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समस्या के समाधान के लिए क्रांति की दरकार होती है
इस हफ्ते के ट्राईकॉन्टिनेंटल के न्यूज़लेटर में गरीब देशों के ऋण के बारें में विस्तृत चर्चा की गयी है। जिस तरह से हम ग़रीब देशों के ऋण के बारे में बात करते हैं, उसमें ख़ून का एक क़तरा भी नहीं है। यहाँ कुछ भी काव्यात्मक नहीं है। संख्या अलगाव पैदा कर रही है और उनके परिणाम चौंकाने वाले हैं।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
08 May 2020
 क्रांति
समस्या के समाधान के लिए क्रांति की दरकार होती है: 19 वाँ न्यूज़लेटर (2020)

मैं पहले ही बता देना चाहता हूँ कि ये न्यूज़लेटर पढ़ने में मुश्किल होगी। ये न्यूज़लेटर ऋण के बारे में है। जिस तरह से हम ग़रीब देशों के ऋण के बारे में बात करते हैं, उसमें ख़ून का एक क़तरा भी नहीं है। यहाँ कुछ भी काव्यात्मक नहीं है। संख्या अलगाव पैदा कर रही है और उनके परिणाम चौंकाने वाले हैं।

अप्रैल के मध्य में, अफ्रीका और यूरोप के अठारह देशों के सरकारी-प्रमुखों ने सार्वजनिक रूप से विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), अफ्रीकी विकास बैंक और न्यू डेवलपमेंट बैंक तथा अन्य क्षेत्रीय संस्थानों से सभी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के द्विपक्षीय और बहुपक्षीय ऋण भुगतानों को ‘महामारी के टल जाने तक, स्थगित करने की घोषणा करने का आग्रह किया।’ इसी दौरान, इन एजेंसियों और अन्य दूसरे एजेंसियों से ‘बुनियादी वस्तुओं और आवश्यक चिकित्सा आपूर्ति की ख़रीद के लिए तरलता प्रदान करने’ के लिए कहा गया था।

30 अप्रैल को इथियोपिया के प्रधान मंत्री, अबी अहमद ने लिखा कि ऋण स्थगित करने का आग्रह अपर्याप्त है; ज़रूरत ऋण रद्द करने की थी। ये आश्चर्यजनक है कि 2019 में दुनिया भर के चौंसठ देशों (उनमें से आधे अफ्रीकी महाद्वीप के देश) ने स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र की तुलना में विदेशी ऋण भुगतान में ज़्यादा पैसा ख़र्च किया। 121 निम्न और मध्यम आय वाले देशों की सरकारों ने अपने राजस्व का 10.7% सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च किया, जबकि ऋण भुगतान के लिए राजस्व का 12.2% देश से बाहर भेजना पड़ा। अहमद ने लिखा कि इथियोपिया, ‘विदेशी ऋण के भुगतान में स्वास्थ्य-क्षेत्र के ख़र्च का दुगुना ख़र्च करता है।’ पिछले साल IMF ने कहा था कि इथियोपिया दुनिया की पाँच सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है; कोरोनावायरस के बाद बदले हुए संदर्भ में अब ऐसा नहीं कहा जा सकता। अहमद ने कहा कि इथियोपिया कोरोनोवायरस मंदी का सामना करने जा रहा है।

मार्च के अंत में IMF ने घोषणा की थी कि वो देशों को कोरोनावायरस मंदी से बचाने के लिए एक ट्रिलियन डॉलर की नयी सुविधा प्रदान करेगा (हालाँकि अमेरिकी ट्रेज़री के दबाव में IMF ने वेनेजुएला को इस सुविधा का लाभ देने से बाहर रखा)। इसके कुछ समय बाद ही सौ से अधिक देशों ने IMF से मदद की अपील की। IMF और G20 देशों ने आने वाले छह महीनों के लिए ऋण भुगतान रद्द कर दिया और कई मामलों में 2020 के शेष वर्ष के लिए ऋण स्थगित कर दिया। G20 ने कहा कि 76 देशों में आधिकारिक, निजी और बहुपक्षीय ऋण-दाताओं द्वारा चुकाया जाने वाला 32 बिलियन डॉलर ऋण निलंबित कर दिया जाएगा। जबकि विकासशील देशों का मौजूदा ऋण स्टॉक (कुल ऋण) 8 ट्रिलियन डॉलर से भी ज़्यादा है। किसी अंतर्राष्ट्रीय ऋण प्राधिकरण के न होने के कारण ये उपाय बेमानी हैं। निजी लेनदार इन नियमों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं, इसका मतलब यही है कि अत्यधिक क़र्ज़ में दबे देशों को ऋण भुगतान करना जारी रखना पड़ेगा। विश्व बैंक में ‘केंद्रीय क्रेडिट सुविधा' के निर्माण की बात चल रही है, जिसके तहत क़र्ज़ लेने वाले देश विश्व बैंक के केंद्रीय क्रेडिट में पैसा जमा करवाएँगे और विश्व बैंक लेनदारों से निपटेगा। कोरोनावायरस के ख़त्म होने के बाद ऋण के स्थिति की फिर से जाँच होगी।

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बेलन मार्को क्रेस्पो, कौन चलाता है जीवन? 2020

व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD) द्वारा विकासशील देशों का अंतर्राष्ट्रीय ऋण प्राधिकरण की स्थापना करने का प्रस्ताव इससे भी ज़्यादा महत्वाकांक्षी है। इस प्राधिकरण के दो काम होंगे: पहला, ऋण के पुनर्भुगतान में आने वाले अस्थायी गतिरोधों पर ध्यान देना ताकि कोरोनोवायरस मंदी जैसी घटनाओं को टाला जा सके; दूसरा, रद्द करने से लेकर अन्य तरह की ऋण-राहत की ज़रूरतों की जाँच करना। UNCTAD के द्वारा 1986, 1998, 2001 और 2015 में भी इस तरह के प्रस्ताव रखे गए थे; लेकिन हर बार शक्तिशाली लेनदारों और धनी देशों ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया। 1985 में क्यूबा की सरकार ने हवाना ऋण सम्मेलन की मेज़बानी की, जहाँ फ़िदेल कास्त्रो ने तीसरी दुनिया में ऋण हड़ताल करने का प्रस्ताव रखा ताकि लेनदारों को इस मुद्दे पर बात करने के बुलाया जा सके। लेकिन कमज़ोर देशों पर बढ़ते दबाव के कारण ये मुहिम कामयाब नहीं हो पाया। न UNCTAD और न ही हवाना ऋण सम्मेलन इस एजेंडे को आगे बढ़ा पाए। इस एजेंडा की फिर से वापसी हुई है।

16 अप्रैल को अमेरिकी ट्रेज़री के सचिव स्टीवन मनुचिन ने साफ़-साफ़ कहा कि अमेरिका इस तरह के किसी भी आक्रामक उपायों के ख़िलाफ़ है। अमेरिका ज़्यादा-से-ज़्यादा जी 20 और पेरिस क्लब (आधिकारिक लेनदारों) के ‘ऋण सेवा भुगतान में समयबद्ध निलंबन’ के लिए मंज़ूरी दे सकता है, जबकि लंदन क्लब (निजी लेनदारों) को स्वैच्छिक आधार पर कार्य करने की छूट होगी। अमेरिका न केवल उचित तात्कालिक राहत को रोकने में हर संभव पहल कर रहा है, बल्कि उसने साफ़ कर दिया है कि वो दीर्घकालिक ऋण निलंबन की अनुमति भी नहीं देगा। दक्षिणी गोलार्ध के देशों में कोरोनोवायरस मंदी आती है तो आए।

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इज़्रेना मारवान, मज़मून और मज़दूर, 2020

कोरोनोवायरस मंदी में जाते देशों में से एक जमैका है; वहाँ के वित्त और लोक सेवा मंत्री निगेल क्लार्क ने कहा कि ‘पर्यटन क्षेत्र की सारी गतिविधि ठप्प पड़ी हुई है और फिर से खुलने की संभावना और समय के बारे में साफ़ तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता।’ नवंबर 2019 में जमैका ने IMF के ऋण चुकाए थे। IMF टीम के प्रमुख, उमा रामकृष्णन ने कहा था कि जमैका उज्ज्वल भविष्य के ओर अग्रसर है। लेकिन ये मीठे शब्द जमैका द्वीप पर भयानक बजट कटौतियों की प्रक्रिया पूरी होने बाद बोले गए।

जमैका लैंड्स के चेयरमैन क्रिस्टोफ सिम्पसन ने जमैका में क़र्ज़ और स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र की स्थिति के बारे में ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान से बात की। सिम्पसन इस बात पर विशेष ध्यान दिलाते हैं कि जमैका की 90% आबादी के पूर्वज ग़ुलाम थे, जिनका श्रम ब्रिटिश हुकुमत ने चुराया था। जब लोगों ने स्वतंत्रता हासिल की, तो ब्रिटिश राजकोष ने बाग़ान मालिकों को उनकी ‘संपत्ति' के 'नुक़सान' के लिए मुआवज़ा दिया। बाग़ान मालिकों को मुआवज़ा देने के लिए ब्रिटिश सरकार ने जो ऋण लिया था, उसका भुगतान 2015 तक नहीं किया गया था, जब ब्रिटेन के प्रधान मंत्री डेविड कैमरन ये कहने के लिए जमैका आए थे कि ग़ुलाम बनाए गए लोगों और उनके वंशजों की क्षतिपूर्ति के लिए मुआवज़ा देने पर विचार नहीं किया जा रहा है। उपनिवेशवाद ने जमैका को पर्यटन क्षेत्र के भरोसे छोड़ दिया, वो भी सीमित आर्थिक संप्रभुता के साथ।

सिम्पसन ने कहा, 'हम क़र्ज़ के कभी न ख़त्म होने वाले चक्र में फँसे हैं।' ‘IMF जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ अपने द्वारा उधार दिए गए धन पर शर्तें निर्धारित करती हैं, जिससे हमें सार्वजनिक क्षेत्र में दिए जाने वाला वेतन पर अपने GDP का 9% से अधिक ख़र्च करने की अनुमति नहीं है।’ स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा के क्षेत्र में भारी कटौती की जाती है, जिसका अर्थ है कि नर्सों और शिक्षकों को बहुत कम वेतन मिलता है। ‘उच्च वेतन के लोभ में नर्सें और शिक्षक जमैका से संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में चले जाते हैं।’ सिम्पसन ने समझाया, 'अनिवार्यत: हमारे ऋण-ग्रस्त होने का लाभ उन्हें मिलता है।’ जमैका के लोग एक-दूसरे को मुफ़्त प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा देते हैं और उच्च शिक्षा की लागत का आधा हिस्सा भी प्रदान करते हैं। उच्च शिक्षा के स्नातकों में से 80% काम करने के लिए जमैका द्वीप छोड़कर विदेश चले जाते हैं। सदियों से लूटा जा रहा जमैका, अब उत्तरी अटलांटिक देशों के स्वास्थ्य-देखभाल क्षेत्र में सहायता करता है।

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एलियन थॉमस (1947-2004), जमैका की वर्कर्स पार्टी के संस्थापकों में से एक, अपनी पुस्तक ‘बिफ़ोर दे कैन स्पीक ऑफ़ फ़्लावर्स: वर्ड रिदम्स’ (1988) में ज़िक्र करतीं हैं कि उन्हें राजनीति में हस्तक्षेप करने से कितनी बार रोका गया था। थॉमस जमैका के संदर्भ में राजनीति (politics) को राजनीतिक-चालें (politricks) कहती थीं। भुखमरी और बीमारी का राजनीति के अलावा किसी और चीज से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि राजनीतिक फ़ैसलों के माध्यम से ही पहले लोगों से संसाधन चुराए जाते हैं जिसके बाद उन्हें ग़रीबी का दंश झेलना पड़ता है।

मैं राजनीति में हस्तक्षेप कैसे न करूँ?

जब राजनीतिक-चालें ही मुझे तय करती हैं।

उदाहरण के लिए... 

अच्छी किताब कहती हैं- 

‘माथे के पसीने से 

कमायी रोटी खाओ’

 

पर क्या तुम नहीं जानते

उन लोगों की जमात को

जो पसीने की नदियाँ बहाते हैं

हर रोज़

फिर भी नहीं मिलती है 

रोटी जिनको?

 

राजनीतिक-चालें

तय करती हैं इस यथार्थ को।

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विकास ठाकुर, ‘घर', भारत के प्रवासी मजदूरों के लिए दूर का सपना, 2020

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान का डॉसियर 28 (मई 2020) “कोरोनाशॉक: वायरस और संसार’’ मौजूदा राजनीति  और राजनीतिक चालों पर केंद्रित है। बजट-कटौती के वायरस और ऋण चुकाने के नाम पर ग़ुलाम बनाने वाले वायरस ने दुनिया के अधिकांश हिस्सों में जर्जर विश्व व्यवस्था का निर्माण किया, जो अब वैश्विक महामारी के आने के साथ चरमराने लगा है। ये डॉसियर नवउदारवाद के राजनीतिक ढाँचे का विवरण प्रस्तुत करता है, जिसने स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा प्रदान करने वाले बुनियादी सामाजिक संस्थानों को नष्ट कर दिया है और एक ऐसी दुनिया का निर्माण किया जा रहा है जहाँ अनुत्पादक पूँजी शासन करती है और जिसमें विशाल प्लेटफ़ार्म या वेब-आधारित फ़र्मों ने अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर अपनी पकड़ जमा ली है।

इंटरनेश्नल पीपुल्स असेंबली और ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने मिलकर एक 16-सूत्री मांगपत्र जारी किया था, जिसमें तत्काल राहत प्रदान करने के उपायों के साथ दीर्घकालिक उपाय शामिल हैं। हाल में जारी होने वाले डॉसियर में हमने इन उपायों में से एक-सब के लिए सार्वभौमिक न्यूनतम आय (UBI)- पर सावधानीपूर्वक बात की है। UBI योजना के बारे में अपना आलोचनात्मक पक्ष रखने के साथ ही हमने इस बात का मूल्यांकन भी किया है कि इसे सार्वभौमिक योजना की तरह लागू करना क्यों ज़रूरी है। इसे अन्य सामाजिक सेवा योजनाओं में कटौती करके चलाने की बजाये धनाढ्यों पर टैक्स लगाकर इसके लिए राशि उपलब्ध कराई जाए। हम UBI के बारे में समाजवादी दृष्टिकोण रखते हैं, और ज़ोर देकर कहते हैं कि UBI अन्य सामाजिक वेतनों का पूरक होना चाहिए न कि ‘पात्र ग़रीबों’ के मिथक को गढ़ने वाला जो कि ज़रूरतमंद ग़रीबों को अन्य ग़रीबों के बीच भेद करता है।

डॉसियर 28 में क्यूबा से लेकर मलेशिया के आठ कलाकारों के चित्र शामिल हैं, जो अपनी तस्वीरों से लॉकडाउन का चित्रण करने के लिए एक साथ आए। इस न्यूज़लेटर में उनके कुछ चित्र साझा किए गए हैं।

<साम्राज्यवाद के विरोध में पोस्टर प्रदर्शनियों के लिए कलाकारों का आह्वान

https://www.youtube.com/watch?time_continue=21&v=NVeHrGraG5M&feature=emb_logo>

कलाकारों के साथ सहयोग स्थापित करना हमारे काम की ख़ास विशेषता है। इसी वजह से हमने इंटरनेश्नल पीपुल्स असेंबली और साम्राज्य-विरोधी संघर्ष के अंतर्राष्ट्रीय सप्ताह के साथ मिलकर पूँजीवाद, नवउदारवाद, हाईब्रिड युद्ध, और साम्राज्यवाद पर एक पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित की है। इस प्रदर्शनी की सूचना ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को दें।

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डार यासीन (एसोसिएटेड प्रेस), श्रीनगर, कश्मीर, 9 अगस्त 2019

एसोसिएटेड प्रेस के तीन फ़ोटोग्राफ़रों, डार यासीन, मुख़्तार ख़ान और चन्नी आनंद को कश्मीर में चल रहे संघर्षों पर उनकी फ़ोटोग्राफ़ी के लिए पुलित्ज़र पुरस्कार मिला है। कृपया कश्मीर पर हमारा रेड अलर्ट पढ़ें।

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Developed country
Loan of poor country
Labour
Labour condition in india
IMF
World Bank
loan from IMF and World bank

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