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भारत
राजनीति
उत्तर प्रदेश का रेस्क्यू प्लान और उससे जुड़ी समस्याएं
रोडवेज़ के एमडी ने बताया कि इस बार सीमावर्ती इलाकों से लगभग 10 लाख लोगों को निकाला जाएगा जिसपर काम शुरू हो चुका है और 10,000 से ज्यादा ट्रिप्स लगेंगी।
सौरभ शर्मा, मनीष पांडे
14 May 2020
covid
बलिया में अपना क्वारंटीन पूरा करने के बाद घर भेजे जा रहे लोग।  

निखिलेश कुमार (34) हाल ही में हरियाणा से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भदोही लाये गए हैं। कुमार लुधियाना में एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थे जहां वो मासिक 20 हज़ार रुपया कमाते थे लेकिन लॉकडाउन के चलते जब कंपनियां बंद होना शुरू हुईं तो उन्हें लगा की उन्हें अपने गाँव वापस चले जाना चाहिए। कुमार उत्तर प्रदेश के अन्य साथियों के साथ पैदल निकल पड़े लेकिन उन्हें हरियाणा बॉर्डर पर रोक लिया गया।

कुमार बताते हैं कि उन्होंने और मज़दूरों के साथ 14 दिन का क्वारंटाइन पूरा किया और तभी उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें बसें भेजकर वापस अपने गृह जनपद बुलाया, लेकिन अपने घर से महज़ 15 किलोमीटर की दूरी पर उन्हें एक स्कूल में रहकर फिर से 14 दिन का क्वारंटाइन पूरा करना होगा।  

आपको बता दिया जाए की हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीमावर्ती राज्यों में फंसे मज़दूरों को लाने का फैसला किया था जिसके चलते अब तक हरियाणा से 12 हज़ार से अधिक मज़दूरों को बसों के जरिये  वापस उत्तर प्रदेश लाया जा चुका है।

उत्तर प्रदेश सरकार के दूसरे राज्यों में फंसे मज़दूरों को निकलने की सराहना काफी हुई है लेकिन चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े जानकार लोगों का मानना है कि अगर जरा सी भी चूक या लापरवाही हुई तो ये फ़ैसला बहुत ही घातक भी साबित हो सकता है।

लखनऊ स्थित विद्या ट्रामा सेंटर के सीईओ डॉ. विवेक त्रिपाठी का कहना है कि ये बहुत अच्छी बात है कि सरकार ने मज़दूरों के बारे में सोचा और सिर्फ़ उन्हीं मज़दूरों को वापस लाया जा रहा है जो सीमावर्ती राज्यों में अपने क्वारंटाइन की अवधि पूरी कर चुके हैं लेकिन अगर कहीं से भी किसी एक व्यक्ति में ये संक्रमण हुआ तो सोचिये कितनी बड़ी आबादी ख़तरे में आ जाएगी।

डॉ. त्रिपाठी का मानना है,  "मेरे हिसाब से तो इन मज़दूरों को लाने से पहले इन सभी का कोविड टेस्ट ज़रूर करा लिया जाए बजाय इसके कि सिर्फ़ स्क्रीनिंग कर बस में बैठाया जाए। हमें यह भी समझना होगा कि वायरस का संक्रमण होने के बाद इसके लक्षण इतनी आसानी से नहीं पता चल रहे हैं और ऐसी परिस्थिति में लोगों का इस तरह से सफ़र करने से संक्रमण बढ़ने के ख़तरा बढ़ जाता है।"  

उत्तर प्रदेश सरकार में मुख्यमंत्री के सूचना सलाहकार मृत्युंजय कुमार कहते हैं कि सरकार केवल उन मज़दूरों को ला रही है जिन्होंने अपनी क्वारंटाइन की अवधि पूरी कर ली है और उन्हें पूरे मेडिकल प्रोटोकॉल  को निभाते हुए ही लाया जाएगा।

मृत्युंजय कुमार कहते है, "सरकार अपने राज्य के लोगो के लिए काम कर रही है और उन्हें किसी प्रकार की दिक्कत न हो इसीलिए यह फ़ैसला लिया गया है। थोड़ा बहुत रिस्क ज़रूर है लेकिन हमारे अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही न हो।"

हालांकि पिछले दिनों राजस्थान के कोटा से लाये गए छात्रों के मामले में एक बार लापरवाही उजागर हुई थी जब कुछ छात्र कोरोना का रैपिड टेस्ट करवाने से पहले अपने घर चले गए। एक अन्य केस में कोटा से लौटा एक छात्र कोरोना से संक्रमित भी पाया जा चुका है।

आगरा के समाजसेवी पारस नरेश कहते हैं कि स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और ऐसे में सरकार को रिस्क नहीं लेना चाहिए।

उन्होंने कहा, "तथाकथित मॉडल जैसे कि आगरा मॉडल काम नहीं कर रहे। प्रदेश में दिन प्रतिदिन कोरोना केस में बढोत्तरी हो रही है, संसाधन उस तरीके से उपलब्ध नहीं है, पीपीई किट्स में खामियां मिल रही हैं और तो और स्वास्थ्यकर्मी बीमार पड़ रहे हैं, ऐसे में और लोगो को बाहर से लाकर रिस्क नही लेनी चाहिए। सरकार को चाहिए था कि वो दूसरे राज्य सरकारों के साथ सामंजस्य स्थापित कर इन मज़दूरों को वहीं बेहतर सुविधाएं दिलाती, इससे संक्रमण को रोका जा सकता था। सरकारों का इस श्रेणी के लोगों के साथ ठीक से संवाद न स्थापित करने की वजह से ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है।"  

लखनऊ में प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे दिल्ली से एक सरकारी अस्पताल से रिटायर हुए डॉ. आर के जैसवाल का मानना है कि इससे कम्युनिटी ट्रांसमिशन का ख़तरा बढ़ सकता है और सिर्फ़ कुछ केस से ही सरकार की अब तक कि गयी पूरी मेहनत बेकार हो सकती है।

उन्होंने कहा, "एक तरफ हम सोशल डिस्टन्सिंग कर रहे है कि संक्रमण न फैले वही दूसरी तरफ बसों में 25-30 की संख्या में लोग आएंगे और बड़ी तादाद में तो सोशल डिस्टन्सिंग कैसे काम करेगी। मेरी समझ से सरकार को कुछ दिन और इंतज़ार करना चाहिए था क्योंकि हमारे पास अभी भी इस रोग को हराने के लिए उतने मेडिकल संसाधन नहीं है। आप खुद ही देखिये की आगरा जैसे शहर में संक्रमण रुक ही नही रह है और आंकड़ा 400 के पार है और ऐसी स्थिति में बाहर से और लोगो का प्रदेश में लाया जाना मेरे हिसाब से सुरक्षित नहीं है।"

उत्तर प्रदेश सरकार में श्रम मंत्री और उनके मंत्रालय से किसी ने भी इस मुद्दे पर बात नहीं की।

मुख्यमंत्री के सूचना सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने कुछ मीडियाकर्मियों से मुखातिब होते हुए संक्षेप में बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को निर्देशित किया है कि जितनी भी ज़रुरत हो उतने क्वारंटाइन सेंटर बनाये जाएं और वहां पर साफ़ सफाई से लेकर खाने का उचित प्रबंध किया जाए।

मृत्युंजय कुमार बताते हैं, "योगी जी स्वयं इन सब पर नज़र बनाये हुए है और जो मज़दूर बहार से लाये गए है उनकी पूरी स्क्रीनिंग हो रही और सभी चीजों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। अभी तक १० हज़ार से ज्यादा बसों का संचालन इस काम में हुआ है और प्रदेश भर में ५० हज़ार से ज़्यादा मेडिकल टीमों का गठन कर काम में लगा दिया गया है।"

हो चुकी है एक दुर्घटना

मंगलवार, 28 अप्रैल की सुबह लगभग 4 बजे करीब 25 छात्रों को लेकर उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम की बस प्रयागराज से कुशीनगर जा रही थी जो एक ट्रक से टकरा गई। उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम के मैनेजिंग डायरेक्टर राज शेखर बताते हैं कि,  "यह एक चलते हुए ट्रक से टकराई जब ट्रक ने अचानक ब्रेक लिया। इस घटना में चालक और पुलिस कांस्टेबल सहित कुल 11 लोगों को मामूली चोटें आईं।

डीएम, एसएसपी और एआरएम अयोध्या घटनास्थल पर पहुंचे और घटना की जानकारी ली। सभी घायलों को तुरंत पास के अस्पताल में पहुंच गए। बाकी छात्रों को तुरंत अयोध्या से दूसरी बस में ले जाया गया और कुशीनगर भेज दिया गया

अस्पताल से प्रारंभिक उपचार और छुट्टी मिलने के बाद, इन छात्रों को अयोध्या से एक अलग बस से कुशीनगर भी भेजा जाएगा।

न्यूज़क्लिक के साथ हुई बातचीत में परिवहन निगम के मैनेजिंग डायरेक्टर राज शेखर ने बताया कि इस बार सीमावर्ती इलाकों से लगभग 10 लाख लोगों को निकाला जाएगा जिसपर काम शुरू हो चुका है और 10,000 से ज्यादा ट्रिप्स लगेंगी।

शेखर कहते हैं, "हमने पिछ्ली बार 6500 ट्रिप्स लगवाई थी जब मज़दूरों को दिल्ली से लाना तब और उसके बाद कोटा से भी बच्चों को सकुशल सुरक्षित निकाला गया। हर बार की तरह इस बार भी हम एक बस ड्राइवर और कन्डक्टर की सेवा सिर्फ एक ट्रिप के लिए ही लेंगे और उनसे मेडिकल प्रोटोकॉल के हिसाब से 14 दिन तक कोई भी सेवा नही ली जाएगी तथा एक बस में सिर्फ 25 लोग ही बैठाये जाएंगे जिससे सोशल डिस्टेन्सिंग भी फॉलो की जा सकेगी।"

मज़दूरों में मिल चुका है संक्रमण

27 अप्रैल को महाराष्ट्र से थाड़ी से बसों में सवार 34 लोग आए थे, जिन्हें बस्ती सीमा पर घघौआ पर रोक लिया गया इन लोगों की जांच की गई थी जिसमें सिद्धार्थनगर जिले का रहने वाले दो लोगों (पिता-पुत्र) की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। बाद में 5 और मज़दूरों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई।

डीएम आशुतोष निरंजन ने बताया कि बाद में पॉजिटिव आए सातों मज़दूरों को महाराष्ट्र से वाया झांसी होते हुए सरकारी बस से बस्ती लाया गया था। इन्हें हरैय्या के एसएसएस इंटर कॉलेज भदावल में रखा गया था।

शुक्रवार, 24 अप्रैल को संत कबीरनगर के एक मज़दूर की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद 13 मज़दूरों की जांच कराई गई, जिसमें सात मज़दूरों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है।

ज़िलाधिकारी ने बताया कि पॉजिटिव पाए गए सभी मज़दूरों को मुंडेरवा L1 अस्पताल में भर्ती किया गया है। जिस स्कूल में मज़दूरों को रोक गया था, उसे सैनिटाइज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पॉजिटिव आए संत कबीरनगर के मज़दूर को बस्ती के डेटा से अलग करने के लिए सरकार को पत्र लिखा गया है। डीएम के मुताबिक, बस्ती में कोरोना मरीज़ों की संख्या बढ़कर 31 हो गई है, जिसमें 17 ऐक्टिव केस हैं। 13 ठीक होकर डिस्चार्ज किए जा चुके है जबकि एक की मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में मौत हुई।

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