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न्यूनतम मज़दूरी बढ़ने से रोजगार कम नहीं होता : जानिए इस साल के अर्थशास्त्र के नोबेल की कहानी
न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने पर रोजगार बढ़ेगा या घटेगा? ऐसे सवालों का जवाब देना बहुत कठिन काम है। इस कठिन काम को जिन अर्थशास्त्रियों ने सुलझाया है। उन्हें ही इस बार का नोबेल पुरस्कार दिया जा रहा है।
अजय कुमार
12 Oct 2021
Nobel in Economics
Image courtesy : Reuters

समाज के सबसे महत्वपूर्ण सवालों का जवाब बिना किसी छेड़छाड़ के अर्थशास्त्र कैसे दे? यही इस साल के अर्थशास्त्र में मिलने वाले नोबेल के रिसर्च का केंद्र बिंदु है। इस साल का अर्थशास्त्र का नोबेल डेविड कार्ड, जोशुआ एंग्रिस्त और गुइडो इम्बेंस को देने का ऐलान किया गया है।

65 साल के डेविड कार्ड मूल रूप से कनाडा के हैं और अभी अमेरिका के बर्कली में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। उन्हें 11 लाख डॉलर के इस पुरस्कार का आधा हिस्सा मिलेगा। दूसरा हिस्सा इजराइली-अमेरिकी अर्थशास्त्री एंग्रिस्त और उनके डच-अमेरिकी सहयोगी इम्बेंस को संयुक्त रूप से दिया जाएगा।

नोबेल समिति की सदस्य एवा मॉर्क ने इस साल के अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मिलने वाले नोबेल के रिसर्च की जानकारी दी। उन्होंने रिसर्च की जानकारी कुछ इस तरह से पेश की:

जब लोगों की आमदनी बढ़ती है तब वह सेहतमंद होते हैं या नहीं? जब पढ़ाई लिखाई लंबी होती है तो मजदूरी बढ़ती है या नहीं? प्रवास की वजह से प्रवास से प्रभावित हो रहे देश के रोजगार और लोगों की मजदूरी पर क्या असर पड़ता है? लॉकडाउन की वजह से वायरस का संक्रमण तेज हुआ या कम? इस तरह के ढेर सारे सवालों के बारे में सोचिए। इस तरह के सवालों को कारण और कार्य/ परिणाम वाले सवाल कहा जाता है। अंग्रेजी में कहा जाए तो causal effect से जुड़े सवाल। इस तरह से जुड़े समाज के बड़े सवालों का जवाब देने के साथ दिक्कत यह है कि जब परिस्थिति बदल जाती है तब इन सवालों का जवाब देना बहुत अधिक मुश्किल हो जाता है।

एवा मारक आगे बताती हैं कि सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में कारण और परिणाम के बीच संबंध स्थापित करना बहुत बड़ी चुनौती होती है। ऐसा करने पर वैसा होगा या वैसा इसलिए हुआ क्योंकि ऐसा हो रहा है, ऐसे संबंध बताना सबसे मुश्किल काम रहा है। यह मुश्किलें इसलिए आती है क्योंकि समाज गणित की तरह नहीं होता। कई सारे कारण एक दूसरे से मिलकर परिणाम को प्रभावित कर रहे होते हैं। इसलिए किसी भी तरह का एक्सपेरिमेंट नहीं हो पाता जिसे पुख्ता तौर पर हर जगह इस्तेमाल किया जाए। इस चुनौती का सामना करते हुए कुछ अर्थशास्त्रियों ने रेंडमाइज कंट्रोल एक्सपेरिमेंट किया। यानी ऐसा एक्सपेरिमेंट जहां पर परिणाम जानने के लिए कारकों को एक्सपेरिमेंट करने वाले ही व्यवस्थित करते हो। जैसे अगर यह निष्कर्ष निकालना है कि संतुलित खाना देने से शरीर का विकास कैसा होता है तो रेंडमाइज्ड कंट्रोल एक्सपेरिमेंट वाले कुछ लोगों को संतुलित खाना देंगे और कुछ लोगों को संतुलित खाना नहीं देंगे। और लंबे समय तक अवधि करने के बाद निष्कर्ष बताएंगे। लेकिन यह अनैतिक है यहां पर जानबूझकर किसी को संतुलित भोजन से दूर रखा जा रहा है।  अगर कोई इतिहास से जुड़ी हुई परेशानी है तो रेंडमाइज्ड कंट्रोल एक्सपेरिमेंट करने वाले इसका अध्ययन नहीं कर पाएंगे क्योंकि वह इतिहास में जाकर के चीजों को व्यवस्थित नहीं कर सकते हैं।

रेंडमाइज्ड कंट्रोल करने वालों को अगर लेबर मार्केट का अध्ययन करना है तो भी वह इसका एक्सपेरिमेंट नहीं कर पाएंगे क्योंकि यह बहुत अधिक खर्चीला होगा। ऐसी तमाम कारण होंगे जिन को व्यवस्थित कर पाना रेंडमाइज्ड एक्सपेरिमेंट करने वालों के कंट्रोल से बाहर की बात होगी।

इसे भी पढ़े :'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के पुरज़ोर समर्थक दो पत्रकारों को 'नोबेल शांति पुरस्कार'

इस साल की अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार वैसे ही तीन अर्थशास्त्रियों को दिया गया है जिन्होंने यह साबित किया है कि समाज के सबसे महत्वपूर्ण सवालों का जवाब दिया जा सकता है। इसके लिए कंट्रोल एक्सपेरिमेंट करने की जरूरत नहीं है। बल्कि वैसी घटनाएं ढूंढने की जरूरत है जहां पर सरकारी नीतियां और प्रकृति खुद ही ऐसा माहौल बना रही हो, जो किसी नेचुरल एक्सपेरिमेंट की तरह हो, जिससे समाज के सबसे महत्वपूर्ण सवालों का जवाब मिल जाए।

जैसे कि इसी कोरोना के समय व्यवस्था ने ऐसा रच दिया कि कुछ बच्चे शिक्षा ले पाने में वंचित रहे और कुछ शिक्षा लेते रहे। इस माहौल में बिना किसी को शिक्षा से वंचित किए शिक्षा के असर के बारे में जाना जा सकता है।

डेविड कार्ड के रिसर्च का महत्व बताते हुए एवा मारक कहती हैं कि साल 1990 की शुरुआत तक  हमारी समझ थी कि न्यूनतम मजदूरी बढ़ने से रोजगार की संख्या कम हो जाती है। यह समझ कई तरह के आंकड़ों पर आधारित थी। लेकिन इस बार अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता डेविड कार्ड ने इस अंतर्दृष्टि को बदलने का काम किया। साल 1992 में उन्होंने अमेरिका के दो पड़ोसी राज्य न्यूजर्सी और पूर्वी पेंसिलवेनिया के फास्ट फूड के लेबर मार्केट का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि सरकारी नीतियों द्वारा न्यूजर्सी में न्यूनतम मजदूरी में 8 फ़ीसदी की बढ़ोतरी की गई और पूर्वी पेंसिलवेनिया में बढ़ोतरी नहीं की गई। यह नेचुरल एक्सपेरिमेंट की बिल्कुल मुफीद जगह थी क्योंकि सरकारी नीतियों की वजह से परिवर्तन किया गया था न कि रिसर्चर ने परिवर्तन किया।

लेबर मार्केट के अध्ययन के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि न्यूजर्सी में न्यूनतम मजदूरी बढ़ी और रोजगार में भी पूर्वी पेंसिलवेनिया से ज्यादा बढ़ोतरी हुई। इस तरह से डेविड कार्ड के काम ने दुनिया के लेबर मार्केट की समझ में बहुत बड़ा हस्तक्षेप किया। उन्होंने बताया कि लेबर मार्केट में न्यूनतम मजदूरी बढ़ने से रोजगार की संख्या कम नहीं होती है।

इस अध्ययन ने सरकार की उन रूढ़िवादी नीतियों पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया जिनकी आधारशिला न्यूनतम मजदूरी बढ़ने से रोजगार की कमी हो जाने से जुड़ी होती है। इसके अलावा डेविड कार्ड ने स्कूली शिक्षा और प्रवास की वजह से मजदूरी पर पड़ने वाले असर पर भी दुनिया की समझ को प्रभावित किया।

कारण और परिणाम ( causal effect) का एक्सपेरिमेंट करने में बहुत सारे ऐसे कारक भी होते हैं जिन्हें साधे बिना सही परिणाम तक नहीं पहुंचा जा सकता है। नेचुरल एक्सपेरिमेंट करते समय इसे रिसर्चर व्यवस्थित नहीं कर सकता।  तकनीकी भाषा में कहा जाए तो इसे वेरिएबल कहा जाता है। इस बात को सबसे पहले समझाने वाले अर्थशास्त्री जोशुआ एंग्रिस्ट थे।( इस बार के अर्थशास्त्र के दूसरे नोबेल विजेता)

जोशुआ एंग्रिस्ट ने बताया कि अर्थशास्त्री समाज के जिन महत्वपूर्ण सवालों का जवाब जानना चाहते हैं उसे जानने के लिए वह समाज को नहीं बदल सकते। बल्कि उन्हें अपना नेचुरल एक्सपेरिमेंट करने के लिए वैसी परिस्थितियां देखनी होगी जहां से वह ठीक ठाक परिणाम बता सकें। उदाहरण के तौर पर शिक्षा का मजदूरी पर क्या प्रभाव पड़ता है? यह जानने के लिए किसी को शिक्षित करना और किसी को शिक्षा से वंचित करना अनैतिक होगा। बल्कि ऐसी परिस्थितियों का चुनाव करना होगा जिससे बात सही निष्कर्ष पर पहुंच सके। इसे ही तकनीकी भाषा में वेरिएबल कहा जाता है। शिक्षा और मजदूरी के बीच रिश्ता निकालने के लिए जोशुआ एंग्रिस्ट ने अमेरिका के उन राज्यों का चुनाव किया जहां पर क्लास की बजाए उम्र के आधार पर सबके लिए अनिवार्य तौर पर पढ़ाई करने की नीति थी। जिसकी वजह से एक खास उम्र तक कम पढ़े लिखे और अधिक पढ़े लिखे लोगों का समूह मिल गया। बिना शिक्षा से वंचित किए हुए शिक्षा और मजदूरी के बीच का रिश्ता निकल कर सामने आ गया।

जोशुआ एंग्रिस्ट आगे जाकर गुइडो इम्बेंस (तीसरे नोबेल विजेता) के साथ मिलकर काम करने लगे। इन दोनों ने मिलकर वेरिएबल तकनीक को और अधिक परिमार्जित किया। सोचने का वैसा ढांचा बनाया जिसकी मदद से नेचुरल एक्सपेरिमेंट किया जा सके। उन शर्तों पर गौर करने की पद्धति बनाई जिनकी मदद से नेचुरल एक्सपेरिमेंट से ठीक-ठाक परिणाम तक पहुंचा जा सके।

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर आनंद श्रीवास्तव और आशीष त्रिपाठी हिंदुस्तान टाइम्स में लिखते हैं कि एंग्रिस्ट उन दुर्लभ नोबेल पुरस्कार विजेताओं में से एक हैं जिनका अपने क्षेत्र के शिक्षण में योगदान यकीनन उनके शोध जितना ही मूल्यवान है। उन्होंने, जोर्न-स्टीफन पिशके के साथ, दो पाठ्यपुस्तकें लिखी हैं। जिन्हें ग्रेजुएट और मास्टर की डिग्री लेने वाले बच्चे पढ़ते हैं। इन किताबों ने अर्थमिति (अर्थशास्त्र की शाखा जो डेटा विश्लेषण और सांख्यिकी से संबंधित है) के शिक्षण में क्रांतिकारी हस्तक्षेप किया है।

इस तरह से देखा जाए तो इस बार का नोबेल का अर्थशास्त्र की दुनिया में नेचुरल एक्सपेरिमेंट का ठोस ढंग से प्रतिपादन करने वाले अर्थशास्त्रियों को मिला है। जिनके रिसर्च की मौजूदगी की वजह से अर्थशास्त्र की आंकड़ों की दुनिया बहुत ज्यादा परिष्कृत और निखरी है।

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