NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
हर्षवर्धन
19 Mar 2022
Azimullah Khan

1857 के विद्रोह के कई नायक और नायिकाओं में एक नाम अज़ीमुल्ला ख़ान का है जिनको याद तो हर साल किया जाता है लेकिन उनकी जगह आज़ाद भारत के मस्तिष्क पटल पर हाशिये पर ही है। अज़ीमुल्ला ख़ान की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो बहुत ही गरीब परिवार में पैदा हुआ, जिसके सर से माँ-बाप का साया बचपन में ही उठ गया, जिसने अपने दम पर समाज में अपनी जगह बनाई, जो चाहता तो अपनी ज्ञान और काबिलियत के दम पर एक आलीशान ज़िन्दगी जी सकता था लेकिन उसने देश के लिए लड़ने और मरने का रास्ता चुना।

अज़ीमुल्ला ख़ान जन्म सन 1830 में कानपुर शहर हुआ था। उनके पिता का नाम नजीबुल्ला ख़ान था जो मिस्त्री का काम करते थे, उनकी माता का नाम करीमन था जो गृहिणी थीं। अज़ीमुल्ला ख़ान अंग्रेज़ सैनिको द्वारा भारतीयों पर किये जाने वाले अत्याचार के गवाह भी थे और भुक्त भोगी भी।

अज़ीमुल्ला के पड़ोस में एक मिठाईवाला था। एक रोज़ वो शाम को अपनी दुकान बंद कर के वापस जा रहा था तभी वहां एक अँगरेज़ सैनिक आ गया। दुकान बंद देखकर उस सैनिक को गुस्सा आ गया और उसने मिठाईवाले को मार-मार कर अधमरा कर दिया। पुलिस भी जब घटनास्थल पर आई तो मिठाईवाले को ही पकड़ कर ले गयी। ये दृश्य देख कर बाल अज़ीमुल्ला में अपने पिता को ले कर डर बैठ गया जो अंग्रेज़ो को यहाँ ही काम करते थे। उनका ये डर कुछ दिनों बाद सही साबित हुआ जब उनके पिता नजीबुल्ला अंग्रेज़ो के ग़ुस्से का शिकार हो गए।

हुआ यूँ की नजीबुल्लाह जिस अंग्रेज़ अधिकारी के यहाँ काम करते थे उसने उनको घोड़े का अस्तबल साफ़ करने को कहा। नजीबुल्ला ने यह काम करने से इंकार कर दिया जिसकी वजह से उस अधिकारी को गुस्सा आ गया। अधिकारी नजीबुल्ला को बाल से पकड़ कर घसीटते हुए छत पर ले गया और वहां से नीचे गिरा दिया। इसके बाद उनसे नजीबुल्ला को पत्थर से मारा जिसकी वजह से उनके सर पर गहरी चोट लग गयी। इसके परिणाम स्वरूप नजीबुल्ला शय्याग्रस्त हो गए और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। अज़ीमुल्ला तब मात्र सात वर्ष के थे। इस घटना से अज़ीमुल्ला के बाल मन में अंग्रेज़ो के लिए नफ़रत भर गई।

पिता की मृत्यु के बाद अज़ीमुल्ला ख़ान के परिवार पर जो आर्थिक संकट आया उसको दूर करने के लिए उनकी माँ ने पुश्तैनी मकान बेच दिया ताकि अज़ीमुल्ला की पढाई न रुके। लेकिन कुछ समय बाद जब पैसे ख़त्म तो गए तो उनकी माँ को दूसरों के घर में काम करना पड़ा जिसको देख कर अज़ीमुल्ला का बाल ह्रदय ख़टकने लगा। एक दिन अज़ीमुल्ला ख़ान ने अपनी दुविधा अपने अपने पिता के एक मित्र को सुनाई और उनकी मदद से कानपुर में ही एक अंग्रेज़ अधिकारीचार्ल्स हिलेर्डसन के यहाँ नौकरी पर लग गए।

हिलेर्डसन के यहाँ अज़ीमुल्ला का मुख्य काम खाना बनाना तथा घर की साफ़-सफाई करना था। हिलेर्डसन के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक शिक्षक आता था। अज़ीमुल्ला दूर से उस शिक्षक को पढ़ाते हुए सुनते थे। जब हिलेर्डसन को ये पता चला की अज़ीमुल्ला पढ़ने-लिखने के इच्छुक हैं तो उसने शिक्षक को  उनको भी पढ़ाने का निर्देश दिया। अज़ीमुल्ला ने इस सुनहरे मौके का पूरा फायदा उठाया और पूरे मन से पढ़ाई करने लगे। जल्द ही वो अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा सिख गए और कुछ समय बाद उनका दाखिला 'कानपुर फ्री स्कूल' में हो गया।    

अज़ीमुल्ला दिन में स्कूल जाते और वापस आ कर हिलेर्डसन के घर का काम करते फिर देर रात तक अपनी पढ़ाई करते। पढ़ाई ख़त्म होने के बाद अज़ीमुल्ला इसी स्कूल में नौकरी करने लगे लेकिन कुछ समय बाद उनको नौकरी से निकल दिया गया। अपने पिता के एक मित्र गजानंद मिश्र के माध्यम से अज़ीमुल्ला ख़ान की मुलाकात ईस्ट इंडिया कंपनी के एक सिपाही अनंदीदीन मिश्र से हुई। कुछ समय उपरांत अनंदीदीन और उनके  कुछ साथी सिपाहियों की बैठकें अज़ीमुल्ला के घर पर होने लगी जहाँ पे राजनीतिक चर्चा के साथ साथ अज़ीमुल्ला उन सिपाहियों को अंग्रेजी भाषा भी सिखाते थे। अज़ीमुल्ला ख़ान को भारतीय सिपाहियों में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सुलग रहे विद्रोह की चिंगारी का पता इन्हीं बैठकों में पता चला।   

इसी बीच में कानपुर के एक साहूकार ने अपने कोर्ट केस के सिलसिले में अज़ीमुल्ला की मदद मांगी। अज़ीमुल्ला ने उस साहूकार की मदद करने के लिए एक अँगरेज़ वकील का इंतज़ाम किया लेकिन वह वकील आखिरी सुनवाई के दिन कोर्ट नहीं आया और वह साहूकार केस हार गया। ऐसे ही एक बार दो अंग्रेज़ अफसरों पर एक हिंदुस्तानी की हत्या का केस चला। अज़ीमुल्ला ने बहुत मशक्कत कर के एक भारतीय वकील का इंतज़ाम किया। इस केस में अंग्रेज़ न्यायधीश ने भारतीय गवाहों की बात मानने से इंकार इनकार कर दिया और दोनों अफसरों को छोड़ दिया।

इन सब के बावजूद अज़ीमुल्ला ख़ान का नाम कानपुर में फैल रहा था क्यूंकि वो उन गिने -चुने भारतीयों  में थे जिनको अंग्रेजी भाषा का ज्ञान था। जल्द ही उनकी मुलाकात कानपुर में नाना साहब पेशवा से हुई और वो उनके सचिव बन गए। अज़ीमुल्ला के सुझाव पर नाना साहेब ने अपनी पेंशन और कुछ अन्य समस्यायों के बारे में महारानी विक्टोरिया के नाम के पत्र लिखा जिसको ले कर 1853 में अज़ीमुल्ला ख़ान लंदन गए।

हालाँकि लंदन में अज़ीमुल्ला जिस मकसद से गए थे वो पूरा नहीं हो सका लेकिन लंदन में रहते हुए अज़ीमुल्ला ख़ान की मुलाकात उस वक़्त के कुछ प्रमुख चिंतको और दार्शनिकों जैसे चार्ल्स डिकेन्स, थॉमस कार्लाइल, विलियम ठाकेरय इत्यादि से हुआ। इन हस्तियों से अज़ीमुल्ला की मुलाकात लंदन की एक प्रभावयुक्त महिला लूसी डफ़ गॉर्डन के माध्यम से हुआ था जिनके यहाँ अज़ीमुल्ला ठहरे थे। लंदन में ही अज़ीमुल्ला ख़ान की मुलाकात सतारा राज्य के प्रतिनिधि रंगोली बापू, लंदन में काम करे रह डॉ. वज़ीर ख़ान जो कि मुग़ल परिवार से सम्बन्ध रखते थे और अभियंता अली मुहम्मद ख़ान से हुई। अली मुहम्मद आगे चल कर अज़ीमुल्ला ख़ान के साथ 1857 के विद्रोह में कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़े। 1858 में अली मुहम्मद को अंग्रेज़ो ने लखनऊ में गिरफ्तार कर लिया गया और उनको फांसी दे दी गयी।   

लंदन से अज़ीमुल्ला ख़ान करीबन दो वर्ष तक रहे। वापसी के वक़्त अज़ीमुल्ला ख़ान कुछ समय आज के इस्तांबुल में रुके। इस्तांबुल में उनको क्रीमिया में चल रहे युद्ध के बारे में पता चला जिसमे एक तरफ अंग्रेज़, फ्रांस और ओटोमन साम्राज्य था और दूसरी तरफ रूस। इस युद्ध में रूस ने ब्रिटेन और फ्रांस की संयुक्त सेना को हरा दिया था जिसको देख कर अज़ीमुल्ला ख़ान के मन में ये बात घर कर गयी कि भारत में भी यदि सारी देसी रियासते एक हो गई तो अंग्रेज़ो को हराया जा सकता है। इस सपने और एक प्रिंटिंग प्रेस के साथ अज़ीमुल्ला भारत वापस भारत आए।

भारत आ कर अज़ीमुल्ला ने अपनी योजना नाना साहेब को सुनाई और वो मान गए। 1857 के विद्रोह को व्यापक रूप देने में अज़ीमुल्ला ख़ान की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने नाना साहेब के साथ मिल कर उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत के कई छोटे राजाओं से मुलाकात की और उनको विद्रोह में शामिल होने का न्योता दिया। इसी सिलसिले में उनकी मुलाकात हरियाणा में राव तुलाराम, बहादुर गढ़ के राजा नाहर सिंह, जम्मू के राजा गुलाब सिंह इत्यादि लोगों से हुई। अम्बाला में अज़ीमुल्ला की मुलाकात अनंदीदीन मिश्र के एक रिश्तेदार गोकुल मिश्र से हुई जो की बंगाल नेटिव इंफंटरी के 64 वे बटालियन में थे। मुलकात की कुछ ही समय पहले बंगाल में मंगल पांडे हो चुकी थी जिसकी वजह से सिपाहियों में गुस्सा था।

इन सब मुलाकातों से हम यह निष्कर्ष निकल सकते हैं की अज़ीमुल्ला ख़ान ने देशी रियासतों और सिपाहियों की लड़ाई को एक सूत्र में पिरोने में अहम् भूमिका निभाई थी। लेकिन अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे। अज़ीमुल्ला अपनी यूरोप यात्रा से जो प्रिंटिंग प्रेस लाये थे उससे उन्होंने एक अख़बार 'पयाम-ए-आज़ादी' निकला जिससे क्रांति और विद्रोह का प्रचार होता था। यह अख़बार हिंदी, उर्दू और मराठी में निकला था।

इसी अख़बार में लिखा उनका एक गीत आगे चलकर 1857 के विद्रोहियों  का झण्डा गीत बना। वह गीत इस प्रकार है…

“हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा,

पाक वतन ह कौम का, जन्नत से भी प्यारा।

 

ये है हमारी मिल्कियत, हिंदुस्तान हमारा,

इसकी रूहानियत से, रोशन है जग सारा।

 

कितनी कदीम, कितनी नईम, सब दुनिया से न्यारा,

करती है ज़रखेज जिसे, गंगो-जमुन की धारा।

 

ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा,

नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्कारा।

 

इसकी खाने उगल रहीं, सोना, हिरा, पारा,

इसकी शान शौकत का दुनिया में जयकारा ।

 

आया फिरंगी दूर से, एसा मंतर मारा,

लुटा दोनों हाथों से, प्यारा वतन हमारा ।

 

आज शहीदों ने है तुमको, अहले वतन ललकारा,

तोड़ो, गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा ।

 

हिन्दू मुसलमाँ सिख हमारा, भाई भाई प्यारा,

यह है आज़ादी का झंडा, इसे सलाम हमारा ।”

यह गीत 1857 के क्रांतिकारी आदर्श और लक्ष्य को भलीभांति प्रकट करता है। इस गीत में निहित राष्ट्रीयता और 1857 की लड़ाई के जन-पक्ष के बारे में भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के साथी भगवानदास माहौर अपने शोध ग्रन्थ, '1857 के स्वाधीनता संग्राम का हिंदी साहित्य पर प्रभाव' में लिखते हैं,“1857 के क्रांतिकारी सिपाहियों का यह अभियान-गीत राष्ट्रीय गीतों का मुकुट मणि है। यह सीधा, सरल, साफ और अमित शक्ति से भरा है...इसमें केवल देश का स्तुतिगान ही नहीं, स्वातंत्र्य-संघर्ष के लिए आह्वान भी है, ललकार भी है। इसमें घोषित किया गया है कि हिन्दुस्तानियों की एक कौम है, हिंदुस्तान जिसका पाकवतन है, हिन्दू-मुस्लिम-सिख़ आदि भाई-भाई हैं…गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए सिपाहियों ने जो झंडा खड़ा किया है वह कौम की आजादी का झण्डा है, किसी सामंती सम्राट का निजी झण्डा नहीं, गीत की भावना में जनवाद है, राष्ट्रवाद है सामंतवाद नहीं इसमें आक्रोश लुटेरे फिरंगी के प्रति है, कौम नसारा (ईसाई) के प्रति नहीं…।”

इस गीत को पढ़कर अगर अज़ीमुल्ला ख़ान को आधिनुक भारत का पहला राष्ट्रवादी कहा जाए तो वह अतिश्योक्ति नहीं होगा। अज़ीमुल्ला ख़ान शायद वह पहले या उन पहले व्यक्तियों में से थे जिन्होंने पूरे भारत, जो उस वक़्त अलग-अलग रियासतों में बटा हुआ था, को एक राजनितिक इकाई के रूप में देखा था। एक सफल विद्रोह के उपरांत उनका लक्ष्य सम्पूर्ण भारत को एकजुट कर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रनिर्माण का था।

'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद करने वाले इस क्रांतिदूत की मृत्यु महज़ 29 साल की उम्र में 18 मार्च सन् 1859 में कानपुर में विद्रोह को कुचले जाने के बाद हुई।

अज़ीमुल्ला ख़ान भारत की आजादी की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक है। आज के सांप्रदायिक माहौल में अज़ीमुल्ला ख़ान का लिखा वह कौमी तराना और भी प्रासंगिक हो जाता है।

(लेखक जेएनयू के शोधार्थी हैं।)

Azimullah Khan
Dewan Azimullah Khan
Indian Rebellion of 1857

Related Stories

साझी विरासत-साझी लड़ाई: 1857 को आज सही सन्दर्भ में याद रखना बेहद ज़रूरी

वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव को विभाजनकारी एजेंडा का मंच बनाना शहीदों का अपमान


बाकी खबरें

  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    यति नरसिंहानंद न्यायिक हिरासत में, उत्तराखंड बीजेपी में खलबली और अन्य ख़बरें
    17 Jan 2022
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी हरिद्वार धर्म संसद मामला, उत्तराखंड बीजेपी में चल रही हलचल और अन्य ख़बरों पर
  • poisonous liquor
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः पूर्ण शराबबंदी के बावजूद ज़हरीली शराब से जा रही लोगों की जानें
    17 Jan 2022
    "ज़हरीली शराब से हुई मौतों के प्रति सरकार व प्रशासन का रवैया असंवेदनशील व ग़ैर ज़िम्मेदाराना है। सत्ता के संरक्षण व पुलिस तंत्र के सहयोग से ज़िला में शराब का ग़ैरक़ानूनी तंत्र चल रहा है।"
  • akhilesh
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव:  बीजेपी को नहीं पचा अखिलेश का ‘अन्न संकल्प’
    17 Jan 2022
    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने किसानों के वोट साधने के लिए अन्न संकल्प लिया है, और किसानों से कई वादे किए हैं। जिसके बाद बीजेपी भी अखिलेश यादव पर हमलावर हो गई।
  • Scenes from the Kashmir press club
    अनीस ज़रगर
    कश्मीर प्रेस क्लब पर जबरन क़ब्ज़े पर पत्रकारों की संस्थाओं ने जताई नाराज़गी और हैरानी
    17 Jan 2022
    केपीसी में “राज्य समर्थित” तख़्तापलट पर पत्रकारों द्वारा बड़े पैमाने पर आक्रोश जताया जा रहा है। इसे जम्मू-कश्मीर में स्वतंत्र अभिव्यक्ति और स्वतंत्र पत्रकारिता के दमन को तेज करने के लिए उठाया गया क़दम…
  • Dalit Movement
    महेश कुमार
    पड़ताल: पश्चिमी यूपी में दलितों के बीजेपी के ख़िलाफ़ वोट करने की है संभावना
    17 Jan 2022
    साल भर चले किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी समीकरण बदल दिए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License