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भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल
दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता पर जारी अमेरिकी विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट भारत के संदर्भ में चिंताजनक है। इसमें देश में हाल के दिनों में त्रिपुरा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में मुस्लिमों के साथ हुई लिंचिंग की घटनाओं के साथ ही भड़काऊ भाषणों को भी शामिल किया गया है।
सोनिया यादव
03 Jun 2022
Antony Blinken
Image courtesy : AP

"भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। वहां हाल के दिनों में लोगों पर और उपासना स्थलों पर हमले के मामले बढ़े हैं।"

ये टिप्पणी अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय की 2021 की रिपोर्ट जारी करते हुए भारत के संबंध में की। ब्लिंकेन ने एक बार फिर भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि हाल के दिनों में भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थल को लेकर लोगों पर हुए हमले बढ़े हैं। पुलिस ने ऐसे ग़ैर-हिंदुओं को गिरफ़्तार किया जिन्होंने मीडिया या फिर सोशल मीडिया पर कुछ ऐसा लिखा जिसे हिंदुओं और हिंदुत्व के लिए 'अपमानजनक' बताया गया। इस रिपोर्ट में त्रिपुरा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में मुस्लिमों के साथ हुई लिंचिंग की घटनाओं का भी ज़िक्र किया गया है।

बता दें कि यह रिपोर्ट अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ़) की जारी रिपोर्ट से अलग है। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने सिफारिश की थी कि भारत को उन देशों की सूची में डाला जाए, जहां धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति चिंताजनक है। आयोग की ओर से बीते तीन सालों से यह सिफ़ारिश की जा रही है लेकिन भारत को अभी तक इस सूची में नहीं डाला गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हालिया जारी इस रिपोर्ट में अमेरिका ने भारत में ऐसे कानूनों की ओर संकेत किया है जो धर्म परिवर्तन पर पाबंदियां लगाते हैं। रिपोर्ट में मुसलमानों और ईसाइयों के साथ धर्म के नाम पर भेदभाव के उदाहरण दिए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के नेताओं ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ टिप्पणियां की हैं या सोशल मीडिया पर लिखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदू-राष्ट्रवादी सरकार ने ऐसे कई कानून बनाए हैं जिन्हें मानवाधिकार कार्यकर्ता और आलोचक भेदभावकारी बताते हैं।

क्या है इस रिपोर्ट में?

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की इस रिपोर्ट में साल 2021 में दुनिया के अलग-अलग देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट को अमेरिकी विदेश मंत्रालय के इंटरनेशनल रिलीजियस फ़्रीडम विभाग के राजदूत रशद हुसैन के नेतृत्व में तैयार किया गया है। इस अवसर पर गुरुवार, 2 जून को रशद हुसैन ने कहा कि भारत में कुछ नेता लोगों और धर्म स्थलों पर बढ़ते हमलों को नजरअंदाज ही नहीं बल्कि समर्थन भी कर रहे हैं।

इस रिपोर्ट में आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान को भी शामिल किया गया है जिसमें भागवत ने कहा था कि भारत में हिंदुओं और मुसलमानों का डीएनए एक है और इन्हें धर्म के आधार पर अलग-अलग नहीं किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि संघ प्रमुख ने कहा था कि मुस्लिमों को इस बात से नहीं डरना चाहिए कि भारत में इस्लाम खतरे में है और गाय की हत्या के लिए किसी गैर हिंदू की हत्या कर देना हिंदू धर्म के खिलाफ है।

रिपोर्ट को जारी करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री ने जिन देशों का विशेष तौर पर नाम लिया उनमें सऊदी अरब, चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं। ब्लिंकेन ने कहा कि चीन मुख्यतौर पर उइगुर मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों का संहार और दमन जारी रखे हुए है। अप्रैल 2017 से 10 लाख से ज्यादा उइगुर, कजाख मूलवासी और अन्यों को शिनजियांग के शिविरों में हिरासत में रखा गया है।

ब्लिंकेन ने धार्मिक स्वतंत्रता ना सिर्फ एक मूलभूत अधिकार और अमेरिकी विदेश नीति की महत्वपूर्ण प्राथमिकता बताते हुए पाकिस्तान की स्थिति पर भी बात की। उन्होंने कहा कि 2021 में पाकिस्तान में कम से कम 16 लोगों को या तो ईशनिंदा के आरोप में या तो अदालत ने मौत की सजा सुनाई या फिर उन पर ऐसे आरोप लगाए गए। इस दौरान वियतनाम और नाइजीरिया का उदाहरण भी दिया गया।

ब्लिंकेन का मानवाधिकारों को लेकर वार और विदेश मंत्री जयशंकर का पलटवार

गौरतलब है कि बीते अप्रैल में भारत और अमेरिका के वरिष्ठ मंत्रियों के बीच 2+2 वार्ता के दौरान एक प्रेस सम्मेलन में भी ब्लिंकेन ने भारत में मानवाधिकारों की स्थिति पर टिप्पणी की थी। ब्लिंकेन ने 11 अप्रैल को वॉशिंगटन में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की मौजूदगी में कहा था कि अमेरिका भारत में मानवाधिकारों के मोर्चे पर कुछ "चिंताजनक घटनाओं" पर नजर बनाए हुए है। हालांकि इसके कुछ ही दिन बाद 14 अप्रैल को भारतीय विदेश मंत्री ने पलटवार करते हुए एक बयान दिया था। जयशंकर ने पत्रकारों से कहा था कि लोगों को हमारे बारे में राय रखने का अधिकार है। हमें भी उतना ही अधिकार है कि उनकी राय, उसके पीछे के हित और उसे बनाने वाली लॉबियों और वोट बैंक पर अपनी राय रखें, तो इस पर जब भी कभी चर्चा होगी, मैं आपको बता सकता हूं कि हम अपनी पूरी बात रखेंगे।

इससे पहले 12 अप्रैल को न्यूयॉर्क में दो सिखों पर हुए एक कथित नस्लीय हमले के संदर्भ में जयशंकर ने कहा था, "हम भी दूसरे देशों में मानवाधिकारों की स्थिति पर राय रखते हैं और इनमें अमेरिका भी शामिल है। जब भी इस देश में मानवाधिकार का कोई मुद्दा सामने आता है, हम उसे उठाते हैं, विशेष रूप से जब वो हमारे समुदाय का हो। बल्कि, हाल ही ऐसा एक मामला सामने आया था...हमारा इस विषय पर यही रुख है।"

मालूम हो कि भारत में लगातार हो रहे धार्मिक हमलों को लेकर अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कई बार चिंता जाहिर की है। हरिद्वार धर्म संसद में मुसलमानों के नरसंहार की अपील और उसके बाद ऐप द्वारा मुस्लिम महिलाओं की नीलामी की कोशिश जैसी घटनाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बनी। जेनोसाइड वॉच नामक संस्था के संस्थापक ग्रेगरी स्टैंटन ने जनवरी में भारत के बारे में अमेरिकी संसद को बताया था, "हम मानते हैं कि हरिद्वार में हुई बैठक का असली मकसद नरसंहार को भड़काना ही था। जेनोसाइड कन्वेंशन के तहत नरसंहार को भड़काना एक अपराध है, और भारत में भी यह गैरकानूनी है।

उन्होंने कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हिंसा के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोला है। स्टैंटन ने कहा था, "हरिद्वार की बैठक में मुसलमानों के खिलाफ जो भाषा प्रयोग की गई, वह अल्पसंख्यक समुदाय का अमानवीयकरण करती है और ध्रुवीकरण पैदा करती है, जो नरसंहार के लिए हालात पैदा करते हैं।”

मौजूदा सरकार हिंदू-राष्ट्रवाद के दर्शन को आगे बढ़ाने का कर रही है काम

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की इससे पहले और इस रिपोर्ट में भी यही दोहराया गया है कि साल भर में भारत सरकार ने अपनी हिंदू-राष्ट्रवादी नीतियों को और मजबूत करने के लिए कई नीतियां अपनाई हैं जो मुसलमान, ईसाई, सिख, दलित और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ काम कर रही हैं। रिपोर्टें कहती हैं कि भारत सरकार व्यवस्थागत तरीके से मौजूदा और नए कानूनों के जरिए अपने हिंदू-राष्ट्रवाद के दर्शन को आगे बढ़ाने पर काम कर रही है।

बहरहाल, इसमें कोई शक नहीं कि भारत में बीते कुछ सालों में सांप्रदायिक तनाव की कई घटनाएं सामने आई हैं, जिसमें सरकार का रवैया निराशाजनक रहा है। लेकिन इस संदर्भ में अमेरिका को भी दूध का धुला नहीं कहा जा सकता। अमेरिका में नस्लीय हिंसा और भेदभाव को लेकर 'ब्लैक लाइफ मैटर्स' आंदोलन का उदाहरण हम सबके सामने है। ऐसे में एक-दूसरे पर छींटाकशी करने से अच्छा है कि सभी देश ऐसी समस्याओं का एक साथ मिलकर हल ढूंढ़ने का प्रयास करें।

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