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भारत
राजनीति
महाशय आप गलत हैं! सुधार का मतलब केवल प्राइवेटाइजेशन नहीं होता!
भारत के नीतिगत संसार में सुधार का नाम आने पर प्राइवेटाइजेशन को खड़ा कर दिया जाता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत की बीहड़ परेशानियां प्राइवेटाइजेशन की वजह से खड़ी हुई गरीबी की वजह से जस की तस बनी हुई है।
अजय कुमार
12 Dec 2021
Privatisation
Image courtesy : The Hindu

भारत में किसी प्रशासनिक अधिकारी से पूछिए या प्रशासनिक अधिकारी की तैयारी कर रहे विद्यार्थी से पूछिए या टीवी के नामी गिरामी आर्थिक पत्रकार से पूछिए या आज के जमाने के मशहूर लोगों से पूछिए तो सब यही कहेंगे कि भारत में आर्थिक सुधार की राह प्राइवेटाइजेशन से होकर जाती है। वह लोग जो इससे अलग राय रखते हैं, उनकी मौजूदगी कम है और उनकी बातें बाजार की रणनीति की वजह से सार्वजनिक विमर्श के क्षेत्र में बहुत कम जगह बना पाती हैं।

इसलिए लोगों को प्राइवेटाइजेशन से हो रहे नुकसान का उस तरह से पता नहीं चल पाता जिस तरह से प्राइवेटाइजेशन के झूठे गुणगान गाए जाते हैं। कृषि कानूनों को ही देख लीजिए। कुछ पत्रकारों और विश्लेषकों को छोड़ दिया जाए तो तकरीबन विमर्श की सारी दुनिया यह बता रही थी कि कृषि कानूनों से किसानों को बहुत अधिक फायदा होगा।

बाजार के मनोविज्ञान पर सालों साल से अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों ने तथ्यों के साथ यह बताया भी कि किस तरह से एक गरीब जनता को बाजार बहुत अधिक लूटता है। देश के तकरीबन 18 राज्यों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह से जहां पर एपीएमसी की मंडियां नहीं है, वहां पर बाजार ने किसानों का शोषण किया है। लेकिन इनकी बातों को किसी ने नहीं सुना। वह तो भला कीजिए पंजाब के किसानों का जो दिल्ली के चारों तरफ आकर डट गए तब जाकर के तीन कृषि कानूनों को सरकार ने खारिज किया। किसान साल भर सर्दी, बरसात, गर्मी, आंधी-तूफ़ान सहते हुए सरकार के खिलाफ नहीं डटे रहते तो हजारों वाजिब तर्क होने के बावजूद भी सरकार इन कानूनों को निरस्त नहीं करती।

ऐसे ढेर सारे उदाहरण हैं, जो यह बताते हैं कि जन कल्याण के लिहाज से प्राइवेटाइजेशन की नीति पूरी तरह से असफल रही है। ढेर सारे तथ्य और आंकड़े हैं, जो यह बताते हैं कि जन कल्याण करने के लिए भारत जैसे गरीब मुल्क में प्राइवेटाइजेशन को छोड़ दिया जाए तो ज्यादा भला होगा। लेकिन फिर भी चूंकि भारत की चुनावी राजनीति पूंजी की रहनुमाई पर चलती हैं इसलिए ढेर सारे तथ्यों उदाहरणों और छानबीन वाले दस्तावेज के बावजूद भी प्राइवेटाइजेशन की राह नहीं छोड़ी गई हैं। अभी world inequality report 2022 आई है। इस रिपोर्ट से ऐसे कई आंकड़े सामने आए हैं जो यह बताते हैं की आर्थिक सुधार के नाम पर उदारीकरण और प्राइवेटाइजेशन की नीति ने भारत की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर दिया है।

भारत को जब आजादी मिली तब भारत की 1% सबसे अमीर लोगों के पास भारत की कुल आमदनी का तकरीबन 11% हिस्सा था। इसी समय 50% सबसे गरीब लोगों के पास भारत की कुल आमदनी का तकरीबन 18% हिस्सा था। आजादी के बाद नेहरू प्रधानमंत्री बने। एक गरीब मुल्क ने नेहरू की प्रगतिशील सोच की अगुवाई में समाजवाद की नीति अपनाई। यानी यह नहीं कहा कि सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है। बल्कि यह कहा और किया कि भारत एक गरीब मुल्क है, वहां पर सरकार भी बिजनेस के कामकाज को करेगी और उस पर नियंत्रण भी रखेगी। 

इसका नतीजा यह हुआ कि साल 1981 आते-आते भारत के सबसे अमीर लोगों की भारत की कुल आमदनी में हिस्सेदारी साल 1951 से घटकर तकरीबन 6% पर पहुंच गई। लेकिन 1981 के बाद भारत की सरकार ने धीरे-धीरे इस इरादे से काम करना शुरू किया कि बाजार के हाथों में सब कुछ चला जाए। जिसे तकनीकी भाषा में उदारीकरण और प्राइवेटाइजेशन कहा जाता है।

इसका नतीजा यह हुआ कि साल 2020 में 1% अमीर लोगों की भारत की कुल आमदनी में हिस्सेदारी तकरीबन 21% की हो गई है। इस 1 फ़ीसदी की हिस्सेदारी भारत की कुल संपत्ति में 33 फ़ीसदी की हो चुकी है। 10 फ़ीसदी सबसे अमीर लोगों की भारत की कुल आमदनी में हिस्सेदारी 57% की हो गई है। इन 10% सबसे अधिक अमीर लोगों की हिस्सेदारी कुल संपत्ति में 63% की हो गई है। जबकि सबसे गरीब 50% की भारत की कुल संपत्ति में हिस्सेदारी महज़ 5.9% की है और कुल आमदनी में हिस्सेदारी महज 13% की है।

यानी 1981 से लेकर 2020 की सरकारी नीति में प्राइवेटाइजेशन के बोलबाला का नतीजा यह हुआ है कि आधी जनता पहले से भी ज्यादा गरीब हुई है। यह आँकड़े पिछले 40 साल की प्रवृत्ति बता रहे हैं। इन 40 सालों में तकरीबन 40 से ज्यादा शोधपरक रिपोर्ट प्रकाशित किए होंगे जो यह साबित कर रहे होंगे कि भारत को प्राइवेटाइजेशन की राह छोड़ देनी चाहिए। लेकिन फिर भी भारत का प्रशासनिक तबका अब भी वही पढ़ाई पढ़ रहा है और वही नीति बना रहा है जिसकी राह प्राइवेटाइजेशन से होकर जाती है। भारत की सरकार उन्हीं आर्थिक विशेषज्ञों की बातों को महत्व दे रही है जो हर मर्ज की दवा प्राइवेटाइजेशन को बताते हैं। उनको कोई तवज्जो नहीं दिया जाता जो कई सालों से यह साबित करते आ रहे हैं कि प्राइवेटाइजेशन की वजह से गरीबी और अधिक बढ़ी है।

साल 1981 के बाद भारत के 1 फ़ीसदी सबसे अधिक अमीर लोगों की सालाना आमदनी में तकरीबन 6% की दर से इजाफा हुआ है।लेकिन वहीं पर 50% सबसे अधिक गरीब लोगों की आमदनी में महज 2% की सालाना दर से इजाफा हुआ है। टीवी की रंग बिरंगी दुनिया के सहारे देखें तो इन 40 सालों में क्या नहीं बदल गया? कई सरकारें आईं और गईं. राजनीति का तौर तरीका बदल गया। नेताओं का हाव-भाव बदल गया. सिनेमा जिसका दबदबा भारत के लोक मानस पर सबसे अधिक होता है, उसकी पूरी शैली बदल गई।

सोशल मीडिया के सहारे भारत की चमचमाहट की दुनिया इतनी खतरनाक तरीके से दिखती है कि लगता है कि सब कुछ बदल गया। लेकिन भारत के 50% गरीब वहीं के वहीं रहे। साल 1951 से लेकर 1981 के बीच उनकी सालाना आमदनी तकरीबन 2% की दर से बढ़ रही थी और 1981 के बाद भी वह 2% की दर से बढ़ रही है। इनके जीवन में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।

मुश्किल से 15 से 20% लोगों को छोड़ देने के बाद भारत का पूरा संसार गरीबी से पटा पड़ा है। इस संसार में आर्थिक असमानता को दर्शा रहे यह बीहड़ आंकड़े यह बताते हैं कि भारत की बीहड़ परेशानियां तब तक हल नहीं हो सकतीं जब तक बहुसंख्य लोगों का आर्थिक स्तर ना सुधरे। बिना आर्थिक स्तर सुधारे जीवन स्तर नहीं सुधरेगा। जीवन स्तर सुधरे बिना समाज की परंपरागत गति में खामियां देखना मुश्किल है। इसीलिए मौजूदा दौर में जातिवाद, नारीवाद, संप्रदायवाद, राजनीतिक फूहड़ता पर ढेर सारी बातचीत होने के बावजूद भी वह सबसे निचले स्तर पर मौजूद भारत के बहुसंख्य मानस को बदलने की कार्यवाही नहीं बन पा रही है। बहूतेरी आबादी के लिए सारी सामाजिक बुराइयां जस की तस बनी हुई है। 

इन सबके बावजूद उन्हीं नीतियों को धड़ल्ले से अपनाया जा रहा है, जिसका रास्ता प्राइवेटाइजेशन से होकर जाता है, जिसका परिणाम बहुसंख्य लोगों के जनकल्याण से नहीं जुड़ा है। सरकार समर्थित तमाम विद्वान उन नीतियों के बारे में सोचने के लिए तैयार नहीं हैं जो प्राइवेटाइजेशन से अलग रास्ता बनाती हो। सुधार का नाम आते ही प्राइवेटाइजेशन खड़ा कर दिया जाता है। भारतीय नीति चिंतन दृष्टि में मौजूदा समय की सबसे घटिया बात यही है। 

चलते चलते समाजवादी रूस से जुड़े वर्ल्ड इनिक्वालिटी रिपोर्ट के आंकड़े पर चिंतन मनन करके देखिए। साल 1990 में समाजवाद की कमान थाम कर चल रहा रूस प्राइवेटाइजेशन की राह पर चल पड़ा। उसके बाद का हाल देखिए। रूस की 50% गरीब आबादी की आमदनी में साल 1961 से लेकर 1991 तक सालाना बढ़ोतरी तकरीबन 3% की दर से हो रही थी। साल 1991 से लेकर 2020 तक का रूस के लिए आकलन बताता है कि उसकी 50% सबसे गरीब लोगों की आमदनी की सालाना बढ़ोतरी माइनस 1.1 की दर से हो रही है। यानी रूस के सबसे गरीब 50% लोगों की आमदनी पिछले 20 सालों से हर साल बढ़ने के बजाय तकरीबन 1% घट जाती है। अब आप खुद ही सोचिए कि प्राइवेटाइजेशन को सुधार की तरह अपनाना क्यों गलत है?

ये भी पढ़ें: निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन

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