध्यान देना है कि सरकार का घाटा अधिक ना हो जाए।

साल 2017-18 में 45 साल में सबसे अधिक बेरोजगारी दर का आंकड़ा जारी हुआ। जिसके मुताबिक वित्त वर्ष 2017- 18 में बेरोजगारी दर 6.1 फ़ीसदी बताई गई। उसके बाद इसी साल कंजूमर एक्सपेंडिचर सर्वे के लीक हुए डाटा से भी यही पता चला था कि भारत के ग्रामीण इलाके की खपत साल 2012 के मुकाबले 8 फ़ीसदी कम हुई है। शहरी इलाकों में खपत में महज 2 फ़ीसदी का इजाफा हुआ है। यह भी पता चला कि साल 2012 के बाद रोजाना और कभी कभार काम करने वाले की वास्तविक आय में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है। वह जस की तस बनी हुई है। इसका मतलब यह था कि ना आय बढ़ रही है, न रोजगार मिल रहा है, ना बेरोजगारी कम हो रही है, जेब में पैसा कमा रहा है, खपत कम हो रही है। मतलब अंतिम तौर पर गरीबी बढ़ रही है।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कुपोषण, मातृत्व मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर के आंकड़े बढ़े हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आंकड़ों में भारत सीरियस हंगर वाली कैटेगरी में चला गया है। यह सब गरीबी के ही परिणाम है।

जहां तक बात रही कोरोना के बाद की तो प्यू रिसर्च का कहना है कि भारत में कोरोना से पहले के मुकाबले कोरोना के बाद गरीबों की संख्या में दोगुना इजाफा हुआ है। पूरी दुनिया में मध्यवर्ग से जितने लोग गरीबी के हालात में पहुंचे हैं उनमें से तकरीबन 60 फ़ीसदी लोगों का संबंध भारत से है। भारत की प्रति व्यक्ति आय पिछले साल के मुकाबले कम हुई है। प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया के 194 देशों के बीच भारत 144 वें पायदान पर मौजूद है। यह आंकड़े इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि भले सरकार बताए या न बताए, लेकिन भारत में गरीबी अपना पैर पसारती जा रही है।

National Family Health Survey
NFHS-5
malnutrition
Maternal Mortality Rate
Infant Mortality
poverty
Poverty in India
Modi government
Narendra modi

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • russia attack on ukrain
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूक्रेन पर हमला, रूस के बड़े गेम प्लान का हिस्सा, बढ़ाएगा तनाव
    25 Feb 2022
    'पड़ताल दुनिया भर की' में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने बात की न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से। यूक्रेन पर रूस हमला, जो सरासर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है, के पीछे पुतिन द्वारा…
  • News Network
    न्यूज़क्लिक टीम
    आख़िर क्यों हुआ 4PM News Network पर अटैक? बता रहे हैं संजय शर्मा
    25 Feb 2022
    4PM News नामक न्यूज़ पोर्टल को हाल ही में कथित तौर पर हैक कर लिया गया। UP की राजधानी लखनऊ का 4PM News योगी सरकार की नीतियों की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। 4PM News का आरोप है कि योगी…
  • Ashok Gehlot
    सोनिया यादव
    राजस्थान : कृषि बजट में योजनाओं का अंबार, लेकिन क़र्ज़माफ़ी न होने से किसान निराश
    25 Feb 2022
    राज्य के बजटीय इतिहास में पहली बार कृषि बजट पेश कर रही गहलोत सरकार जहां इसे किसानों के हित में बता रही है वहीं विपक्ष और किसान नेता इसे खोखला और किसानों के साथ धोखा क़रार दे रहे हैं।
  • ADR Report
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनाव छठा चरणः 27% दाग़ी, 38% उम्मीदवार करोड़पति
    25 Feb 2022
    एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार छठे चरण में चुनाव लड़ने वाले 27% (182) उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं वहीं 23% (151) उम्मीदवारों पर गंभीर प्रकृति के आपराधिक मामले हैं। इस चरण में 253 (38%) प्रत्याशी…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव 2022: मोदी सभा में खाली कुर्सियां, योगी पर अखिलेश का तंज़!
    25 Feb 2022
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा बात करेंगे आवारा पशुओं के बढ़ते हुए मुद्दे की, जो यूपी चुनाव में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा सकता है। उसके साथ ही अखिलेश यादव द्वारा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License