NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
राजनीति
प्रगतिशील न्यायिक फ़ैसलों से हिंदू महिलाओं के उत्तराधिकार से जुड़े अधिकार मजबूत हुए
एक महिला जिसके पक्ष में चाहे, उसके लिए अपनी वसीयत लिख सकती है।
ई जयश्री कुरुप
17 Apr 2021
प्रगतिशील न्यायिक फ़ैसलों से हिंदू महिलाओं के उत्तराधिकार से जुड़े अधिकार मजबूत हुए

(अपने पिता और पति की संपत्ति में महिला का उत्तराधिकार लगातार विकसित हो रहा है। 1956 के पहले महिलाओं को पैतृक संपत्ति में किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं होता था। लेकिन 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार दे दिया। पर इस 'अंतिम तारीख़ (कट-ऑफ डेट)' से जुड़े कोर्ट में कई सारे दावे पेश किए गए। ई जयश्री कुरुप लिखती हैं कि 2020 में एक अहम फ़ैसले में कहा गया कि अगर 2005 से पहले पिता की मौत भी हो चुकी हो या महिला का जन्म 2005 से पहले हुआ है, तो भी हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 लागू होगा।)

महिलाओं के उत्तराधिकार के अधिकार को लगातार चुनौती दी जा रही है। इस बीच प्रगतिशील न्यायाधीशों की पीठ लगातार अहम फ़ैसले देती जा रही हैं। लेकिन पूरे देश में अनगिनत मुक़दमों में महिलाओं द्वारा उत्तराधिकार की कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है। 

सोनू कौर की कहानी यहां हर महिला की कहानी है। उनका जन्म और परवरिश एक मध्यमवर्गीय शिक्षित परिवार में हुई। अपनी उम्र की तीसरे दशक में उनकी शादी कर दी गई। उन्होंने पत्नी और मां के अपने कर्तव्यों का अच्छे ढंग से पालन किया। उनके उद्यमी पति अपने भाईयों और परिवार के सदस्यों के साथ फैक्ट्री (हिंदू अविभाजित संपत्ति) में काम करते थे। 

इन रिश्तेदारों के साथ साझा तरीके से रहते हुए सोनू और उनके पति इमारत के एक तल पर रहते थे। अचानक एक दिन सोनू के पति को दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। उनके दोनों बच्चे कॉलेज में थे। सोनू के लिए एक आरामदायक जिंदगी से अब चीजें बदल गईं और उन्हें अपने लिए और अपने बच्चों के लिए उत्तराधिकार की लड़ाई में उतरना पड़ा। सोनू के पक्ष में अच्छी चीज यह रही कि महिला उत्तराधिकार पर गहन विमर्श चालू हो चुका था और 2005 के बाद इसमें बदलाव भी आ चुके थे। 

उत्तराधिकार के पहले वर्ग में शामिल महिला को उत्तराधिकार मिलने का कानून

9 सितंबर, 2005 को हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में बेटी को अपने पिता की संपत्ति में समान अधिकार देने के लिए संशोधन कर दिए गए। अब बेटी अपने पिता की संपत्ति में अधिकार मांग सकती थी। कोई भी नया कानून नई व्याख्याओं और चुनौतियों की श्रंखला का सामना करता है।

महिलाओं के लिए उत्तराधिकार के कानून ने अगस्त 2020 में एक और अहम फ़ैसले की नींव रखी। इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी महिला के पिता का, कानून में संशोधन होने, मतलब 2005 से पहले निधन हो चुका है, तो भी उसका पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार होगा। 

जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाले तीन जजों के पैनल ने फ़ैसले में कहा कि बेटी का उत्तराधिकार का अधिकार संपूर्ण है। अगर कोपार्सनर (हमवारिस) जिंदा भी नहीं है, तो भी यह बरकरार रहेगा। कोर्ट ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि अगर बेटी की 2005 के पहले मौत भी हो चुकी हो, तो उसके बच्चे भी उत्तराधिकार में हिस्सा मांग सकते हैं। इसकी एकमात्र शर्त यह है कि संबंधित संपत्ति का 20 दिसंबर 2004 से पहले बंटवारा ना हुआ हो। यह वह तारीख़ थी, जब विधेयक में संशोधन किए गए थे।  

इस फ़ैसले से यह निश्चित हो गया कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 अब और भी ज़्यादा महिला हितैषी हो जाएगा। अगस्त, 2020 में दिए गए फ़ैसले से उन पुराने फ़ैसलों को पलट दिया गया, जिनमें कहा गया था कि नए नियम तभी लागू होंगे, जब पिता और बेटी 2005 में जिंदा रहे हों। 

इस नियम के चलते अब सोनू की बेटी अपने पिता की संपत्ति में बराबरी के अधिकार के लिए संघर्ष कर सकती है। 

विधवाओं के अधिकार

लेकिन सोनू का मामला इससे ज़्यादा पेचीदा है। एक विधवा के उसके पति की संपत्ति में क्या अधिकार हैं? हिंदू उत्तराधिकार कानून, 2005 के मुताबिक़, एक महिला को बेटी और पत्नी के तौर पर उत्तराधिकार के समान अधिकार हैं। अगर उसकी दोबारा शादी हो जाती है, तब भी वह उन अधिकारों की मांग कर सकती है। लेकिन एक विधवा के अपने मृत पति की संपत्ति में क्या अधिकार होते हैं, भले ही उसकी दोबारा शादी हो गई हो?

अगर पति की बिना वसीयत बनाए मृत्यु हो चुकी है तो उसकी विधवा को 'वर्ग-1 के उत्तराधिकारी का दर्जा' दिया जाएगा। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के मुताबिक़, उसका दूसरे उत्तराधिकारियों के बराबर ही संपत्ति पर अधिकार होगा। अगर कोई दूसरा कानूनी उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है, तो उसे पूरी संपत्ति दी जाएगी। इस तरह की संपत्ति का उत्तराधिकारी होने के बाद, महिला दूसरे उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना अपने हिस्से की संपत्ति बेच भी सकती है। 

अक्टूबर, 2020 में दिए गए एक फ़ैसले के मुताबिक़, अगर कोई महिला अपने पति के साझा परिवार में रह रही है, जिसमें सास-ससुर या फिर परिवार के दूसरे संबंधी मौजूद हों, तो उसे घर से नहीं निकाला जा सकता। यहां तक कि अगर उसका अपने पति के साथ भी विवाद हो गया हो, तब भी उसे नहीं निकाला जा सकता। पति और पत्नी के बीच लंबित मामले के निपटारे तक या फिर जब तक महिला कोई दूसरा रहवास स्थल नहीं देख लेती, तब तक इस तरह के निवास का अधिकार है। ध्यान रहे यह किसी संपत्ति पर अधिकार नहीं है। 

एक बहू को अपने ससुराल पक्ष के घर में रहने का अधिकार है। कानूनी तौर पर सोनू और उसके बच्चों को उसके पति की संपत्ति में उसके पिता और भाई-बहनों के समान ही बराबर का अधिकार है। एक बार जब उसे अपना हिस्सा मिल जाएगा, तो वह उसे बेचने के लिए भी सक्षम है।

लेकिन इस तरह के मामले में हर महिला का संघर्ष लंबा और कड़वा होता है। जब तक मामला ख़त्म नहीं हो जाता, उसे बिना वैवाहिक स्थिति के उसी साझा परिवार में रहने पर मजबूर होना पड़ता है। 

संपत्ति का बंटवारा

एक अविवाहित महिला के मामले में स्थिति अलग है। एक बार अगर महिला अपने पिता की संपत्ति में कोपार्सनर या पति की संपत्ति में वर्ग-1 के उत्तराधिकारी के तौर पर संपत्ति में अपने अधिकार हासिल कर लेती है, उसके बाद भी आगे संघर्ष जारी रहता है। 

हाल में सुप्रीम कोर्ट ने एक फ़ैसला दिया। जिसके मुताबिक़, कोई महिला अपनी संपत्ति को अपने खुद के परिवार को वसीयत में दे सकती है, भले ही यह उसके पति के पक्ष से हासिल की गई हो। बाद में महिला की मृत्यु के बाद यह उसके पिता के उत्तराधिकारियों द्वारा हासिल की जा सकती है।

यह चीज गुरुग्राम में जगनो देवी नाम की महिला के केस में सामने आई थी। जगनो देवी ने अपने परिवार वालों के साथ एक मौखिक समझौता किया था। जगनो जिस संपत्ति पर अपने परिवार के साथ समझौता कर रही थी, वो उसने पति के उत्तराधिकार से पाई थी। पति के परिवार ने जगनो देवी को कोर्ट में चुनौती दी और कहा कि उसके पिता के उत्तराधिकारी अजनबी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में समझौते को मान्य ठहराया।

अगर किसी हिंदू महिला का बिना वसीयत के निधन हो जाता है, तो क्या होता है? अगर संपत्ति खुद से बनाई गई या उत्तराधिकार की है, तो विवाहित और गैर-विवाहित महिला के मामले में उत्तराधिकार कानून अलग-अलग हैं। धारा 14 कहती है कि अविवाहित महिला द्वारा जो संपत्ति हासिल की गई होती है, वह उसके निधन की स्थिति में महिला के पिता के कानूनी वारिसों के पास जाती है। 

अगर किसी विवाहित महिला की मृत्यु हो जाती है तो धारा 15 लागू होती है। तब संपत्ति उसके पति और बच्चों को हासिल हो जाती है। महिला के पिता और माता उत्तराधिकार के पैमाने पर पति के बाद आते हैं।

वसीयत की अहमियत

अगर कोई वसीयत मौजूद है, तो वह उत्तराधिकार कानून पर अध्यारोही होगी। एक महिला अपने द्वारा हासिल संपत्ति की अपनी वसीयत लिख सकती है, वह जिसे चाहे वह संपत्ति दे सकती है। तब यहां हिंदू उत्तराधिकार कानून के नियम लागू नहीं होंगे।

धारा 15 के मुताबिक़, अगर पारिवारिक उत्तराधिकार की कोई संपत्ति पति द्वारा महिला के नाम से पंजीकृत की गई है, तब तलाक, महिला की मौत की स्थिति में उस संपत्ति पर पति के उत्तराधिकारियों का हक होगा। अगर महिला का बेटा या बेटी है, तो उनका उस संपत्ति पर पहला अधिकार होगा, उसके बाद दूसरे उत्तराधिकारियों का अधिकार होगा।

एक महिला के पास बतौर मां भी अधिकार होता है। चूंकि वह वर्ग-1 की उत्तराधिकारी होती है, तो उसके पास मृतक बेटे की संपत्ति पर बराबरी का अधिकार होता है। लेकिन कोर्ट के प्रगतिशील फ़ैसलों से उम्मीद बनती है कि सोनू जैसी कई महिलाएं संघर्ष कर इन कानूनी लड़ाईयों को जीत सकती हैं।
भले ही बाहरी दुनिया महिलाओं का समर्थन ना करे और उनके प्रति सदव्यवहार ना रखे, लेकिन जब बात कोर्ट की आती है, तो वहां उन्हें जजों और कोर्ट की पूरी सहानुभूति हासिल है।
यहाँ जिन अधिकारों की बात हुई है, वह सारे हिंदू महिलाओं के लिए हैं। मुस्लिम और क्रिश्चियन महिलाओं के लिए कानून अलग हैं और उन्हें अलग से समझने की जरूरत है।

(ई जयश्री कुरुप 25 साल से संपत्ति पर काम करने वाली पत्रकार हैं। वे हाल तक मैजिकब्रिक्स और इसके यू-ट्यूब चैनल MBTV की मुख्य संपादक थीं। वहां कुरुप और उनकी टीम ने संपत्ति से जुड़े कानूनी विषयों पर गहन शोध किया है। यह उनके निजी विचार हैं।)

यह लेख मूलत: द लीफलेट में प्रकाशित हुआ था।

इस लेख को मूलत: अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Progressive Judicial Orders Boost Hindu Women’s Inheritance Rights

Fundamental Rights
Judiciary
social justice
Supreme Court
women's rights

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

एक्सप्लेनर: क्या है संविधान का अनुच्छेद 142, उसके दायरे और सीमाएं, जिसके तहत पेरारिवलन रिहा हुआ

राज्यपाल प्रतीकात्मक है, राज्य सरकार वास्तविकता है: उच्चतम न्यायालय

राजीव गांधी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश दिया

मैरिटल रेप : दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या अब ख़त्म होगा न्याय का इंतज़ार!

राजद्रोह पर सुप्रीम कोर्ट: घोर अंधकार में रौशनी की किरण

सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मामलों की कार्यवाही पर लगाई रोक, नई FIR दर्ज नहीं करने का आदेश

क्या लिव-इन संबंधों पर न्यायिक स्पष्टता की कमी है?

उच्चतम न्यायालय में चार अप्रैल से प्रत्यक्ष रूप से होगी सुनवाई


बाकी खबरें

  • farmers
    चमन लाल
    पंजाब में राजनीतिक दलदल में जाने से पहले किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए
    10 Jan 2022
    तथ्य यह है कि मौजूदा चुनावी तंत्र, कृषि क़ानून आंदोलन में तमाम दुख-दर्दों के बाद किसानों को जो ताक़त हासिल हुई है, उसे सोख लेगा। संयुक्त समाज मोर्चा को अगर चुनावी राजनीति में जाना ही है, तो उसे विशेष…
  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License