NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
आरबीआई! टॉप डिफॉल्टरों का 62 हज़ार करोड़ का क़र्ज़ा बट्टे खाते में डालने का सबब क्या है?
बैंक कॉरपोरेट कंपनियों की ओर से लोन का हजारों करोड़ डकार लिए जाने के बावजूद बगैर आह किए इसे बट्टे खाते में डाल दे रहे हैं। लेकिन आपको निगेटिव इंटरेस्ट दे रहे हैं। यह तो वैसा ही हुआ, जैसे आपने किसी को क़र्ज़ दिया और उसने आपका पैसा हड़प लिया।
दीपक के मंडल
09 Feb 2021
RBI

दो जनवरी को दिल्ली हाईकोर्ट में 4335 करोड़ रुपये के घोटाले में फंसे पीएमसी बैंक के मामले में सुनवाई चल रही थी। बैंक पर प्रतिबंध के बाद ग्राहकों को बड़ी रकम निकालने से रोक दिया गया है। लेकिन ग्राहकों ने अदालत में अपील दायर कर मांग की थी कि कोरोना संकट के इस दौर में इलाज, शादी और पढ़ाई जैसी जरूरत के लिए उन्हें पांच लाख रुपये तक निकालने की इजाजत दी जाए। आरबीआई पीएमसी को तुरंत इसका निर्देश दे। लेकिन आरबीआई ने हाथ झाड़ लिए। कहा, “अच्छा हो यह फैसला पीएमसी बैंक खुद करे कि इमरजेंसी में ग्राहकों को पैसा निकालने की इजाजत देना है या नहीं।” ऐसी उलटबांसी आपने शायद ही देखी होगी। आरबीआई ने बैंक पर खुद प्रतिबंध लगाया और अब जब ग्राहक अपना पैसा मांगने आ रहे हैं तब कह रहे हैं कि जाकर बैंक से पूछो। पैसा मिलेगा या नहीं।

अब, दूसरा वाकया सुनिए। आरबीआई ने बड़े कॉरपोरेट कंपनियों के लोन डिफॉल्ट की जानकारी मांग रहे एक आरटीआई आवेदन को महीनों से दबाए रखा था। लेकिन आरटीआई एक्टिविस्ट विश्वनाथ गोस्वामी डटे रहे। और अब जो खुलासा हुआ है उसके मुताबिक बैंकों ने मार्च 2020 तक देश के टॉप 100 विलफुल डिफॉल्टर्स (जानबूझ कर कर्ज न चुकाने वाले) के 62 हजार करोड़ रुपये का कर्जा बट्टे खाते में डाल दिया है। बैंकों से हजारों करोड़ रुपये कर्ज लेकर खा चुके इन विलफुल डिफॉल्टर्स की लिस्ट में विजय माल्या, मेहुल चोकसी, नीरव मोदी जैसे बिजनेस टाइकून से लेकर रोटोमैक ग्लोबल और डेक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग जैसी अखबार निकालने वाली कंपनी भी शामिल है।

क़र्ज़ बट्टे खाते में डालकर बैलेंसशीट साफ़ करने की जुगत

आरबीआई की ही रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2019-20 में बैंकों ने कुल जितना लोन दिया था उसमें से 2.38 लाख करोड़ रुपये की वसूली नहीं हो सकी और इसे भी बट्टे खाते में डाल दिया गया। इससे बैंकों का एनपीए (फंसा हुआ कर्ज) 9.1 फीसदी से घट कर 8.2 फीसदी हो गया। एनपीए घटने से यह संदेश गया कि बैकों की बैलेंसशीट अच्छी हो गई है। लेकिन हकीकत यह थी कि बैंक इस भारी-भरकम कर्ज को वसूल नहीं पाए और इसे उन्होंने बट्टे खाते में डाल दिया।

सवाल यह है क्या 2.38 लाख करोड़ रुपये की यह विशाल रकम बैंकों की थी? क्या बैंकों ने यह रकम खुद कमाई थी? और अगर कमाई थी तो कैसे?  इसका जवाब जानने के लिए न तो अर्थशास्त्र की समझ जरूरी है और न ही वित्तीय मामलों की जानकारी। दरअसल यह पैसा जनता का था। हम और आप जैसे आम डिपोजिटरों का, जो बैंकों पर भरोसा कर अपनी गाढ़ी कमाई इनमें जमा रखते हैं। बैंकों के पास यह रकम बहुत कम लागत में आती है। इस वक्त आपके रेगुलर सेविंग अकाउंट में जमा पैसे पर ढाई से साढ़े तीन फीसदी तक और फिक्स डिपोजिट पर पांच से छह फीसदी का ब्याज मिल रहा है। फिक्स डिपोजिट के ब्याज पर तो इनकम टैक्स भी लगता है और मेच्योरिटी से पहले निकालने पर पेनल्टी भी लगती है। तो पूरा मामला यह है आपका पैसा बेहद सस्ते में लेकर बैंक मोटा इंटरेस्ट कमाने के चक्कर में बड़े कॉरपोरेट घरानों को हजारों करोड़ रुपयों का लोन देते हैं। लेकिन आम डिपोजिटर से पैसा वसूलना जितना आसान है, कॉरपोरेट कंपनियों से उतना ही कठिन। खास कर ऐसी कंपनियों के मालिकों से तो और कठिन, जिनकी सरकार में बैठे मंत्रियों से यारी-दोस्ती हो। तो अब आपके सामने यह बात साफ हो गई होगी कि देश के 100 डिफॉल्टरों पर बकाया 62 हजार करोड़ रुपये को बट्टे खाते में डालने से किस कदर जनता की जेब कट गई।

बैंकों का आम डिपोजिटरों से बर्ताव अलग होता है। वे उन आम डिपोजिटरों को कोई खास तवज्जो नहीं देते हैं, जो उनके फंड का सबसे बड़े स्रोत हैं। उन्हें ऊंची दरों पर लोन मिलता है। कर्ज न चुकाने पर वसूली के लिए मसलमैन भेजे जाते हैं। क्रेडिट स्कोर खराब कर दिया जाता है। मुकदमे लाद दिए जाते हैं। बैंकों से कर्ज लेकर खेती करने वाले किसानों की हालत तो और खराब रहती है। देश में किसानों की खुदकुशी के पीछे बैंकों की सख्ती एक अहम वजह रही है।

आम जनता को निगेटिव ब्याज और अमीरों को क़र्ज़ सब्सिडी

वर्षों से आम डिपोजिटरों के सेविंग खातों पर मिलने वाले ब्याज को डी-रेगुलेट करने की मांग हो रही है। क्योंकि कुछ साल पहले इस पर चार-पांच फीसदी ब्याज मिलता था और अब यह घट कर और नीचे यानी ढाई से तीन फीसदी हो गया है। अगर महंगाई से एडजस्ट (खुदरा महंगाई दर 6.95 फीसदी है) किया जाए तो यह ब्याज दर -4 फीसदी बैठती है। यानी बैंक आपके डिपोजिट के दम पर करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं। कॉरपोरेट कंपनियों की ओर से लोन का हजारों करोड़ डकार लिए जाने के बावजूद बगैर आह किए इसे बट्टे खाते में डाल दे रहे हैं। लेकिन आपको निगेटिव इंटरेस्ट दे रहे हैं। यह तो ऐसा ही हुआ है जैसे आपने किसी को कर्ज दिया और उसने आपका पैसा हड़प लिया।

दस साल पहले आरबीआई के तीन डिप्टी गवर्नरों एस.एस. तारापोर, किशोरी उदेशी और उषा थोराट ने सेविंग अकाउंट पर मिलने वाले ब्याज को रेगुलेशन और कार्टलाइजेशन से मुक्त करने की मांग रखी थी। 1996-97 से लेकर अब तक कई बार आरबीआई ने डिपोजिटरों को कम ब्याज मिलने के मामले पर अंदरखाने चर्चा की है। लेकिन ज्यादा ब्याज देने की सिफारिश करने का इसने साहस नहीं किया। इसके उलट 100 बड़े डिफॉल्टरों पर बकाया 62 हजार करोड़ रुपये इसने बैंकों को चुपचाप बट्टे खाते में डालने की इजाजत दे दी। यही नहीं, अपने इस कदम पर पर्दा डालने की भी कोशिश की। क्या इसके लिए आरबीआई के आला अफसरों को भी कभी कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जाएगी? आखिर जनता के इस पैसे को हड़पने के लिए किसी को सजा भी मिलेगी?  शायद ऐसा कभी नहीं होगा। उल्टे जब बैंकों के डूबने की नौबत आएगी तो सरकार टैक्स और सेस लगाएगी और डूब रहे बैंकों की तिजोरी भर दी जाएगी। आम जनता को कहा जाएगा कि बैंकों का री-कैपिटलाइजेशन किया जा रहा है। इससे बैंक ज्यादा मजबूत होंगे और जनता की ज्यादा अच्छी तरह से सेवा कर सकेंगे।

जनता का पैसा है, क्या फ़र्क़ पड़ता है?

पिछले कुछ वर्षों के दौरान हमने देखा कि डूबते बैंकों को बचाने के लिए किस तरह जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा झोंका जा रहा है और अब बैड बैंक बनाने की बात जोर-शोर से हो रही है। यानी सारे बैंकों का घाटा जनता के मत्थे मढ़ने की एक और जबरदस्त तैयारी है। सरकार की शह पर एक बैड बैंक यानी एक री-कंस्ट्रक्शन कंपनी बनेगी। बैंकों का सारा एनपीए उसमें ट्रांसफर कर दिया जाएगा। उनका बही-खाता चकाचक हो जाएगा और वे जनता का पैसा अमीर कर्जदारों पर लुटाने के आरोप से मुक्त हो जाएंगे। फिर एसेट कंस्ट्रक्शन कंपनी फंसे हुए कर्ज की वसूली कर पाए या नहीं, यह न तो आरबीआई की चिंता होगी और न सरकार की। और जहां तक जनता का सवाल है तो उसकी भी याददाश्त कमजोर ही मानी जाती है। तमाम गमों की तरह इसे भी भूल जाएगी कि हमारे हजारों करोड़ रुपये किस तरह एक एसेट री-कंस्ट्रक्शन कंपनी बना कर बट्टे खाते में डाल दिए गए।

जब बैंक फेल हो जाते हैं तो आप आम डिपोजिटरों को पैसा निकालने से रोक दिया जाता है। कर्मचारियों को जबरदस्ती वीआरएस देकर नौकरी से निकालने का सिलसिला शुरू हो जाता है। दो-तीन कमजोर बैंकों को मिलाकर एक कर दिया जाता है। मुट्ठी भर कर्मचारियों को रखा जाता है और बाकियों को नमस्ते कर दिया जाता है..... और फिर ‘पिंक पेपर’ सरकार और आरबीआई की वाहवाही करने लगते हैं, देखिये! सरकार ने बैंकिंग सेक्टर में सुधार की रफ्तार तेज कर दी है।

क्या जनता को थोड़ा सी सहूलियत मिलते देख उसे सब्सिडीखोर कहने वाला इस देश का गोदी मीडिया सरकार और आरबीआई से सवाल पूछेगा कि बैंकों में जमा उसकी अमानत पर किसने खयानत की है? क्या कोई पूछेगा कि आरबीआई आखिर आपकी पॉलिसी क्या है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

RBI
Bank crises
corporate
BJP
Narendra modi
Media
Godi Media
PMC bank

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • omicron
    भाषा
    दिल्ली में कोविड-19 की तीसरी लहर आ गई है : स्वास्थ्य मंत्री
    05 Jan 2022
    ‘‘ दिल्ली में 10 हजार के करीब नए मामले आ सकते हैं और संक्रमण दर 10 प्रतिशत पर पहुंच सकती है.... शहर में तीसरी लहर शुरू हो चुकी है।’’
  • mob lynching
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: बेसराजारा कांड के बहाने मीडिया ने साधा आदिवासी समुदाय के ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ पर निशाना
    05 Jan 2022
    निस्संदेह यह घटना हर लिहाज से अमानवीय और निंदनीय है, जिसके दोषियों को सज़ा दी जानी चाहिए। लेकिन इस प्रकरण में आदिवासियों के अपने परम्परागत ‘स्वशासन व्यवस्था’ को खलनायक बनाकर घसीटा जाना कहीं से भी…
  • TMC
    राज कुमार
    गोवा चुनावः क्या तृणमूल के लिये धर्मनिरपेक्षता मात्र एक दिखावा है?
    05 Jan 2022
    ममता बनर्जी धार्मिक उन्माद के खिलाफ भाजपा और नरेंद्र मोदी को घेरती रही हैं। लेकिन गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी के साथ गठबंधन करती हैं। जिससे उनकी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर सवाल खड़े हो…
  • सोनिया यादव
    यूपी: चुनावी समर में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री का महिला सुरक्षा का दावा कितना सही?
    05 Jan 2022
    सीएम योगी के साथ-साथ पीएम नरेंद्र मोदी भी आए दिन अपनी रैलियों में महिला सुरक्षा के कसीदे पढ़ते नज़र आ रहे हैं। हालांकि ज़मीनी हक़ीक़त की बात करें तो आज भी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में उत्तर…
  • मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    05 Jan 2022
    “बीएमसी के अधिकारियों ने उन्हें परेशान किया, उनके साथ बुरा व्यवहार किया। वेतन मांगने पर भी वे उस पर चिल्लाते थे।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License