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राजनीति
सर्केगुडा हत्याएँ :  न्यायायिक आयोग ने माओवादी संबंधों को नकारा, सशस्त्र बलों को ठहराया ज़िम्मेदार
सर्केगुडा, कोत्तागुडा और राज पेंटा के सात नाबालिगों सहित 17 आदिवासियों की सुरक्षा बलों ने उस वक़्त कथित तौर पर हत्या कर दी थी, जब वे अपने बुवाई के त्योहार यानी बीज पांडुम को मनाने की तैयारियों के लिए सर्केगुडागुड़ा में इकट्ठे हुए थे।
सौरभ शर्मा
05 Dec 2019
Translated by महेश कुमार
सर्केगुडा हत्याएँ
Image Courtesy : Deccan Herald

छत्तीसगढ़ के सर्केगुडा की रहने वाली कमला खाखा ने अपने भतीजे और चचेरे भाई को न्याय दिलाने के लिए संकल्प लिया था, जिन्हें 28 और 29 जून, 2012 की रात को सुरक्षा बलों ने कथित तौर पर मार डाला था। अब उनका यह संकल्प और मज़बूत हो गया है।

कमला ने न्यायमूर्ति वीके अग्रवाल न्यायिक आयोग की लीक हुई रिपोर्ट के बारे में कहा कि यह हमारी  सबसे बड़ी जीत है कि आयोग ने अपनी 78 पन्नों की रिपोर्ट में माना है कि जिन ग्रामीणों की सुरक्षा बलों ने बेरहमी से हत्या की थी, उनका माओवादी संगठन से कोई भी संबंध नहीं था और वारदात के वक़्त सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए ग्रामीणों की तरफ़ से किसी भी तरह की गोलीबारी नहीं हुई थी। 

कमला के भतीजे राहुल खाखा और चचेरे भाई सरस्वती खाखा मारे गए सात लोगों में से दो नाबालिग़ थे जिन्हें केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) और पुलिस ने मुठभेड़ में मार दिया था। यहाँ यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सर्केगुडा, कोत्तागुडा और राज पेंटा के सात नाबालिगों सहित 17 लोगों को सुरक्षा बलों ने उस वक़्त कथित तौर पर मार डाला था, जब वे बीज पांडुम यानी बुवाई के त्यौहार की तैयारियों के लिए सर्केगुडा में इकट्ठे हुए थे। छत्तीसगढ़ में बीज पांडुम आदिवासियों द्वारा मानसून की शुरुआत में बुवाई के मौसम से पहले मनाया जाने वाला त्योहार है।

न्यायिक आयोग की जांच का नतीजा

पूर्व न्यायमूर्ति विजय कुमार अग्रवाल के नेतृत्व में न्यायिक आयोग बना था जो 30 अक्टूबर को एक निष्कर्ष पर पहुंचा कि ग्रामीणों ने कभी भी सुरक्षा बलों पर गोलीबारी नहीं की और इसलिए उसके कोई भी सबूत नहीं मिले हैं।

सेवानिवृत्त मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की रिपोर्ट में कहा गया है, “इसके कोई भी संतोषजनक सबूत नहीं मिले कि टकराव नक्सल संगठन के सदस्यों के साथ था या वे बैठक में शामिल होने आए थे या वे बैठक के हिस्सेदार थे या वे सुरक्षा बल के साथ टकराव की घटना में शामिल थे। यह भी साबित नहीं हुआ है कि सुरक्षाकर्मियों के अलावा घटना में मारे गए और घायल हुए लोग नक्सली थे क्योंकि उस संबंध में कोई संतोषजनक सबूत नहीं मिला है।"

रिपोर्ट का एक हिस्सा कहता है, “पुलिस के दावे ग़लत थे और पुलिस गोलीबारी के मामले में कोई भी सबूत दाख़िल नहीं कर पाई है। दावे में त्रुटि थी और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई थी।"

सुरक्षा बलों की जघन्यता

“बीज पांडुम बैठक में आए 17 लोगों में से दस लोग पीठ पर गोली लगने से घायल हुए थे। इस तरह के भागते हुए व्यक्ति कभी भी सुरक्षा बलों के लिए कोई ख़तरा नहीं हो सकते थे और ऐसे लोगों को पीछे से गोली मारकर चोट पहुंचाना पूरी तरह से असंगत और बलों का अनुचित प्रयोग है।" रिपोर्ट आगे कहती है, "एक खाखा मिथुन को बहुत ही क़रीब से गोली मारी गई थी और गोली जानबूझकर चलायी गई थी न कि आत्मरक्षा में क्योंकि गोली सर के नीचे की तरफ़ लगी थी।” 

न्यूज़क्लिक द्वारा हासिल रिपोर्ट में आगे लिखा गया है, “इरपा सोमालू, कोर्सा बीचे, इरपा नारायण, हापका मिथुन, इरपा धर्मैया, मदकम दिलीप को बड़ी संख्या में छोटी-छोटी जगहों पर गोलियां लगीं हैं, जो आमतौर पर गोली के फटने के कारण होता है, लेकिन सुरक्षा बलों ने गोली के फटने से इनकार किया है जिसे वे उचित नहीं ठहरा पाए।”

वो मनहूस रात

कमला उस मनहूस रात को याद करती हैं जब वह लगभग 7:30 बजे काम से अपने गाँव वापस लौटी थी और अपने कमरे में आराम कर रही थी।

वो कहती हैं, “मैं रात क़रीब 8 बजे अपने कपड़े बदलने के बाद अपने कमरे में गई। पुरुष, लड़के और अन्य सदस्य बीज पांडुम की बैठक में जा रहे थे और गाँव में सभी लोग ख़ुश दिख रहे थे। हमने क़रीब 10 बजे पहली बार गोलियों की आवाज़ सुनी और फिर सुरक्षा बलों ने सभी दिशाओं से गोलीबारी कर हम पर क़हर बरपा दिया। मुझे सिर्फ़ यह याद रहा कि सुरक्षा बल ज़बरदस्ती घरों में घुस रहे थे, संपत्ति के साथ तोड़फोड़ कर रहे थे, लोगों को पीट रहे थे और मेरे चचेरे भाई और भतीजे की हत्या कर दी गई थी। सुबह हमने गांव में चारों ओर लाशों को पड़ा पाया और फिर, हमें पता चला कि 17 लोगों की सुरक्षा बलों ने हत्या कर दी है।”

उन्होने बताया, “फिर सुरक्षा बलों ने गांव के एक पुरुष को उठा लिया और उसे तब तक पीटा जब तक कि वह मर नहीं गया। हम उसकी लाश के बारे में पूछने पुलिस स्टेशन गए, लेकिन हमें लाश नहीं दी गई और उन्होंने उसे थाने के सामने ही दफ़ना दिया।"

क़ानूनी लड़ाई में दिक़्क़तें

इस मामले में बीजापुर के आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाली वकीलों में से एक शालिनी गेरा का कहना है कि यह उनके जीवन में लड़े गए सबसे मुश्किल केसों में से एक था।

उन्होंने बताया, “सुनवाई के लिए गवाहों को अदालत में लाना एक बड़ी चुनौती थी। शुरुआती दिनों में, आयोग ने आदिवासियों को कुछ सुविधा दी ताकि वे सुनवाई के लिए आ सकें, लेकिन आप एक बार सुनवाई के लिए बीजापुर, रायपुर, जगदलपुर और यहां तक कि भोपाल जैसे स्थानों की यात्रा करने में हुए दर्द की कल्पना करके देखें। आदिवासियों के सामने एक अन्य चुनौती उनको 'नक्सलियों' का लेबल देना था। सुरक्षा बलों के वकील ने गवाहों और वकीलों को नक्सली कहना जारी रखा, जो हमें कई बार असहज कर देता था लेकिन यह हमारी धैर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति ही थी कि हम न्याय के लिए लड़ते रहे।"

शालिनी गेरा कहती हैं, "छत्तीसगढ़ में मुठभेड़ अक्सर होती रहती है और सरकार को उन मामलों में निष्पक्ष जांच के आदेश देने चाहिए, जहां ग्रामीण ऐसी मुठभेड़ पर सवाल उठाते हैं।"

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Sankerguda Killing: Judicial Commission Denies Maoist Connection, Puts Onus on Armed Forces

Sankerguda Killing
V K Agarwal Commission
Shalini Gera
CRPF
Chattisgarh

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