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राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
ब्राज़ील में ‘गुलाबी लहर’ की वापसी 
पूर्व राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डी सिल्वा ने बुधवार को धुर-दक्षिणपंथी वर्तमान राष्ट्रपति जायेर बोल्सोनारो की कोरोनावायरस महामारी को लेकर की गई ‘मूर्खतापूर्ण’ और भौंडी कार्यवाही पर जमकर खिंचाई की।
एम. के. भद्रकुमार
13 Mar 2021
ब्राज़ील
ब्राज़ील के पूर्व राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा 

ब्राज़ील के पूर्व राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डी सिल्वा ने राजनीतिक मैदान में पूरी धमक के साथ अपनी वापसी की है। देश की सर्वोच्च अदालत के आश्चर्यचकित कर देने वाले फैसले के द्वारा अभी सोमवार को ही उनकी ब्राजीली राजनीति के अग्रिम मोर्चे में वापसी हो सकी है, जिसमें घोषित किया गया है कि जिस भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान के कारण 2018 के राष्ट्रपति चुनाव में लूला को राष्ट्रपति पद के लिए दोबारा से चुने जाने की दावेदारी का कत्ल कर दिया गया था, वह देश के इतिहास में “सबसे बड़ा न्यायिक घोटाला” था।

बुधवार तक लूला की ओर से एक प्रेरणादायी और संभावित ऐतिहासिक संबोधन को पेश किया गया, जिसे व्यापक तौर पर राष्ट्रपति पद की भिड़ंत में बोली लगाने की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। लूला ने धुर-दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जायेर बोल्सोनारो की कोरोनावायरस महामारी को लेकर की गई “मूर्खतापूर्ण” एवं भौंड़ी कार्यवाहियों को लेकर जमकर लताड़ लगाई। कोविड संकट के व्यापक स्तर को देखते हुए बोल्सोनारो की अयोग्यता और इंकार वाले रुख की वजह से अभी तक लगभग 2,70,000 लोग मारे जा चुके हैं, जिसकी वजह से ब्राजीली राजनीति पहले से ही उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है।

पिछले सप्ताहांत हुए एक सर्वेक्षण नतीजे में पता चला है कि बोल्सोनारो के लिए 38% समर्थन की तुलना में ब्राज़ील के 50% लोग अगले चुनावों में लूला के पक्ष में वोट कर सकते हैं या निश्चित तौर पर वोट करेंगे। इतना तो तय है कि लूला की पुनर्वापसी ने 2022 के चुनावों को तरंगित कर डाला है, और तथाकथित “गुलाबी लहर” और विषाक्त दक्षिणपंथी लोक-लुभावनवाद के बीच में एक प्रचण्ड संघर्ष का होना तय है। (इस गोलार्ध के सरकारों की ऐतिहासिक रूप से हार्ड-लाइन या “लाल” वामपंथी आंदोलनों के विपरीत कहीं अधिक उदार नीतियों के साथ व्यापक लैटिन अमेरिकी नीतियों में वाम की ओर झुकाव की अभिव्यक्तियों को “पिंक टाइड” के बतौर चिन्हित किया जाता रहा है।)

निश्चित ही गरीबी के खिलाफ चलाए गए अभियान की वजह से लूला बेहद सम्माननीय व्यक्तित्व बने हुए हैं। बतौर राष्ट्रपति उनके 8 वर्षीय शासनकाल के दौरान ब्राज़ील ने जिन आर्थिक उछाल के आनंदमयी दिनों को देखा था, उन्हें आज अतीत की खुशनुमा यादों के तौर पर देखा जाता है। लूला ने चरम रुख न अपनाकर कहीं अधिक व्यवहारिक नजरिये के साथ अपने देश में गरीबी, असमानता और आर्थिक विकास की सतत चुनौतियों से निपटने में खुद को लगा रखा था।

लूला के शानदार योगदान के बगैर ब्राज़ील का पश्चिमी गोलार्ध में एक क्षेत्रीय केन्द्रक के बतौर उदय अधूरा ही रह जाता, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को रिकॉर्ड वृद्धि की राह पर ले जाने का काम किया था। इसका ही नतीजा था कि सामाजिक निवेशों के वित्तपोषण में मदद की, जिसने देश में चरम स्तर पर धन की असमानता को आधा कर दिया था। 2003 और 2013 के बीच ब्राज़ील का सकल घरेलू उत्पाद 64% की दर से बढ़ा, और गरीबी में जी रही आबादी का प्रतिशत आधा रह गया था। इसके अतिरिक्त सामाजिक व्यय में तीव्र वृद्धि हुई, वहीं न्यूनतम मजदूरी में वास्तविक अर्थों में बढ़ोत्तरी 75% तक हो गई थी, और हर वर्ष लाखों की संख्या में नए औपचारिक रोजगार सृजित हो रहे थे।

अमेरिकी राजनीति में वामपंथ के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने हर्षोल्लास के साथ सक्रिय राजनीति में लूला की वापसी का स्वागत किया है। बुधवार को अपने ट्वीट में उन्होंने कहा है “राष्ट्रपति के तौर पर लूला ने ब्राज़ील में गरीबी को कम करने और श्रमिकों के समर्थन में खड़े होने का अतुलनीय काम किया था। उनके खिलाफ निहायत संदेहास्पद सजा को रद्द किया जाना एक बेहद शानदार खबर है। यह ब्राज़ील में लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण जीत है।” 

सैंडर्स के सराहनापूर्ण शब्दों में एक दक्ष वामपंथी के ब्राज़ील की सत्ता में वापसी को लेकर किसी भी प्रकार की दुश्चिंता के भाव नजर नहीं आते, जो संभवतया लैटिन अमेरिका के तीन सबसे बड़े और सबसे अधिक प्रभावशाली देशों - ब्राज़ील, अर्जेंटीना और मेक्सिको को “गुलाबी लहर” की चपेट में ले सकता है। यह उस प्रकार की कूटनीति और राजनीति के बारे में काफी कुछ कहने के लिए पर्याप्त है, जिसको लेकर लूला से उम्मीद की जा सकती है कि वे राष्ट्रपति अल्बर्टो फर्नांडीज (अर्जेन्टीना) और आंद्रेस मैनुअल लोपेज़ ओब्रेडोर (मेक्सिको) के साथ आगे बढ़ाएंगे।

हालांकि फर्नांडीज और ओब्रेडोर, जो कि बौद्धिक तौर पर संपन्न हैं, की तुलना में लूला की औपचारिक शिक्षा नाममात्र की ही है। दस वर्ष की उम्र तक उन्हें पढ़ना नहीं आता था और दूसरी कक्षा के बाद उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया था, और अपने परिवार की मदद करने के लिए वे काम पर जाने लगे थे। 12 साल की उम्र में सबसे पहले उन्होंने जूते पॉलिश करने का काम शुरू किया, और फिर फेरी लगाने का काम किया था। 14 साल के होने पर उन्हें एक गोदाम में औपचारिक काम मिल गया था।

लूला राजनीति में एक ट्रेड यूनियन नेता के बतौर उभरे थे, जिनकी ठोस मजदूर वर्ग वाली पृष्ठभूमि थी। लेकिन वर्कर्स पार्टी की स्थापना के दौरान – प्रगतिशील विचारों के साथ एक वामपंथी रुझान वाली पार्टी के निर्माण का विचार, 1980 में ब्राज़ील के सैन्य शासन के दौरान जन्मा था – जिसके संचालन के केंद्र में यूनियन नेताओं का सलाहकार मंडल और शिक्षाविदों एवं बुद्धिजीवियों का एक समूह शामिल था। 

बतौर राष्ट्रपति लूला ने इक्वाडोर, बोलीविया और वेनेजुएला में होने वाली कहीं अधिक रेडिकल प्रक्रियाओं को अस्थिर करने के लिए अमेरिकी नेतृत्त्व में चल रहे प्रयासों से बचाव के लिए फायरवाल सुरक्षाचक्र प्रदान करने का काम किया था। हालांकि ये देश उनके वैचारिक प्रक्षेपवक्र के हिसाब से नहीं चल रहे थे। दक्षिण अमेरिकी राष्ट्रों के संघ और लातिनी अमेरिकी एवं कैरबियन राज्यों के समुदाय जैसी पहलकदमियों, जिसके जरिये इस क्षेत्र के वृहत्तर एकीकरण की चाह थी, को उनका भरपूर समर्थन हासिल था। इसके साथ समाजवाद के उनके अपने खास ब्रांड के साथ, विदेश-नीति में बदलाव का एजेंडा उनकी निगाह में अंतर्निहित था, जिसमें साम्राज्यवाद-विरोधी स्वर निकल रहे थे। इसकी वजह से उनके आंदोलन को अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान से विद्वेष का सामना करना पड़ा, लेकिन कभी भी उन्होंने खुलकर अमेरिकी-विरोधी स्वरों को बुलंद नहीं किया था। लूला इस बात को लेकर बेहद सचेत थे कि ब्राज़ील को पश्चिम के साथ व्यापार और निवेश और विशेषकर अमेरिकी बाजार तक पहुँच बनाने की सख्त आवश्यकता है।

संभवतः जिस चीज से वाशिंगटन को सबसे अधिक चिढ़ थी, वह यह थी कि लूला का ब्राज़ील ब्रिक्स समूह के देशों के बीच में सक्रिय भागीदार बन गया था। ब्रिक्स की संकल्पना का विचार असल में जी7 राष्ट्रों के लिए एक वैकल्पिक आर्थिक और और राजनीतिक छोर के तौर पर की गई थी, जिसको लेकर लूला निजी तौर पर बेहद आशावान थे। जबकि वाशिंगटन के दृष्टिकोण में ब्रिक्स एक घातक विचार था (और यह आज भी है), जिसने अमेरिका के नेतृत्त्व वाली आपूर्ति श्रृंखलाओं, श्रम विभाजन और निश्चित रूप से अमेरिकी डॉलर की प्रभुता वाले अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के समक्ष एक चुनौती पेश करने की जुर्रत की थी।

निवर्तमान अमेरिकी विदेश मंत्री पोम्पेओ, वास्तव में विदेश विभाग से सेवामुक्त होने के दौरान अपने अंतिम संदेशों में से एक में लूला को राजनीति से निकाल बाहर किये जाने पर एक चुटकी लेना नहीं भूले। 19 जनवरी को पोम्पेओ ने बमुश्किल से अपने विजयी भाव को छुपाते हुए ट्वीट किया कि बोल्सोनारो के नेतृत्व में ब्राज़ील और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्त्व में भारत के होते, ब्रिक्स अपनी सुषुप्तावस्था में चला गया है, जिसका अभिप्राय था कि दोनों राज्यों के प्रमुखों ने रूस और/या चीन के इशारे पर समूह के भीतर किसी भी अमेरिकी-विरोधी गतिविधि का गला घोंटने का काम कर रहे हैं।

ब्रिक्स याद है?  @jairbolsonaro और @narendramodi  को धन्यवाद है, बी और आई दोनों को ही पता है कि सी और आर उनके लोगों के लिए खतरा हैं। 

ब्रिक्स  जिंदाबाद! पोम्पेओ का सपना चकनाचूर हो गया है। और मोदी को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2021 की अगवानी करनी है।

यह कहना पर्याप्त होगा, हालांकि लूला कोई मार्क्सवादी या अमेरिका-विरोधी प्रमुख विचारक नहीं हैं, लेकिन ब्राजीली राजनीति में उनकी वापसी संभवतया वाशिंगटन के इस क्षेत्र में अपने आधिपत्य को बहाल करने के मामले में एक बड़ा झटका साबित हो सकती है। एक ऐसे मोड़ पर जब “गुलाबी लहर” इस गोलार्ध में निरंतर अपने उतार पर थी और रुढ़िवादी लहर उसे तेजी से स्थानापन्न कर रही थी। इसके साथ ही अमेरिका की वैश्विक रणनीति ने चीन और रूस को हर जगह, कहीं भी, वैश्विक स्तर पर और विशेषकर अमेरिका के पिछवाड़े में मुकाबले में ला खड़ा कर दिया है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यदि अगले साल लूला राष्ट्रपति के बतौर चुने जाते हैं, तो ब्रिक्स में एक बार फिर से उत्साह का संचार होना तय है। मास्को और बीजिंग लूला को एक ऐसे सहयोगी के तौर पर देखेंगे जो एक ऐसे संस्था के तौर पर ब्लॉक में निहित दृढ विश्वास को बनाये रखेंगे, जिससे विकास कार्यों को कहीं अधिक गंभीरता से समर्थन हासिल होगा और एक बहुध्रुवीय विश्व की बुनियाद के निर्माण के कार्य को संभव किया जा सकेगा। 

जो बाइडेन प्रशासन कैसे खुद को इस प्रकार की भू-राजनीतिक वास्तविकता में अनुकूलित करता है, यह देखना अभी शेष है। बोल्सोनारो ने ट्रम्प प्रशासन के साथ प्रगाढ़ संबंधों को स्थापित कर रखा था और तुनकमिजाज ब्राजीली नेता को बाइडेन की ओर से वैर भाव देखने को मिल सकता है। (बोल्सोनारो को अक्सर उनके देशवासियों द्वारा “उष्णकटिबंधीय ट्रम्प” के नाम से पुकारा जाता है।)

7 नवंबर को लूला ने बाइडेन की जीत पर कहा था कि दुनिया “राहत की सांस ले रही है”, जबकि ट्रम्प के घनघोर समर्थक बोल्सोनारो ने रहस्यमयी चुप्पी धारण कर रखी थी। लूला ने अपने ट्वीट में कहा था: “मैं बाइडेन की जीत का स्वागत करता हूं और मुझे उम्मीद है कि वे मानवीय मूल्यों से संचालित होंगे, जिनसे उनका चुनावी अभियान चिन्हित हो रहा था। यह उम्मीद न सिर्फ घरेलू स्तर पर बल्कि लैटिन अमेरिका और विश्व में उनके रिश्तों में दिखने की उम्मीद करता हूँ।”

जब बाइडेन ने ट्रम्प के साथ हुई अपनी पहली डिबेट में कहा था कि अमेरिका को चाहिए कि वह ब्राज़ील को अमेज़न वर्षावन को बेहतर तरीके से रक्षा के लिए दबाव डाले, तो बोल्सोनारो ने जवाबी हमले में कहा था कि यह बयान “विनाशकारी और बेतुका” था। दरअसल कुछ ब्राजीलियाई मीडिया रिपोर्टों में सरकारी सूत्रों का हवाला देते हुए कहा गया था कि बोल्सोनारो प्रशासन ने बाइडेन की जीत को तब तक मान्यता न देने की योजना बना रखी थी, जब तक कि अदालत में ट्रम्प द्वारा विभिन्न कानूनी चुनौतियों से लड़ने की धमकी कमजोर नहीं हो जाती। आज, निश्चित तौर पर यदि बाइडेन ब्राज़ील में दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद को पीछे धकेलने के इच्छुक हैं, तो इसके लिए उन्हें लूला से बेहतर विकल्प नहीं मिल सकता है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Return of the ‘Pink Tide’ in Brazil

Luiz Inácio Lula da Silva
Brazil
Bernie Sanders
US
Venezuela

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