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राजनीति
बिहार के ग्रामीण खेत मज़दूरों का ऐलान : 8 जनवरी 2020 को भारत बंद सफल करेंगे!
अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मज़दूर सभा के आह्वान पर 9 व 10 नवंबर को पटना में 1000 से भी अधिक खेत व ग्रामीण मज़दूरों का सम्मेलन हुआ। सम्मेलन से आगामी 27 नवंबर को राज्य के सभी प्रखंडों पर खेत व ग्रामीण मज़दूर अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की गई है।
अनिल अंशुमन
16 Nov 2019
farmer protest

9 नवंबर को जब सबकी नज़रें अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट से होने वाले फ़ैसले पर टिकी हुई थीं और इसी दिन बिहार के दसियों हज़ार ग्रामीण 'हमें काम चाहिए और काम का पूरा दाम चाहिए!' जैसे नारों के साथ राजधानी पटना में इकट्ठे हुए। इन ग़रीबों के जुटान ने दिखा दिया कि सत्ता-सियासत द्वारा ‘भटकाव के उन्मादी मुद्दे‘ थोपकर उनके बुनियादी मुद्दों को हाशिये पर धकेलने की साज़िशों को वे समझने लगे हैं।

अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मज़दूर सभा के आह्वान पर 9 व 10 नवंबर को राजधानी पटना के गर्दनीबाग गेट पब्लिक लाईब्रेरी परिसर में आयोजित रैली व सम्मेलन के तहत विभिन्न ज़िलों–अंचलों से आए गांवों के ग़रीब-गुरबों का यह जुटान हुआ। सम्मेलन में 1000 से भी अधिक खेत व ग्रामीण मज़दूर शामिल हुए, साथ ही महिला व पुरुष प्रतिनिधियों ने भागीदारी निभाई। इस सम्मेलन में वर्तमान की केंद्र और बिहार की सरकारों द्वारा भूमि, आवास, शिक्षा व रोज़गार के अधिकारों को छीने जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष के कार्यक्रम तय किए गए।

साथ ही ग्रामीण पलायन रोकने के लिए यूपीए सरकार के समय से ही चलाई जा रही मनरेगा योजना में कटौती कर उसे समाप्त करने की साज़िशों को रोकने के उपायों पर भी बातें हुईं। सम्मेलन से आगामी 27 नवंबर को राज्य के सभी प्रखंडों पर खेत व ग्रामीण मज़दूर अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन करने तथा मोदी सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ आगामी 8 जनवरी 2020 को विभिन्न ट्रेड यूनियनों के भारत बंद को पूरी सक्रियता के साथ सफल बनाने की घोषणा की गयी। सम्मेलन से मनरेगा बचाने के संघर्ष के लिए बिहार प्रदेश मज़दूर सभा का भी गठन किया गया।

पटना ग्रामीण क्षेत्र से सैकड़ों महिला–पुरुष ग्रामीण खेत मज़दूरों को रैली व सम्मेलन में लेकर आए युवा जितेंद्र पासवान ने बताया कि गाँव के ग़रीबों को उज्जवला गैस और शौचालय योजना जैसी योजनाओं का शोर मचाकर सिर्फ़ विकास राशियों का बंदरबाँट किया गया। व्यापक ग़रीबों के पेट और हाथ ख़ाली के ख़ाली रखकर सिर्फ़ रोज़ रोज़ के करोड़ी प्रचार से गाँव के लोगों को फ़ायदा पहुंचाने का सिर्फ़ शोर मचाया जा रहा है। मधुबनी ज़िले से आई 50 वर्षीय धनिया देवी ने राशन में मची लूट पर क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि मोदी–नितीश की सरकार सिर्फ़ ग़रीबों को ठगने का काम कर रही है। भभुआ–कैमूर के दुखिराम ने कहा, "गाँव के ग़रीबों को भूमि और आवास देने की बात सिर्फ़ हवा हवाई है उल्टे जल संरक्षण के नाम पर आहार–पोखर और सड़क किनारे वर्षों से बसी हुई उनकी बस्तियों को उजाड़ने का सरकार ने फ़रमान जारी कर दिया है।"

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नालंदा से आए दलित ग्रामीण मनरेगा मज़दूर अजित रविदास ने कहा, "मोदी और एनडीए शासन हम ग्रामीण ग़रीबों के लिए तो काल बनकार आया है। बड़े-बड़े चँवर–पोखर की ज़मीनों पर क़ब्ज़ा किए बैठे सामंतों–भूमिपतियों को हर तरह से सरकार–प्रशासन का संरक्षण मिल रहा है और हमें उजाड़ा जा रहा है।"

ग्रामीण खेत मज़दूरों की रैली को संबोधित करते हुए भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर ने कहा, "पूरा देश जिस आर्थिक मंदी और भारी आर्थिक अस्तव्यस्तता की चपेट आया हुआ है वह सब मोदी सरकार की ही देन है। जिसने नोटबंदी और आधा अधूरा जीएसटी लाकर अर्थव्यवस्था की रही सही कम तोड़ दी। इसीलिए मज़दूर–किसानों पर कोई बात नहीं हो रही है। भूख से लगातार मौतें हो रहीं हैं और ग़रीबों की राशन व्यवस्था तहस नहस करके सबको मंदिर–मस्जिद विवाद में उलझाया जा रहा है। एनडीए सरकार गांवों के ग़रीबों को फिर से ज़मींदारी दौर में ले जाना चाहती है।"

संगठन के राष्ट्रीय महासचिव धीरेन्द्र झा ने खेत मज़दूरों के जुटान में आए लोगों का स्वागत किया। रैली व सम्मेलन से आगामी संघर्ष के 10 सूत्री प्रस्ताव भी पारित किए गए। समापन के पूर्व जहानाबाद में खेत मज़दूरों के अधिकारों की नेता मंजू देवी के शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि दी गयी।

होली–दशहरा–दीपावली और छठ पूजा के अवसरों पर देश की रेलगाड़ियों के बाथरूम तक में घुसे जिन यात्रियों की तस्वीरें सामने आती हैं, अधिकांश वे बिहार के ग्रामीण मज़दूरों की ही होती हैं। हर साल काम धंधे की तलाश में पलायन करके परदेस की ठोकरें खाने वालों में आज भी बिहार के ग्रामीण मज़दूरों की तादाद सबसे अधिक रहती है। जो कभी कश्मीर में मारे जाते हैं तो कभी गुजरात और मुंबई से पीट–पीटकर भगाए जाते हैं तो कभी सुदूर मणिपुर तो कभी कहीं और से।

जबकि गाँव के ग़रीबों के पलायन रोकने और उन्हें वहीं काम धंधा उपलब्ध कराने के नाम पर आए दिन सरकारें बड़ी–बड़ी योजनाओं के ढोल पीटती नज़र आती हैं। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इससे पूरी तरह अलग और भयावह है। ऐसे में खेग्रामस के बैनर तले जुटे बिहार के ग्रामीण–खेत मज़दूरों का अपनी ज़िंदगी की बेहतरी और अधिकार सम्पन्न–सम्मान-जनक जीवन यापन के संघर्ष का हौसला स्वागत योग्य कहा जाना चाहिए।

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