NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पंजाब विधानसभा चुनाव: परंपरागत सियासत पर सवाल खड़े करती जनता 
“किसान आंदोलन पंजाब के लोगों के लिए सिर्फ़ आंदोलन नहीं है, बल्कि एक विश्वविद्यालय है जिसमें उन्होंने बहुत कुछ सीखा भी है और सीखे हुए को वे व्यवहारिक रूप देने की कोशिश भी कर रहे हैं।”
शिव इंदर सिंह
13 Sep 2021
पंजाब विधानसभा चुनाव: परंपरागत सियासत पर सवाल खड़े करती जनता 

पंजाब विधानसभा चुनावों में महज़ पांच महीने से भी कम का समय रह गया है। भाजपा से गठजोड़ तोड़कर बहुजन समाज पार्टी के साथ गठजोड़ करने के बाद शिरोमणि अकाली दल ने अभी से ही अपनी चुनावी सरगर्मियां शुरू कर दी हैं और अपने उम्मीदवारों का ऐलान करना भी शुरू कर दिया है। अपनी कमज़ोर हुई जकड़ को मजबूत करना अकाली दल के लिए बड़ी चुनौती है। कांग्रेस में हालांकि अंदरूनी खींचतान चल रही है, लेकिन उसे यकीन है कि वह जल्दी ही इसका हल कर लेगी और अपनी मजबूत स्थिति को बनाये रखेगी।

आम आदमी पार्टी के लिए अपनी स्थिति को मजबूत करना बड़ी सिरदर्दी बनी हुई है। पार्टी का मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, इस बारे पार्टी हाईकमान फैसला नहीं ले रही है। हाईकमान को डर है कि ऐसा करने से कहीं पार्टी की फूट सामने न आ जाये।

जहां एक ओर राज्य की तीनों प्रमुख पार्टियां विधानसभा चुनावों को लेकर कमर कस रही हैं, वहीं दूसरी ओर पंजाब के अवाम में इन चुनावों को लेकर कोई उत्साह नहीं नज़र आ रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों का सारा ध्यान किसान आंदोलन को सफ़ल बनाने में ही लगा हुआ है।

पंजाब में लोग भाजपा के साथ-साथ दूसरी राजनीतिक पार्टियों का भी विरोध कर रहे हैं। लोगों में यह धारणा बन रही है कि सारी सियासी पार्टियां लगभग एक जैसी ही हैं। राज्य में भाजपा के राजनीतिक व सामाजिक कार्यक्रमों का पहले ही बायकाट हो रहा है। लोग अब अकाली दल, आप और कांग्रेस के नेताओं को भी घेरकर सवाल करने लगे हैं एवं उनके राजनीतिक कार्यक्रमों के बायकाट के साथ-साथ अपने गांवों में “सियासी पार्टियों का गांवों में आना मना है” व “जब तक दिल्ली मोर्चा तब तक चुनाव नहीं” के बोर्ड लगाने शुरू हो गए  हैं।

मालवा क्षेत्र के करीब 200 गांवों ने ऐसे ‘चेतावनी बोर्ड’ लगा दिए हैं। जिनमें साफ़ लिखा हुआ है कि किसी भी पार्टी का राजनीतिक नेता उनके गांव में कदम न रखे। ‘चेतावनी बोर्ड’ लगाने में बठिंडा जिला सबसे आगे है जहां पर अब तक 30 से अधिक गांवों ने ऐसा कदम उठाया है। इसी जिला के गांव जंगीराणा में तो राजनैतिक पार्टियों को पोस्टर लगाने पर भी मनाही है। बठिंडा के ही नंगला, बहमन जस्सा, बुर्ज महमा व चठ्ठेवाला गांवों में भी इसे सख्त फैसले लिए गये हैं। मानसा जिला में अब तक 25 से ज्यादा गांवों में ‘चेतावनी बोर्ड’ लगे हैं। इसी जिले के गांव गोविन्दपुरा के किसान नेता मेजर सिंह बताते हैं, “गांवों की जवानी और किसानी दोनों में सभी सियासी नेताओं के प्रति बेहद रोष है, हमें लगता है कि किसी भी नेता या पार्टी ने हमारी बांह नहीं पकड़ी।” 

बेशक संयुक्त किसान मोर्चा ने सिर्फ भाजपा नेताओं के बहिष्कार करने का फैसला किया था और अन्य पार्टियों से सवाल पूछने की बात कही थी। लेकिन ऐसा लगता है कि गांव जाग उठे हों। बरनाला जिला के करीब 20 गांवों ने लोगों को इकठ्ठा करके प्रस्ताव पारित किये हैं और गांवों के मुख्य रास्तों पर फ्लेक्स बोर्ड लगाए हैं ताकि कोई राजनैतिक पार्टी का नेता गांव में दाखिल होने की हिम्मत न कर सके। गांव जोधपुर में बीकेयू (कादीयां) और बीकेयू (डकौन्दा) ने मीटिंग करके सियासी पार्टियों के बॉयकाट का प्रस्ताव पास किया है। इलाके के किसान नेता उधम सिंह ने न्यूजक्लिक को बताया, “जब से फैसला हुआ है तब से किसी नेता ने गांव की तरफ मुंह नहीं किया है।” जिला मुक्तसर के 15 से अधिक गांवों ने ऐसे ही प्रस्ताव पास किये हैं। इसी जिला के गांव रहूरियावाली में नौजवानों, किसानों और मजदूरों द्वारा तीन ‘चेतावनी पोस्टर’ लगाये गये हैं जिनमें सियासी दलों के नेताओं को गांव में न घुसने देने बारे चेताया गया है। इसी तरह जिला मोगा, फिरोजपुर, संगरूर व् पटियाला के दर्जनों गांव इसी राह पर हैं। 

किरती किसान यूनियन के वरिष्ठ नेता राजिंदर सिंह दीपसिंहवाला हमें बताते हैं, “खेती कानूनों ने लोगों को जगाया है जिन्हें हुकूमतों ने मुसीबतों और कठिनाइयों की जकड़ में रखा हुआ था। खेती कानूनों के खिलाफ छिड़े ऐतिहासिक संघर्ष की लौ पंजाब को नयी दिशा देगी। अगर यह लहर और ज़ोर पकड़ गई तो चुनाव प्रचार के लिए नेताओं का निकलना मुश्किल हो जायेगा।” 

निस्संदेह, पंजाब में चल रहे किसानी संघर्ष ने लोगों को सियासी तौर पर सचेत किया है। इसका एक उदाहरण है बठिंडा जिला के 70 वर्षीय किसान गुरनाम सिंह। वह कहते हैं, “मैं शुरू से ही किसान मोर्चे के साथ जुड़ा हुआ हूं, मोर्चे के दौरान अपने नेताओं के भाषण और विद्वानों की बातों से मुझे पता लगा है कि भाजपा समेत सारी पार्टियां लोगों का लहू पीने वाली जोंके हैं, ये कॉर्पोरेट घरानों के हितों के लिए काम करती हैं। काले खेती कानूनों के लिए भाजपा तो जिम्मेवार है ही दूसरी पार्टियां भी दोषमुक्त नहीं, उन्होंने भी लोगों से झूठे वायदे किये हैं। जैसे कांग्रेस पार्टी ने नशा खत्म करने, घर-घर नौकरी देने के वायदे पूरे नहीं किये उसी तरह अकाली दल भी इन कृषि कानूनों का शुरू में समर्थन करता रहा, यही हाल आम आदमी पार्टी का था। ये सारी सियासी पार्टियां लोगों के तिरस्कार की पात्र हैं।” 

कई स्थानों पर लोगों व सियासी पार्टियों के बीच टकराव तीखे रूप में भी सामने आया है। गांवों के सरपंच इस मामले पर चुप हैं। क्योंकि हर कोई किसानी की नाराजगी से डर रहा है। पंजाब कांग्रेस के प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू को भी किसानी रोष का रंग देखना पड़ा। आम आदमी पार्टी के कई विधायक लोगों के सवालों से डरकर भागे हैं। इसी महीने के पहले हफ्ते जिला मोगा में अकाली दल की रैली में जब किसानों ने रैली का तीखा विरोध किया तो उनपर जमकर लाठीचार्ज किया गया। संयुक्त मोर्चा कई बार राजनैतिक पार्टियों को कह चुका है कि वे चुनावों के ऐलान से पहले अपनी सियासी सरगर्मियां न करें, 10 सितम्बर को पंजाब के 32 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाजपा को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों के साथ बैठक की जिसमें किसान नेताओं ने स्पष्ट कहा कि चुनावों के ऐलान से पहले कोई भी पार्टी राजनैतिक रैलियां न करे और ऐसा करने वाली पार्टी को किसान विरोधी माना जायेगा।

पंजाब की राजनीती पर पकड़ रखने वाले सीनियर पत्रकार राजीव खन्ना का कहना है, “किसान आंदोलन पंजाब के लोगों के लिए सिर्फ आंदोलन नहीं है बल्कि एक विश्वविद्यालय है जिसमें उन्होंने बहुत कुछ सीखा भी है और सीखे हुए को वे व्यवहारिक रूप देने की कोशिश भी कर रहे हैं। आंदोलन ने लोगों को सिखाया है कि राजनैतिक पार्टियों व बड़े कॉरपोरेट्स की सांठगाठ कैसे है। किसान आंदोलन ने लोगों में भाईचारिक एकता व सियासी चेतना पैदा की है। सियासी पार्टियां समझती हैं कि इस aआंदोलन का प्रभाव अल्पकालिक और अस्थाई है और चुनावों के दौरान लोगों का ध्यान सत्ता के लोभ-लालच के द्वारा भटकाया जा सकता है। पर सियासी पार्टियां गलत हैं। 2022 का पंजाब विधानसभा चुनाव साधारण नहीं होगा। राजनैतिक पार्टियों को किसानों व आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर जनता से संवाद करना ही पड़ेगा।”

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

punjab
Punjab assembly elections
BJP
BSP
Congress
kisan andolan
Samyukt Kisan Morcha

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Indian Economy
    न्यूज़क्लिक टीम
    पूंजी प्रवाह के संकेंद्रण (Concentration) ने असमानता को बढ़ाया है
    31 Jan 2022
    पिछले एक दशक में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा उधार देने का तरीका बदल गया है, क्योंकि बड़े व्यापारिक घराने भारत से बाहर पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। रोहित चंद्रा, जो आईआईटी दिल्ली में…
  • unemployment
    सोनिया यादव
    देश में बढ़ती बेरोज़गारी सरकार की नीयत और नीति का नतीज़ा
    31 Jan 2022
    बेरोज़गारी के चलते देश में सबसे निचले तबके में रहने वाले लोगों की हालत दुनिया के अधिकतर देशों के मुक़ाबले और भी ख़राब हो गई। अमीर भले ही और अमीर हो गए, लेकिन गरीब और गरीब ही होते चले जा रहे हैं।
  •  Bina Palikal
    राज वाल्मीकि
    हर साल दलित और आदिवासियों की बुनियादी सुविधाओं के बजट में कटौती हो रही है :  बीना पालिकल
    31 Jan 2022
    काफी सालों से देखते आ रहे हैं कि हर साल सोशल सेक्टर बजट- जो शिक्षा का बजट है, जो स्वास्थ्य का बजट है या जो बजट लोगों के उद्योग के लिए है, इस बजट की कटौती हर साल हम लोग देखते आ रहे हैं। आशा है कि इस…
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    एक चुटकी गाँधी गिरी की कीमत तुम क्या जानो ?
    31 Jan 2022
    न्यूज़ चक्र में आज अभिसार शर्मा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए बता रहे हैं कि कैसे गाँधी देश को प्रेरित करते रहेंगे।
  • nirmala sitharaman
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    2022-23 में वृद्धि दर 8-8.5 प्रतिशत रहेगी : आर्थिक समीक्षा
    31 Jan 2022
    समीक्षा के मुताबिक, 2022-23 का वृद्धि अनुमान इस धारणा पर आधारित हैं कि आगे कोई महामारी संबंधी आर्थिक व्यवधान नहीं आएगा, मानसून सामान्य रहेगा, कच्चे तेल की कीमतें 70-75 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License