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भारत
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राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद : एक रुका हुआ फ़ैसला और डर व आशंका में जीती अयोध्या
अयोध्या के इस विवाद में इतने पेच रहे हैं कि सभी की निगाहें फ़ैसले से ज़्यादा उसके बाद होने वाली प्रतिक्रिया पर है। सामान्यजन आशंकित हैं, अयोध्या के लोगों ने पिछले दशकों में बहुत कुछ देखा और सहा है। इसलिए उनकी आशंका भी स्वाभाविक है।
सुमन गुप्ता
28 Oct 2019
Ram mandir and babri masjid

अयोध्या विवाद के फ़ैसले का अयोध्या को ही नहीं पूरे देश को इंतज़ार है। मुहल्ला रामकोट मे जमीन का यह छोटा सा टुकड़ा अयोध्या विवाद में कब बदल गया इसके बारे में न तो किसी ने 1883 में राममंदिर बनाने के लिए अर्जी लगाते समय सोचा रहा होगा और न 1949 में मूर्ति रखे जाने के समय।

अब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लेकर पूरे देश की सांसे टंगी रहेंगी कि फ़ैसले के बाद क्या होगा? कुछ ऐसी ही स्थिति 2010 में भी हुयी थी जब मूर्ति रखे जाने के साठ साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का फैसला आना था तो लोगों की सांसे थमीं हुयी थीं। पूरा देश लगता था थम सा गया है। पुलिस प्रशासन के हाथ पांव फूल गये थे। फैसला आने के बाद सभी ने राहत की सांस ली। पहले तो किसी के समझ में नहीं आया कि कौन जीता कौन हारा।

फ़ैसले में तीनों प्रमुख पक्षों को वह विवादित भूमि बांट दी गयी थी जिसकी अपील किसी भी पक्षकार ने अपने दावे में नहीं की थी। इनमें दो प्रमुख पक्ष हिन्दुओं के थे निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान। मुस्लिमों का प्रमुख पक्ष सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड था। इस फ़ैसले से कोई भी पक्षकार सन्तुष्ट नहीं हुआ यद्यपि देश में फ़ैसले के कारण कोई संकट नहीं आया और न ही साम्प्रदायिक तनाव या हिंसा हुई। सभी पक्षकार इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट 2011 में ही पहुंच गये और 2019 में 40 दिन की सुनवाई के बाद अब इसका अन्तिम फैसला होना है।

इस विवाद को सुलझाने के लिए कोर्ट कचहरी, समझौते की दर्जनभर कोशिशें भी परवान नहीं चढ़ सकीं। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के फ़ैसले से ज्यादा फ़ैसले के बाद होने वाली स्थितियों से लोगों के मन में तमाम तरह की आशंकायें जन्म ले रही हैं।
 
अयोध्या के लोगों ने अयोध्या को लेकर 1984 से लेकर 1992 तक उपद्रव, हिंसा और अराजकता का दौर भी देखा है इसलिए उनके अंदेशे भी स्वाभाविक ही हैं। लोगों को लग रहा है कर्फ़्यू ज़रूर लगेगा, इसलिए राशन का इंतज़ाम कर रहे हैं। अयोध्या में विवादित स्थल की ओर जाने वाले मार्गो पर बंकर बनाये जा रहे हैं। इससे उन क्षेत्रों में रहने वाले संत-महन्त गृहस्थ सभी को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। छोटे रास्ते बंद कर दिये गये हैं। अयोध्या को सुरक्षा की दृष्टि से पहले ही तीन जोन में बांटा हुआ है। अयोध्या-फैजाबाद के बाशिंदों को ऐसा लग रहा है कि आने वाले दिनों में कश्मीर जैसी सुरक्षा की बंदिशों की स्थितियों में लोगों को जीना पड़ेगा। भले ही ऐसा कुछ न हो।

अयोध्या के तीन मेलों में अब एक मेला दीपावली मेला भी शामिल हो गया है। योगी आदित्यनाथ की सरकार राम के वनवास और लंका विजय के बाद अयोध्या आगमन को पर्यटन के नाम पर महत्व देने के लिए सरकारी तौर पर दीपावली मनाने का काम पिछले तीन वर्षो से कर रही है इस बार यह पांच दिन का समारोह रहा। जिसमें त्रेतायुग को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान तकनीक के जरिये लेजर शो आदि के माध्यम से दिखाने का मंचन करती है। राम और सीता (कलाकार) पुष्पक विमान (हेलीकाप्टर) से उतरने पर मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री ने अगवानी की। मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने इनकी आरती उतारी और धार्मिक कृत्य को सम्पादित किया। लाइट एंड साउण्ड कार्यक्रम के जरिये अयोध्या में नदी किनारे राम की पैड़ी पर उत्सव जैसा दृश्य रहा।

योगी सरकार के पूर्व अयोध्या में राम के अयोध्या वापसी का दीपावली जैसा कोई विशेष पर्व नहीं होता था। सामान्य ढंग से खील, बताशे लइया और गणेश-लक्ष्मी का पूजन और मंदिरों के दर्शन तक यह पर्व सीमित था। 2010 में हाईकोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या को लेकर यह सवाल उठता था कि अयोध्या की दीवाली कैसी होती है? दीवाली के अवसर पर बाहरी श्रद्धालुओं का आगमन बहुत कम होता है इसलिए भी इस अवसर पर कोई विशेष कार्यक्रम अयोध्या में नहीं होता रहा। श्रावण मेला, चैत्र रामनवमी मेला और कार्तिक परिक्रमा मेले के लिए श्रद्धालुओं की लाखों की भीड़ आती है।

दीपोत्सव 2019 को योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सरकारी तौर पर मेला घोषित कर दिया। अयोध्या विवाद की सुनवाई पूरी होने और फैसला आने के पूर्व सरकारी तौर पर कार्यक्रम को भव्य बनाने का प्रयास सरयू तट, राम की पैड़ी पर किया गया। विश्व हिन्दू परिषद से लेकर सभी संतो-महन्तों को उम्मीद है कि राममंदिर अब बनने वाला है इसलिए उनके चेहरे पर कोई तनाव नहीं है। फैसले से पूर्व विश्व हिन्दू परिषद ने अपने संगठन के अयोध्या में होने वाले सभी कार्यक्रमों को विराम दे दिया है।

वहीं योगी सरकार ने सबसे अधिक दीये जलाकर इस वर्ष गिनीज बुक में गत वर्ष के अपने ही रिकार्ड को तोड़ते हुये नया रिकार्ड स्थापित किया है। इस दीपावली उत्सव पर 1.33 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान है। प्रदेश की पूरी मशीनरी सभी विभाग इस कार्य में लगे रहे। नगर निगम अयोध्या ने भी दलित वस्तियों में सौ-सौ दिये तेल बाती बांटे। सरकार का दावा है कि पूरी अयोध्या में छह लाख दिये जलाये गये।

अयोध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में इतने पेच रहे हैं कि सभी की निगाहें फैसले से ज्यादा उसके बाद होने वाली प्रतिक्रिया पर है। सामान्यजन आशंकित हैं, अयोध्या के लोगों ने पिछले दशकों में बहुत कुछ देखा और सहा है। इसलिए उनकी आशंका भी स्वाभाविक है। विश्व हिन्दू परिषद और अयोध्या के अधिकांश लोगों को लग रहा है कि फैसला मंदिर के पक्ष में आयेगा इसलिए समस्या ज्यादा नहीं होगी। वहीं दूसरे पक्ष के लोगों का कहना है कि फैसला कुछ भी लेकिन एक बार निपट जाये तो रोज-रोज की मुसीबत से मुक्ति मिले।

फ़ैसले के मद्देनजर अयोध्या विवाद से जुड़े सभी पक्षकारों की सुरक्षा इतनी सख्त कर दी गयी है कि अब उनसे मिलने के पहले रजिस्टर में दर्ज होगा। मोबाइल कैमरे से फोटो ली जायेगी। यदि पक्षकार उक्त व्यक्ति से मिलना चाहेगा तभी वह मिल सकता है। अयोध्या में सहज ही सुलभ लोगों के आगे-पीछे घर के बाहर सुरक्षा एक शिकंजा बन गया है। वह चाहे रामजन्मभूमि न्यास के महन्त नृत्यगोपाल दास हों या मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी। इकबाल अंसारी कहते हैं ‘एक बार फैसला आ जाये तो फिर जिन्दगी अगली राह चले।’
 
फ़ैसले के अन्देशे से घिरे फैजाबाद शहर में रह रहे अयोध्या के गोकुल भवन से जुड़े अशोक सिंह कहते हैं कि ‘मैं तो गांव आ गया हूं कि कुछ घर के लिए इंतज़ाम कर लूं। कर्फ़्यू लग जाये तो राशन तो घर में रहे। बहुत दिनों से अयोध्या में शांति थी, लगता अब कुछ होगा।’

एक दौर था जब बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी और राम जन्मभूमि का मुकदमा लड़ने वाले परमहंस रामचन्द्र दास एक साथ ही कचहरी में मुकदमा लड़ने के लिए जाते थे। अब स्थिति यह है कि एक कथित शूटर अयोध्या मुद्दे पर उनके बेटे इकबाल अंसारी से मिलने घर पहुंच कर विवाद करती है और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने कोर्ट जाती है। मीडिया में चर्चित होने के लिए बेचैन एक महन्त उनके घर पर पहुंचकर कहते हैं कि मैं यहां हनुमान चालीसा पढूंगा, तो इकबाल अंसारी कहते हैं कि पढ़िये कौन रोक रहा है।  
 
अयोध्या के इस विवाद ने देश की राजनीति की ही धुरी नहीं बदली पूरे समाज का ताना-बाना ही बदल दिया है। नयी पीढ़ी ने वह दंश नहीं देखे है इसलिए वे उस दुःख दर्द से अंजान हैं। 1989 से देश की राजनीति चाहे अनचाहे, प्रत्यक्ष-परोक्ष इसी के इर्द-गिर्द घूमती रही है। जिस भारतीय जनता पार्टी को 1984-85 में दो सीटें संसद में मिली थीं उसके बाद अयोध्या विवाद के फलस्वरूप उसके द्वारा चलाये गये आंदोलनों से पुष्पित पल्लवित हुयी।

भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र और उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार सत्तारूढ़ है। जिस प्रकार भाजपा और उसके मातृ और अनुषांगिक संगठनों ने 1984 में रामजानकी रथयात्रा के माध्यम से इस विवाद में धीरे-धीरे प्रवेश किया इसके बाद 1985-86 में ताला खोलने की मांग के लिए आंदोलन, 1989 में विवादित भूमि पर शिलान्यास और फिर कारसेवा के नाम पर बाबरी मस्जिद को तोड़ने का प्रयत्न, गोलीकांड और 1992 में दिनदहाडे़ उनके द्वारा बुलायी गयी भीड़ ने मस्जिद को ढहा दिया। अब ऐसी ही पार्टी केन्द्र और राज्य में सत्तारूढ़ है। 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों का जो ताण्डव हुआ उसमें मुस्लिम समुदाय के 12 लोगों की जान गयी, 267 दुकानें व घर जलाये गये।

अभी तक जो रिकार्ड हैं उसके अनुसार 19वीं सदी में रामचबूतरे पर बैठे रामलला को ठंड, धूप और गर्मी से बचाने के लिए 1883 में महन्त रघुवरदास की ओर से मुकदमे की शुरुआत रामचबूतरे पर मंदिर बनाने की अर्जी से हुई थी। जिसे न तो निचली अदालत से अनुमति मिली और न अवध चीफ कोर्ट की अपील में रामचबूतरे पर मंदिर बनाने की अनुमति मिल सकी। बात आयी, गयी हो गयी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के असफल होने के बाद अवध के अंग्रेजीराज में विलय के साथ ही मस्जिद के आंगन को अंग्रेजी के ‘एल’ शेप में बांट दिया गया। जो दीवार बनायी गयी उसमें सीखचों की खिड़कियां और दो दरवाजे लगा दिये गये जिससे मस्जिद में लोग आ जा सकें।

आंगन के विभाजन के बाद मुकदमे में इसी के अन्दर के भाग को इनर कोर्टयार्ड कहा गया जहां 22/23 दिसम्बर 1949 को जबरन मूर्तियां रख दी गयीं। बाहर के भाग जहां एक दरवाजे पर रामलला तथा दूसरे दरवाजे पर सीता रसोई या छठी पूजन स्थल रहा उसके बाहर की बाउण्ड्री को आउटर कोर्टयार्ड कहा गया। यहां पूजा होती रही और मूर्ति रखे जाने के बाद कोर्ट के आदेश से गुम्बद के अन्दर रखी गयी मूर्तियों की भी पूजा होने लगी। इस प्रकार इस स्थान का स्वरूप ही बदल गया।

निर्मोही अखाड़ा का कहना है कि मस्जिद के अन्दर उसे चबूतरे पर पूजा करने की अनुमति अकबर के काल में मिली थी लेकिन इसका कोई पुख्ता प्रमाण फिलहाल उपलब्ध नहीं है। वहीं सुन्नी सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड भी बाबर की माफी से आयी ग्रांट का उल्लेख करता आया है उसके मूल दस्तावेजों की उपलब्धता नहीं है।

22/23 दिसम्बर 1949 को अयोध्या कोतवाली में लिखायी गयी एफआईआर के हिसाब से जबरन मस्जिद में मूर्ति रख दी गयी और मूर्ति रखने वालों के ऊपर जब मुकदमा चला और उसकी चार्जशीट लगायी गयी तो उसमें कहा गया कि ‘इन लोगों ने पुराना मंदिर समझकर मूर्ति रख दी थी।'
 
फ़ैज़ाबाद की अदालत से इस मामले को हाईकोर्ट, सरकार के विशेष आग्रह पर स्थानान्तरित कर दिया गया जिसके कारण निचली अदालत से कोई फ़ैसला होने के बजाय सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ विशेष पीठ को सौंपा गया। हाईकोर्ट ने इस मामले की दिन प्रतिदिन सुनवाई के करने के बाद 30 सितम्बर 2010 को फैसला आ सका। इस फ़ैसले में तीन प्रमुख पक्षकारों को विवादित भूमि की 1/3 भूमि देने का आदेश दिया गया जिस पर सभी पक्षकार संतुष्ट नहीं हुये और सुप्रीम कोर्ट की शरण में गये।

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुकदमा मूलतः जमीनी विवाद था लेकिन वाद बिन्दु में ‘क्या पहले वहां मंदिर था जोड़े जाने के बाद’ इसकी धार्मिक प्रकृति भी हो गयी। साथ ही इसका पूरे समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के नज़रिये से भी देखा जाने लगा। इस मुकदमे का फ़ैसला कुछ भी हो लेकिन फ़ैसले के सभी पक्ष तो नहीं जीत सकते हैं किसी न किसी को हारना ही पड़ेगा।

फ़ैसले की घड़ी को देखते हुए मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक तबके ने भी यह सवाल उठाये हैं कि फ़ैसला कुछ भी हो लेकिन अब उस स्थान पर मस्जिद बनना मुमकिन नहीं है इसलिए बेहतर है कि इसे सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड सरकार को सौंप दे। मुस्लिम इनिशियेटिव फाॅर पीस संस्था के बैनर तले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर जमीरउद्दीन शाह ने कहा ‘40 साल से हम लड़ाई लड़ते रहे हैं लेकिन हासिल क्या हुआ। फैसला आने के बाद फिर से जंग की शुरूआत हो जायेगी।

मुसलमान यदि जीत भी गये तो भी अब उस जगह पर मस्जिद बनाना मुमकिन नहीं हो सकेगा। एक अच्छे जनरल की पहचान यह होती है कि बिना युद्ध लड़े जीत हासिल कर ले।’ यदि जमीन सरकार को सौंप दे तो इससे देश में साम्प्रदायिक सौहार्द का माहौल बनाने में मदद मिलेगी। साम्प्रदायिक सौहार्द की स्थापना के लिए ही पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 में एक्ट बनाकर विवादित भूमि सहित 67 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की थी जो अभी भी केन्द्र सरकार के ही कब्जे में है। हालांकि मुस्लिम पक्ष इस पर एक राय नहीं है।  

उधर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मोल्डिंग ऑफ रिलीफ के तहत सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने अपना पक्ष सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को दिया है। अयोध्या विवाद का फैसला सिर्फ किसी जमीन का मंदिर-मस्जिद का फैसला नहीं होगा इस देश की किस्मत भी लिखेगा।

(सुमन गुप्ता वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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