NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?
प्रधानमंत्री ने तमाम विपक्षी दलों को अपने, अपनी पार्टी और देश के दुश्मन के तौर पर प्रचारित किया और उन्हें खत्म करने का खुला ऐलान किया है। वे हर जगह डबल इंजन की सरकार का ऐसा प्रचार करते हैं, जैसे विपक्ष की सारी सरकारें जनविरोधी, देश विरोधी और विकास विरोधी हैं। प्रधानमंत्री की इस राजनीति ने विपक्षी पार्टियों को सोचने के लिए मजबूर किया।
अनिल जैन
01 Jun 2022
Narendra Modi
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले सप्ताह 26 मई को जब तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद पहुँचे तो राज्य के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव उनकी अगवानी के लिए मौजूद नहीं थे। वे प्रधानमंत्री के हैदराबाद पहुंचने से कुछ घंटे पहले ही बेंगलुरू के लिए रवाना हो गए, जहां उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा से मुलाकात की। पिछले चार महीने में यह दूसरा मौका था जब चंद्रशेखर राव ने अपने राज्य के दौरे पर आए प्रधानमंत्री मोदी से मिलने से परहेज किया। 

प्रधानमंत्री इसी साल 5 फरवरी को जब संत रामानुजाचार्य की प्रतिमा का अनावरण करने हैदराबाद पहुंचे थे तब भी मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव उनकी अगवानी करने न तो हवाई अड्डे पर पहुंचे थे और न ही बाद में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। हालांकि उस समय तेलंगाना में या हैदराबाद शहर में कोई चुनाव भी नहीं हो रहा था, जो यह माना जाए कि राजनीतिक कारणों से मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री की तेलंगाना यात्रा का बहिष्कार किया। प्रधानमंत्री एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने हैदराबाद गए थे, इसलिए प्रधानमंत्री के पद का मान और अपने पद की मर्यादा रखते हुए मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव को मोदी की अगवानी करनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने इस सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार का पालन नहीं किया।

बहरहाल, चंद्रशेखर राव पहले ऐसे विपक्षी मुख्यमंत्री नहीं हैं, जिन्होंने अपने सूबे में आए प्रधानमंत्री का इस तरह बहिष्कार किया हो। पिछले एक साल के दौरान और भी कई विपक्षी मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्य में पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी की न तो अगवानी की और न ही उनके साथ किसी कार्यक्रम में शिरकत की।

कुछ ही दिनों पहले (25 अप्रैल को) भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना के बीच जारी तनातनी के बीच प्रधानमंत्री मोदी जब लता दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार ग्रहण करने मुंबई पहुंचे थे तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी उनकी अगवानी के लिए हवाई अड्डे पर नहीं गए। बाद में वे उस कार्यक्रम में भी शामिल नहीं हुए जिसमें लता मंगेशकर के परिजनों ने प्रधानमंत्री मोदी को सम्मानित किया था। 

हालांकि शिव सेना की ओर से इस बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया था, लेकिन अनौपचारिक तौर पर बताया गया था कि पुरस्कार समारोह के निमंत्रण पत्र में मुख्यमंत्री का नाम नहीं था, जिसे उद्धव ठाकरे ने अपना और राज्य की जनता का अपमान माना और इसीलिए वे उस कार्यक्रम में नहीं गए। यह भी बताया गया था कि लता मंगेशकर के परिजनों ने भाजपा और शिव सेना के तनावपूर्ण रिश्तों के मद्देनजर निमंत्रण पत्र में मुख्यमंत्री का नाम नहीं डाला था। अलबत्ता मंगेशकर परिवार के दो सदस्य मुख्यमंत्री को आमंत्रित करने उनके सरकारी निवास पर जरूर गए थे। 

जो भी हो, लेकिन महाराष्ट्र में भी यह पहला मौका नहीं था जब मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने अपने सूबे में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम से इस तरह दूरी बनाई हो। उससे दो महीने पहले 6 मार्च को जब प्रधानमंत्री पुणे में मेट्रो रेल परियोजना का उद्घाटन करने पहुंच थे तब भी उद्धव ठाकरे उस कार्यक्रम से भी दूर रहे थे। उस वक्त शिव सेना की ओर से बताया गया था कि मुख्यमंत्री का ऑपरेशन हुआ है और डॉक्टरों ने उन्हें अभी कुछ दिन आराम करने को कहा है। 

इस वाकये से ठीक दो महीने पहले 5 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी पंजाब के बठिंडा पहुंचे थे तो वहां भी उनकी अगवानी के लिए सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी मौजूद नहीं थे। प्रधानमंत्री को हुसैनीवाला में शहीद स्मारक पर जाना था और कुछ परियोजनाओं का शिलान्यास करना था। लेकिन मुख्यमंत्री ने अपनी अस्वस्थता का हवाला देकर किसी भी कार्यक्रम में शामिल होने में पहले ही असमर्थता जता दी थी। यह अलग बात है कि किसान आंदोलन के कारण प्रधानमंत्री की वह यात्रा पूरी नहीं हो सकी थी और कथित सुरक्षा चूक के मामले से भारी विवाद पैदा हो गया था। 

उससे पहले पिछले साल पश्चिम बंगाल में भी ऐसा ही हुआ था। प्रधानमंत्री 28 मई को चक्रवाती तूफान का जायजा लेने जब बंगाल पहुंचे थे तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनके साथ समीक्षा बैठक में शामिल नहीं हुईं थीं। प्रधानमंत्री उनका इंतजार करते रहे थे लेकिन ममता बनर्जी ने आकर उन्हें नमस्ते किया और कुछ जरूरी कागज उन्हें थमा कर चली गईं थीं। 

मोदी और ममता के बीच संबंधों की यह तल्खी इसी साल 23 जनवरी को नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती के मौके पर कोलकाता में आयोजित कार्यक्रम में भी देखी गई। ममता बनर्जी के भाषण के दौरान प्रधानमंत्री की मौजूदगी में जय श्रीराम के नारे लगे थे, जिससे नाराज होकर वे अपना भाषण पूरा किए बगैर ही कार्यक्रम छोड़ कर चली गई थीं। इसी तरह पिछले साल मई के महीने में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान प्रधानमंत्री ने कई मुख्यमंत्रियों को फोन किया था। 

उसी सिलसिले में उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी टेलीफोन किया था तो उसके बाद मुख्यमंत्री सोरेन ने कहा था कि प्रधानमंत्री सिर्फ अपने मन की बात करते हैं, बेहतर होता कि वे काम की बात करते और काम की बात सुनते। यही शिकायत करते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी कहा था कि प्रधानमंत्री द्वारा मुख्यमंत्रियों की जो बैठकें होती हैं, उनमें सिर्फ वन-वे होता है। प्रधानमंत्री सिर्फ अपनी बात कहते हैं, मुख्यमंत्रियों की बात का कोई जवाब नहीं मिलता है। थोड़ा पीछे जाएं तो साल 2015 में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो प्रधानमंत्री को कायर और मनोरोगी तक कह दिया था।

ये कुछ प्रतिनिधि घटनाएं हैं, जिनसे प्रधानमंत्री पद की प्रतिष्ठा और सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार को लेकर कुछ गंभीर सवाल खड़े होते हैं। सवाल है कि आखिर पिछले आठ साल में ऐसा क्या हुआ है, जो विपक्ष शासित राज्यों के मुख्यमंत्री देश के प्रधानमंत्री के प्रति ऐसा उपेक्षा या बेअदबी भरा बर्ताव कर रहे है? राजनीति में वैचारिक टकराव पहले भी रहा है और पहले भी केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें रही हैं, लेकिन किसी प्रधानमंत्री के साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। 

तो सवाल यह उठता है कि अभी जो हो रहा है, क्या उसे भाजपा विरोधी पार्टियों की राजनीतिक असहिष्णुता या दुराग्रह मान कर खारिज किया जा सकता है या इसके कुछ गंभीर कारण हैं, जिनकी पड़ताल और निराकरण जल्द से जल्द होना चाहिए? असल में प्रधानमंत्री के प्रति देश के अलग-अलग राज्यों में उभर रही इस किस्म की प्रवृत्ति को गंभीरता से समझने की जरूरत है। आखिर ऐसा क्या हुआ है कि पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं के मुख्यमंत्री इस तरह का बरताव कर रहे हैं? 

सबसे पहले इस तथ्य को रेखांकित करने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री के प्रति बेअदबी की लगभग सारी घटनाएं पिछले एक साल की हैं। उससे पहले राजनीतिक विरोध के बावजूद सामान्य शिष्टाचार था और उसका सार्वजनिक प्रदर्शन भी होता था। हालांकि इसके बीज पड़ना शुरू हो गए थे, जिसकी तार्किक परिणति ऐसी ही होनी थी। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही इसकी शुरुआत हो गई थी। 

विरोधी दलों और उनके नेताओं के प्रति प्रधानमंत्री की अपमानजनक बातें शुरू में जरूर अटपटी लगी थी। चूंकि भाजपा और मोदी ने काफी बडी जीत हासिल की थी, इसलिए विपक्षी नेताओं ने यह सोच कर बर्दाश्त किया कि जीत की खुमारी उतर जाने पर प्रधानमंत्री राजनीतिक विमर्श में सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार और भाषायी शालीनता का पालन करने लगेंगे। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ और लगने लगा कि यही मोदी की स्वाभाविक राजनीतिक शैली है और वे बदलने वाले नहीं हैं, तब विपक्षी नेताओं के सब्र का बांध टूटा और उसमें सारे राजनीतिक शालीनता और मर्यादा बहती गई। 

देश में शायद ही कोई ऐसा विपक्षी मुख्यमंत्री या नेता होगा, जिसके लिए प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से अपमानजनक बातें या गाली-गलौज नहीं की होगी। मोदी उन्हें भ्रष्ट, परिवारवादी, लुटेरा, नक्सली, आतंकवादियों का समर्थक और देशद्रोही तक करार देने में भी संकोच नहीं करते हैं। इस सिलसिले में वे पूर्व प्रधानमंत्रियों और विपक्ष की महिला नेताओं को भी नहीं बख्शते हैं और उनके लिए बेहद अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करते रहते हैं।

मोदी ने यह सिलसिला सिर्फ चुनावी सभाओं तक ही सीमित नहीं रखा है, बल्कि संसद में, संसद के बाहर विभिन्न मंचों पर और यहां तक कि विदेशों में भी वे विपक्षी नेताओं पर निजी हमले और अपमानजनक बातें करने से नहीं चूकते हैं। फिर विपक्ष शासित राज्यों के प्रति उनकी सरकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार ने भी केंद्र और राज्यों के बीच खटास पैदा की है। केंद्रीय एजेंसियां विपक्षी नेताओं और उनके परिजनों के यहां छापे मार रही हैं। गड़े मुर्दे उखाड़ कर कार्रवाई की जा रही है, खास कर चुनावों के वक्त। लेकिन जैसे ही आरोपी नेता भाजपा में शामिल हो जाता है, वैसे ही उसके खिलाफ जांच बंद हो जाती है, उसे क्लीन चिट मिल जाती है। केंद्र सरकार की मनमानियों और विपक्षी नेताओं के प्रति अपमानजनक बर्ताव का नतीजा है कि आज केंद्र-राज्य संबंध किसी भी समय के मुकाबले सबसे बदतर स्थिति में हैं।

प्रधानमंत्री ने तमाम विपक्षी दलों को अपने, अपनी पार्टी और देश के दुश्मन के तौर पर प्रचारित किया और उन्हें खत्म करने का खुला ऐलान किया है। वे हर जगह डबल इंजन की सरकार का ऐसा प्रचार करते हैं, जैसे विपक्ष की सारी सरकारें जनविरोधी, देश विरोधी और विकास विरोधी हैं। प्रधानमंत्री की इस राजनीति ने विपक्षी पार्टियों को सोचने के लिए मजबूर किया। इसलिए आज अगर प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर आंच आ रही है और उनकी बेअदबी हो रही है तो इसके लिए प्रधानमंत्री का अंदाज-ए-हुकूमत और अंदाज-ए-सियासत ही जिम्मेदार है।

ये भी पढ़ें: प्रधानमंत्रियों के चुनावी भाषण: नेहरू से लेकर मोदी तक, किस स्तर पर आई भारतीय राजनीति 

Narendra modi
Modi government
mamata banerjee
Arvind Kejriwal
K. Chandrashekhar Rao
Bhupesh Bhagel

Related Stories

ख़बरों के आगे-पीछे: MCD के बाद क्या ख़त्म हो सकती है दिल्ली विधानसभा?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रपति के नाम पर चर्चा से लेकर ख़ाली होते विदेशी मुद्रा भंडार तक

भारत को मध्ययुग में ले जाने का राष्ट्रीय अभियान चल रहा है!

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

ख़बरों के आगे-पीछे: पंजाब पुलिस का दिल्ली में इस्तेमाल करते केजरीवाल

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

17वीं लोकसभा की दो सालों की उपलब्धियां: एक भ्रामक दस्तावेज़


बाकी खबरें

  • Saharanpur
    शंभूनाथ शुक्ल
    यूपी चुनाव 2022: शांति का प्रहरी बनता रहा है सहारनपुर
    13 Feb 2022
    बीजेपी की असली परीक्षा दूसरे चरण में हैं, जहां सोमवार, 14 फरवरी को वोट पड़ेंगे। दूसरे चरण में वोटिंग सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, संभल, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बदायूँ, शाहजहांपुर ज़िलों की विधानसभा…
  • Uttarakhand
    कृष्ण सिंह
    चुनाव 2022: उत्तराखंड में दलितों के मुद्दे हाशिये पर क्यों रहते हैं?
    13 Feb 2022
    अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी दलित समाज के अस्तित्व से जुड़े सवाल कभी भी मुख्यधारा के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्न नहीं रहे हैं। पहाड़ी जिलों में तो दलितों की स्थिति और भी…
  • Modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: अगर आरएसएस न होता...अगर बीजेपी नहीं होती
    13 Feb 2022
    "...ये तो अंग्रेजों की चापलूसी में लगे थे। कह रहे थे, अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं"
  • election
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: चुनाव आयोग की साख पर इतना गंभीर सवाल!
    13 Feb 2022
    हर हफ़्ते की कुछ खबरें और उनकी बारिकियाँ बड़ी खबरों के पीछे छूट जाती हैं। वरिष्ठ पत्रकार जैन हफ़्ते की इन्हीं कुछ खबरों के बारे में बता रहे हैं। 
  • Hum bharat ke log
    अनिल सिन्हा
    हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है
    13 Feb 2022
    हम उस ओर बढ़ गए हैं जिधर नहीं जाने की कसम हमने ली थी। हमने तय किया था कि हम एक ऐसा मुल्क बनाएंगे जिसमें मजहब, जाति, लिंग, क्षेत्र, भाषा या विचारधारा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। हमने सोचा था कि…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License