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प्रधानमंत्री मोदी का पांचवां संबोधन भी निराशाजनक रहा
कुल मिलाकर देश के नाम अपने पांचवें भाषण में भी नरेंद्र मोदी मूल समस्या को नजरअंदाज करते हुए और अपनी सरकार की अभी तक की नाकामी को भी शब्दों के मायाजाल से कामयाबी बताने का उपक्रम करते दिखाई दिए।
अनिल जैन
13 May 2020
प्रधानमंत्री मोदी

कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर देश से मुखातिब हुए। पिछले 54 दिनों के दौरान राष्ट्र के नाम उनका यह पांचवां औपचारिक संबोधन था। कोरोना वायरस संक्रमण की चुनौती के संदर्भ में अपने 34 मिनट के इस संबोधन में उन्होंने शुरु के 15 मिनट 'गौरवशाली भारतीय संस्कृति’, 'वैभवशाली विरासत’, 'इतिहास’, 'योग साधना’, 'डेमोग्राफी’, 'डेमोक्रेसी’, '21वीं सदी का आत्मनिर्भर भारत’, '135 करोड भारतीयों की संकल्प शक्ति’ आदि पर खर्च किए। इसके बाद उन्होंने देश के अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए विभिन्न तबकों के लिए 20 लाख करोड रुपये के आर्थिक पैकेज और लॉकडाउन को चौथे चरण के रूप में आगे बढ़ाने का ऐलान किया।

हालांकि उन्होंने आर्थिक पैकेज का विस्तार से ब्योरा नहीं दिया और यह काम अपनी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर छोड़ दिया जो अब कुछ दिनों तक इसकी विस्तार से जानकारी देती रहेंगी। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन-4 बिलकुल अलग रंग-रूप में होगा और इसकी जानकारी भी देशवासियों को 18 मई से पहले दे दी जाएगी।

22 मार्च के जनता कर्फ्यू से लेकर अब तक जारी लॉकडाउन के दौरान वैसे तो समाज के हर तबके को तमाम परेशानियों का सामना करना पडा है, लेकिन सबसे दर्दनाक दुश्वारियों का सामना गरीबों और बडे शहरों से पलायन कर अपने घरों को लौटने वाले प्रवासी मजदूरों ने किया है। मगर प्रधानमंत्री ने करीब 2500 शब्दों के अपने भाषण में ग़रीबों का जिक्र सिर्फ तीन जगह और मज़दूर शब्द का जिक्र सिर्फ एक बार किया। दुनिया के किसी भी देश में कोराना महामारी के दौरान इतने बड़े पैमाने पर आबादी का पलायन नहीं हुआ है, जितना बडा भारत में हुआ है और अभी हो रहा है।

सिर सामान की गठरी, गोद में बच्चों को और पीठ पर बूढे मां-बाप को लादकर सैकडों किलोमीटर की दूरी तय करने और इस दौर भूख-प्यास के साथ ही कई जगह पुलिस की मार सहते हुए प्रवासी मजदूर सिर्फ इस 'गौरवशाली भारत’ में ही दिखाई दे रहे हैं। मगर प्रधानमंत्री के भाषण में इन मजदूरों की दशा को रत्तीभर स्थान नहीं मिल सका। और तो और पुलिस की मार से बचने के लिए रेल की पटरियों के सहारे अपने गांव लौटते जो मजदूर रास्ते में ही मौत का शिकार हो गए, उनके बारे में भी प्रधानमंत्री के लंबे भाषण में संवेदना के दो शब्द अपनी जगह नहीं बना पाए। यही नहीं, पलायन शब्द का तो उन्होंने अपने पूरे भाषण में एक बार भी इस्तेमाल नहीं किया।

लॉकडाउन की अवधि के दौरान ही कई बार हुई बेमौसम की बारिश ने किसानों को भी खासा नुकसान पहुंचाया है। प्रधानमंत्री ने आर्थिक पैकेज की चर्चा करते हुए किसानों का भी चार बार जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह आर्थिक पैकेज देश के उन श्रमिकों और किसानों के लिए है जो हर स्थिति, हर मौसम में देशवासियों के दिन-रात परिश्रम करते हैं। उन्होंने इस सिलसिले में उद्योग जगत का जिक्र भी किया और कहा कि इस पैकेज से कुटीर उद्योग, गृह उद्योग, लघु और मंझौले उद्योग को भी काफी सहारा मिलेगा जो करोडों लोगों की जीविका का साधन है और आत्मनिर्भर भारत के हमारे संकल्प का मजबूत आधार है।

प्रधानमंत्री ने आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए उसके लाभार्थियों में सबसे पहले ग़रीबों, मज़दूरों और किसानों का जिक्र किया और और आखिरी में उद्योगपतियों का। अब देखने वाली बात होगी कि पैसा बांटते समय भी यही क्रम बना रहता है या नहीं।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस बात की कोई चर्चा नहीं की कि कोरोना महामारी का मुकाबला करने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर पर क्या प्रयास किए जा रहे हैं। उनके पूरे भाषण में न तो 'अस्पताल’ शब्द का जिक्र आया और न ही 'इलाज’ शब्द का। अलबत्ता विदेशों को भेजी गई दवाओं का जिक्र उन्होंने जरूर किया। उन्होंने कहा कि जिंदगी और मौत की लड़ाई लड रही दुनिया में आज भारत की दवाइयां एक नई आशा लेकर पहुंच रही हैं। प्रधानमंत्री के भाषण में सबसे ज्यादा जोर 'आत्म-निर्भर भारत’ पर रहा। उन्होंने 29 मर्तबा आत्म-निर्भर शब्द का इस्तेमाल किया और हर क्षेत्र में आत्म-निर्भरता पर जोर दिया।

पिछले 54 दिनों के दौरान कोरोना वारियर्स के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए ताली-थाली बजाने, दीया-मोमबत्ती जलाने और अस्पतालों पर सेना के विमानों फूल बरसाने तथा अस्पतालों के सामने सेना का बैंड बजाने जैसे इंवेट आयोजित करवा चुके प्रधानमंत्री मोदी ने इस बार के भाषण में डॉक्टर, नर्स, पुलिस और फ्रंटलाइन पर खडे अन्य कोरोना वारियर्स का एक बार भी जिक्र नहीं किया। उन्होंने यह ज़रूर कहा कि कोरोना वायरस लंबे समय तक हमारे जीवन का हिस्सा बना रहेगा। यानी एक तरह से प्रधानमंत्री ने मान लिया किया स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर पर इस महामारी का मुकाबला करने के लिए उनकी सरकार जितना कर सकती थी, वह कर चुकी है।

हमेशा की तरह प्रधानमंत्री अपने इस संबोधन के दौरान भी खुद की पीठ थपथपाने से नहीं चूके। बीते छह वर्षों में लागू हुए आर्थिक सुधारों की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि उन सुधारों के कारण ही आज इस संकट के दौर में भारत की व्यवस्थाएं अधिक समर्थ और सक्षम नजर आई हैं। इस सिलसिले में मोदी हमेशा की तरह गलत बयानी करने या तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करने से भी नहीं चूके। उन्होंने कहा कि जब कोरोना संकट शुरू हुआ तब भारत में एक भी पीपीई किट नहीं बनती थी और एन-95 मास्क उत्पादन भी नाममात्र का होता था, लेकिन आज स्थिति यह है कि भारत में ही हर रोज दो लाख पीपीई किट और दो लाख एन-95 मास्क बनाए जा रहे हैं। सवाल है कि जब कोरोना संकट शुरू होने से पहले इन चीजों का उत्पादन नहीं होता था तो फिर फरवरी महीने तक इनका निर्यात कैसे होता रहा? सवाल यह भी है कि अगर आज इनका भारी मात्रा उत्पादन हो रहा है तो फिर इन चीजों को विदेशों से मंगाने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है और देश के कई राज्यों में इनका अभाव क्यों बना हुआ है?

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में लैंड और कानून का जिक्र भी किया है। देखने वाली बात होगी कि वे कौन से कानून बदलते हैं। श्रम कानूनों को बदलने और उन्हें सख्त तथा उद्योगपतियों के अनुकूल बनाने की शुरुआत तो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने कर ही दी है। आत्म-निर्भरता और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं के साथ आर्थिक सुधारों और श्रम-सुधारों का जिक्र सुनते ही लग जाता है कि मजदूरों को कम पैसे में खामोशी के साथ ज्यादा खटने को कहा जाएगा। जाहिर है कि त्याग मजदूर करेगा और मेवा समर्थ वर्ग खाएगा। जब चुनाव आएंगे तो मजदूरों के वोट हासिल करने के लिए उनके त्याग-तपस्या को फिर याद कर लिया जाएगा।

अमेरिका और यूरोप के अन्य देशों में सरकारें ऐसे मौकों पर आर्थिक पैकेज तय करने में विपक्ष से भी सलाह-मशविरा करती हैं। वहां मीडिया भी सवाल करता है। मगर यहां तो इस सरकार के लिए इन सब बातों का कोई मतलब ही नहीं है। लोकतंत्र का मंत्रोच्चार करते हुए अलोकतांत्रिक इरादों पर अमल करना इस सरकार का मूल मंत्र है।

प्रधानमंत्री मोदी ने हमेशा की तरह इस बार भी अपने भाषण में 130 करोड़ भारतीयों का जिक्र किया है लेकिन अपने पहले के चार संबोधनों की तरह इस बार भी उन्होंने उन लोगों को नसीहत देने से परहेज किया जो कोरोना महामारी की आड़ में सांप्रदायिक नफरत फैलाने का संगठित और सुनियोजित अभियान छेड़े हुए हैं। इस अभियान में उनकी अपनी पार्टी भाजपा के कई सांसद, विधायक और पदाधिकारी भी सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं।

कुछ दिनों पहले ज़रूर प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके देशवासियों से अपील की थी कोरोना महामारी को किसी धर्म, जाति, संप्रदाय, नस्ल, भाषा या किसी देश-प्रदेश की सीमा से न जोड़ा जाए और हम सब मिल-जुल कर इसका मुकाबला करें। यह अपील अरब देशों की ओर से सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले अभियान पर नाराजगी जताने के बाद की गई थी। लेकिन पूरे कोरोना काल में एक बार भी राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री का इस विभाजनकारी अभियान के बारे में न बोलना यही बताता है कि वे इस आपदा को भी ऐसे अभियान के लिए एक अवसर मानकर चल रहे हैं।

कुल मिलाकर प्रधानमंत्री का कोरोना काल में राष्ट्र के नाम पांचवां संबोधन भी निराशाजनक ही रहा, जिसमें वे मूल समस्या को नजरअंदाज करते हुए और अपनी सरकार की अभी तक की नाकामी को भी शब्दों के मायाजाल से कामयाबी बताने का उपक्रम करते दिखाई दिए।

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