NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
न्यायपालिका को आज़माइश में डालना
इस तरह की बेरोक-टोक आलोचना संस्थानों की स्वतंत्रता को बुरी तरीके से प्रभावित कर सकती है।
हिरेन गोहेन
16 Mar 2020
न्यायपालिका को आज़माइश में डालना

भाजपा के एक सांसद ने कथित तौर पर संसद में आरोप लगाया है कि हाल ही में दिल्ली के दंगों को भड़काने के अपराध में देश की "न्यायिक व्यवस्था" एक अन्य दोषी है। ये बयान निंदनीय और बेहद चौंकाने वाला है। ये टिप्पणी न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया में रुकावट पैदा करती है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों सहित न्यायाधीशों के फैसले में भी बाधा उत्पन्न करता है।

गौरतलब है कि भाजपा सर्वोच्च न्यायालय को श्रेष्ठ निर्णय देने वाला बताती है लेकिन इस मामले में भाजपा के एक नेता ने इसे निर्णय में विफलता के लिए दोषी ठहराया है। इसमें पीछे न रहते हुए भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी जिन्होंने दंगों को लेकर एक तत्काल मामले के बीच में एक न्यायाधीश के पहले से चल रहे हस्तांतरण की प्रक्रिया को सही ठहराने के लिए खुफिया ब्यूरो (आईबी) की रिपोर्ट के बारे में निराशाजनक टिप्पणी की। व्यापक तौर पर इन दंगों को बड़ी तबाही के तौर पर माना गया है।

अब यह एक समस्या है कि आईबी को न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण और पदोन्नति को लेकर फैसलों को प्रभावित करने की क्या अनुमति दी जाती है। आईबी को अक्सर उसके अपने काम करने के अकुशल तरीकों को लेकर दोषी ठहराया गया है। प्रत्यक्ष रूप से यह सत्तारूढ़ दलों के दबाव को लेकर भी कुख्यात है। तो फिर निष्पक्ष और सावधानीपूर्वक जांच के बिना इसकी रिपोर्ट को न्यायाधीशों की सत्यनिष्ठा पर अंतिम शब्द कैसे माना जा सकता है?

दूसरे, यह चौंकाने वाला है कि उन्हें स्पीकर और विपक्ष दोनों के द्वारा उपयुक्तता के गंभीर उल्लंघनों से दूर रहने की अनुमति दी गई है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता संवैधानिक लोकतंत्र का एक आधार है। इस तरह की बेरोक-टोक आलोचना इस स्वतंत्रता को गंभीर तरीके से नीचे की तरफ दबा सकते हैं।

मेरी विनम्र सलाह है कि सुप्रीम कोर्ट को भी इस तरह के गैरजिम्मेदार आलोचना के खिलाफ कड़ी चेतावनी देनी चाहिए। अदालत के निर्णय की तर्कसंगत चर्चा और आलोचना की जा सकती है और किसी भी जीवंत लोकतंत्र में न्यायपालिका इस तरह की जांच पड़ताल के लिए काफी सतर्क होती है और सावधानीपूर्वक तथा न्यायसंगत तर्क के आधार पर अपने निर्णय देने के लिए काफी सतर्क रहती है। निर्णय देने में निष्क्रियता या पूर्वाग्रह की कोई भी धारणा इसके प्रभाव को कमजोर कर सकती है और राज्य के तीन मुख्य स्तंभों के उत्कृष्ट संतुलन को खतरे में डाल सकती है।

आज हमारा लोकतंत्र विकट परिस्थिति में है और ऐसा लगता है कि कार्यकारी शक्ति राज्य को विभिन्न दिशाओं में गति देने के बजाय इसे सुचारू रूप से आगे बढ़ाने में कम दिलचस्पी दिखा रही है। न्यायपालिका को न्यायिक हस्तक्षेप के साथ शक्तियों के संतुलन को बनाए रखना अनिवार्य है। इस तरह के कठिन समय में न तो शिथिलता और न ही उतावलापन किसी भी तरह से उपयोगी होगा।

यह दिलचस्प है कि दो न्यायाधीशों वाली अवकाश पीठ ने योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा निजता पर गंभीर हमले के साथ नागरिकों के जीवन के अपरिहार्य अधिकारों और स्वतंत्रता को लेकर दिए गए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक नहीं लगाई है। उच्च न्यायालय का यह मानना कि यह "संवैधानिक मूल्यों का घोर उल्लंघन है" जिसने हमारे संविधान को एक बड़े खतरे में डाल दिया है। न्यायपालिका की ओर से इस तरह का रुख हमें बढ़ती चिंताओं के बीच राहत की सांस देता है।

लेखक सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणीकार और सांस्कृतिक आलोचक हैं। ये लेखक निजी विचार है।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Putting the Judiciary on Trial

Judiciary
Uttar Pradesh posters
BJP
Meenakshi Lekhi
Parliament

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी: अयोध्या में चरमराई क़ानून व्यवस्था, कहीं मासूम से बलात्कार तो कहीं युवक की पीट-पीट कर हत्या
    19 Mar 2022
    कुछ दिनों में यूपी की सत्ता पर बीजेपी की योगी सरकार दूसरी बार काबिज़ होगी। ऐसे में बीते कार्यकाल में 'बेहतर कानून व्यवस्था' के नाम पर सबसे ज्यादा नाकामी का आरोप झेल चुकी बीजेपी के लिए इसे लेकर एक बार…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ट्रेड यूनियनों की 28-29 मार्च को देशव्यापी हड़ताल, पंजाब, यूपी, बिहार-झारखंड में प्रचार-प्रसार 
    19 Mar 2022
    दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को सफल बनाने के लिए सभी ट्रेड यूनियन जुट गए हैं। देश भर में इन संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठकों का सिलसिला जारी है।
  • रवि कौशल
    पंजाब: शपथ के बाद की वे चुनौतियाँ जिनसे लड़ना नए मुख्यमंत्री के लिए मुश्किल भी और ज़रूरी भी
    19 Mar 2022
    आप के नए मुख्यमंत्री भगवंत मान के सामने बढ़ते क़र्ज़ से लेकर राजस्व-रिसाव को रोकने, रेत खनन माफ़िया पर लगाम कसने और मादक पदार्थो के ख़तरे से निबटने जैसी कई विकट चुनौतियां हैं।
  • संदीपन तालुकदार
    अल्ज़ाइमर बीमारी : कॉग्निटिव डिक्लाइन लाइफ़ एक्सपेक्टेंसी का प्रमुख संकेतक है
    19 Mar 2022
    आम तौर पर अल्ज़ाइमर बीमारी के मरीज़ों की लाइफ़ एक्सपेक्टेंसी 3-12 सालों तक रहती है।
  • पीपल्स डिस्पैच
    स्लोवेनिया : स्वास्थ्य कर्मचारी वेतन वृद्धि और समान अधिकारों के लिए कर रहे संघर्ष
    19 Mar 2022
    16 फ़रवरी को स्लोवेनिया के क़रीब 50,000 स्वास्थ्य कर्मचारी काम करने की ख़राब स्थिति, कम वेतन, पुराने नियम और समझौते के उल्लंघन के ख़िलाफ़ हड़ताल पर चले गए थे।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License