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महेंद्र सिंह टिकैत और ऐतिहासिक बोट क्लब आंदोलन की याद दिलाते प्रदर्शनकारी किसान
तीन दशक पहले अक्टूबर 1988 में सिसौली (मुजफ़्फ़रनगर में टिकैत के घर) से किये गये एक आह्वान पर पश्चिमी उत्तरप्रदेश के विभिन्न गांवों के तक़रीबन 5 लाख किसानों ने अपनी 35-सूत्री मांग-पत्रों को लेकर राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच कर लिया था और बोट कल्ब के मैदान में घेरेबंदी कर दी थी।
तारिक़ अनवर
21 Jan 2021
महेंद्र सिंह टिकैत और ऐतिहासिक बोट क्लब आंदोलन की याद दिलाते प्रदर्शनकारी किसान

नई दिल्ली: हालांकि चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का निधन एक दशक पहले (16 मई, 2011) हो चुका है,लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान दिल्ली में यह कहकर हलचल मचा देते हैं कि उस दिग्गज किसान नेता और उनके ऐतिहासिक 1988 के बोट क्लब की उस तारीख़ तक वे सरकार को अपनी मांगों-तीन नये अधिनियमित कृषि क़ानूनों को वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य(एमएसपी) को लेकर क़ानूनी गारंटी-को मंज़ूर करने के लिए मजबूर कर देंगे।

किसानों ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को चेतावनी जारी करते हुए भगवा पार्टी के उन्हीं दो सांसदों-ए.के. पटेल और सी.जंगा रेड्डी को उद्धृत किया है,जिन्होंने तत्कालीन राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को चेतावनी दी थी,-“आंदोलित किसान का मतलब एक आंदोलित राष्ट्र होता है।”

“इतिहास इस सचाई की गवाही देता है कि बोट क्लब का वह विरोध उस कांग्रेस सरकार पर भारी पड़ा था,जो एक साल बाद 1989 (आम चुनाव) ही सत्ता से बेदखल हो गयी थी।ग़ाज़ीपुर बॉर्डर (राष्ट्रीय राजधानी के पांच दरबाज़ों में से एक,जहां 26 नवंबर से शांतिपूर्ण धरना चल रहा है) में डेरा जमाये बुज़ुर्ग किसानों में से एक,जिन्होंने 1988 की हड़ताल में भी हिस्सा लिया था,कहा,‘सत्तासीनों को इसे नहीं भूलना चाहिए।” 

1988 में हुआ क्या था ?

गन्ना उत्पादन के लिए उच्च पारिश्रमिक मूल्य,पानी और बिजली के बक़ाये की माफ़ी और उनके शुल्क में रियायतों की मांग करते हुए टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन (BKU) ने मेरठ के संभागीय आयुक्त के दफ़्तर का घेराव किया था। जब अफ़सरों और प्रदर्शनकारी किसानों के बीच चली बातचीत की एक श्रृंखला भी आंदोलनकारियों को समझा पाने में नाकाम रही थी, तब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री-वीर बहादुर सिंह ने भी टिकैत को चर्चा के लिए लखनऊ आमंत्रित किया था।

लेकिन,जाट बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए लखनऊ से कहीं ज़्यादा क़रीब तो दिल्ली थी। दिल्ली में उत्तरस्तरीय नेतृत्व के साथ कांग्रेस इन दोनों ही जगह सत्ता में थी। इसलिए, सिसौली (मुज़फ़्फ़रनगर में टिकैत के घर) से किये गये एक आह्वान पर पश्चिमी उत्तरप्रदेश के विभिन्न गांवों के तक़रीबन 5 लाख किसानों ने अपनी 35-सूत्री मांग-पत्रों को लेकर राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच कर लिया था और 25 अक्टूबर,1988 को बोट कल्ब के मैदान में घेरेबंदी कर दी थी।

मुज़फ़्फ़रनगर के भौरा कलां के रहने वाले 75 वर्षीय तिलक राम ने ग़ाज़ीपुर प्रदर्शन स्थल पर न्यूज़कल्कि से बताया, "तब भी हमें दिल्ली में दाखिल होने के लिए बैरिकेड तोड़ना पड़ा था, लेकिन पुलिस ने इस तरह सख़्त ताक़त का इस्तेमाल नहीं किया था।"

उन दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा, “वह एक शानदार प्रदर्शन था। बोट क्लब जलते हुए अलाव के चारों तरफ़ इकट्ठा होकर हुक्का गुड़गुड़ाते लोगों से पट गया था,यहां ग्रामीण जीवन एकदम से जीवंत हो गया था। बब्बा टिकैत ने दिल्ली के उस इलाक़े को एक ग्राम पंचायत में बदल दिया था। चारपाइयां,भैंसें और गाड़ियाँ थीं। हम दिन में दो बार भैंस का दूध पीते थे और लकड़ी की आग पर खाना बनाते थे।”

मुज़फ़्फ़रनगर के अठत्तर वर्षीय चंदर शहंशाह ने आगे बताया कि धरना आयोजित होते हुए एक सप्ताह बीत चुका था,और कांग्रेस को उसी स्थल पर इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि मनाने के लिए एक सभा का आयोजन करना था।

उन्होंने बताया, “पुलिस ने हमें बोट क्लब से हटाने के लिए सभी तरक़ीबें अपनायीं। उस इलाक़े में पानी और भोजन की आपूर्ति रोक दी गयी। हमें और हमारे मवेशियों को परेशान करने के लिए घनघोर रात में ज़ोर-ज़ोर से संगीत बजाया गया। जब ये तमाम तरक़ीबें काम नहीं आयीं, तो बल प्रयोग करने और बोट क्लब से हमें खदेड़ने के बजाय,धरना स्थल को लाल क़िले के मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया। लेकिन,अगले ही दिन सरकार ने मांगों को मंज़ूर कर लिया और धरना को ख़त्म कर दिया गया।”

महीनों बाद,उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री,एनडी तिवारी ने 1989 के लोकसभा चुनाव से पहले उनकी कई मांगों को मानते हुए बीकेयू के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये।

उस ऐतिहासिक आंदोलन को हुए 32 सर्दियां बीच जाने के बाद यह विरोध प्रदर्शन हो रहा है और गतिरोध ख़त्म करने के सिलसिले में कई दौर की वार्ता नाकाम हो चुकने के बाद भी किसान 26 नवंबर से राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर इंतज़ार कर रहे हैं।

मुज़फ़्फ़रनगर के खरर गांव के 70 वर्षीय सुखबीर सिंह ने कहा,“विगत में अपने प्रभाव और लोकप्रियता के बावजूद प्रधानमंत्रियों और उनके कैबिनेट मंत्रियों ने कभी भी बड़े पैमाने पर चलने वाले विरोध प्रदर्शन को इतने लंबे समय तक खिंचने नहीं दिया। लोकतंत्र का सम्मान करते हुए वे आगे आये,बातचीत की और सुनिश्चित किया कि दोनों पक्ष आम सहमति तक पहुंचें। आख़िर (प्रधानमंत्री) मोदी को हम तक ख़ुद से आने में क्या रोक रहा है ?”  

प्रदर्शनकारियों को गर्म रखने के लिए ग़ाज़ीपुर फ़्लाईओवर के नीचे एक कोने में जल रहे एक अलाव की ओर अपने पैर फ़ैलाये बाग़पत के 64 वर्षीय अशोक कुमार ने सिंह से सहमति जताते हुए कहा कि सरकार उन दिनों इतनी "ज़िद्दी" नहीं हुआ करती थी और इसलिए अपने पैर पीछे खींच लेती थी,ताकि जीवन सामान्य हो सके।

लेकिन,इसके साथ ही इस कामयाबी के लिए वे किसानों पर सीनियर टिकैत के जादुई असर और किसानों की मांगों के प्रति उनकी ईमानदार प्रतिबद्धता को भी श्रेय देते हैं।

कुमार ने बीकेयू के उस दिवंगत नेता की तारीफ़ का पुल बांधते हुए कहा,“चौधरी साब का किसानों और उन दिनों की सरकार पर कुछ जादुई असर सा था। विरोध के उनके ग़ैर-परंपरागत तरीक़ों ने उन्हें एक ऐसा नेता बना दिया था,जो मुश्किल और अप्रिय स्थितियों से निपट सकते थे। वह शेर की तरह दहाड़ा करते थे,और उनकी ईमानदारी और निस्वार्थता के कारण कोई भी कभी भी उनका सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। वह तो एक 'भगत' (भगत सिंह) थे। उनके पास अलग-अलग सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि के विशेषज्ञों का एक ऐसा समूह था,जो उनकी ओर से सरकार के साथ बातचीत करता था। लेकिन,उन्होंने अपनी प्रसिद्धि और विशाल समर्थन को कभी भी अपने सर नहीं चढ़ने दिया।”

मुज़फ़्फ़रनगर के दिनेश बलियान ने कहा,"टिकैत लोगों की यादों से धुंधले पड़ सकते हैं,क्योंकि नयी पीढ़ी को आये हुए अभी पिछला एक दशक या उससे ज़्यादा समय ही हुआ है,लेकिन 1980 के दशक में लखनऊ और दिल्ली की सरकारें तो उनके आंदोलन के ऐलान से ही हरक़त में आ जाती थीं।"

उन्होंने याद करते हुए कहा, ''उन्होंने किसानों की ताक़त का इस्तेमाल उनके अधिकारों को लेकर लड़ने के लिए किया।हज़ारों-लाखों किसान हर गांव की घेरेबंदी करते थे,जिन्हें वे उनकी मांगों के पूरा होने के बाद ही उठाते थे।”

किसान आंदोलन-तब और अब

उत्तर प्रदेश के अमरोहा के 69 वर्षीय सबरपाल सिंह ने इस समय चल रहे किसान आंदोलन और बोट क्लब के उस आंदोलन के बीच की समानतायें दिखाते हुए कहा कि 1988 के उस आंदोलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की ही भागीदारी थी,लेकिन इस समय जो हड़ताल चल रही है,उसमें देश भर के किसान हैं और इसका मक़सद किसानों का व्यापक हित है।

उन्होंने कहा,"यह ज़्यादा समावेशी है और बोट क्लब के विरोध के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बड़ा है। वो ज़माना दूसरा था, यह ज़माना दूसरा है।”

किसान नेता,चौधरी चरण सिंह के बीमार पड़ जाने और बाद में उनके निधन हो जाने के बाद टिकैत उत्तर भारत की सुर्ख़ियों में आये थे। लेकिन,जानकारों के मुताबिक़, वह ख़ुद को दिल्ली में अखिल भारतीय किसानों की आवाज़ बनाने में नाकाम रहे। महाराष्ट्र के शेतकारी संगठन के शरद जोशी और राष्ट्रीय लोकदल के अजीत सिंह क्रमशः वीपी सिंह और नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकारों में किसानों के नेता के तौर पर उभरे। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ने समर्थन जुटाने को लेकर उसी दिग्गज नेता की क्षमता पर भरोसा किया। 

इसे समझाते हुए सबरपाल सिंह ने न्यूज़क्लिक से बताया, “जब किसानों ने बोट क्लब में धरना दिया,तो संसद का शीतकालीन सत्र अगले कुछ ही दिनों में शुरू होने वाला था। सरकार किसान की मांगों के सामने झुक गयी, विवाद को हल कर लिया और निर्धारित सत्र अपने समय से ही चला। लेकिन आज,मोदी सरकार हमारी शिकायतों को सुनने और उनके समाधान के प्रयास के बजाय, इस विरोध को ख़त्म करने की सभी गंदे चालें चल रही है। उसने अपनी नाकामियों पर उठ रहे सवालों से बचने के लिए संसद का शीतकालीन सत्र तक रद्द कर दिया।”

सुखबीर ने कहा, 'उस समय भी मीडिया (दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो) सरकार द्वारा ही नियंत्रित था। जो कुछ चल रहा होता,उसकी हक़ीक़त जानने के लिए हमारे पास बीबीसी लगाने या अख़बारों के लिए सुबह तक का इंतज़ार करना ही एकमात्र विकल्प था। निजी 24X7 टीवी समाचार चैनल तो थे, लेकिन कोई मोबाइल फ़ोन और कोई इंटरनेट नहीं था। आज,जब सरकार द्वारा संचालित मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों के अलावा,निजी टेलीविज़न नेटवर्क ने भी समझौता किया हुआ है, तो हमारे पास उस सोशल मीडिया का ही विकल्प बचता है,जो लोगों की चिंताओं को सामने रख रहे हैं।”

दोनों आंदोलन में जो एक अनूठी समानता है,जिसे तक़रीबन सभी लोग मानते हैं, वह  है- दोनों आंदोलनों का किसी भी राजनीतिक दल के साथ किसी तरह का कोई जुड़ाव का नहीं होना।

सुखबीर ने बताया, “बीकेयू ने तब राजनेताओं को किसानों को संबोधित करने के लिए अपने मंच का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी थी। टिकैत उस आंदोलन को इसी तरह जारी रखना चाहते थे। शायद, यह इसकी कामयाबी के अहम कारणों में से एक था। अख़बारों ने इस हक़ीक़त पर ग़ौर किया और इस पर कई संपादकीय लिखे गये। नतीजतन, इस विरोध को जनता की सहानुभूति मिली। इसी तरह,चल रहे मौजूदा आंदोलन में शामिल किसान संगठनों ने भी अपने मंच पर राजनेताओं को नहीं आने दिया है। यही वजह है कि जनता की सहानुभूति किसानों के प्रति बढ़ती जा रही है। ”

उस विरोध प्रदर्शन के एक सप्ताह के भीतर किसानों की मांगों को स्वीकार करने के बावजूद (1989 में) कांग्रेस को वोट नहीं मिल पाने की नाकामी पर टिप्पणी करते हुए मेरठ के 83 वर्षीय राजेंद्र सिंह ने कहा, “राजीव गांधी सरकार बोफ़ोर्स घोटाले के विवाद में फंस गयी थी। यही वीपी सिंह के इस्तीफ़े की वजह बना, जो 1989 के चुनाव के बाद जनता दल के नेता होने  के नाते बतौर प्रधानमंत्री चुने गये थे। अलोकप्रिय हो चुकी कांग्रेस के ख़िलाफ़ तब बहुत बड़ी सत्ता विरोधी लहर थी।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करे

Protesting Farmers Remember Mahendra Singh Tikait and Historic Boat Club Agitation

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Anti Farmer Policies of Modi Government
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