NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
रिकॉर्ड अनाज का उत्पादन, फिर भी पेट ख़ाली
ताज़ा सरकारी अनुमान बताते हैं कि 2019-20 में लगभग 292 मिलियन टन अनाज की फसल होगी, इस वृद्धि के बावजूद प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता ना के बराबर बढ़ रही है।
सुबोध वर्मा
21 Feb 2020
Translated by महेश कुमार
Record Food Grain Production

हाल ही में जारी दूसरे दौर के अग्रिम अनुमानों के अनुसार, भारत में अनाज और दालों का कुल उत्पादन 2019-20 में 291.95 मिलियन टन होगा, जो कि आज तक का सबसे अधिक रिकॉर्ड होगा, जो पिछले वर्ष के रिकॉर्ड 285.21 मिलियन टन से ज़्यादा है। इस उत्पादन में गेहूं का 106.21 मिलियन टन और चावल का 117.41 मिलियन टन ऊंचे स्तर का उत्पादन शामिल है। आने वाले दिनों में इन अनुमानों में उत्पादन के आंकड़ों को अंतिम रूप देते वक़्त थोड़े से बदलाव की संभावना है।

table 1_7.JPG

यह आंकड़े देखने में ठीक लगते हैं लेकिन कई चिंताएं भी हैं जो सीधे दिखाई नहीं देती हैं।

अगर आप नीचे दिए गए चार्ट को देखें तो पाएंगे कि वास्तव में अनाज का उत्पादन हर साल बढ़ रहा है, यह वार्षिक वृद्धि दर है। इसकी आधिकारिक उत्पादन डाटा से गणना की जाती है। यह दर्शाता है कि उत्पादन वृद्धि में अचानक गिरावट आ रही है (वह भी ख़राब मानसून के कारण) और इसके बाद यह उत्पादन बढ़ने लगता है क्योंकि उत्पादन ठीक हो जाता है। अगर कोई ऊंचे स्तर और नीचे जाते उत्पादन के आंकड़ों को नज़रअंदाज़ करता है, तो कुल मिलाकर, विकास दर 2-3 प्रतिशत या उसके बीच मँडराती दिखती है। यह प्रवृत्ति लाल रेखा के जरिए इंगित होती है।

table 2_6.JPG

वास्तव में, उपरोक्त चार्ट में, विकास दर में लगातार गिरावट का स्पष्ट संकेत मिलता है। यह लगभग स्थिर है। इसका मतलब यह है कि "रिकॉर्ड" आउटपुट जिसे रिपोर्ट किया जा रहा है, वह बस मामूली वृद्धि है, कोई बहुत बेहतर वृद्धि नहीं है।

यह समझना कि यह देश के लिए महत्वपूर्ण और चिंताजनक क्यों है, यह देखना होगा कि देश के लोगों के इस्तेमाल के लिए कितना अनाज वास्तव में उपलब्ध है। किसान कुल उत्पादन में से एक हिस्सा बीज के लिए अलग रख लेते है, कुछ हिस्सा प्रोसेस और उसकी ढुलाई/परिवहन में खो जाता है या बर्बाद हो जाता है, और कुछ हिस्सा निर्यात किया जाता है। इन सबका अनुमान सरकार लगाती है और कुल उत्पादन से इसे घटा दिया जाता है। एक छोटा हिस्सा आयात भी किया जाता है, शायद उन कंपनियों द्वारा जो उपभोक्ता वस्तुएँ जैसे बिस्कुट या अन्य खाने के उत्पाद बनाती हैं। इतना सब जोड़ना पड़ता है। इस प्रकार से लोगों के लिए उपलब्ध कुल अनाज की गणना की जाती है।

आज़ादी के कुछ साल बाद 1951 में, खाद्यान्न की शुद्ध उपलब्धता सिर्फ 52.4 मिलियन टन थी। यह पिछले 40 वर्षों में बढ़कर 158.6 मिलियन टन हो गई – यानी 1991 तक। साल 2019 में शुद्ध उपलब्धता 285.21 मिलियन टन थी। इस बीच, जनसंख्या भी बढ़ी है, हालांकि यह वृद्धि पिछले कुछ दशकों में काफ़ी कम हो गई है। खाद्यान्न उपलब्धता पर जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए, प्रति व्यक्ति शुद्ध उपलब्धता का पता लगाना जरूरी है।

2006 में, प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की शुद्ध उपलब्धता सिर्फ 445.3 ग्राम प्रतिदिन थी। 2019 में, यह बढ़कर 491.9 ग्राम/दिन हो गई थी। नीचे दिए गए चार्ट से पता चलता है कि 2007 के बाद से प्रति व्यक्ति यह उपलब्धता कैसे बढ़ी है।

table 3_0.JPG

यह स्पष्ट है कि ख़राब मानसून के वर्षों में, लोगों को कम खाने के लिए मिलता है, और अच्छे मानसून वर्षों में अधिक मिलता हैं। यह अपने आप में, लोगों की अनिश्चितता से भरे हालात को दर्शाता है। यह उस शर्मनाक हक़ीक़त को भी दर्शाता है कि 21वीं सदी में भारत में लोग अपना पेट भरने के लिए बारिश पर निर्भर हैं - ठीक वैसे ही जैसे कि 5000 साल पहले हुआ करता था।

ग्राफ़ में दिखाई देने वाला एक अन्य पहलू यह भी है कि विकास दर न तो खास उल्लेखनीय और न ही वह जश्न मनाने लायक है। कोई भी रिकॉर्ड खाद्य अनाज पर खुश हो सकता है, लेकिन प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता नाटकीय रूप से नहीं बढ़ रही है, मॉनसून के उतार-चढ़ाव को छोड़ते हुए जो 1 प्रतिशत की वृद्धि या कमी के स्तर के आसपास घूम रही है।

इसलिए, यदि प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता ध्यान देने योग्य नहीं है, तो फिर रिकॉर्ड कटाई का जश्न क्यों मनाया जाना चाहिए? मोदी काल में (2014 से) अनाज की उपलब्धता में बहुत मामूली सी वृद्धि हुई है। ऐसा पहले से चल रही सभी शानदार योजनाओं के बावजूद है। यह कोई आश्चर्य नहीं है कि देश में कुपोषण से पीड़ित लगभग 20 करोड़ लोग है, और एक तिहाई से अधिक बच्चे कम वजन के हैं या अन्य अभावों से पीड़ित हैं। भारत को फिर से महान बनाने और 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की हड़बड़ी में, मोदी और उनकी सरकार ने इस प्रमुख संकट से छुपने के लिए अपने सिर रेत में दफन कर लिए हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Record Food Grain Production, Yet People Are Not Getting More

Food Grain
Narendra modi
modi 2.0
FCCI
GDP

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

GDP से आम आदमी के जीवन में क्या नफ़ा-नुक़सान?

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • Women Hold Up More Than Half the Sky
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    महिलाएँ आधे से ज़्यादा आसमान की मालिक हैं
    19 Oct 2021
    हाल ही में जारी हुए श्रम बल सर्वेक्षण पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 73.2% महिला श्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करती हैं; वे किसान हैं, खेत मज़दूर हैं और कारीगर हैं।
  • Vinayak Damodar Savarkar
    डॉ. राजू पाण्डेय
    बहस: क्या स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए सावरकर जेल से बाहर आना चाहते थे?
    19 Oct 2021
    बार-बार यह संकेत मिलता है कि क्षमादान हेतु लिखी गई याचिकाओं में जो कुछ सावरकर ने लिखा था वह शायद किसी रणनीति का हिस्सा नहीं था अपितु इन माफ़ीनामों में लिखी बातों पर उन्होंने लगभग अक्षरशः अमल भी किया।
  • Pulses
    शंभूनाथ शुक्ल
    ‘अच्छे दिन’ की तलाश में, थाली से लापता हुई ‘दाल’
    19 Oct 2021
    बारिश के चलते अचानक सब्ज़ियों के दाम बढ़ गए हैं। हर वर्ष जाड़ा शुरू होते ही सब्ज़ियों के दाम गिरने लगते थे किंतु इस वर्ष प्याज़ और टमाटर अस्सी रुपए पार कर गए हैं। खाने के तेल और दालें पहले से ही…
  • migrant worker
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ 20 अक्टूबर को बिहार में विरोध प्रदर्शन
    19 Oct 2021
    "अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद घाटी की स्थिति और खराब हुई है। इससे अविश्वास का माहौल कायम हुआ है, इसलिए इन हत्याओं की जिम्मेवारी सीधे केंद्र सरकार की बनती है।”
  • Non local laborers waiting for train inside railwaysation Nowgam
    अनीस ज़रगर
    कश्मीर में हुई हत्याओं की वजह से दहशत का माहौल, प्रवासी श्रमिक कर रहे हैं पलायन
    19 Oct 2021
    30 से अधिक हत्याओं की रिपोर्ट के चलते अक्टूबर का महीना सबसे ख़राब गुज़रा है, जिसमें 12 नागरिकों की हत्या शामिल हैं, जिनमें से कम से कम 11 को आतंकवादियों ने क़रीबी टारगेट के तौर पर मारा है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License