NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
अनुच्छेद 14 और 15 को मिलाकर पढ़ेंगे तो नागरिकता संशोधन बिल हारता दिखेगा
अनुच्छेद 14 के तहत सभी व्यक्तियों के लिए समान विधि यानी क़ानून बनाने का नियम है। इसलिए भारतीय राज्य की यह संवैधानिक बाध्यता है कि वह सभी व्यक्तियों को जिसमें नागरिक और ग़ैर-नागरिक सभी शामिल हैं, सभी के लिए एक समान नियम बनाए जब तक विभेदीकृत क़ानून बनाने का कोई युक्तियुक्त या तर्कसंगत मक़सद न हो।
अजय कुमार
12 Dec 2019
CAB
Image Courtesy: The Hindu

तमाम असहमतियों के बावजूद नागरिकता संशोधन बिल संसद के दोनों सदनों से पास हो गया। अब ये असहमतियां याचिका के तौर सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दे सकती हैं कि असंवैधानिक होने के नाते इस बिल को ख़ारिज किया जाए। जब बिल पेश किया गया तो बिल के इर्द-गिर्द तमाम तरह की चर्चाएं की गईं। सरकार की तरफ़ से बहुत सारे तर्क रखे गए। ऐसे भी तर्क रखे गए जो सच्चाई से कोसों दूर थे। जैसे कि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था जबकि सच्चाई यह है कि पाकिस्तान ने भारत से अलग होने के लिए धर्म को आधार बनाया था लेकिन भारत न तो धर्म के आधार पर अलग हुआ न ही भारत ने धर्म के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को अपने संविधान में मान्यता दी। ठीक ऐसे ही अमित शाह की तरफ़ से यह कहा गया कि भारतीय संविधान का मूल अधिकार ग़ैर नागरिकों पर लागू नहीं होता लेकिन सच्चाई यह है भारतीय संविधान के मूल अधिकार के प्रमुख प्रावधान हर व्यक्ति पर लागू होते हैं। भले जी वह नागरिक हो या न हो।

लेकिन ऐसे तर्कों से दूर नागरिकता संशोधन बिल के शब्द कैसे ग़ैर संवैधानिक हैं और किन आधारों पर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। उस पर एक नज़र डालने की कोशिश करते हैं।

मोटे तौर पर समझा जाए तो बिल में यह प्रावधान किया गया है कि 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में आकर रहने वाले अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को ज़रूरी दस्तावेज़ों के अभाव में भी अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा। नागरिकता प्राप्त करने पर ऐसे व्यक्तियों को भारत में उनके प्रवेश की तारीख़ से भारत का नागरिक माना जाएगा।

इस तरह से इस संशोधन में दो तरह के वर्गीकरण हुए पहला धर्म के आधार पर नागरिकता का और दूसरा देश के आधार पर नागरिकता देने का। यानी अगर आप ग़ैर इस्लाम धर्म से जुड़े हैं तभी नागरिकता मिलेगी और अगर आप पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए हैं तब नागरिकता मिलेगी।  

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 की भाषा है - राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। यानी अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों की बात करता है, केवल नागरिकों की नहीं। अब इसके साथ अनुच्छेद 15 की भाषा को भी समझना ज़रूरी है। अनुच्छेद 15 के चार भाग हैं और चारों भाग भारत के नागरिकों पर लागू होते हैं। पहला कहता है कि नागरिकों के बीच धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। इसी अनुच्छेद का भाग तीन और चार भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित समानता और सामाजिक न्याय जैसे मूल्यों को हासिल करने के लिए कुछ वर्गों को विशेष सहूलियत देने की बात भी करता है। जैसे कि अनुसूचित जाति व जनजातियों के आरक्षण से जुड़े नियम- क़ानून।

कहने का मतलब यह है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 संविधान की प्रस्तावना में लिखित समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को अपने समाज में लागू करने के लिए यह प्रावधान करता है कि राज्य नागरिकों के बीच में भेदभाव कर सकता है।

लेकिन अनुच्छेद 14 के तहत सभी व्यक्तियों के लिए समान विधि यानी क़ानून बनाने का नियम है। इसलिए भारतीय राज्य की यह संवैधानिक बाध्यता है कि वह सभी व्यक्तियों को जिसमें नागरिक और ग़ैर-नागरिक सभी शामिल है, सभी के लिए एकसामन नियम बनाए जब तक विभेदीकृत क़ानून बनाने का कोई युक्तियुक्त या तर्कसंगत मक़सद न हो। फिर भी यह सवाल उठ सकता है कि कुछ परिस्थितियां ऐसी भी हो सकती हैं,जहां पर सभी के लिए एक समान नियम बनाने की बजाए अलग-अलग नियम बनाया जाए।

इस सवाल के जवाब में क़ानून की जानकार निवेदिता इंडियन कंस्टीटूशन लॉ एंड फिलॉसोफी के ब्लॉग पर लिखती हैं कि इसका निर्धारण इस बात से होगा कि व्यक्तियों के बीच अलग नियम बनाने का मक़सद क्या है? इस लिहाज़ से देखें तो इस बिल के अंतिम पेज पर इस बिल की उद्देशिका लिखी है। जिसमें केवल ग़ैर मुस्लिम सदस्यों को नागरिकता देने के लिए धार्मिक प्रताड़ना को वजह के तौर पर रखा गया है।

यानी पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश में ग़ैर मुस्लिम सदस्यों के साथ धार्मिक प्रताड़ना होती है इसलिए यहाँ से आने वाले ग़ैर मुस्लिम सदस्यों को नागरिकता मिल जाएगी। यानी व्यक्तियों के बीच प्रताड़ना का चुनाव करने के लिए धर्म का आधार बनाया जा रहा है, जब उस प्रताड़ना पर भारतीय राज्य का कोई हक़ नहीं है। वह प्रताड़ना न भारतीय समाज में हो रही है और न ही भारतीय राज्य की अनदेखी की वजह से हो रही है। इसलिए अगर प्रताड़ना को ही आधार बनाना है तो यह ज़रूरी है कि नागरिकता देने संबंधी नियम बनाने के लिए धर्म के आधार पर भेदभाव न करे। संविधान के अनुच्छेद 14 के महत्व को समझे, भारतीय राज्य में व्यक्तियों को सदस्यता देने के लिए वैसे आधारों का चुनाव न करे जिस पर व्यक्तिओं का नियंत्रण नहीं होता है जैसे कि धर्म। और ऐसा करना पूरी तरह से संविधान और संवैधानिक भावनाओं के ख़िलाफ़ है।

इसके बाद वह सारे तर्क तो हैं ही जो यह कहते हैं कि भारत के पड़ोस में केवल बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान ही नहीं है और भी सारे राज्य हैं। और उन राज्यों में भी कई समुदायों के साथ ज़्यादतियों की ख़बर आती है। राजनीतिक चिंतक योगेंद्र यादव द प्रिंट में लिखते है कि अगर सरकार का तर्क कि  भारत के सिर्फ़ इन तीन ही पड़ोसी देशों में किसी धर्म को राजकीय धर्म घोषित किया गया है तो यह कमजोर तर्क है दरअसल श्रीलंका के संविधान में भी बौद्ध शासन की बात कही गई है।

बहुत सारे जानकारों का कहना है कि अगर सरकार की चिंता प्रताड़ित लोगों की है तो फिर धार्मिक आधार पर होने वाले प्रताड़ना ही को क्यों आधार बनाया गया है, क्षेत्रीयता जैसे कि पाकिस्तान में बलूचिस्तान और प्रजातिगत जैसे नेपाल के तराई वाले इलाक़े में और श्रीलंका के तमिल के आधार पर होने वाले उत्पीड़न को क्यों नहीं आधार बनाया जा रहा है? आख़िर भारत ऐसे उत्पीड़न के बारे में भी कहता-बोलता आया है? अगर हमने धार्मिक आधार पर होने वाले उत्पीड़न को अपनी चिंता का मुख्य विषय बनाया है तो फिर पाकिस्तान के अहमदिया और शिया मतावलंबियों, चीन के हाथों परेशानहाल तिब्बतियों, म्यांमार के रोहिंग्या और श्रीलंका के मुस्लिम तथा हिन्दुओं को क्यों छोड़ दिया है?

इस बिल में 31 दिसम्बर 2014 को कट ऑफ़ डेट की तरह शामिल किया गया है। अगर धर्म के आधार पर प्रताड़ना की बात की जा रही है तो इसके लिए 2014 को ही क्यों आधार बनाया जा रहा है? इस अपवाद का जवाब क्या है कि पूर्वोत्तर भारत के लिए अलग और शेष भारत के लिए नागरिकता देने के लिए अलग नियम बनाए जा रहे हैं।

CAB
Protest against CAB
Citizenship Amendment Bill
article 14
article 15
Indian constitution
Narendra modi
Amit Shah
BJP

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • up elections
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!
    22 Jan 2022
    कोविड-19 की तीन लहरें और उसके बाद के लॉकडाउन, डेंगू का प्रकोप, कच्चे माल और गैस की क़ीमतों में इज़ाफ़ा, कच्चे माल पर  GST के चलते फ़िरोज़ाबाद के पारंपरिक कांच उद्योग को भारी मंदी का सामना करना पड़ा…
  • Mumbai
    भाषा
    मुंबई में बहुमंजिला इमारत में भीषण आग लगने से 7 लोगों की मौत, 16 अन्य घायल
    22 Jan 2022
    ''18वीं मंजिल पर आग लगने के तुरंत बाद, निवासी अपने परिवार के सदस्यों के साथ बाहर की ओर भागने लगे। प्रत्येक मंजिल पर कम से कम छह फ्लैट हैं। आग ने 18वीं और 19वीं मंजिल को अपनी चपेट में ले लिया और कुछ…
  • LIC
    थॉमस फ्रंकों
    एलआइसी को बेचना क्यों परिवार की चांदी बेचने से भी बदतर है?
    22 Jan 2022
    एलआइसी की सीमित बिकवाली के वादे पहले भी किए और तोड़े जा चुके हैं। भारत को अपनी एकमात्र सामाजिक सुरक्षा के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए; ऐसा करना असंवैधानिक और लोगों के साथ अन्याय होगा।
  • Hum Bharat Ke Log
    मुकुल सरल
    हम भारत के लोग:  एक नई विचार श्रृंखला
    22 Jan 2022
    “हम भारत के लोग” हमारे संविधान की प्रस्तावना (preamble) का पहला ध्येय वाक्य है। जिसके आधार पर हमारे संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य की स्थापना हुई है। इसी को…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में आज लगातार तीसरे दिन भी कोरोना के 3 लाख से ज़्यादा नए मामले
    22 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 3,37,704 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 89 लाख 3 हज़ार 731 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License