NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
हिन्द महासागर की ओर बढ़ रहे हैं रूसी
हाल के वर्षों में रूस ने पूर्वी भूमध्यसागर में अपनी उपस्थिति को मज़बूत किया है जिसमें तुर्की के साथ उसकी सांठ-गाँठ रही है। इसे सीरिया के ऊपर उनके घनिष्ठ समन्वय के साथ-साथ ख़ासतौर पर हाल ही में लीबिया को स्थायित्व में लाने के लिए ली गई संयुक्त पहल में देखा जा सकता है।
एम. के. भद्रकुमार
16 Jan 2020
Russians Are Coming

शीत युद्ध की यह परिकल्पना कि सोवियत संघ हिंद महासागर में "अपने पैर की उंगलियों को गीला" करने की उम्मीद कर रहा था, असल में "एंग्लो-रूसी प्रश्न" के रूप में जाना जाने वाले भू-राजनीतिक विन्यास का ही एक विस्तार था, जो कि एक ज़माने में ब्रिटिश काल में भारत (1899-1905) के वायसराय रहे लॉर्ड कर्जन के बारे में लिखा गया था। लेकिन आज हम इस बात को जान गए हैं कि अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप परिस्थिति वश हुई थी, बजाय किसी रणनीतिक वजहों से।

लेकिन अब ऐसा लगता है कि हिन्द महासागर में रूस का प्रवेश एक रणनीति के तहत हो रहा है, जिससे कि अमेरिका के सैन्य शक्ति की नीतियों पर भारी मात्रा में ज़ोर देने के जवाब में देखा जा सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप अक्सर अपनी सैन्य श्रेष्टता के लक्ष्यों को पूरा करने के विश्वास की पुष्टि करते रहते हैं। अभी हाल ही में अपने 8 जनवरी के भाषण में ईरान पर बोलते हुए ट्रंप ने अपने इरादों का खुलासा किया है, जिसमें उत्तर अटलांटिक संगठन (नाटो) को “मध्य पूर्व प्रक्रिया” में शामिल किये जाने की बात कही है।

रूस ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन इस बयान को अवश्य ध्यान में रखा होगा, जिसमें 4 दिसम्बर के नाटो के लंदन घोषणापत्र में रूस के "आक्रामक क्रिया कलापों" को पश्चिम देशों के लिए "विशिष्ट ख़तरों और सभी रणनीतिक दिशाओं से मिलने वाली चुनौतियों" के एक प्रमुख सांचे के रूप में अलग से रेखांकित किया गया था।

ट्रंप के इस भाषण के दो दिन बाद ही 10 जनवरी तक नाटो देशों का एक प्रतिनिधिमंडल पहले से ही वाशिंगटन में पहुँच जाता है, और विदेश विभाग की सूचना के अनुसार यह "यह चर्चा इराक में नाटो की भूमिका को और बढ़ाने को लेकर हुई, जो कि हम सभी के साझा सुरक्षा कार्यभार के दायित्व को साझा करने के राष्ट्रपति की इच्छा के अनुरूप" है।

और ठीक उसी दिन रोम में हुई इटली-यूएस रणनीतिक वार्ता के बाद वाशिंगटन ने अपने संयुक्त बयान में इस बात का भी उद्घोष किया कि दोनों मित्र देशों के बीच "साझेदारी के क्षेत्र" में अब भूमध्यसागरीय क्षेत्र में सुरक्षा और रक्षा सहयोग को भी बढ़ाने को लेकर हैं, जिसमें क्षेत्र में नाटो की भूमिका को बढ़ाया जायेगा और उन देशों के साथ जो साहेल के अंतर्गत आते हैं।"

असामान्य तौर पर रविवार के दिन, 12 जनवरी को, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने अपने तुर्की के समकक्ष मावलुत कावुसोग्लू से "मध्य पूर्व के घटनाक्रम" पर चर्चा करने और विशेष तौर पर "इस क्षेत्र में नाटो की कहीं और गुरुतर भूमिका निभाने की जरूरत" पर अपनी वचनबद्धता को दोहराया। जाहिर सी बात है, ट्रंप हवा में बयानबाज़ी नहीं कर रहे थे। पूरे मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में नाटो प्रोजेक्ट अपने कार्यान्वयन के तहत चालू है।

हाल के वर्षों में रूस ने तुर्की के साथ मिलकर पूर्वी भूमध्य सागर में अपनी उपस्थिति को सुद्रढ़ किया है, विशेष रूप से सीरिया पर उनके घनिष्ठ समन्वय के अलावा लीबिया को स्थिर करने के लिए अपने नवीनतम संयुक्त कदम के साथ। और इसी तरह सभी प्रकार के राजनैतिक और सम्प्रदायों में विभक्त समुदायों के साथ वृहत पैमाने पर सम्बन्धों के अलावा सीरिया में रूसी ठिकाने ने इस क्षेत्र में मास्को की प्रोफ़ाइल को एक प्रभावशाली मध्यस्थता की भूमिका वाली ताक़त में ला खड़ा कर दिया है।

लेकिन इसकी अभी तक इसकी सबसे बड़ी कमज़ोर कड़ी हिन्द महासागर क्षेत्र में बनी हुई है, जहाँ रूस की उपस्थिति हमेशा से एक मेहमान वाली रही है। लेकिन वास्तविकता में देखें, तो हाल के दिनों में रूस ने हिंद महासागर में नए सिरे से दिलचस्पी लेने के संकेत देने शुरू कर दिए थे। इसे नवंबर के अंत में रूस और चीन के साथ दक्षिण अफ्रीका के त्रिपक्षीय नौसैनिक अभ्यास में देखा जा सकता है। इसके एक महीने बाद इसी प्रकार के संयुक्त अभ्यास को उन्होंने ईरान के साथ भी मिलकर किया है।

मुश्किल से इस अभ्यास के एक पखवाड़े बाद ही, “उत्तरी अरब सागर” के आस पास रूसी और अमेरिकी जहाजों के बीच टकराहट होते होते बची है। पांचवे अमेरिकी जहाज़ी बेड़े ने यह आरोप लगाया है कि 9 जनवरी को एक रूसी नौसैनिक जहाज (संभवतः जासूसी जहाज) ने "आक्रामक तरीके से" यूएसएस फर्रागुत, एक 510-फुट मिसाइल निर्देशित विध्वंसक जो "उत्तर पूर्वी सागर में अपने नियमित गश्त पर था" से “आक्रामक तौर पर नजदीक आने की कोशिश की।“

रूसी रक्षा मंत्रालय ने अमेरिका के इस आरोप की धज्जियाँ उड़ाते हुए कहा है कि "नेविगेशन की सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय नियमावली की जानबूझकर अवहेलना करते हुए," अमेरिकी विध्वंसक ने "रूसी नौसैनिक जहाज के ट्रैफिक लेन का उल्लंघन किया था"।

इस पृष्ठभूमि को देखते हुए रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की कोलम्बो में 14 जनवरी की “वर्किंग विजिट” का महत्व काफ़ी बढ़ जाता है। यह यात्रा एक ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका ने इस बात के मद्देनज़र कि कोलम्बो को अपने “इंडो-पैसिफिक” वाली टोली में शामिल होने का दबाव बढ़ाया जा सके, जिसका निशाना चीन के खिलाफ होने जा रहा है, एक बार फिर से संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार आयोग जेनेवा में श्रीलंका पर युद्ध अपराधों और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर अपनी सक्रियता दिखानी शुरू कर दी है।

पारंपरिक रूप से श्रीलंका को यूएनएचआरसी में पश्चिमी देशों के प्रस्तावों के खिलाफ रूस और चीन के खेमे का हिस्सा मना जाता है। निश्चित तौर पर लावरोव ने फरवरी-मार्च में कोलंबो की बाँह मरोड़ने की आगामी अमेरिकी कोशिशों को रोक देने की अपनी प्रतिज्ञा को ही दोहराया होगा।

रूसी (और चीनी) कूटनीति को धक्का तब लगा था जब पिछली पश्चिम समर्थक सरकार द्वारा 2017 में अमेरिका के साथ अधिग्रहण और क्रॉस-सर्विसेज समझौते (एसीएसए) पर हस्ताक्षर किये गए थे। जबकि दूसरी ओर, वर्तमान में अमेरिका ने कोलंबो पर स्टेटस ऑफ़ फोर्सेज एंड मिलेनियम चैलेंज कॉम्पैक्ट समझौते पर हस्ताक्षर करने का दबाव बना रखा है, जो अमेरिकी सैन्य कर्मियों को इस द्वीप पर पेंटागन के हिन्द महासागर में अपनी योजनाओं को आधिकारिक तौर पर लागू करा सकने और प्रभुत्व हासिल करने के लिए क़ानूनी आधार मुहैया करा देगा।

इसमें कोई शक नहीं कि श्रीलंका आज हिंद महासागर की भू-राजनीति में एक निर्णायक स्थिति के रूप में है। यह भी एक रोचक संयोग है कि अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री ऐलिस वेल्स के साथ ही साथ चीनी राज्य पार्षद और विदेश मंत्री वांग यी 13-14 जनवरी को कोलंबो में एक साथ पाए गए।

किसी भी अन्य समय से कहीं अधिक आज रूस और चीन के लिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि श्रीलंका अपनी सामरिक स्वायत्तता और स्वतंत्र विदेश नीतियों पर कायम रहे। उम्मीद है कि मॉस्को और बीजिंग इस संबंध में आपसी समन्वय के साथ कदम बढ़ाएंगे।

इन दो बड़ी शक्तियों द्वारा द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर मजबूत राजनैतिक और राजनयिक समर्थन मुहैय्या होने पर कोलम्बो के लिए एक ऐसी स्थिति बन सकती है, जिसमें वह अमेरिकी दबाव को झटक सकने की स्थिति में हो जाए। रूस के श्रीलंका के साथ रक्षा समझौते भी हैं, जिसमें हथियारों की बिक्री भी शामिल है, जिसे वह और विकसित करने के लिए इच्छुक भी होगा।

और इन सबसे ऊपर लावरोव खुद श्रीलंका से लम्बे समय से संबद्ध रहे हैं, जिन्होंने अपने राजनयिक कैरियर की शुरुआत 1972 में कोलंबो से ही की थी। गोटाबया राजपक्षे और महिंदा राजपक्षे दोनों ही उनसे भली भांति परिचित हैं। इन सबसे ऊपर, लावरोव के शब्दों में दृढ़ विश्वास है, जिसे एलटीटीई युद्ध के दौरान मॉस्को द्वारा चट्टानी समर्थन देने में देखा जा सकता है।

जबकि इसके विपरीत मौजूदा इराक़ में हो रही दुर्दशा को देखते हुए, यदि कहीं एक बार भी अमेरिकियों को श्रीलंकाई धरती पर अपने धंधे को जमाने का भी मौका मिल जाता है तो उनको फिर से हटा पाना कोलंबो के लिए नामुमिकन हो जाएगा। इसे ट्रंप के इराक़ को धमकी देने से भी समझा जा सकता है कि, यदि बगदाद ने अमेरिकी सेना को अपने यहाँ से बाहर का रास्ता दिखाया तो उसे एक महत्वपूर्ण सरकारी बैंक खाते की पहुँच से हाथ धोने का जोखिम उठाना पड़ेगा।

वॉल स्ट्रीट जर्नल से उद्धृत, "विदेशी विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि, विदेश विभाग ने इस बात की चेतावनी दी है कि फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क में स्थित देश के केंद्रीय बैंक खाते में इराक की पहुंच को अमेरिका बंद कर सकता है, यह एक ऐसा कदम साबित होगा जो पहले से ही ख़राब हालत में चल रही इराकी अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका देने का काम करेगा।"

“दूसरे अन्य देशों की तरह ही इराक भी अपना सरकारी खाता न्यूयॉर्क फेड में रखता है, जो तेल की बिक्री से प्राप्त आय के अलावा देश के वित्त प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। खातों तक यदि इराक की पहुँच नहीं होती है तो वह उस राजस्व के इस्तेमाल से खुद को महरूम कर लेगा, जिसका नतीजा इराक की वित्तीय व्यवस्था में नकदी संकट के रूप में प्रकट होगा और यह अर्थव्यवस्था के लिए अति आवश्यक लोच को खातों तक पहुंच का नुकसान इराक के उस राजस्व के उपयोग को प्रतिबंधित कर सकता है, जिससे इराक की वित्तीय प्रणाली में नकदी संकट पैदा होता है और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण चिकनाई प्रदान करने में अवरोधक का काम कर सकता है।”

इस विषय में और जानकारी के लिए दो प्रसिद्ध अमेरिकी टिप्पणीकारों द्वारा प्रस्तुत एक उत्कृष्ट विश्लेषण को पढ़ सकते हैं, जिसका शीर्षक है हेज द ट्रम्प एडमिनिस्ट्रेशन नाउ लांचड अ मैक्सिमम प्रेशर कैम्पेन अगेंस्ट इराक़? (क्या ट्रंप प्रशासन ने इराक़ के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव का अभियान शुरू कर दिया है?)

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Russia
libya
Syrian Crisis
Russia Intervention
NATO
USA

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

रूस की नए बाज़ारों की तलाश, भारत और चीन को दे सकती  है सबसे अधिक लाभ

गुटनिरपेक्षता आर्थिक रूप से कम विकसित देशों की एक फ़ौरी ज़रूरत

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं

पश्चिम बनाम रूस मसले पर भारत की दुविधा

रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध का भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

यूक्रेन संकट : वतन वापसी की जद्दोजहद करते छात्र की आपबीती

लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें

यूक्रेन संकट, भारतीय छात्र और मानवीय सहायता

यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए


बाकी खबरें

  • बोलिवियाई लोगों को तख्तापलट करने वाली नेता जीनिन आनेज़ के जेल से भागने की आशंका
    पीपल्स डिस्पैच
    बोलिवियाई लोगों को तख्तापलट करने वाली नेता जीनिन आनेज़ के जेल से भागने की आशंका
    26 Aug 2021
    एपीडीएचबी ने इस बात को लेकर आगाह किया है कि देश में कुछ दूतावासों की मिलीभगत से मुख्य विपक्षी नेताओं द्वारा पूर्व डी-फैक्टो प्रेसिडेंट जीनिन एनेज के भागने की संभावित योजना बनाई जा रही है।
  • किसान आंदोलन के 9 महीने पूरे: सिंघू बॉर्डर पर किसानों का राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू 
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    किसान आंदोलन के 9 महीने पूरे: सिंघू बॉर्डर पर किसानों का राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू 
    26 Aug 2021
    इस दो दिवसीय सम्मेलन में किसान, महिलाओं, युवाओं और मजदूर संगठनों के 1,500 प्रतिनिधि हिस्सा लेने जा रहे हैं।
  • तालिबान के बहाने इस्लाम को बदनाम करने की तुच्छ राजनीति!
    अजय कुमार
    तालिबान के बहाने इस्लाम को बदनाम करने की तुच्छ राजनीति!
    26 Aug 2021
    भारत में कुछ राजनीतिक पार्टियां इस जुगत में हैं कि तालिबान के सहारे इस्लाम को खूब बदनाम किया जाए। जितना इस्लाम बदनाम होगा भारतीय समाज में ध्रुवीकरण की दीवार उतनी मजबूत बनेगी और चुनावी राजनीति में…
  • यूपी सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगे से जुड़े 77 मामले लिए वापस, नहीं बताया कोई कारण
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी सरकार ने मुज़फ़्फ़रनगर दंगे से जुड़े 77 मामले लिए वापस, नहीं बताया कोई कारण
    26 Aug 2021
    योगी सरकार ने साल 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे से जुड़े 77 मामले वापस ले लिये हैं, जिनका संबंध ऐसे अपराधों से है जिनमें उम्रकैद की सजा हो सकती है।
  • किसान बनाम भाजपा आईटी सेल, 9 महीने में किसान आंदोलन ने हिलाईं जड़ें
    बादल सरोज
    किसान बनाम भाजपा आईटी सेल, 9 महीने में किसान आंदोलन ने हिलाईं जड़ें
    26 Aug 2021
    किसान आंदोलन ने काफी हद तक भाजपा के उन्मादी और झूठे प्रचार की मारकता कम की है। उसने न सिर्फ इसके खंडन का काम किया  है बल्कि अपने सन्देश और तर्कों को ले जाने वाले नए जरिये भी तैयार किये हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License