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बेहतर भविष्य का रास्ता युद्ध से होकर नहीं जाता है
चाहे जितने भी जायज तर्क हों, लेकिन वह युद्ध को जायज नहीं बता सकते। युद्ध वर्तमान को तो बर्बाद करता ही है, साथ में भूत और भविष्य सबको तबाह कर देता है।
अजय कुमार
03 Mar 2022
Russia Ukraine war

जब आप किसी यूक्रेनी नागरिक के मरने पर सहानुभूति जता रहे हैं, तो एक बार अपने आप से सवाल जरुर पूछिएगा कि आखिरकार ऐसी ही सहानुभूति फिलिस्तीन, ईरान, इराक, यमन, अफगानिस्तान जैसे देशों में मरने वाले लोगों के लिए क्यों नहीं उमड़ी?

आखिरकार क्या वजह थी कि 3 फरवरी साल 2022 को जब रूस यूक्रेन पर हमला करने की सोच रहा था, ठीक उसी समय अमेरिका की सैन्य कार्रवाई की वजह से सीरिया में 4 बच्चे और 5 औरतों के साथ 13 लोग मारे गए थे, तो इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली? साल 1987 से लेकर साल 2020 तक मरे 10 हजार से अधिक फिलिस्तीनी बच्चों के लिए दुखों का समंदर क्यों नहीं उमड़ता है? यमन में मरने वाले साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोगों के दुख और यमन की बर्बादी पर हमने इतनी चर्चा क्यों नहीं की जितनी हम यूक्रेन पर कर रहे हैं?

इस सवाल पर सोचते हुए जायज जवाब मिलेंगे। उन सब जवाबों में एक जवाब कॉमन यह होगा कि हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां पर कई स्तरों पर गहरे तौर पर गैर-बराबरी है। यह गैर-बराबरी हमारे चाहते और न चाहते हुए भी हमें बर्बाद करती है। इस गैर बराबरी से लड़ना ही असली लड़ाई है। सबके लिए आजादी बराबरी और इंसाफ का सपना बम और बारूद के जरिए हकीकत में नहीं बदला जा सकता।

यह तर्क बिल्कुल जायज है कि अगर रूस यूक्रेन पर हमला ना करता तो हो सकता है कि आने वाले दिनों में नाटो के सदस्य यूक्रेन से रूस पर हमला कर देते। यह बात भी बिल्कुल सही है कि अमेरिका की अगुवाई वाले नाटो ने अपनी ही नियम का उल्लंघन किया है। वारसा की संधि के तहत  नाटो को जर्मनी से 1 इंच भी आगे नहीं बढ़ना था। लेकिन नाटो में बुल्गारिया, एस्टोनिया, लैटविया, लिथुआनिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया जैसे तमाम पूर्वी देश शामिल हो गए। नाटो रूस के मुहाने तक चला गया। रूस के लिए खतरा बन कर खड़ा हो गया। रूस के साथ यह सब कुछ गलत होने के बावजूद भी दुनिया के किसी भी इलाके में युद्ध का समर्थन नहीं किया जा सकता है।

मध्य एशिया से लेकर यूक्रेन तक कहीं भी केवल देश नहीं रहता है, बल्कि उस देश के भीतर लोग रहते हैं। जब युद्ध होता है तो अधिकतर चर्चा केवल कूटनीति पर होती है। लेकिन जब हम कूटनीति और रणनीति पर चर्चा कर रहे होते हैं, ठीक उसी समय देश की संपत्ति तो तबाह हो रही होती है। जमीन जायदाद और प्रकृति सब कुछ बर्बाद हो रहे होते है। लोग मरते हैं। अपंग होते है। घर छोड़कर एक जगह से दूसरी जगह भागते हैं। कई पीढ़ियों से चले आ रहे रिश्ते नाते अचानक हमेशा हमेशा के लिए टूट जाते हैं।

किसी भी देश के साथ या किसी भी व्यक्ति के साथ चाहे जितना भी नाजायज क्यों ना हुआ हो? युद्ध उस नाजायज का समाधान नहीं हो सकता है। अन्याय गैर बराबरी और गुलामी में बंधी हुई इस दुनिया को सही रास्ते पर ले चलने की जिम्मेदारी हम सब की है। जब अमेरिका के किए जा रहे अन्याय ऊपर अपनी आंख बंद कर लेते हैं केवल दूसरे के बदले की कार्यवाही को दोष देने लगते हैं तो हम चाहे अनचाहे दुनिया में युद्ध को दावत दे रहे होते हैं। यह एक उदाहरण है। यह बात समझाने के लिए कि युद्ध को रोकना देश के बस की बात की नहीं। बल्कि नागरिकों के अपने सत्ता से बनाए गए रिश्ते पर निर्भर करता है। इस बात पर निर्भर करता है कि देश के लोग अपनी सरकार को किस तरह से जवाबदेह बना रहे है।

युद्ध संगठित होकर जान माल को मारने का तरीका है। इसे सही ठहराने का कोई तरीका नहीं हो सकता। जब रूस यूक्रेन पर हमला कर रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि रूस बर्बाद नहीं होगा। हो सकता है कि पर रूस के अमीर लोग खुद को बजा ले जाएं लेकिन रूस के गरीब लोगों पर यह हमला कहर बनकर टूटेगा। वर्ल्ड इनिक्वालिटी रिपोर्ट कहती है कि कि साल 1990 के बाद रूस के 1% अमीर लोगों की रियल इनकम में तकरीबन 270 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जबकि 50 फ़ीसदी गरीब लोगों की रियल इनकम 1990 के मुकाबले 26 फ़ीसदी कम हुई है। इसका मतलब यह है कि कहने के लिए आर्थिक प्रतिबंधों से भले रूस अपने आप को बचा ले लेकिन उसका गरीब खुद को नहीं बचा सकता।

यूक्रेन का हाल तो बद से बदतर होने वाला है। पहले से ही तबाही के मुहाने पर खड़े मुल्कों यूक्रेन के रहनुमाओं ने बर्बाद कर दिया है। तर्क और विवेक के साथ सोचा जाए तो यूक्रेन के अगुआ ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे जिससे युद्ध से छुटकारा पाया जाए। वह शुरू से ही अमेरिकी और यूरोपी जाल में फंसकर चल रहे हैं। जिसका यूक्रेन लंबे समय से शिकार रहा है। जिसका असर यूक्रेन की अर्थव्यवस्था पर इतना गहरा पड़ा है  वह लगातार महंगाई बदहाली और नकारात्मक आर्थिक वृद्धि से गुजरा रहा था। ऐसे में नाटो को दावत देने का मतलब यह भी है कि यूक्रेन के अगुआ युद्ध की भयावहता को लेकर तनिक भी गंभीर नहीं थे।

जिस तरह की दुनिया में बन चुकी है, वैसी दुनिया में युद्ध के खिलाफ भी युद्ध विरोधी आंदोलन चलाने की जरूरत है। बड़े ध्यान से देखा जाए तो रूस यूक्रेन अमेरिका कोई भी देश सबसे पहले अपने नागरिकों में मिथक का भंडार भरकर उन्हें बहकाता है। उन्हें अंध राष्ट्रवादी बताता है। पुतिन या मोदी को ही देख लीजिए वह इतिहास की ऐसी व्याख्या करते हैं  जैसे इतिहास को तोड़ मरोड़ कर अंधराष्ट्रवादी भावनाएं भरने की कोशिश कर रहे है। यह भावनाएं कट्टरता से होते हुए युद्ध उन्माद तक की ला जाती है। और पता नहीं चलता कि समाज कब युद्ध उन्मादी बनता चला जा रहा है।

भारत में यूक्रेन के राष्ट्रपति की वर्दी वाले तस्वीर को लेकर जिस तरह से प्रतिक्रिया दी गई, उसमें एक सबसे बड़ी कमी थी कि लोगों ने युद्ध पर ताली बजाई। यह नहीं पूछा कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से क्यों नहीं निभाई। यह सबसे बड़ा पाठ है। अगर दुनिया युद्ध की तबाही से बचना चाहती है, तो लोगों को अपने सरकार की आलोचना करना सीखना पड़ेगा। सरकार के गलत कदमों को लेकर विरोध तेज करना होगा और सरकार भी लोगों से मिली अपनी आलोचना को सहना और स्वीकारना पड़ेगा।

फिलिस्तीन, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, यमन, अफ्रीका के देश, इन सब जगहों को विकसित देशों के लालच ने तबाह किया है। विकसित देशों की सरकार ने इन्हें कब्रगाह में तब्दील करने का काम किया है। यह सारे युद्ध इसलिए संभव हो पाते हैं क्योंकि नागरिकों की तरफ से सरकार में बैठे लोग की सही से घेराबंदी नहीं की जाती है। सरकार को जवाबदेही के कटघरे में खड़ा ना करने की वजह से सारे अनर्गल काम होते हैं। मध्य एशिया में जिस तरह से तख्तापलट के उदाहरण मौजूद हैं और विध्वंस की कई कहानियां हैं, वह यही बताती हैं कि सब कुछ होता रहा, लेकिन पूरा का पूरा विकसित समाज चुप रहा। क्यों चुप रहा? अगर इसका जवाब ढूंढने जाएंगे तो यही मिलेगा कि सरकार ने अमीर पूंजीपतियों के गठजोड़ से ऐसा मानस बनाया जो इंसानियत के लिए बोलने के बजाए ऐसे जाल में फंस गया, जिसकी अंतिम परिणीति युद्ध थी।

यूक्रेन में जो हो रहा है वह अचानक नहीं हुआ। यह साल 2014 से चल रहा है। लेकिन रुका नहीं। अब युद्ध में तब्दील हो गया। इसकी दोषी तो सरकार है ही, लेकिन यूक्रेन का नागरिक समाज भी है। केवल अमेरिका और यूरोप नहीं है, बल्कि यूरोप का नागरिक समाज है। युद्ध की भीषण तबाही को हम रोक सकते हैं, बशर्ते हम जागरूक नागरिक की भूमिका निभाएं।

जागरूकता का मतलब यह कतई नहीं होता की अच्छाई और बुराई की कैटेगरी बनाकर युद्ध को जायज ठहराया जाए। जागरूकता का मतलब यह होता है कि दुनिया की संरचना को समझा जाए जो हर रोज अन्याय की कहानी लिख रही होती है। जब तक हम हर तरह के अन्याय पर खुलकर नहीं बोलेंगे तब तक हम सुंदर भविष्य की कल्पना नहीं कर सकते। सुंदर भविष्य हथियारों के जरिए हासिल नहीं किया जा सकता। युद्ध के जरिए हासिल नहीं किया जा सकता। सुंदर भविष्य हासिल करने का तरीका है कि लोग सरकार और अमीरों के गठजोड़ पर बोलें। दुनिया में मौजूद हर तरह के भेदभाव पर बोलें। नाजायज फायदे पर बोलें। जायज नुकसान को स्वीकार करें। दुनिया अगर स्वतंत्रता समानता और न्याय हासिल करना चाहती है, तो उसका रास्ता भी स्वतंत्रता, समानता और न्याय होगा। उसका रास्ता युद्ध नहीं हो सकता। उसका रास्ता यह नहीं हो सकता कि दुनिया ईरान, इराक, अफगानिस्तान, यमन और अफ्रीका पर चुप रहें और अमेरिका द्वारा बनाए गए जाल में फंस कर हो-हल्ला करें। 

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